अवसाद और मनोविश्लेषण की सैद्धांतिकता

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

अवसाद और मनोविश्लेषण की सैद्धांतिकता (Theoreticity of Psychoanalysis or Structure of ideology of psychoanalysis and Depression) पर एक चर्चा

(30 जून को लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संगठन आइसा के फेसबुक लाइव पर पढ़ा गया आलेख)

अरुण माहेश्वरी

पिछले दिनों बॉलीवुड के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्म-हत्या पर जब तमाम माध्यमों पर काफी चर्चा चल रही थी, उसी वक्त हमने अपनी फेसबुक वाल पर अवसाद के विषय में एक पोस्ट लगाई थी। वह पोस्ट वास्तव में हमारी तैयार हो रही एक पुस्तक से निकाला गया अंश था, जो मनोविश्लेषण के क्षेत्र में सिगमेंड फ्रायड के बाद के अब तक के सबसे दक्काक मनोविश्लेषक जॉक लकान को केंद्र में रख कर लिखी जा रही है। हमने उस पुस्तक का शीर्षक रखा है — ‘अथातो चित्त जिज्ञासा’। यह हमारी उसी पोस्ट का परिणाम है कि कुछ मित्रों ने आग्रह कर दिया कि मैं इस विषय पर कुछ और प्रकाश डालूं।

सोशल मीडिया पर अभी जो लाइव टेलिकास्ट्स का सिलसिला चल रहा है, मुझसे उसी में पेश होने के लिये कहा गया। आज की हमारी चर्चा उसी आग्रह का परिणाम है। सचमुच यह हमारे काल की एक विशेषता है कि आप खुद भले किसी भी समारोह में शामिल होने की गहमा-गहमी से बचना चाहे, पर आपको घर बैठे ही कहीं ज्यादा बृहत्तर समारोह में शामिल करा लिया जा सकता है !

बहरहाल, आज के विषय पर आने के पहले शुरू में ही मैं मित्रों को यह साफ कर देना चाहता हूं कि मैं कोई वास्तविक अर्थ में मनोविश्लेषक नहीं हूं, अर्थात् वह नहीं हूं जिसे practicing psychoanalyst कहते हैं। उस ओर न हमारा अभी कोई रूझान है और न आगे के लिये ही वैसी कोई योजना है। किसी मनोरोगी को खास तौर पर समझने और उसके उपचार के विषय पर विचार करने की तरह का हमारा जरा भी कोई इरादा नहीं है। वैसे यह काम स्वयं में आदमी के रोजमर्रे के जीवन की एक गतिविधि भी हुआ करती है। जब भी हम किसी दूसरे व्यक्ति से संवाद करते हैं, उसमें और उससे  हमेशा अपनी बात पर एक खास प्रकार की प्रतिक्रिया की उम्मीद पालते हैं। उसे अपनी बात प्रेषित कर कुछ कहना चाहते हैं अथवा उससे कुछ सुनना चाहते हैं। इसे ही फ्रायड ने everydey psychology कहा था। लेकिन ऐसे किन्हीं आपसी व्यवहार के नुस्खों को भी यहां हमारा विषय बनाने का हमारा कोई इरादा नहीं है।

मित्रो, मनोविश्लेषण के प्रति हमारा आग्रह शुद्ध रूप से सैद्धांतिक है, आदमी के अंतर का जगत जिस इच्छा, ज्ञान और क्रिया की श्रृंखला से नियमित होता है, गति पाता है, उसके दर्शन को, उसकी गति के नियमों को जानने-समझने का है। यही वजह है कि शुरू में ही हम आप सबसे कुछ अतिरिक्त धीरज और concentration का निवेदन करना चाहेंगे।

हम इस बात को समझते हैं कि जो भी इस प्रकार के विचारधारात्मक संरचना से जुड़े विषयों से पूरी तरह अपरिचित हैं, उन्हें इस विवेचन से संगति बनाए रखने में कुछ कठिनाई हो सकती है। इसके बावजूद यहां अवसाद और मनोविश्लेषण की सैद्धांतिकी के विषय पर हमसे जो और जितना बन पड़ेगा, रखने की कोशिश करूंगा। उम्मीद है कि पूरी चर्चा आपमें कुछ न कुछ विचारात्मक उत्तेजना का हेतु जरूर बनेगी।

मित्रो, मार्क्सवाद के एक विद्यार्थी के नाते हम देखते हैं कि मार्क्स ने पूंजी, उसके अपने गठन, और उस पर टिकी समाज व्यवस्था के अध्ययन के जरिये सामाजिक जीवन में गति के ऐतिहासिक नियमों की खोज की थी और वस्तुतः उन्हें ही पूरी तरह से पुष्ट करने में उनकी पूरी जिंदगी लग गई थी। ऐसा उन्होंने आदमी के जीवन-जगत के प्रश्नों के वस्तुनिष्ठ कारणों की तलाश में ही किया था। लेकिन यह सच है कि मानव जीवन के कुछ दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्र, जिनके प्रति खुद मार्क्स में बहुत गहरा आकर्षण था और जिनके महत्व को वे राजनीतिक अर्थशास्त्र के अपने मूल विषय से किसी भी मायने में कमतर नहीं समझते थे, उन पर अपेक्षित गहराई और विस्तार से काम करने का वे समय ही नहीं निकाल पाए थे। इनमें एक सबसे प्रमुख क्षेत्र था साहित्य और कला का क्षेत्र, सौन्दर्यशास्त्र का क्षेत्र। आदमी के आत्मिक जगत की संरचना का क्षेत्र। और, यही वजह रही कि पूंजी की तरह का इतना विशाल और युगान्तकारी काम करने के बावजूद मार्क्स की ज्ञान पिपासा कभी संतुष्ट नहीं हुई थी। जीवन के अंत के दिनों में वे अपने दामाद पॉल लफार्ग के सामने इस बात पर अफसोस जाहिर कर रहे थे कि वे अपने प्रिय उपन्यासकार होनोरीद बाल्जक (1799-1850) पर जितनी गहराई से काम करना चाहते थे, नहीं कर पाए।

उनका यह अफसोस इसलिये नहीं था कि वे अपने समकालीन इस महत्वपूर्ण और प्रिय उपन्यासकार के साथ न्याय नहीं कर पाए। दरअसल, उनकी इस चिंता के केंद्र में भी मूलतः मनुष्य था, मनुष्य जो साहित्य और कला के नाना रूपों में अपने अंतर के तमाम आयामों को व्यक्त करता है, उस मनुष्य के अंतर के गठन और उसके नियम को समझने का था। साहित्य और कला का क्षेत्र, बल्कि जिसे सौन्दर्यशास्त्र का क्षेत्र कहते हैं, वह आदमी के अपने एक अलग जगत का क्षेत्र है, जिसे दूसरे शब्दों में उसके सामाजिक संसार से भिन्न उसके शरीर और उसके भाषाई जगत की निर्मिति कहा जा सकता है। एक शब्द में यह आदमी के चित्त का विषय है। मनुष्य के दैनंदिन व्यवहार को समझने के लिये इतना समझ लेना ही काफी नहीं होता है कि वह एक सामाजिक प्राणी है, बल्कि हम आगे यह देखेंगे कि वह अपने आप में बेहद नाकाफी होता है।

मित्रो, हर वस्तु के अपने जगत की तरह ही इसके गठन के भी अपने ही स्वतंत्र नियम होते हैं। जैसे मार्क्स कहते हैं कि हर चीज के दो पहलू होते हैं, एक उसका ठोस रूप और दूसरा उसकी अवधारणा का शाब्दिक, संकेतमूलक रूप। माल का एक ठोस भौतिक रूप और उसका मूल्य रूप, और मूल्य का भी एक उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य, use value and exhange value। माल के विनिमय मूल्य को मूलतः मार्क्स माल के मूल्य का एक अवधारणात्मक रूप मानते है, सांयोगिक, accidental रूप कहते हैं। माल के मूल्य के इस रूप के संघटन के पीछे प्राकृतिक पदार्थों और श्रम की तरह की कई ठोस चीजों का योग होने के बावजूद मार्क्स ने एक कहा था कि यह मूलतः “व्यावहारिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल की गई एक कामचलाऊ तरकीब है” (a makeshift for practical purposes)। अर्थात् विनिमय मूल्य को तय करने के पीछे माल से जुड़े ठोस कारणों के बजाय समाज की अपनी कुछ व्यवहारिक जरूरतें काम करती रहती है।

पर  इसमें सबसे गौर करने की बात यह है कि माल का यही विनिमय मूल्य स्वयं में इतना महत्वपूर्ण होता है कि जिसे हम पूंजीवादी समाज का पूरा तानाबाना कहते हैं, वह पूरी तरह से इसी पर टिका होता है। कह सकते हैं, पूंजी के आत्म-विस्तार की प्रक्रिया का अकेला रूप। माल के मूल्य के बारे में इस प्रकार की कामचलाऊ तरकीब को ही सर्वमान्य सत्य मान कर चलने की प्रवृत्ति को ही मार्क्स ने माल के प्रति अंध श्रद्धा (commodity fetishism) के मूल में देखा था, जिस fetishism के रहस्य को समझे बिना पूंजीवादी समाज के सत्य की गहराई में प्रवेश करना नामुमकिन होता है।

मित्रो, इस प्रकार जैसे पूंजी के आत्म-विस्तार और उसकी गतिशीलता के ठोस रूप के पीछे उसके अपने आंतरिक जगत की जरूरतों का एक नियम प्रमुख रूप से काम करता है, उसी प्रकार हर परिवर्तनशील वस्तु की गति के पीछे उसकी अपनी जरूरत के कुछ आंतरिक नियम होते हैं। कहा जा सकता है कि मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन का यही मूलभूत सत्य है। यह इसी अर्थ में शुद्ध भौतिकवादी दर्शन नहीं है, क्योंकि इसमें किसी भी विषय के अपने आंतरिक नियमों को उसके भौतिक प्रकट से कम नहीं, बल्कि समान महत्व दिया जाता है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की इसी बुनियाद पर जब हम हमारे जगत के सबसे प्रमुख प्राणी मनुष्य पर गौर करते हैं तो हम पाते हैं कि उसके जितना परिवर्तनशील प्राणी तो कोई दूसरा है ही नहीं। जब हम इस मानव प्राणी को एक प्रमाता के रूप में, एक सब्जेक्ट, एक विषय बना कर उस पर विचार करते हैं तो हम साफ तौर पर देखते हैं कि यह प्राणी महज एक शरीर नहीं है। इसके साथ ही जुड़ा हुआ उसका एक अलग विराट, ब्रह्मांड की तरह लगातार फैलता हुआ विशाल आंतरिक जगत भी है, जो उसका प्रतीकात्मक जगत, symbolic order कहलाता है, जिसे हम अपनी भाषा में आदमी का चित्त कहते हैं। वह मूलतः उसका एक भाषाई और संकेतों के आधार पर निर्मित जगत है। मनुष्य की शारीरिक-सामाजिक जरूरतों पर टिका उसका पल-पल बदलता आंतरिक भाषाई जगत।

मित्रो, हमारा यह मानना है कि कार्ल मार्क्स के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के नियमों को तो दुनिया के तमाम मार्क्सवादियों ने, और यहां तक कि गैर-मार्क्सवादियों ने भी समझने के तमाम यत्न किये हैं और उन पर सामाजिक परिवर्तन के आंदोलनों के जरिये अपने प्रकार से नाना सामाजिक प्रयोग भी किये गये हैं। लेकिन जहां तक आदमी के आंतरिक जगत का सवाल है, इस पर अभी तक भी यथोचित ध्यान नहीं दिया जा सका है। बल्कि इसके बारे में किये गये मार्क्सवादी विश्लेषणों में अक्सर एक अजीब प्रकार की यांत्रिकता देखी जाती है। आदमी की वर्गीय, लैंगिक तथा दूसरी सामाजिक पहचान की श्रेणियों, catagories पर कुछ इस प्रकार अतिरिक्त बल दिया जाता है जिनसे लगता है कि आदमी का अंतर महज उसकी इन सामाजिक पहचान के तत्त्वों से ही गठित हुआ है, उसके अपने भाषाई, प्रतीकात्मक पक्षों की, उसके चित्त की प्रक्रियाओं की उसमें अपनी कोई भूमिका ही नहीं होती है। इस प्रकार के तथाकथित ‘वस्तुनिष्ठ’ वर्गीकरणों के कारण मनुष्यों के आचरण का विश्लेषण जैसे किसी फार्मूले में बांध कर किया जाने लगता है। कोई मजदूर है तो उसका सामाजिक व्यवहार ऐसा होगा, किसान का वैसा होगा, स्त्री का यह होगा, तो दलित का कुछ और होगा, हिंदू का ऐसा तो मुसलमान का वैसा। अर्थात्, जो होगा, वह किसी न किसी रूप में एक पूर्वकल्पित तयशुदा खांचे में बंधा होगा। साहित्य में सामान्यीकरण का सिद्धांत भी बुनियादी तौर पर इसी समझ पर टिका हुआ है, जिसमें हर पात्र को किसी वर्ग, लिंग, जाति, धर्म आदि का प्रतिनिधि मान लिया जाता है। जबकि इन सबके विपरीत सच यह है कि मनुष्य का अपना भी स्वतंत्र रूप में बहुत कुछ ऐसा है जिन्हें महज इन सामाजिक वर्गीकरणों के जरिये व्याख्यायित नहीं किया जा सकता हैं। बल्कि इन वर्गीकरणों से आदमी के विशाल विस्तृत आत्म-संसार का न्यूनतम अंश ही व्यक्त होता हैं। यही वजह है कि अनेक मार्क्सवादी विश्लेषणों में आदमी की आकांक्षाओं, उसकी वासनाओं, उसके प्रेम, सुख-दुख की भावनाओं आदि-आदि को समग्रता में समझने के लिये जिस प्रकार के अतिरिक्त परिश्रम की जरूरत होती है, उसकी कमी दिखाई देने लगती है और वे सारे विश्लेषण अंततः बेहद ऊबाऊ और लगभग एक जैसे प्रतीत होने लगते हैं। वे आदमी के सत्य को उसकी परिवर्तनशील नैसर्गिकता के साथ विश्लेषित करने में विफल होते हैं और इसीलिये अक्सर आदमी की नैसर्गिकता से जुड़ी साहित्य और कला की कृतियों के विश्लेषण में भी उन्हें अपेक्षित रूप में उपयोगी नहीं पाया जाता है।

मित्रो, मनुष्य के प्रति इस प्रकार के आंशिक और यांत्रिक दृष्टिकोण के समग्र परिणाम आज हमारी आंखों के सामने हैं। मार्क्सवादी विश्लेषण के औजार अर्थ-जगत के नियमों के मामले में जितने कारगर दिखाई देते हैं, अर्थनीति से प्रभावित होने वाले मनुष्यों के चित्त को पकड़ने के मामले में अक्सर उतने ही कमजोर जान पड़ते हैं। परिवर्तन की प्रक्रिया में मनुष्यों के जिस सचेत हस्तक्षेप को मार्क्सवादी अपने क्रांतिकारी प्रकल्प के रूप में अपनाए हुए हैं, वह प्रकल्प अपने लक्ष्य से आज जैसे हर बीतते दिन के साथ और दूर, और दूर होता हुआ दिखाई पड़ता है। आज के समय की इतनी भारी प्रतिकूलताओं में मनुष्यों से अपेक्षित क्रांतिकारी व्यवहार लगभग असंभव सा लगने लगता है।

मित्रो, कहना न होगा, किसी के लिये भी उसकी आकांक्षा की पूर्ति की यही असंभव परिस्थिति वह परिस्थिति है जिसमें आदमी के कथित अवसाद के बीज पड़ा करते हैं, जिसे आज हमारी चर्चा का विषय रखा गया है। इसे राजनीतिक संगठनों के मामले में भी देखा जा सकता है।

मार्क्स में उनके आखिरी दिनों में सौन्दर्यशास्त्र के क्षेत्र के बारे में जो छटपटाहट थी, उस पर यदि वे काम करने का समय निकाल पाते तो हमारा यह पूरा विश्वास है कि परवर्ती दिनों में, उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मनोविश्लेषण की जो धारा सिगमेंड फ्रायड (1856-1939) से लेकर जॉक लकान (1901-1981) तक में विकसित हुई, मार्क्स ने बहुत पहले ही उसकी बाकायदा नींव रख दी होती।

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन आदमी के अंतर के इस जगत को व्याख्यायित करने में कितना सक्षम है, मार्क्स ने ही इस अन्तरदृष्टि का परिचय धर्म के बारे में अपनी प्रारंभिक तमाम टिप्पणियों से दे दिया था। साहित्य और कला के विषयों पर उनकी फुटकर टिप्पणियों से भी वह शक्ति बार-बार जाहिर होती रही है।

बहरहाल, जैसा कि हम बार-बार कह रहे हैं, मनोविश्लेषण का पूरा विषय मनुष्य के चित्त का, उसके भाव जगत का विषय है जो मूलतः एक भाषाई, प्रतीकात्मक (symbolic) संरचना है। यह आदमी के अंतर की अपनी इच्छा, ज्ञान और क्रिया का क्षेत्र है। उसकी शारीरिक जरूरतों से पैदा होने वाली वासनाओं, ऐंद्रिक जरूरतों, कामेच्छाओं, उसकी सांस्कृतिक-सामाजिक जरूरतों से उत्पन्न ज्ञान के स्फोटों और इनके स्पंदन से पैदा होने वाली आदमी की क्रियात्मकता की प्रक्रिया का क्षेत्र है।

मनुष्य के इस अन्तरजगत की विशिष्टता को समझने की एक सबसे मूल बात यह है कि हमारे पूरे प्राणीजगत में मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी अपने पर्यावरण के अनुरूप उससे ताल-मेल बैठाते हुए कैसे जीए, इसे वे जानते हैं। लेकिन अकेला मानव प्राणी ऐसा है जो इस बात को नहीं जानता है क्योंकि वह नैसर्गिक तौर पर ही सिर्फ अपने प्राकृतिक परिवेश के दायरे में नहीं जीता है।

लकान कहते हैं कि हमारे प्राणी जगत में मानव प्राणी एक मात्र है जो अनिवार्य तौर पर समय पूर्व (premature) पैदा होता है, वह अन्याश्रित होता है। जन्म के साथ ही उसे यदि एक निश्चित समय तक मां या समाज का संरक्षण न मिले तो उसका जिंदा बचे रहना भी कठिन हो जायेगा। जन्म के वक्त न वह अपने बूते चल सकता है और न कुछ समझ-बोल समझ सकता है। प्रकृति के साथ उसके संबंध नवजात शिशु के प्रारंभिक महीनों में ही जैसे कई स्फोटों (dehiscence) के साथ बदलता जाता है। उसका आगे का पूरा निर्माण उसके परिवेश के दृश्यों-छवियों से होता है, जो पल-पल कुछ-कुछ बदलता रहता है। और वह परिवेश भी शुद्ध रूप में प्राकृतिक अर्थात् भौतिक नहीं होता है। जैसे हम हमेशा वास्तुकला, चित्रकला, फिल्म, फैशन की बदलती हुई शैलियों में अपने जीवन को भी हमेशा नाना रूपों में बनते-बिगड़ते हुए देखते रहते हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हमारा पर्यावरण प्रकृति की तरह ही कहीं न कहीं इन तमाम दृश्य कलाओं से भी निर्मित होता है और हमारे मानस को, चित्त को निर्मित करने में इनकी एक बड़ी भूमिका होती है। साहित्य और कला का तो अर्थ ही है मनुष्य की अपनी वे भाषाई, प्रतीकात्मक निर्मितियां जिनसे वह खुद अपने परिवेश को बनाया करता है। हम अपने को हमेशा एक जटिल सांस्कृतिक परिवेश से घिरा पाते हैं जो परिवेश हमें जन्म के साथ अपने बुजुर्गों से, माता-पिता से मिलता है। इसमें एक महत्वपूर्ण चरण होता है आदमी के अहम् के गठन का चरण। किसी भी प्राणी मात्र से जुड़ी सेक्स की सार्विक (universal) प्रक्रिया के बीच से, x y क्रोमोजोम्स के मेल से गर्भ में पैदा होने और धरती पर आने के बाद बहुत जल्द, हम जैसे ही अपने मन से स्वतंत्र रूप में कोई काम, कोई गतिविधि करते हैं, वैसी ही हम अपने जीवन में एक प्रकार के परिवर्तन को अपनाते हैं, अर्थात् जॉक लकान के शब्दों में, हम ‘परिस्थिति का लाभ उठाते हैं’। इन्हें ही मनुष्य के मन में होने वाले स्फोट कहा जाता है, जिनका एक जैविक सिलसिला गर्भ के अंदर भी शुरू हो जाता है। गर्भस्थ पिंड में जब शिशु के अंगों के तार उसके मस्तिष्क से जुड़ कर उससे संचालित होने लगते है, उसे एक स्फोट ही माना जाता है। पर वह एक अलग, मूलतः जीवविज्ञान का विषय है। मनोविश्लेषण हमें बताता है कि काल के उसी क्षण और भूगोल के उसी स्थान में, जब हम ‘परिस्थिति का अपने लिए लाभ उठाते हैं’, हम एक प्रकार से अपनी उस जाति-सत्ता, Human being की सार्विकता (universality) को छोड़ कर, जो हमें अन्य सभी मनुष्यों और प्राणियों से जोड़ती थी, अपने खुद के अहम् (ego) को प्राप्त करते हैं। आदमी के इसी अहम् को लकान ने एक प्राकृतिक परिवेश पर उसका अपना हस्ताक्षर कहा है।

इसके साथ ही क्रमशः यह भी देखा जाता हैं कि आदमी मनुष्यों के भी किसी एक परिवार का अंग मात्र नहीं रहता है, बल्कि विभिन्न भाषाओं, जातियों, नस्लों, धर्मों, सामाजिक वर्गों, राजनीतिक निष्ठाओँ, पारिवारिक परंपराओं और पंथों में बटता जाता है। इस प्रक्रिया में  उसके अंदर यह कशमकश बनी रहती है कि वह कैसे इन अलग-अलग पहचानमूलक सांस्कृतिक समूहों, सामाजिक इकाइयों में खुद को शामिल करें, इन समूहों का सदस्य बनें। कहना न होगा,  कला और संस्कृति का बहुविध संसार ही मुख्य रूप से उसके सामने ये समस्याएं पेश करता है। वही मनुष्य के ज्ञान और ज्ञान से उत्पन्न उसकी कामनाओं और क्रियाओं के मूल में काम कर रहा होता है। यहां ज्ञान उसकी वासना का उत्स हो जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मनोविश्लेषण हमें जीवन और कला के बीच के, मनुष्यों और उनके अपने खुद के दृश्यमूलक, प्रतीकात्मक रचावों के बीच के संबंधों के मूलभूत सवालों पर सोचने का रास्ता दिखाता है।

मित्रो, समाज में हर व्यक्ति इस बात को लेकर परेशान रहता है कि ‘अन्य’, दूसरा व्यक्ति या समाज उससे क्या चाहता है। जैसे वह किसी कथाकार या चित्रकार का कोई चरित्र या पात्र हो और वह चरित्र उत्सुकता के साथ इस उधेड़बुन में फंसा हुआ हो कि आखिर वह लेखक या कलाकार उससे चाहता क्या है ?  इसी उधेड़बुन में फंस कर जो आदमी पागल या हिस्टेरिक हो जाता है वह अपने से की जाने वाली तमाम उम्मीदों को एक सिरे से खारिज करने लगता है। उसका यह प्रतिरोध उन अवांगर्द कलाकारों जैसा होता है जो अपने वक्त के कला के तमाम मानक नियमों को मानने से एक सिरे से इंकार करते रहे हैं। इसके विपरीत, विक्षिप्तता की एक दूसरी मनोदशा जुनूनियत की,obsessiveness की दशा की भी होती है। एक जुनूनी आदमी — जिसे हम आम तौर पर संस्कृति की परंपरागत और अकादमिक दुनिया के आदमी के तौर पर देखते हैं — वह हमेशा दूसरों की कल्पित कामनाओं में इस बात को ढूंढता रहता है कि उसमें सर्वमान्य सामान्य अनुशासन का पालन किया जा रहा है या नहीं ? वह एक कठोर वैयाकरणवादी होता है। उसका बल हमेशा इस बात पर ही ज्यादा से ज्यादा होता है कि हर क्षेत्र के अपने मान्य नियमों का शत्-प्रतिशत पालन किया जाना चाहिए। वह एक प्रकार से बिल्कुल अंधा हो कर चली आ रही परंपराओं को पकड़ा रहता है, और मान्यताओं की श्रेष्ठता की स्थापना की उम्मीद में लगभग मृत सा हो जाता है।

मित्रो, मनोविश्लेषण का सारा कारोबार आदमी में इन्हीं दो प्रकार की विक्षिप्तताओं के अनेक-अनेक रूपों के विश्लेषण से ही जुड़ा हुआ है।

आज के जमाने में, मनोचिकित्सा के क्रम में सभी मनोरोगियों को विश्लेषक इसी बात के लिये प्रेरित करते हैं कि उन्हें न सिर्फ प्रतिरोध-प्रतिवाद करते जाने की जरूरत है और न पूरी तरह से परंपरा और नियमों का पालन करने की, अर्थात न अंध विरोध की जरूरत है और न लकीर का फकीर हो कर ही चलने की। इसका साधारण सा कारण यह है कि जिस ‘अन्य’,  Other के बारे में सोच कर आप हमेशा व्यग्र, anxiety में रहते हैं कि जैसे वह मालिक है और जो जीवन के सभी मूलभूत सवालों का जवाब जानता है, और जिसकी कसौटियों पर खरा उतरने के जिस दबाव को आप हर पल अपने पर महसूस करते रहते हैं, या जीते हैं, वैसी सर्वज्ञानी-आत्मा का वास्तव में कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं होता है, कि उसकी मान्यताओं को आदमी अपनी खुद की इच्छाओं के ऊपर तरजीह दे। जिसे कहते हैं — Big brother is watching you — स्वस्थ मानसिकता का तकाजा है कि वह इस प्रकार के किसी भी अदृष्ट के दबावों को न स्वीकार कर अपने विवेक और अपनी पसंद के रास्ते पर चले। आज के व्यापक survillence के युग में राज्य की आततायी उपस्थिति जितना ही बड़ा सच क्यों न हो, किसी के पास इतनी शक्ति नहीं होती है कि वही आदमी की नियति का अंतिम नियंता बन सकता है। हमारे तंत्रशास्त्र में, जिसे मनुष्य के आत्म के विस्तार का शास्त्र कहा गया है, मनुष्य के इस स्वतंत्र पथ पर चलने को ही स्व छंद को पाना कहते हैं। इसमें गुरू से भी मुक्ति की बात कही गई है। मुक्ति का मार्ग दिखाने के बावजूद जब तक गुरू सर पर लदे रहता है, आदमी की आंतरिक कसमसाहट का कोई अंत नहीं होता है, उसका व्यक्तित्व किसी न किसी रूप में दमित ही रहता है। आदमी की स्वतंत्रता की अंतहीन इच्छा और क्रियात्मकता उसकी आत्म-मुक्ति का एक सनातन संघर्ष है। स्वतंत्रता ही आदमी के जीवन संघर्ष का पारमार्थिक संदर्भ, हमारे तंत्रालोक के प्रणेता अभिनवगुप्त की भाषा में, मोक्ष है।

मित्रो, आदमी के स्व के छंद को पाने की इसी कशमकश के संदर्भ में हम अवसाद के विषय पर भी गंभीरता से गौर कर सकते हैं, जो हमारी आज की चर्चा से जुडा एक मूल विषय है।

जाक लकान ने बताया था कि आदमी के चित्त को संचालित करने, उसे सदा व्यग्र करने वाला एक परासत्य, जिसे सामान्य भाषा में युगीन सत्य भी कहा जाता है, अनेक प्रकार के मूर्त रूपों में सामने आने वाली उस सत्य की छवियां, आदमी पर किसी ‘अन्य’ का दबाव — यही है जो चित्त की खाली पट्टी पर तमाम प्रकार के भावों, विचारों की भाषाई आकृतियों को लिखा करते हैं। इस प्रकार एक खाली पृष्ठ पर अदृश्य कलम की नोक के दबाव को, महज एक दबाव होने के नाते ही, एक डर भी कहा जा सकता है।

आदमी के मन के इस डर, इस संविभ्रम (paranoia) ,व्यग्रता और उसके अंदर के उद्वेलन के अर्थों और परिणामों की तलाश पर ही मनोविश्लेषण का पूरा ताना-बाना टिका हुआ है। एक अकेले तत्त्व डर का संरचनामूलक आत्म विस्तार ही मनोविश्लेषण में मनोरोगी के चित्त के निर्माण का प्रमुख कारक कहलाता है। लकान ने खुद अपने पर्यवेक्षणों के शुरू में ही आदमी में इस पैरेनोइअ के तत्त्व से एक प्रकार की ‘मानसिक स्वयंक्रिया’ (mental automatism) की प्रक्रिया को लक्षित किया था — एक ऐसी स्थिति को जब आदमी पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है, वह अपनी ही स्वतंत्र गति से चलता जाता है। यह mental automatism ही विक्षिप्तता और पागलपन के नाना रूपों का एक सामान्य ढांचा तैयार करता है, जिसमें आदमी जैसे इस जगत के ‘बाहर से’ संचालित होने लगता है। वह बाहरी शक्ति किन्हीं विचारों की गूंज हो सकती है अथवा ‘अन्य‘ के द्वारा की गयी टीका-टिप्पणी भी। वह सब हमारी दैनंदिन चर्याओं में प्रत्यक्ष नहीं होता, हमारे भाव जगत की वस्तु होता है, आदमी के अचेतन के जगत में जमा होते तत्त्व। मनोविश्लेषण में इस बाहरी शक्ति के रूप में बातों की भूमिका पर काफी विस्तार से काम किया गया है। कैसे शब्द आदमी के लक्षणों के रूप में बदलते है, मनोविश्लेषण के सिद्धांतों में इस पर काफी रोशनी डाली गई है। इसमें विचारधारा की भूमिका भी विचार का एक महत्वपूर्ण हो सकता है। ये सब मनुष्यों के बीच संबंधों में जिसे inter-subjectivity कहते हैं, उसी से जुड़े विषय हैं।

बहरहाल, पैरोनाइअ की अनुभूति में सामान्य तौर पर कुछ खास परिस्थितियों की छवियों के संकेत, उनसे प्रेषित होने वाले व्यग्र करने वाले संदेश, और उन पर ही आदमी के ध्यान का अटक जाना, उनसे एक प्रकार की बाहरी प्रतारणा का अहसास करना आदि शामिल हैं। आदमी के इस प्रतारणा के अहसास को ही उसके अहम् के निर्माण में नींव के पत्थरों के रूप में भी समझा जा सकता है। हमारा अहम् खुद की एक बाहरी छवि से ही बनता है,  हमारी पहचान अन्य लोगों के साथ दैनन्दिन जीवन के संबंधों में उनसे भिन्नता के आधार पर तैयार होती है, लेकिन अपने सामान्य जीवन में हम इन बाहरी चीजों के प्रति पूरी तरह से सचेत नहीं होते हैं। लकान बताते हैं कि वास्तव में अहम् का सत्य खास तौर पर आदमी की विक्षिप्तता, उसके पागलपन की दशा में ही पूरी तरह से सामने आता है जब उसके लिये बाकी दुनिया खत्म सी हो जाती है और स्वयं और अन्य के बीच के फर्क पर उसके अंदर बिल्कुल मूलगामी सवाल उठ जाते हैं। जब वह अपने को बिल्कुल सचेत रूप से अन्यों से पूरी तरह अलगाने लगता है।

इसी के आधार पर लकान इस नतीजे पर पहुंचे थे कि मनुष्य का स्वयं के बारे में ज्ञान मूल रूप से भयजनित होता है। भयाक्रांत स्थिति में ही हम अपने सारे अंग-प्रत्यंगों को, अपने गठन की सभी चीजों को, संसार के साथ अपने को जोड़ने की कोशिशों को बिल्कुल साफ-साफ देख पाते हैं। पागलपन हमें यह सब नग्न रूप में दिखा देता है।

मित्रो, फ्रायड के अध्ययनों से ही सबसे पहले भाषा की शारीरिक लाक्षणिकता का एक नया पहलू सामने आया था। हम उससे ही यह जान पाए हैं कि कैसे कोई लक्षण और आदमी की क्रिया के पीछे वस्तुतः शरीर में फंसे हुए शब्द हो सकते हैं। जुमलेबाजी का पूरा समाजशास्त्र इसी सत्य पर टिका हुआ है। जुमलेबाज नेता खुद भी अपने जुमलों में फंस कर बावला रहता है, किसी भी नीति पर अमल और उसके परिणामों पर सुचिंतित विचार उसकी क्षमता के बाहर हो जाता है।

फ्रायड के यहां एक पदबंध आता है — ‘मृत्यु कामना’ (Death Instinct)। कामना तो जीवन में आदमी की क्रियाओं को मूल रूप से संचालित करती है और मृत्यु जीवन को खत्म कर देती है। यह दोनों ही जीवन के सत्य हैं। पर फ्रायड ने देखा कि अवसाद की ओर बढ़ते विक्षिप्त आदमी के चित्त में यह जीवन और मृत्यु का चक्र मानो तेजी से बार-बार घटित होने लगता है। इसे उसके दैनंदिन व्यवहार में भी देखा जाने लगता है। तब उसका रोग किसी भी मायने में सिर्फ एक जैविक अर्थात् एक शारीरिक मामला नहीं रह जाता है कि उसे कुछ हारमोन्स के नियंत्रण की तरह की औषधियों से पूरी तरह से खत्म किया जा सके। सभी मानसिक क्रियाओं के पीछे कोई शरीर विज्ञान के कारणों को देखने वालों से लकान का एक बहुत बुनियादी सवाल था कि आदमी के जीवन में स्मृतियों की भी कोई भूमिका होती है या नहीं ?

इसी प्रकार अपनी एक पहचान कायम करने की कोशिश, किसी एक छवि के साथ खुद को जोड़ कर देखना, आत्ममुग्धता —  ये सब भी आदमी के चित्त के ही अलग-अलग आयाम हैं। इसे ही मनोविश्लेषण में अपने अहम् को किसी ‘आदर्श से जोड़ कर अपने को देखना’ कहते हैं। यहां इसका अर्थ बिल्कुल सहीपन या जिसे ‘आदर्श’  कहते हैं, वह नहीं है। यह आदर्श कोई सचेत आदर्श नहीं है। बच्चा अचानक अपने को किसी पूर्वज या परिवार के किसी अन्य सदस्य के पद-चिन्हों पर नहीं चलाने लगता है। बल्कि वह अपने बचपन से जो बातें सुनता है, वे सब मिल कर उसके लिए आदर्श के बीज तत्व तैयार करते हैं, जो उसके अवचेतन के मूल में बैठ जाते हैं। उसके अंतर की ये छवियां जब एक प्रतीकात्मक व्यवस्था के जटिल जाल में फंस कर रह जाती है, जो संजाल उन सभी छवियों को अपने ढंग से संचालित करने लगता है, उन्हें आपस में जोड़ता और उनके बीच के संबंधों को निर्धारित करने लगता है, तभी वह अपने बाहर से संचालित होने लगता है।

मित्रो, इन्हीं तमाम संदर्भों की पूरी पृष्ठभूमि में हमने अवसाद के विषय में फेसबुक पर अपनी पोस्ट में लिखा था कि किसी भी अवसादग्रस्त आदमी के साथ एक चरण में जा कर ऐसा होता है कि उसे अपने चारों ओर की अन्य सारी आवाजें सुनाई देना बंद हो जाती है। वह जैसे खुद में ही कैद हो जाता है। किसी और का उसके अंदर कोई स्थान नहीं रह जाता है। खुद में ही सवाल-जवाब करता है और इस प्रक्रिया में यदि कोई एक चीज उसके दिमाग में गूंजती है, जिसके गुंफन में वह फंस सा जाता है, वह है मृत्यु की प्रबल प्रेरणा (death drive) के गहरे सन्नाटे की गूंज। आदमी की आत्मलीनता का एक नकारात्मक विकास। इस कामना की उत्तेजना में वह अजीबो-गरीब कल्पनाओं में डूबता चला जाता है, अपने अवचेतन को, अर्थात् अपने अस्तित्व को ही तुच्छ करता हुआ उससे खेलने लगता है। यही उत्तेजना उसे किसी अन्य की ओर ध्यान न देने के लिये मजबूर करती रहती है। इस प्रकार वह अपनी इस दृष्टि से खुद को अंधा बना लेता है, अगल-बगल का कुछ भी देखने से इंकार करता है।

आदमी की खुद को अंधा बना देने वाली यह दृष्टि ही मूलतः उसका अहम् होती है। मनोविश्लेषण के काम में अहम् का सही स्थान वहीं पर दिखाई देता है, जहां रोगी विश्लेषण में बाधक बनता है, अर्थात् उसमें अहम् की भूमिका महज अस्वीकार की भूमिका होती है। फ्रायड ने इसी के आधार पर आदमी के अहम् और उसकी कामेच्छा के बीच के संबंध के सिद्धांत को तैयार किया था। जाक लकान के शब्दों में, अहम् हमारे अज्ञान के क्षेत्र को विस्तार देता है, ज्ञान को नहीं। जहां तक अहम् की अपनी शक्ति का सवाल है, वह बिल्कुल अलग विषय है।

इसी संदर्भ में लकान आदमी के आदर्श की भूमिका की चर्चा करते हैं और उसे आँख के लेंस की भूमिका से जोड़ते हैं। आँख का लेंस उसके कोर्निया से लगा हुआ एक पारदर्शी उभयोत्तल (biconvex) ढांचा होता है जो किसी भी चीज से आने वाली रोशनी को कोर्निया के सहयोग से आँख के पीछे के पर्दे, रेटिना पर उतारता है, और वह तस्वीर प्राणी के दिमाग में दर्ज हो जाती है, वह उस चीज को देख पाता है। इसी प्रकार, आदमी का आदर्श उसके अहम् को दृष्टि देने वाले वाले लेंस का काम करता है। इसके जरिये ही वह बाकी सच्चाइयों को देख पाता है। इसीलिये आदमी के मस्तिष्क में आदर्श एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। लकान ने इस आदर्श के दो रूप बताए थे — अहम् का आदर्श (Ego-ideal) और आदर्श अहम् (Ideal-ego)।

लकान के सूत्र में आदर्श अहम् आपकी स्वयं की अपने बारे में मान ली गई छवि है, पर अहम् का आदर्श आपके चित्त से जुड़ा हुआ एक प्रतीकात्मक बिंदु है, एक सांस्कृतिक पहलू जो किसी को भी जीवन में उसका अपना एक स्थान प्रदान करता है और जहां से आपको देखा जाता है, उस बिंदु को भी तैयार करता है। मसलन्, यदि आप तेज गति से गाड़ी चला रहे है तो यह संभव है कि आप अपने को गाड़ियों की दौड़ में उतरा हुआ एक ड्राइवर मान कर ऐसा कर रहे हो। तब आप अपनी छवि को उस ड्राइवर से साथ जोड़ लेते हैं। वही आपका आदर्श अहम् हो जाता है। लेकिन वास्तविक सवाल यह उठता है कि वह व्यक्ति कौन है जिसे आप रेस में लगा ड्राइवर मान कर उससे खुद को जोड़ रहे है ? जब आप तेज गाड़ी चलाते हैं तब किसके बारे में सोचते हैं कि वह आपको देख रहा है ?

मित्रो, यह सवाल ही अहम् के आदर्श से जुड़ा हुआ सवाल है। आपको कोई नहीं देख रहा होता है, फिर भी आप मान कर चलते हैं कि वह देख रहा है।

लकान अपने विश्लेषणों से बताते हैं कि ऐसे रोगी को सीधे-सीधे उसके आदर्श अहम् के बारे में बताने से, जिससे वह झूठी प्रतिद्वंद्विता कर रहा है, उस पर कोई खास असर नहीं होता है ;  उसके प्रभाव से मुक्त कराने के लिये जरूरी होता है कि उसके अपने प्रतीकात्मक आयाम पर,  अहम् के आदर्श के सांस्कृतिक कोने पर दस्तक दी जाए। अर्थात् उसके अपने सांस्कृतिक मानदंडों को बदलने पर बल दिया जाए। उसे अपने स्वतंत्र विवेक पर चलने की प्रेरणा दी जाए।

आदमी के अहम् का आदर्श उसके प्रतीकात्मक जगत, उसके सांस्कृतिक परिवेश से ही आता है, इसीलिये वह अहम् की तमाम अचेतन क्रियाओं पर आधारित होता है। फ्रायड ने अपने प्रबंध ‘सामूहिक मनोविज्ञान और अहम् का विश्लेषण’ (Group Psychology and the Analysis of Ego) में यह सवाल उठाया था कि कैसे कुछ लोगों के लिये कोई लक्ष्य अपने सबसे जघन्य रूप में भी इस आदर्श अहम की वजह से ही उनकी पहचान में शामिल हो जाता है और उनमें कुछ भी कर गुजरने की एक मूर्खताजनित शक्ति आ जाती है। लकान कहते हैं कि हिटलर और समूह मानसिकता की परिघटना पर फ्रायड का यह कथन जैसे सभ्यता के संकट के हृदय में झांक लेने की एक अतिंद्रीय दृष्टि प्रदान करता है। (भारत में हम इससे भक्तों की परिघटना को भी समझ सकते हैं।) लकान यहीं पर फ्रायड की शिक्षाओं की विडंबना की बात करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने बाद के जिन मनोविश्लेषकों के समुदाय को सभ्यता के इस संकट के निदान का दायित्व सौंपा था, उसी ने उल्टे आदमी में एक मजबूत अहम् (strong ego)  के संश्लेषण को अपने कामों का मुख्य उद्देश्य बना लिया। वही बाद में जैसे उनके विश्लेषण की तकनीक के केंद्र में कायम हो गया। उनकी यह मान्यता हो गई कि इस प्रकार आदमी में किसी मजबूत आदर्श को मूर्त करके ही उन्हें अपने उपचारमूलक काम में परिणाम हासिल होते हैं।

मित्रो, यह वैसे ही है जैसे हम देखते हैं कि कैसे एक राज्यविहीन समाज के निर्माण के लक्ष्य पर चलने वाला समाजवाद ही व्यवहार के धरातल पर जीवन के हर क्षेत्र में एक सर्व-व्यापी राज्य की स्थापना का सबब बन जाता है, पूंजीवाद का विकल्प दमनकारी राज्य की सर्व-व्यापकता के रूप में पेश किया जाने लगता है। राज्य की व्यवस्थाएँ नहीं, राज्य का ढांचा प्रमुख हो जाता है। जीवन का सच इसी प्रकार की नाना प्रकार की विसंगतियों के बीच से ही अपने को व्यक्त करता है।

बहरहाल, यहां भी समस्या वही है कि मनोविश्लेषण का काम मनोविज्ञान की व्याख्या करने का है या उसे बदलने का। मनुष्य को उसकी नैसर्गिक स्वतंत्रता की कामना से जोड़ने के लिये किसी भी कथित आदर्श के बंधन से उसे बांधने के बजाय उससे मुक्त करने की जरूरत है,  जिसे, लकान के अनुसार, फ्रायड के वंश के तमाम लोगों ने त्याग दिया है। जैसा कि हमने पहले भी कहा है, मनुष्य की मुक्ति का अंतिम रास्ता किसी भी आदर्श के बंधन में नहीं, उसके अपने स्वातंत्र्य में है। पर आज भी सामान्य तौर पर मनोविश्लेषक आदमी की खब्तों को किसी अन्य बड़े उद्देश्य की दिशा में दिशान्वित करना ही, उसके ध्यान को दूसरी बड़ी चीज से जोड़ना ही अपना प्रमुख काम मानते हैं। यही तात्कालिकता के साथ जुड़ी हुई एक चिरस्थायी समस्या है। यही meta-narratives की भी मूल समस्या है, क्योंकि हर metanarrative न जाने कितने अन्य छोटे-छोटे narratives का ही समुच्चय होता है।

लकान इन सबके विपरीत कामनाओं के स्वातंत्र्य के प्रति निष्ठा में, आदर्श अहम् और अहम् के आदर्श के बीच अधिकतम संगति, एकान्विती में आदमी के उपचार पर बल देते हैं। यही व्यक्ति के और पूरी सभ्यता के रोगों के उपचार का रास्ता हो सकता है। यही वजह है कि हमने मार्क्स के सर्वहारा की अवधारणा को किसी ठोस वर्गीय निर्मिती के बजाय अपने कई लेखों में अभिनवगुप्त के भैरव भाव से, अंतहीन अभिलाषा पर किसी से भी कोई उम्मीद पाल कर न चलने के स्वातंत्र्य के भाव से जोड़ कर परिभाषित करने की बार-बार कोशिश की है। अभिनवगुप्त के कथन को दोहरा कर ही हम अपनी बात का अंत करते हैं —

“स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु तुच्छोऽतुच्छोऽपि कच्श्रन।

न मोक्षो नाय तन्नास्य पृथङ्नामापि गृह्यते।।

(स्वतंत्र आत्मा के अतिरिक्त मोक्ष नामक कोई भी तुच्छ या अतुच्छ पदार्थ नहीं है। इसीलिये इसका अलग से नाम भी नहीं लिया जाता है।)

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