मर्यादा पुरुषोत्तम राम को तीसरा वनवास

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Third exile to Maryada Purushottam Ram

राम मंदिर का भूमि पूजन या हिंदू राष्ट्र का शिलान्यास

Bhoomi Poojan of Ram temple or the foundation stone of Hindu nation

‘‘पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे

कि नजर आए वहां खून के गहरे धब्बे

पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे

राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे

राजधानी की फज़ां आई नहीं रास मुझे

छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे।’’

कैफी आजमी के राम को अगर 6 दिसंबर 1992 की ध्वंसलीला ने अपने दूसरे बनवास पर भेज दिया था, तो 5 अगस्त 2020 के प्रधानमंत्री के ‘‘भूमिपूजन तथा कार्यारम्भ’’ ने राम को आजीवन बनवास पर बल्कि कहना चाहिए कि आजीवन कारावास पर में भेज दिया है। आजीवन कारावास इसलिए कि प्रस्तावित ‘‘भव्य मंदिर’’ के जरिए और ‘‘नव्य अयोध्या’’ के निर्माण समेत तरह-तरह की परियोजनाओं के जरिए, राम को स्थायी रूप उस जगह के साथ बांध दिया जाएगा, जो उनकी मर्यादाओं के तार-तार किए जाने की निशानी है।

आखिरकार, अयोध्या के इस राम को जब भी याद किया जाएगा, मस्जिद को ध्वस्त करा के अपना मंदिर बनवाने वाले राम के रूप में ही याद किया जाएगा। साधारण जन का सहजबोध अगर इस कलंकमय इतिहास को कमजोर या धुंधला करने की कोशिश भी करेगा, तो भी संघ परिवार का फैलाया हिंदुत्ववादी मकडज़ाल लोगों को इसे भूलने नहीं देगा।

जहां तक कल्पना जा सकती है वहां तक के भविष्य में वह, अपनी इस ‘विजय’ को राजनीतिक रूप से दुहना जो जारी रखना चाहेगा। चुनाव हो या नहीं हो, सत्ता चाहने/ पाने वालों को, लोगों के अनुमोदन की वैधता की जरूरत तो होती ही है।

बेशक, यह अचरज की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी ने 5 अगस्त के अयोध्या के अपने संबोधन में न सिर्फ कथित ‘राम मंदिर निर्माण’ को राष्ट्रीय गौरव तथा पहचान का मामला साबित करने की कोशिश की है बल्कि बड़े भोंडे तरीके से इस मुहिम को, देश की आजादी की लड़ाई की बराबरी पर रखने की भी कोशिश की है। इसके लिए उन्होंने सोच-समझकर, आजादी के बराबरी पर ‘‘मुक्ति’’ की संज्ञा का प्रयोग भी किया।

इस क्रम में उन्होंने इसका दावा भी किया है कि जैसे भारतवासियों ने आजादी की लड़ाई में बेशुमार कुर्बानियां दी थीं तथा असीम त्याग किए थे, वैसे ही भारतीयों ने राम मंदिर के लिए बल्कि जन्मभूमि की मुक्ति के लिए, अंतहीन बलिदान दिए थे और तप-त्याग किए थे।

वास्तव में बिना कहे ही, उनकी भारतीयों के इन ‘दो गौरवपूर्ण संघर्षों’ की प्रस्तुति में, बार-बार इसे रेखांकित करने के जरिए कि राम मंदिर के लिए संघर्ष ‘पांच सौ साल’ से चला आ रहा था, 5 अगस्त की लकीर को 15 अगस्त की लकीर से बहुत बड़ा कर दिया गया। आखिरकार, स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास किसी भी तरह से दो सौ साल से लंबा नहीं था!

इसी के हिस्से के तौर पर प्रधानमंत्री ने शब्दों तथा भाषण की बाजीगरी से, रामकथा की देश-विदेश में दूर-दूर तक व्याप्ति को, विवादास्पद मंदिर के निर्माण की मुहिम का हिस्सा होने के साथ जोड़ दिया और यह दिखाने की भरसक कोशिश की कि वह जिस मंदिर का ‘भूमिपूजन तथा कार्यारम्भ’ कर रहे थे, उसे सभी का समर्थन हासिल था। इसके लिए उन्होंने देश तथा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित रामकथा के विभिन्न रूपों की खासी लंबी सूची भी पेश की। लेकिन, इस सारी लफ्फाजी से भी वह इस सचाई पर पर्दा नहीं डाल सकते थे, नहीं डाल पाए कि वह उस मंदिर के निर्माण की शुरूआत कर रहे थे, जो भले ही सुप्रीम कोर्ट के अनुमोदन से हो, साढ़े चार सौ साल पुरानी मस्जिद के गैर-कानूनी तरीके से गिराए जाने के बाद, उसकी जगह पर बनाया जा रहा था। अन्य धर्मावलंबियों और किसी भी धर्म को न मानने वालों की विशाल संख्या को अगर छोड़ भी दें तब भी, खुद को आस्थावान हिंदू मानने वालों तथा इसलिए राम को पूजनीय मानने वालों में से भी, चाहे घटती हुई ही सही, पर अब भी ऐसे लोगों की अच्छी खासी संख्या है जो इस अन्याय से बने मंदिर को, राष्ट्र तथा उसकी एकता के लिए नुकसानदेह ही नहीं मानते हैं, खुद राम की अपनी मर्यादा और इसलिए हिंदू धर्म की भी मर्यादा के विरुद्घ भी मानते हैं।

अचरज की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री को राम की मर्यादा की याद सिर्फ कोरोना काल में ‘दो गज दूरी, मास्क भी जरूरी’ के लिए आयी। लेकिन, राम राज्य और राजा राम की मर्यादा की याद उन्हें भूले से भी नहीं आयी, न बाल्मीकि की संस्कृत में और न तुलसी की अवधी में! वर्ना वह इस सफेद झूठ को सच बनाकर चलाने की कोशिश नहीं करते कि ‘‘वहीं’’ बनाया जाने वाला यह मंदिर, एक सौ तीस करोड़ भारतवासियों की कामनाओं का फल होगा!

जाहिर है कि इस दावे के झूठा होने पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, जिस समुदाय के साथ अन्याय हुआ है उसके समेत, इस फैसले का विरोध करने का किसी के लिए भी कोई मौका नहीं रह गया है। और इसके झूठा होने पर इससे तो और भी कोई असर नहीं पड़ता है कि अस्सी फीसद से ज्यादा हिंदू आबादी वाले इस देश में, राजनीतिक/ चुनावी नफा-नुकसान देखकर, कोई भी मुख्यधारा की पार्टी अब इस अन्याय का जिक्र नहीं करना चाहती है। इसके झूठा होने पर इससे भी कोई असर नहीं पड़ता है कि सोचने-विचारने वालों के भी बड़े हिस्से ने अब यह मान लिया है कि पुराने जख्म को कुरेदते रहने की जगह, जो हो गया उसे स्वीकार कर अब बढ़ जाने में ही सबका भला है।

सारे व्यवहारवादी तकाजों के बावजूद, एक सरासर अन्याय को बर्दाश्त भी नहीं किया जाना चाहिए, फिर उसे सही और उससे भी बढक़र सब की आकांक्षाओं का प्रतिफल मानने की बात ही कहां उठती है।

सिर्फ बहुसंख्या के दबाव से या सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से हम न्याय-अन्याय को परिभाषित होने देंगे, तो तुर्की के हजिया सोफिया के एक संग्रहालय से मस्जिद में तब्दील कर दिए जाने का हम कैसे विरोध करेंगे, जबकि उक्त फैसले पर भी तुर्की की शीर्ष अदालत की मोहर लगी हुई है। और जैसे प्रधानमंत्री मोदी कोरोना महामारी के बीच, सारे सरकारी ताम-झाम के साथ अयोध्या में विवादित रही जगह पर मंदिर का भूमि पूजन करने के लिए पहुंचे थे, उसी तरह तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन हजिया सोफिया के मस्जिद में रूपांतरण के बाद, जुमा की पहली नमाज की अगुआई करने के लिए पहुंचे थे।

अगर, नौ सौ साल गिरजा रहने के बाद, हजिया सोफिया का मस्जिद बनाया जाना और कमाल अतातुर्क द्वारा उसे मस्जिद से संग्रहालय में तब्दील कर इस अन्याय का एक हद तक परिमार्जन किए जाने के बाद, तुर्की के वर्तमान शासक द्वारा दोबारा उसका मस्जिद में तब्दील किया जाना, सिर्फ इसलिए न्याय नहीं हो जाता है कि उसको न्यायपालिका समेत मौजूदा राज्य तथा शासक का अनुमोदन हासिल है, तो बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर बनाया जाना भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले और प्रधानमंत्री के भूमि पूजन के बाद भी, रहेगा अन्याय ही।

प्रधानमंत्री के भाषण में और उनके पूरे अयोध्या कार्यक्रम में ही, एक परोक्ष किंतु जरा भी न छुपाया जा रहा इशारा और था। इशारा था, राममयता से भारतीय परंपरा, संस्कृति, धर्म, संक्षेप में भारतीयता की परिभाषा का। राममयता और भारतीयता को इस तरह मिलाया जा रहा था कि जो कुछ राममय नहीं है, वह अभारतीय या कमतर भारतीय हो जाता था। यहां राम जन्मभूमि के दावे के सामने, किसी और धार्मिक स्थल के बने रहने की कोई वैधता ही नहीं रह जाती थी। फिर प्रधानमंत्री ने तो भारतीय की इस धार्मिक परिभाषा को और भी आगे बढ़ाते हुए, अन्य यानी इस धार्मिक परिभाषा में न आने वालों के लिए कोई जगह ही नहीं रहने दी, हाशिए तक पर नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए, दूसरे पक्ष को अपनी मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही समुचित जगह पर पांच एकड़ जमीन दिए जाने का आदेश दिया हो, प्रधानमंत्री के संबोधन में दूसरे पक्ष की मौजूदगी का कोई एहसास तक नहीं था। वह और उनका शासन, एक बहुसंख्यकवादी धार्मिक राज्य की तरह आचरण कर रहे थे। आदित्यनाथ ने सप्रीम कोर्ट के उसी आदेश से दूसरी जगह पर बनने जा रही मस्जिद के शिलान्यास में अपने जाने की संभावना से साफ इंकार कर, इस सचाई पर मोहर ही लगायी है।

इसलिए, यह कहने में अतिरंजना नहीं होगी कि 5 अगस्त को प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का जितना कार्यारम्भ किया है, उससे ज्यादा अपने वैचारिक परिवार की कल्पना के हिंदू राष्ट्र का शिलान्यास किया है।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

मोदी का न्यू इंडिया, ऐसा ही हिंदू राष्ट्र होगा, जिसमें जो कुछ भी हिंदू है, उसका दर्जा श्रेष्ठतर और बाकी सब का दर्जा कमतर होगा। जाहिर है कि इस हिंदू राष्ट्र में ‘‘गंवार, शूद्र, पशु और नारी’’ सहज ही ताड़ना के अधिकारी होंगे। कोई पूछ सकता है कि भारत की इतनी बड़ी अल्पसंख्यक व अन्य की आबादी को कैसे मिटाया जा सकता है? लेकिन, यह सवाल भोला है।

जर्मनी में यहूदियों को मिटाने की जैसी कोशिश हिटलर ने की थी, अल्पसंख्यकों को मिटाने की वैसी कोशिश शायद ही कोई धर्मराज्य भी करता हो। मकसद मिटाना नहीं दबाना, झुकाना है। प्रधानमंत्री ने अयोध्या के ही अपने भाषण में उसका भी मॉडल पेश कर दिया है। यह मॉडल ‘शरणागत की रक्षा करने’ का है। आधीनता या कमतर दर्जा स्वीकार करो और अभयदान प्राप्त कर लो।

वर्ना! जी हां, वर्ना प्रधानमंत्री ने ‘‘भय’’ की जरूरत भी यह कहकर बता दी है कि, ‘भय बिन न होय प्रीति।’ लेकिन, खुद मोदी राज का इतिहास गवाह है कि प्रीति जगाने के लिए भय के इस उपयोग से वे बहुसंख्यक भी बच नहीं पाते हैं, जिनके नाम पर ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर यह राज चलने जा रहा है।

कोरोना की पाबंदियों और मुख्यधारा की पार्टियों की निष्क्रियता के बावजूद, जिस तरह रोज-रोज मेहनत-मजदूरी करने वालों के अलग-अलग हिस्से विरोध की आवाज उठाने के लिए सडक़ों पर उतर रहे हैं, उससे लगता है कि मोदी जी ने हिंदू राष्ट्र का शिलान्यास तो कर दिया है, पर उसकी इमारत का बनकर खड़े होना अब भी आसान नहीं होगा। बहुत बार ओठों तक आते-आते प्याली खिसक भी जाती है।

राजेंद्र शर्मा

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