यह लड़ाई फासीवादी सरकार के विरुद्ध लोकतंत्र की है

Akhilendra Pratap Singh

नागरिकता संशोधन कानून और नागरिकता रजिस्टर के खिलाफ चल रहे आंदोलन में शरीक हुए सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली के बच्चों की शिनाख्त कि यह लड़ाई केंद्र की फासीवादी सरकार के विरुद्ध लोकतंत्र की है, पूरी तौर पर सटीक है।

दरअसल यह लड़ाई फासीवाद बनाम लोकतंत्र की (Battle of Fascism vs Democracy) है, जो कि संविधान बचाओ के माध्यम से व्यक्त हो रही है। आज के दौर में यह सबसे बड़ा राजनीतिक अंतर्विरोध बन गया है जिससे निपटना सरकार के लिए कठिन हो गया है। आंदोलन से निपटने के लिए जनता के ऊपर भाजपा सरकारों का दमन बढ़ता जा रहा है, उसमें उत्तर प्रदेश सरकार सबसे आगे है।

अंग्रेजों से मिली माफी के एवज में सावरकर की थ्योरी ‘हिंदुत्व का राष्ट्रवाद’ उपनिवेशवाद विरोधी चेतना को कमजोर करने वाला और अलगाववादी है। इस तरह के राष्ट्रवाद के विरुद्ध इस आंदोलन के गर्भ से उभर रहा राष्ट्रवाद ‘भारत का विचार’ (Idea of India) का वाहक बनता जा रहा है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’ – का पाठ बढ़ता जा रहा है। उभर रहा यह राष्ट्रवाद लोगों के अस्तित्व और अस्मिता के इर्दगिर्द घूम रहा है। यह राष्ट्रवाद यह भाव जगा देगा कि वे हमसे अलग हो गए तो क्या, हैं तो अपने ही। यह गांधी के राष्ट्रवाद का उत्तराधिकारी होगा, यह 50 के दशक के प्रारंभिक काल का राष्ट्रवाद होगा, जो सभ्य पड़ोसी देश के बतौर एक दूसरे से व्यवहार करेगा।

नागरिक समाज को खड़ा करने में जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय के छात्रों और आम महिलाओं की बड़ी भूमिका है। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा न्याय, समता और बंधुत्व की लड़ाई का प्रतीक बना हुआ है।

गांधी आज भी युग पुरूष हैं, डॉ. अंबेडकर के राष्ट्रवाद की यात्रा जारी है, लोहिया, जेपी आंदोलन की भी धमक है, लाल सलाम भी सतह से उभर रहा है।

बकौल सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर अर्बन नक्सलवाद की क्या बात, नक्सलवाद की अपनी उपयोगिता रही है।

जेल से छूट रहे उदारवादियों का नारा है कि अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है। समाज को अस्थिर करने वाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध यह आंदोलन अनुशासित है, प्रगतिकामी है।

कश्मीर, पूर्वोत्तर, मध्य दक्षिण भारत आंदोलन की भावना से लोकतंत्र के लिए एक सूत्र में बंधते जा रहे हैं। विदेश के विश्वविद्यालय और शहरों में भारत में लोकतंत्र के लिए चल रहे आंदोलन का समर्थन बढ़ता जा रहा है। लोगों को 70 के दशक का नारा याद आ रहा है, We shall fight, We shall win, Peris, London & Berlin.

नागरिक समाज को धन्यवाद कि उसने फासीवाद के विरुद्ध लोकतंत्र के लिए लड़ने की चुनौती स्वीकार की है। विपक्षी दल कहां हैं, उनकी राजनीति क्या है ? वाम दल जरूर भिन्न हैं लेकिन उनकी ताकत अभी सीमित है।

A large part of the Congress is still unable to differentiate between Hindu and Hinduism.

नागरिक समाज से उभरे लोगों की ही ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि इस पूरे आंदोलन को एक राजनीतिक सूत्र में बांधे, क्योंकि फासीवादी राजनीति का मुकाबला लम्बे समय तक गैर-राजनीति नहीं कर सकती। कांग्रेस से जो उदारमना लोग उम्मीद करते हैं उन्हें नाउम्मीद होना होगा। युग बदल रहा है। आज के दौर का पूंजीवाद उत्पादक नहीं सट्टेबाज है। सट्टेबाज नवउदारवादी आर्थिक व्यवस्था की नींव तो कांग्रेस ने ही रखी है। कांग्रेस का बड़ा हिस्सा आज भी हिंदुत्व और हिंदू धर्म में फर्क नहीं कर पाता है। दरअसल वह फर्क करना ही नहीं चाहता। जबकि हिंदुत्व और नव उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के ही गर्भ से फासीवाद-अधिनायकवाद विकसित हो रहा है।

Only an opponent of Hindutva and corporate alliances can lead the democratic movement of today.

हिंदुत्व और कारपोरेट गठजोड़ का विरोधी ही आज के दौर के लोकतांत्रिक आंदोलन का नेतृत्व कर सकता है।

दुनिया में फासीवाद के विरुद्ध आंदोलन हुए हैं। आंदोलन के अनुभवों से सीखते हुए आगे बढ़ने की जरूरत है। लोकतंत्र के लिए चल रहे इस आंदोलन को समाज के बुनियादी तबकों और वर्गों से जोड़ना होगा। प्रतिरोध संघर्ष के इलाके खड़े करने होंगे। आज के आंदोलन को सत्तर के दशक की अपराजेय भावना से जुड़ना होगा। नया लोकतांत्रिक समाज और राज्य बनाना होगा।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह,

स्वराज अभियान

21.01.2020

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