यह महाविनाश का परिदृश्य है : मीडिया के लिए कोरोना काल में पाकिस्तान, चीन और अमेरिका से बड़ी कोई खबर नहीं है

कहा जा रहा है कि 1734 के बाद करीब तीन सौ साल बाद बंगाल में इतना भयानक तूफान आया। 1734 में तो कोलकाता बसा भी नहीं था, जहां एक करोड़ से ज्यादा आबादी (Kolkata population) है तो रोज़ एक करोड़ लोग महानगर में आते-जाते हैं।

इन तीन सौ सालों से कोलकाता और बंगाल को मैनग्रोव जंगल सुंदरवन (The Sundarbans is a mangrove area in the delta formed by the confluence of the Ganges, Brahmaputra and Meghna Rivers in the Bay of Bengal.) बचाता रहा है जो आज़ादी से पहले कोलकाता तक फैला हुआ था। आज़ादी के बाद सुन्दर वन कटते कटते समुंदर के किनारे तक सिमट गया।

अबकी दफा कटा-फटा सुंदरवन कोलकाता को बचा नहीं सका।

क्या हिमालय के लोग केदार जलप्रलय से जिनकी आंख नहीं खुली, वे कोलकाता से सबक लेंगे?

ओडिशा के बालेश्वर जिले से सटे पूर्व मेदिनीपुर के दीघा के बजाय समुद्री तूफान सुपर सायक्लोन अम्फान (LIVE Cyclone Amphan updates) सीधे सागरद्वीप यानी गंगासागर से टकराया।

Speed of hurricane super cyclone Amphan

गंगासागर, दीघा और नन्दीग्राम समेत पूर्व मेदिनीपुर से लेकर कोलकाता तक इस तूफान की गति 185 किमी थी। हम झाने 27 साल रहे उस दमदम सोदपुर में तूफान की गति 140 किमी थी। हावड़ा पुल के आसपास 165 किमी। कोलकाता महानगर, पूर्व मेदिनीपुर, दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना जिले तहसनहस हो गए।

तूफान फिर हावड़ा, हुगली, नदिया और मुर्शिदाबाद जिलों से होकर बांग्लादेश निकलकर वहां तबाही मचाने लगा।

Number of dead in Cyclone Amphan.

पांच लाख लोग सुरक्षित निकाल लिए गए थे तूफान आने से पहले, इसलिए ज्यादा नहीं है मृतकों की संख्या।

हमारे प्रिय कवि, बड़े भाई और अंतरंग मित्र वीरेनदा 1992 में धर्मतला से शोभबाज़ार आहिरी तोला में 85 बीके पाल एवेन्यू पैदल आये थे मुझसे मिलने जनसत्ता में। वे तब अमित प्रकाश और श्याम आचार्य से भी नहीं मिले थे। मिलाना चाहा तो बोले तुमसे मिलने आया हूँ और किसी से नहीं।

वीरेनदा ने कहा था कि कोलकाता महानगर नहीं एक विराट गांव है और यहाँ गाड़ी से नहीं, पैदल घूमना चाहिए। वे पैदल ही घूमे कोलकाता।

1973 में कोलकाता पिताजी के साथ गया तो वे भी मुझे पैदल उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम पैदल घुमाते रहे।

वे सबसे पहले मुझे केवड़ा तला महाश्मशान दिखाने ले गए, जहां वह 1949 में पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों को अंडमान या नैनीताल या दण्डकारण्य किसी एक जगह एकसाथ बसाने की मांग लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे।

तब कम्युनिस्ट पार्टी में थे वे और पार्टी शरणार्थियों को बंगाल में ही बसाने की मांग लेकर आंदोलन कर रही थी।

बंगाल सरकार और ज्योति बसु की कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें वहां से उठाकर उनके साथियों यानी बसंतीपुर के लोगों के साथ ओडिशा के कटक रिफ्यूजी कैम्प भेज दिया, फिर वहां से नैनीताल।

महिषासुर को लेकर इतना हंगामा – माइकेल मधुसूदन दत्त को हम क्यों याद करेंगे?

केवड़ा तला में राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ को नायक बनाकर रामायण के मिथक तोड़कर मेघनाथ वध काव्य लिखने वाले कवि मधुसूदन दत्त की समाधि दिखाई थी पिताजी ने और सत्ता और विचारधारा पर काबिज कुलीनतंत्र से लड़ने की जरूरत बताई थी।

केवड़ा तला से वे मुझे उत्तर कोलकाता के निम्तला श्मशान घाट ले गए रवींद्रनाथ की समाधि पर।

नबारून भट्टाचार्य के कंगाल मालसाट की कथा केवदतला और कालीघाट से शुरू होती है और कोलकाता में सतह से नीचे के लोगों की ज़िंदगी पर फोकस करती है, जिसे पढ़ते हुए मुझे केवड़ातला के पुलिन बाबू याद आते हैं।

नबारुन दा का बहुचर्चित उपन्यास हर्बर्ट भी श्मशान यात्रा की कथा है।

हम इसी दृष्टि से कोलकाता और बंगाल को देखते रहे 27 साल तक।

हम सौ साल की उम्र तक मछुआरों और दलितों की लड़ाई लड़ने वाले एमबीबीएस डॉक्टर गुणधर वर्मन के नज़रिये से बंगाल को देख रहे थे।

इसलिए दीघा से लेकर नन्दीग्राम,हावड़ा से लेकर मुर्शिदाबाद, सागरद्वीप, नामखाना, काकद्वीप, से लेकर गॉसाबा, फ्रेजरगंज, बक्खाली, हिंगलगंज, सन्देशखाली, झड़खाली, बासन्ती तक, कोलकाता, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर बांकुड़ा, पुरुलिया और झारखण्ड तक कई पीड़ित मनुष्यता के जख्म और दर्द की मौजूदगी अपने दिल ओ दिमाग में वैसे ही महसूस कर सकता हूँ जैसे कि समूचे आदिवासी भूगोल का दर्द या तबाह हो रहे हिमालय के हर हिससे की जवालामखी की तरह सुलगती हुई पीड़ा।

कोरोना काल में बची हुई जख्मी पृथ्वी, लहूलुहान प्रकृति और मरणासन्न मनुष्यता को सिरे से खत्म करने की नई विश्व व्यवस्था बनी है और मीडिया को इस महातूफान की रिपोर्टिंग के बजाय इस नरसंहार के महिमामंडन की पड़ी है।

द्वीपों की कोई खबर नहीं है।

ममता बनर्जी का दफ्तर हावड़ा का नबान्न तक अम्फान से हिल गया।

पूरे दक्षिण बंगाल में खेतों में समुंदर का नमकीन पानी कमोबेश घुस गया है। द्वीपों के तटबंध टूट गए हैं।

कोलकाता महानगर में कोई पेड़ खड़ा नहीं है।

सारे रास्ते अवरुद्ध हैं।

आंधी का सिलसिला जारी है।

बारिश हो रही है।

पुराने मकान और कच्चे घर तहस-नहस हैं।

पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।

गंगा सागर बाकी दुनिया से कटा हुआ है।

बाकी बंगाल का हाल तो ममता बनर्जी भी नहीं जानती।

मीडिया के लिए कोरोना काल में पाकिस्तान, चीन और अमेरिका से बड़ी कोई खबर नहीं है

यह महाविनाश का परिदृश्य है और सतह के नीचे दबे लोग जब तक उठ खड़े होकर इस दुनिया को सिरे से बदल न देंगे तो अंतहीन नरसंहार का सिलसिला जारी रहेगा।

पलाश विश्वास

कार्यकारी संपादक, प्रेरणा अंशु

समाजोत्थान विद्यालय

दिनेशपुर

उत्तराखण्ड 263160

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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