सियासत के ढंग निराले और अवाम उस से भी निराली

सियासत के ढंग निराले और अवाम उस से भी निराली

सियासत के ढंग निराले ही रहे हैं और अवाम उस से भी निराली।

मृत्युशैया पे 57 दिनों तक पडे रहे गंगा पुत्र भीष्म पितामह अथाह पश्चाताप में करहाते रहे, ताकत अहंकार महत्वाकांक्षा को ना तब समझा माना गया ना ही इस दौर में।

ईर्ष्या, दूसरों से घृणा, असंतुष्ट, शंकालु प्रवृत्ति और पराश्रित न राज्य के अनुकूल होता है न ही नागरिकों के लिये हितकारी।

वर्तमान काल में जनता सियासत को किसी कसौटी पे कसने की बजाय खुद को परखने में लगी हुयी है।

राजनीति में समान्तर शक्ति विपक्ष की भूमिका में सता को नियंत्रित मार्ग पर रहने को बाध्य करती है। समान्तर शक्ति विभिन्न नागरिकों समूहों के अधिकारों की मुखर आवाज के रूप में सता को सचेत रखती है।

विपक्षी राजनीतिक दल आमजन के अंतरद्वंद्व को समझ पाने में लगभग नाकाम ही हैं। यह स्थिति सताधारी पार्टी के लिये स्वतः अनुकूल है। हालाँकि उपलब्धियों के नाम पर सत्ता से कुछ ठोस हुआ भी नहीं। प्रदेश के हालात सुधारने से बजाय सामाजिक प्रयोगों पर प्रयास केन्द्रित रहे जिसके कोई प्रत्यक्ष लाभ से आमजन वंचित ही रहा।

दूरदर्शिता से शून्य विपक्षी आवाजें केवल अपने अस्तित्व तक ही सीमित हो कर रह गयी हैं। सरोकार व विस्तार के अभाव ने संघर्ष को हाशिये पर ला दिया है। अपराध बोध से ग्रसित विपक्ष अपनी दूरदर्शिता के ग्रहण में उलझा हुआ है। विपक्ष का राजनीतिक साहस किसी जोखिम को उठाने में असमर्थ है।

अभूतपूर्व संकट के काल में बेबस व वंचित आमजन अधिकारों से विमुख हो कर अपने भाग्य को नियति मान आस्था के प्रतीकों मे समाधान खोजने में व्यस्त है। वास्तविकता से विमुख जनता आडम्बर के उत्सवों को ही उपलब्धियां मान रही है।

एक बड़े प्रदेश के आने वाले विधानसभा चुनावों मे सत्ताधारी दल और उसके सहयोगी संगठन तथा केन्द्रीय नेतृत्व व प्रादेशिक नेतृत्व के भीतर का संघर्ष कुछ घटनाओं से धरातल पर उभरने लगा है। प्रदेश में दुबारा जीत कर सत्ता हासिल करने की आशंका एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।

विपक्षी राजनीतिक दलों की ताकत व भूमिका की निष्क्रियता के आकलन के बावजूद केंद्रीय सताधारी नेतृत्व प्रदेश की जनता के आक्रोश से गंभीर चिंतित है। बड़ी विफलताओं को ढंकने के प्रयासों के बाद भी गिरी साख जीत में बड़ी फांस बन गयी है जिसके कोई ठोस समाधान दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहे।

विगत में एक अन्य प्रदेश के चुनावों में असफलता के सदमे ने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह नीतियों और नेतृत्व के भविष्य पर लगा दिया है। एक आशंका ने सत्ताधारी दल में अप्रत्याशित हलचल को बढ़ा दिया है। सामाजिक समीकरणों को खंगालने व पुनर्परिभाषित करने की जोड़-तोड़ से राजनीतिक लाभ की खोज के भरसक प्रयास होने लगे हैं।

राजनीति के नये रूप में किसी संभावित विपक्षी शक्ति को भ्रामक प्रचार से निष्क्रिय करने के हर पैंतरे के प्रयोग नये आदर्श बन चुके हैं।

प्रदेश में जीत को प्राप्त करने के लिये मोहरों की शह मात से बढ कर ऊँट घोड़े हाथी वजीर रानी के साथ कौन सी ढाई चाल को सियासत तय करेगी ये फिलहाल एक पहेली है।

जगदीप सिंह सिन्धु

sindhu jagdeep
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