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दुनिया “एक चट्टान के कगार पर है” ! कई संकट आने की आशंका

दुनिया “एक चट्टान के कगार पर है” ! कई संकट आने की आशंका

वैश्विक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग

इज़राइल के ख़ुफ़िया मंत्रालय ने देश की पहली राष्ट्रीय ख़ुफ़िया अनुमान रिपोर्ट, मीडिया रिपोर्ट का अनावरण किया है। रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया “एक चट्टान के कगार पर है” जिसमें जीवन के सभी पहलुओं, विशेष रूप से स्वास्थ्य, ऊर्जा और पानी पर कई संकट आने की आशंका है।

आज तृतीय विश्व-युद्ध के कगार पर है दुनिया

चूँकि युद्ध दो महाशक्ति देशों के बीच चल रहा है (हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से), तृतीय विश्व-युद्ध का अंत परमाणु युद्ध से होगा, परिणाम की चर्चा नहीं करेंगे। इतना कहना काफ़ी होगा कि परमाणु युद्ध की आशंका बहुत कम है पर फिर भी आशंका बनी हुई है। द्वितीय विश्व-युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु हमले के बाद आज फिर से इसकी आशंका बनी है, जो 1962 के क्यूबा संकट से बहुत भी ज़्यादा गहरा है।

वैसे भी दुनिया में कई जगह और कई देशों के बीच अघोषित युद्ध चल रहे हैं; जैसे फिलिस्तीन, सीरिया (अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं सीरिया में, जो वहाँ से 2003 युद्ध के बाद से आज तक क़रीब 150 अरब डॉलर का तेल लूट चुका है सैन्य बल द्वारा), यमन, इथोपिया, म्यांमार, आर्मीनिया-अज़रबैजान, सर्बिया-कोसोवो, आदि।

मेहनतकश जनता के ख़िलाफ़ विश्व के अधिकांश देश फ़ासीवादी चरित्र अख़्तियार कर रहे हैं और उन्हें सीधे-सीधे लूट रहे हैं। लूट में कई पीढ़ियों द्वारा दशकों से संचित सार्वजानिक संपत्ति, प्राकृतिक संसाधन, बैंक, बीमा कंपनी आदि शामिल हैं। ये लूट सिर्फ़ श्रमशक्ति का ही नहीं है बल्कि सीधे-सीधे आम जनता, किसान, आदिवासी और निम्न पूँजीपति वर्ग का भी है।

भारत और एशिया के देशों की चर्चा इतनी ही काफ़ी होगी कि कुछ देशों के नाम इंगित कर दें-भारत, म्यांमार, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका। वैसे अन्य देशों में लैटिन अमेरिका और यूरोप के भी दर्ज़नों देश हैं।

पेरू का उदाहरण देखें।

फ़ासीवादी दक्षिणपंथी विचार आख़िरकार 7 दिसंबर, 2022 को वह करने में सक्षम हो गया जो वह एक साल से अधिक समय से करने की कोशिश कर रहा था- देश (पेरू) के निर्वाचित राष्ट्रपति को हटा दिया और उन्हें जेल में डाल दिया। यह सारा आपराधिक कार्य अमेरिकी साम्राज्यवादी शक्ति की देख-रेख में हुआ और उसकी पिट्ठू सरकार बनी।

अमेरिका और इंग्लैण्ड में ग़रीबी तेज़ गति से बढ़ रही है और इस ठंडे समय में लाखों घर बेरोज़गारी, ठंड, बीमारी और भूख के शिकार होंगे। इसी की चेतावनी इज़राइल का ख़ुफ़िया-तंत्र दे रहा है न?

इंग्लैण्ड में क़रीब 22% जनता ग़रीबी-रेखा के नीचे है जो आँकड़ा 1.5 करोड़ बनता है। यहाँ महँगाई 10-11% के बीच है, बेरोज़गारी दर 3.7% है। अमेरिका में ग़रीबी दर 12.8%, महँगाई दर 7.1% और बेरोज़गारी दर 3.5% है। जबकि ये दरें पूरे यूरोप को लें तो 22.5%, 10.6% और 6% हैं।

यानी उन्नत पूँजीवादी “प्रजातांत्रिक” देशों की स्थिति ख़राब ही नहीं है बल्कि भयावह है।

यूएनएचसीआर (UNHCR) के आँकड़ों के हिसाब से विश्व भर में क़रीब 9 करोड़ लोगों को ज़बरन विस्थापित किया गया है। इतने बड़े स्तर पर शरणार्थी क्यों हैं? कारण हैं उत्पीड़न, हिंसा, मानवाधिकारों का उल्लंघन, युद्ध, ख़तरनाक वातावरण (जिसमें बाढ़ से लेकर अकाल या सूखा तक शामिल है), दंगे, ख़ासकर राज्य प्रायोजित नरसंहार शामिल हैं, दीर्घकालिक बेरोज़गारी, महामारी आदि। यहाँ बेघर लोगों की बातें नहीं हो रही हैं जो इनसे कई गुना ज़्यादा हैं। सिर्फ़ भारत में एक आँकड़े के अनुसार, इनकी संख्या क़रीब 2-3 करोड़ है, जिनके पास आधार कार्ड या मतदाता कार्ड नहीं हैं, यानी ये लोग सिटिज़न अमेंडमेंट एक्ट (नागरिकता संशोधन अधिनियम) और एनआरसी – नैशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजन के हिसाब से भारतीय नहीं हैं। ये लोग वैसे भी भारतीय उत्पादन और वितरण-प्रणाली से बाहर हैं और एक जानवर की ज़िंदगी जीते हैं। राजनीति में इनकी कोई हस्ती नहीं है, मतदान नहीं कर सकते हैं। ये लोग सड़क के किनारे पेड़ों, ह्यूम पाइप, नाले, शहर के बाहर त्रिपाल लगाकर रहनेवाले लोग हैं। ये अक्सर फेंके हुए भोजन और जीने के अन्य साधन इकठ्ठा करते हुए पाए जाते हैं सडकों, गलियों, गंदी बस्तियों में पाए जाते हैं।

आपातकाल में बदल रहा है जलवायु-संकट

वातावरण और पानी की समस्याओं पर ‘लोकपक्ष’ के पिछले अंकों पर चर्चाएँ की गई हैं। इसलिए संक्षेप में कहना काफ़ी होगा कि जलवायु-संकट आपातकाल में बदल रहा है। भारत जैसे देश में भी हवा में प्रदूषण सैकड़ों लोगों को हर रोज़ बीमार बना रहा है जो ख़तरनाक स्तर पर पहुँच चुका है और यह स्थिति सिर्फ़ दीवाली या किसी पर्व के समय की नहीं है बल्कि साल-दर-साल की बात है। दक्षिण कोरिया में समुद्र स्तर 10 सेंटीमीटर (3.9 इंच) ऊपर आ चुका है, सिर्फ़ पिछले 33 वर्षों में।

क्या सच में आबादी विस्फोट है?

आबादी विस्फोट एक मिथ्या प्रचार है जो असली मुद्दों को छुपाने की कोशिश भर है। मनुष्यों की आबादी उनके द्वारा पैदा किए गए उत्पाद, स्वास्थ्य और शिक्षा-व्यवस्था में बढ़ोतरी, विज्ञान और तकनीकी विकास के पीछे रहता है। समस्या उत्पाद और साधनों की कमी की नहीं है बल्कि वितरण को लेकर है।

अज्ञानता और अन्धविश्वास भी आज एक वैश्विक बीमारी है जो मनुष्यजनित है। इन्हें बढ़ाया जाता है योजना के तहत। पूंजीपति वर्ग और उसके चापलूस राजनीतिक दल, सरकारी और तथाकथित स्वतंत्र संस्थाएँ आदि अनवरत अज्ञानता और अंधविश्वास फैलाते हैं।

यह सर्वविदित है कि झूठ पर आधारित प्रचार अरबों का व्यापार है और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सेवाएँ प्रदान करती हैं सरकारों, राजनीतिक दलों, बड़े एनजीओ, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों को। बड़े-बड़े कुलीन घराने, पूँजीपति और वित्तपति इन्हें करोड़ों में अनुदान भी देते हैं, जिसे हम “मानवीय” कार्य कहते हैं। कुंद दिमाग़ (तार्किक दिमाग़ का विपरीत) का आधार अधिकांशतः बचपन से ही शुरू हो जाता है। कुछ तो अपने परिवार और पड़ोस से, बाक़ी विद्यालय की कक्षा एलकेजी, एक-दो से ही शुरू हो जाता है। वर्ग 10 के बाद से महाविद्यालय और विश्वविद्यालय तक पाठ्यक्रम बहुत महँगे ही नहीं बल्कि अवैज्ञानिक ही रहते हैं। उद्देश्य “शिक्षित” और निपुण मज़दूर पैदा करना है जो सत्ताधारी वर्ग के ख़िलाफ़ विद्रोह न करे।

जनता को मूर्ख बनाना और युद्ध करना इनकी मजबूरी है ताकि वे अपनी सत्ता बनाए रखें। ऊपर के कुछ आँकड़ों को प्रस्तुत करना इस लेख की मंशा नहीं है। ये सारे गूगल या किसी अन्य इन्टरनेट पर आधारित सेवाओं से प्राप्त किए जा सकते हैं।

कई निम्न पूँजीवादी लेखक, चाटुकार, उदारवादी लेखक, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और पत्रिकाएँ भी ऐसे लेख लिखते रहते हैं और मालिक वर्ग को आगाह करते रहते हैं कि पानी सर से ऊपर जा रहा है। बौद्धिक वर्ग भी ऐसी स्थिति से निवारण के लिए यदा-कदा आंदोलन करते रहते हैं और कई बार तो सामाजिक लोकतांत्रिक और यहाँ तक कि “वामपंथी” दल भी हज़ारों लाखों में भीड़ भी इकठ्ठा करते हैं और शोर मचाते हैं कि अब वे क्रांति ही कर बैठेंगे।

फ़्रांस, लैटिन अमेरिका के कई देश, भारत, श्रीलंका, यूरोप के अन्य देश, अफ़्रीकी देशों में ऐसे कई किलोमीटर लंबी रैली और प्रदर्शन होते रहते हैं। पूँजीपति वर्ग इनसे कोई ख़ास परेशान नहीं होते हैं। फ़ासीवाद, नाज़ीवाद या खुलेआम तानाशाही का इस्तेमाल घटती मुनाफ़ा दर को बढ़ाने के लिए किया जाता है ताकि बदहाल मेहनतकश जनता प्रतिरोध न करे, सीधे-सीधे उन्हें लूटा जा सके।

बाज़ार में हिस्से के लिए लड़ाइयाँ तो होती रहती थीं, अभी भी हो रही हैं, पर अब युद्ध का इस्तेमाल “युद्ध-उद्योग” के लिए किया जा रहा है।

मुनाफ़ा दर काफ़ी है, बाज़ार में हक ज़माने के लिए साम्राज्यवाद का आसान हथियार है, जनता को उसके ज्वलंत मुद्दों से हटाने के लिए, और ख़ुद की आयु अर्थात ऐतिहासिक रूप से ख़त्म पूँजीवाद को जीवित रखने का षड्यंत्रकारी कार्यक्रम।

तो सवाल है हम, सर्वहारा वर्ग क्या करें? जब तक पूँजी जीवित है चाहे जिस भी रूप में हो (औद्योगिक या बैंक पूँजी, वित्त पूँजी, एकाधिकार पूँजी, काल्पनिक पूँजी आदि) मानवश्रम का शोषण जारी रहेगा। पूँजी की नियति है या मजबूरी है, पूँजी और उत्पादन का संचय और एकाग्रता, यानी इसे बढ़ाना है। ठहराव मतलब ख़ात्मा यानी मौत, प्रतियोगिता के कारण, अपने ही बंधुओं से। बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। यानी पूँजी का पुनरुत्पादन बढ़ते स्तर पर और मज़दूरों का ग़रीबीपन और उत्पादन-वितरण यानी समाज से बहिर्गमन, चाहे जिस भी रूप में हो। पृथ्वी का वह गुण ख़त्म होना, जिसके कारण हम सभी क्रमागत उन्नति (Evolution) के कारण आज यहाँ पर हैं।

अतः सभी मानवकृत शोषण, प्रतारण, अज्ञानता, अंधविश्वास, युद्ध आदि का अंत पूँजीवाद के अंत से ही संभव है और यह एक ऐतिहासिक नियति है। हालांकि ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं होगा बल्कि एक सचेत और सोचे-समझे बदलाव के द्वारा ही होगा। यह बदलाव कुछ ख़ास लोगों के द्वारा नहीं, शिक्षिकों और दार्शनिकों द्वारा नहीं, बल्कि मज़दूर वर्ग और प्रताड़ित जनता के द्वारा एक क्रांतिकारी रास्ते से ही संभव है। ऐसा नहीं होने पर हम पूरे के पूरे बर्बादी की ओर अग्रसर तो हो ही रहे हैं और बर्बाद भी हो जाएँगे| यहाँ से मात्र दो ही रास्ते हैं- पूरी बर्बादी के साथ असभ्यता की ओर, या फिर समाजवाद।

इस संघर्ष को सर्वहारा वर्ग द्वारा पूँजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ वर्ग-संघर्ष कहते हैं जो हमेशा लगातार प्रक्रिया में है। मज़दूर वर्ग की ढहते जीवन के आधार को रोकने की कोशिश और पूँजीपति वर्ग की मुनाफ़ा दर को बढ़ाने की कोशिश इस वर्ग-संघर्ष का आधार है जो वर्ग विभाजित समाज की उत्पत्ति और विकास के साथ शुरू हुआ और आज तीव्रतम है और वर्गविहीन समाज के साथ ख़त्म हो जायेगा। सर्वहारा वर्ग (मज़दूर वर्ग) समाज का वह हिस्सा है जो उत्पादन के साधनों से महरूम है और इस कारण विवशतावश उसे अपनी श्रमशक्ति को बेचना पड़ता है, मज़दूरी के लिए, जीवनयापन के लिए। इस ऐतिहासिक संघर्ष में सर्वहारा-वर्ग सबसे आगे है क्योंकि इसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। वर्ग विभाजित मानव समाज में यह वर्ग सबसे अधिक अग्रसर, जागरूक और जुझारू वर्ग है। इस वर्ग की तुलना निम्न पूँजीपति या मध्यम-वर्ग, श्रम अभिजात्य वर्ग से कर सकते हैं।

आसन्न सर्वहारा क्रांति या समाजवादी क्रांति के लिए मज़दूर-वर्ग और इसके सहयोगी वर्ग को क्रांतिकारी विचारधारा से लैस करना क्रांतिकारी दल का राजनीतिक काम है। राजनीतिक सत्ता क़ायम करना और समाजवादी समाज का निर्माण करना ही वैश्विक सर्वहारा-वर्ग का कार्यभार है, जो हर देश के मज़दूर-वर्ग अपनी क्रांतिकारी पार्टियों के साथ पूरा करेंगे एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भाईचारा क़ायम रखते हुए!

कैप्टन केके सिंह

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व रक्षा विशेषज्ञ हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर पैनी निगाह रखते हैं।

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