आप कोरोना से निबटना ही नहीं चाहते, लॉक डाउन का इस्तेमाल गरीबों, किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों से निबटने के एजेंडे के लिए ?

#CoronavirusLockdown, #21daylockdown , coronavirus lockdown, coronavirus lockdown india news, coronavirus lockdown india news in Hindi, #कोरोनोवायरसलॉकडाउन, # 21दिनलॉकडाउन, कोरोनावायरस लॉकडाउन, कोरोनावायरस लॉकडाउन भारत समाचार, कोरोनावायरस लॉकडाउन भारत समाचार हिंदी में, भारत समाचार हिंदी में,

आपातकाल के अवसान के बाद 1977 के आम चुनाव (1977 general election) में पहली बार अमेरिकापरस्त सामंती हिंदुत्ववादियों के सत्ता और लोकतंत्र के हर अंग में व्यापक पैमाने पर प्रवेश के बाद से भारत लगातार अमेरिका बनने के प्रयास में है (India is constantly trying to become America)

विडम्बना यह है कि अमेरिका बनते बनते हम एकदम पाकिस्तान बन गए हैं। वे इस्लामी राष्ट्र हैं तो हम हिन्दू राष्ट्र। वहां शरीयत तो हमारे यहां मनुस्मृति।

कोरोना संकट ने यह साबित कर दिया है कि हमें जिनसे सबसे ज्यादा नफरत है, हम एकदम उन्ही की तरह हो गए हैं। वहां सैन्य शासन है तो हम भी सैन्य राष्ट्र हैं।

वहां लोकतंत्र और मानवाधिकार नहीं हैं तो हमारे यहां भी नहीं हैं।

कोरोना संकट कुलीन सत्तावर्ग के लिए किसानों, मजदूरों, दलितों और आदिवासियों के साथ गैर हिंदुओं के दमन और उत्पीड़न का अभूतपूर्व मौका बन गया है। उनके हितों में आवाज़ उठाने वाले आनन्द तेलतुंबड़े और गौतम नवलखा और ऐसे तमाम लोगों की गिरफ्तारी का मकसद भी यही है।

केरल और पंजाब में सबसे ज्यादा विदेश से लौटने वाले लोग हैं। केरल में कोरोना पर नियंत्रण को मॉडल कहें या वियतनाम और क्यूबा की बात करें तो मुस्लिम और हिन्दू तब्लीगी दोनों हमें गरियाते रहेंगे।

कोरोना के नाम पर जिस तरह मजदूरों का दमन हो रहा है, उस पर क्या कहेंगे? | What will be said about the way workers are being oppressed in the name of Corona?

सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले को क्या कहेंगे?

योगी राज में तेज़ी से राम मंदिर निर्माण के साथ पूरी मुस्लिम आबादी को तब्लीगी करार देकर उनकी घेराबंदी और मीडिया के तब्लीगी अभियान को क्या कहेंगे?

कोरोना संकट से निबटने का कोई इंतजाम नहीं है। | There is no way to deal with the Corona crisis.

विदेशी नागरिको, विदेश से लौटे लोगों की निगरानी का दावा है, उनकी जांच नहीं।

तीन महीने में तीन लाख लोगों का भी कोरोना टेस्ट हैं हुआ।

बिना तैयारी के लॉक डाउन में 38 करोड़ बेरोज़गार हो गए और खेती किसानी बर्बाद हो गयी, करोड़ों मजदूर कीड़ों मकोड़ों की तरह महानगरों में फंसे हुए हैं, जिन्हें दावे के विपरीत 96 प्रतिशत को न खाना मिल रहा है और न राशन।

गम्भीर रूप से बीमार लोगों और बुजुर्गों का इलाज सिरे से बन्द है।

सीएमआईआर के मुताबिक 61 प्रतिशत लोगों ने नौकरी और रोज़गार न होने की निराशा में नौकरी और रोज़गार की तलाश छोड़ दिया है।

बेरोजगारी दर 8 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गयी है।

किसी को कोई राहत नहीं।

विकासदर शून्य है।

किसानों मजदूरों की परवाह नहीं।

कोरोना से निबटने का कोई इंतजाम नहीं। न जांच, न निगरानी।

ज़ाहिर है कि आप कोरोना से निबटना ही नहीं चाहते।

लॉक डाउन का इस्तेमाल आप गरीबों, किसानों,मजदूरों, दलितों , आदिवासियों और गैर हिंदुओं से निबटने के अपने एजेंडे के लिए कर रहे हैं।

बिना टेस्ट के लॉक डाउन से आप ट्रम्प की तरह भारत में अमेरिका के हालात बना रहे हैं, जहां 33 हजार लोगों की जान गई है और ट्रम्प अपने एजेंडे को लागू करने पर आमादा हैं।

जिस ब्रिटेन ने दो सौ साल तक हम पर राज किया, हमारी विविधता और बहुलता की विरासत को भी उन्होंने कोहिनूर की तरह अपना लिया।

ब्रिटेन के गृहमंत्री और वित्तमंत्री भारतीय मूल के हैं। जबकि भारत मे नफरत और हिंसा की राजनीति को हम उनकी विरासत बताते लिखते अघाते नहीं हैं।

ब्रिटेन का अलिखित संविधान है।

हमारा लिखित भारी भरकम संविधान है।

हमने अपने संविधान और लोकतंत्र की हत्या कर दी है।

हम भारत विभाजन के लिए उनको जिम्मेदार मानते हैं और विभाजन के महानायकों की हम पूजा करते हैं।

मुगल काल में हुकूमत इस्लामी शासकों का था लेकिन हिन्दू प्रजा को मनुस्मृति विधान से चलना होता था।

इस मनुस्मृति विधान के खिलाफ बंगाल में नवजागरण हुआ तो हरिचाँद ठाकुर और महात्मा ज्योतिबा फुले और माता सावित्री बाई फुले ने इसके खिलाफ विद्रोह किया। ब्रिटिश हुकूमत में पहली बार शूद्रों और अस्पृश्यों को सम्प्पत्ति, शिक्षा और शास्त्र शस्त्र के अधिलर दिये। मनुस्मृति के बदले कानून का राज लागू हुआ।

मनुस्मृति और शरीयत की बहाली के लिए सत्तावर्ग ने अपनी जमींदारी और रियासत के हितों के मुताबिक अंग्रेजों के साथ गठबंधन कर लिया। उन्होने 1927 से पहले कभी अंग्रेजी हुकूमत से भारत की पूरी आजादी की मांग नहीं की।

1885 में कांग्रेस और 1901 में मुस्लिम लीग की स्थापना भी जमींदारी, रियासत और कुलीन एकाधिकार वर्चस्व बचाने की गरज से हुई। बाद में हिन्दू महासभा और आरएसएस की स्थापना दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के हक हक़ूक़ को खत्म करने के लिए कानून के राज के बदले मनुस्मृति राज़ भल करने के लिए हुई।

इसके विपरीत भारत के आदिवासी और किसान पलासी की लड़ाई के तुरन्त बाद 1757 से लगातार अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे, जिनके क्रूर दमन में हमेशा हिन्दुत्ववादी और इस्लामी जमींदार, राजा महाराजा, बुद्धिजीवी और राजनेताओं ने अंग्रेजों का साथ दिया।

1857 की क्रांति के दौरान भी वे अंग्रेजों के साथ थे।

आजादी की लड़ाई उनके लिए अपनी जमींदारी और रियासत के हितों के साथ फिर मनुस्मृति शासन की बहाली की लड़ाई थी।

इसलिए उनकी आजादी की लड़ाई को ज्योतिबा फुले और गुरुचांद ठाकुर फिर दलितों और आदिवासियों और बहुजनों की गुलामी बहाल करने की लड़ाई मानते थे और महात्मा गांधी के अनुरोध को उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि पहले आप हमें अपना भाई तो मान लें। इस बारे में विस्तार से फिर।

दूसरे विश्वयुद्ध और भुखमरी की वजह से भारत में किसानों और मजदूरों का आंदोलन बहुत तेज़ हो गया था। जिसे अंग्रेज़ भी रोक नहीं पा रहे थे और इन आंदोलनों की वजह से ख़ास तौर पर बंगाल, बिहार और समूचे पूर्वी भारत में तेभागा आंदोलन की वजह से जमींदारी और रियासतों के वजूद को भारी खतरा हो गया था। सोमनाथ होड़, चित्तोप्रसाद, माणिक बंदोपाध्याय, महाश्वेता देवी को पढ़कर देखें और समझे कि भारत विभाजन की वजह (The reason for partition of India) किसान और मजदूर, दलित आंदोलन को खत्म करने की हिंदुत्ववादी और लीगी कुलीन जमींदारी, राजा रजवाड़ा तबके की गरज और सत्ता हड़पने की जल्दबाजी है।

अब भी कोरोना संकट के बहाने वे भारत विभाजन के हालात पैदा कर रहे हैं। कोरोना, भुखमरी और बेरोज़गारी के त्रिशूल से बहुजनों का सफाया कर रहे हैं।

बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में सत्ता में भागेदारी के लिए बाबासाहेब और जोगेंद्र नाथ मण्डल के नेतृत्व में दलित आंदोलन तेज था तो हिंदुत्ववादियों और लीगियों के खिलाफ अकाली आंदोलन भी तेज था।

आदिवासी आंदोलन तो 1757 से कभी रुका ही नहीं। आज भी जारी है।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का अंत तय था और इस मौके का फायदा उठाकर हिंदुत्ववादियों और इस्लामी कट्टरपंथियों ने अपना अपना राज़ कायम कर लिया जमींदारी और रियासतों को सही सलामत रखते हुए, किसानों और मजदूरों का दमन करते हुए और मनुस्मृति और शरीयत को बहाल करते हुए।

हम तब भी एक थे भारत विभाजन के बावजूद और आज भी एक हैं।

फर्क यह पड़ा कि किसान और मजदूर आंदोलन सिरे से खत्म कर दिए गए और उनका तेज़ी से हिन्दुत्वकरण और इस्लामीकरण हुआ।

दलित और अकाली, लिंगायत आंदोलनों का और उससे भी ज्यादा ओबीसी और स्त्रियों का हिन्दुत्वकरण हो गया।

इससे अब हममें और पाकिस्तान में कोई बुनियादी अंतर नहीं रहा।

राजनीति से भी ज्यादा इस बदलाव के लिए भाषा, बोली, संस्कृति, लोक, साहित्य, शिक्षा और मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। क्योंकि इन सभी क्षेत्रों से किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों, गैर हिंदुओं,पिछड़ों को योजनाबद्ध तरीके से बहिष्कृत कर दिया गया।

पलाश विश्वास

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें