श्रमिक वर्ग के लिए यह पैकेज और बुरे दिन लाएगा, इसमें उसके खून-पसीने को और निचोड़ा जायेगा, देश को कंगाल बना देगा यह पैकेज

Modi in Gamchha

This package will bring more bad days for the working class, it will squeeze its blood and sweat, it will make the country poor

कोरोना महामारी के दौर में प्रधानमंत्री का आत्मनिर्भरताका सपना -Part 2

Prime Minister’s dream of ‘self-reliance’ during the Corona epidemic – Part 2

आप कहते हैं कि ‘‘आत्मनिर्भर भारत की ये भव्य इमारत, पाँच Pillars पर खड़ी होगी। पहला पिलर होगा Economy एक ऐसी इकॉनॉमी जो incremental change नहीं बल्कि Quantum Jump लाए । दूसरा पिलर Infrastructure एक ऐसा Infrastructure जो आधुनिक भारत की पहचान बने। तीसरा पिलर- हमारा सिस्टम- एक ऐसा सिस्टम जो बीती शताब्दी की रीति-नीति नहीं, बल्कि 21वीं सदी के सपनों को साकार करने वाली Technology Driven व्यवस्थाओं पर आधारित हो। चौथा पिलर- हमारी Demography– दुनिया की सबसे बड़ी Democracy में हमारी Vibrant Demography हमारी ताकत है, आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारी ऊर्जा का स्रोत है। पाँचवाँ पिलर- Demand– हमारी अर्थव्यवस्था में डिमांड और सप्लाई चेन का जो चक्र है, जो ताकत है, उसे पूरी क्षमता से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।’’

भारत तो दुनिया के पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं फिर भी इस भारत में करोड़ों लोग भूखे जीने को मजबूर हैं जिसकी बानगी हम अभी देख सकते हैं।

आप की इनफ्रास्टकचर इतनी खराब है कि आप अपनी ही देश की जनता को उनके घरों तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। जो आपका सिस्टम है 21वीं सदी का नहीं अठारहवी सदी का है जहां पर जात-पात, धर्म, लिंग भेद-भाव के अनुसार काम होता है।

चौथा जो आप बता रहे हैं कि भारत की डेमाग्रेफी दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है तो यह बात जग जाहिर हो चुका है कि कैसे आपके विचार को नहीं मानने वाले को देश द्रोही और आपके विचारपालक को देशभक्त की संज्ञा दी जाती है। हम देखते हैं कि कैसे हत्यारों को बेल मिल जाती है और देश के विषय में चिंतन करने वाले को जेल मिलती है। आपके डेमेक्रेसी की पोल वहीं खुल जाती है।

पांचवा जो डिमांड की बात, तो हम देखते हैं कि कैसे कुछ लोगों के पास गाड़ियों का काफिला है तो किसी के पास एक टुटी हुई चप्पल नहीं है और वह खाली पैर या प्लास्टिक बोतल को पैर के नीचे बांध कर चलने पर मजबूर हैं। सप्लाई चेन की हालत यह है कि एक तरफ किसान अपने उत्पादन को फेंकने पर मजबूर होता है तो दूसरी तरफ उसी की कीमत आसमान छूती है।

आपने घोषणा करते हुए कहा कि

‘‘कोरोना संकट का सामना करते हुए, नए संकल्प के साथ मैं आज एक विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा कर रहा हूं। ये आर्थिक पैकेज, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की अहम कड़ी के तौर पर काम करेगा। आज जिस आर्थिक पैकेज का ऐलान हो रहा है, उसे जोड़ दें तो ये करीब-करीब 20 लाख करोड़ रुपए का है। ये पैकेज भारत की जी.डी.पी. का करीब-करीब 10 प्रतिशत है।’’

आप ने जिस 20 लाख करोड़ जो आर्थिक पैकेज दिए हैं वह उन्हीं को मिलेगा जो देश के मजदूरों के काम किए हुए पैसों को नहीं देते हैं। आप जीडीपी की दस प्रतिशत की बात करते हैं अगर आप जीडीपी का एक प्रतिशत भी इन मजदूरों पर खर्च कर देते तो आज इन्हें सड़कों पर दबकर या गाड़ियों से कटकर मरते हुए नहीं देखा जा सकता।

प्रख्यात अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने तो कहा है कि 65 हजार करोड़ अगर सरकार इन पर खर्च कर देती तो इनकी स्थिति को सम्भाला जा सकता था जो कि आपके जीडीपी का एक प्रतिशत से भी कम है।

आपके द्वारा ‘‘आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सिद्ध करने के लिए, इस पैकेज में जमीन, श्रम, लिक्विटी और कानून पर बल दिया गया है।’’ आप सही कह रहे हैं कि जब तक लोगों की जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा नहीं होगा तब तक उनकी लूट आसान नहीं होगी। अपने मुनाफे को दिन दुना-रात चौगुना करने के लिए श्रम की लूट भी जरूरी है। यह काम तभी आसान होगा जब हम जमीन छीनने के लिए भू-संरक्षण कानून बदल दें; मजदूरों के बलिदान से मिले लेबर कानून को बदल दिया जाये। तभी तो आप के दिशा निर्देश के अनुसार श्रम कानूनों में बदलाव कर आठ घंटे की जगह 12 घंटे काम करने को बाध्य किया जा रहा है। 8 मई, 2020 के समाचार पत्रों में छपे खबरों के अनुसार प्रधानमंत्री ने राज्यों को चार होम वर्क दिया है- 1. उद्योगों के लिए तकनीकी बाधा को दूर करें। 2. जमीन के लिए कानूनी प्रक्रिया का रोड मैप तैयार रखें। 3. श्रम सुधार से जुड़े प्रस्ताव को सभी राज्य पारित करें। 4. कर्ज देने में योग्यता रहने पर किसी तरह की देरी नहीं हों। मोदी जी आप ने घोषणा भले ही 12 मई को किया है लेकिन जनता के संसाधनों और श्रम को लूटने की प्लानिंग तो पहले ही बन चुकी थी।

आप कहते हैं कि ‘‘ये आर्थिक पैकेज देश के उस श्रमिक के लिए है, देश के उस किसान के लिए है जो हर स्थिति, हर मौसम में देशवासियों के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहा है। ये आर्थिक पैकेज हमारे देश के मध्यम वर्ग के लिए है, जो ईमानदारी से टैक्स देता है, देश के विकास में अपना योगदान देता है। ये आर्थिक पैकेज भारतीय उद्योग जगत के लिए है जो भारत के आर्थिक सामर्थ्य को बुलंदी देने के लिए संकल्पित हैं।’’

देश के श्रमिक वर्ग के लिए यह पैकेज और बुरे दिन लाएगा, इसमें उसके खून-पसीने को और निचोड़ा जायेगा।

किसानों के लिए आप ने 2014 चुनाव से पहले वादा किया था कि स्वामिनाथन कमीशन के अनुसार उनकी फसल को उनकी लागत मूल्य से 50 प्रतिशत ज्यादा पर खरीदा जायेगा। आपके प्रधानमंत्रीत्व काल में कई बार किसानों ने इस मांग को लेकर संसद भवन पर प्रदर्शन किया, लेकिन आपने आज तक उनकी यह मांगे नहीं मानी। मध्यमवर्ग के टैक्स में आप 2019 चुनाव से पहले अंतरिम बजट में जो छूट दी थी उसके बाद उसमें कोई वृद्धि नहीं की, जबकि मध्यमवर्ग आयकर में और छूट की आशा कर रहा था। यह पैकेज जरूर उन उद्योगपतियों को मुनाफे बढ़ा सकती है जिनकी कोरोना माहामारी में आमदनी कम हुई है। इसी बहाने वह कई तरह के छूट पाने और पैकेज पाने में सफल रहेंगे।

आप के अनुसार ‘‘आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए ‘बोल्ड रिफॉरर्मस’ की प्रतिबद्धता के साथ अब देश को आगे बढ़ना अनिवार्य है।’’ आप निर्भीक सुधार की बात करते हैं, वह दिख रहा है कि आप कर भी रहे हैं। केन्द्रीय कर्मचारियों का आपने 18 माह का डीए रोक दिया। कर्मचारियों को एक दिन का वेतन काटने का फरमान सुना दिया गया है। असंगठित क्षेत्र में मजदूरों को काम के घंटे आठ से बढ़ा कर 12 कर दिये गये हैं और उनको श्रम कानून से वंचित कर दिया गया है। वे गंदे में काम करें, बीमार पड़ें या उनके लिए कैंटीन है या नहीं, मातृत्व लाभ दिया जा रहा है कि नहीं, यह सब मालिकों के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया है। अभी तक आप भू-अधिग्रहण को लेकर जो करने का प्रयास किया था किसानों के विरोध के कारण आपको अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। इस बार शायद आप किसानों के विरोध को कुचल कर भी नियम बना पायें और आपकी मिडिया उसे ‘बोल्ड रिफॉर्म’ और देशहित में प्रचारित करेगी। इस निर्णय को 1991 के नई आर्थिक नीति जैसा एक साहसिक कदम भी बताया जा सकता है। इस ‘बोल्ड रिफॉर्म’ से भारत की जनता को नहीं कुछ बड़े धन्नासेठों के ‘क्रोनी कैपिटल’ से फायदा हो सकती हैं। मुकेश अम्बानी, गौतम अदानी की इकनॉमी (सम्पत्ति) में उछाल आ सकती है। अरबपतियों-खरबपतियों की संख्या में थोड़ी वृद्धि हो सकती है।

प्रधानमंत्री जी आप का कहना है कि ‘‘संकट के समय में लोकल ने ही हमारी मांग पूरी की है, हमें लोकल ने बचाया है। लोकल सिर्फ जरूरत नहीं बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। लोकल को हमें अपना जीवन मंत्र बनाना होगा। आज से हर भारतवासी को अपने लोकल के लिए वोकल बनना है न सिर्फ लोकल प्रोडेक्ट्स खरीदने हैं बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है।’’

प्रधानमंत्री जी आपने स्वदेशी पर जोर दिया है, आप ही के सहगोत्र संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ आपके प्रधानमंत्री बनते ही साइलेंट मोड में चला गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि स्वदेशी की राग अलापने वाली संगठन 2014 के बाद चुप बैठा हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ, आंख, जेब पर उसकी नजर पड़ती  हो तो सब कुछ विदेशी ही नजर आता हो।

आप ने विदेश भ्रमण इतना किया है कि कोरोना महामारी के समय चुटकले चल रहे हैं कि जिस दिन प्रधानमंत्री का विमान गैरेज से निकलेगा और विदेश दौरे पर जाएंगे उस दिन समझना होगा कि कोरोना महामारी खतम हो गई है। आप घूम-घूम कर विदेशी कम्पनियों को न्यौता देते रहे कि आओ हमारे पास कच्चा माल है, श्रम है, आकर इसका भरपूर लाभ उठाओ। 15 अगस्त, 2014 को लाल किले के प्राचीर से खुले विदेशी कम्पनियों को निमंत्रण देते हुए कहा था- आइये, हमारे देश में युवा श्रमिक हैं (35 उम्र से कम 65 प्रतिशत आबादी), जिनके पास कौशल, प्रतिभा और अनुशासन है, उसका इस्तेमाल कीजिये। हम विश्व को एक अवसर देना चाहते हैं- ‘कम, मेक इन इण्डिया’।

आप ने रिटेल सहित कई क्षेत्रों में 100 प्रतिशत एफडीआई के लिए खोल दिया। रक्षा उत्पाद में एफडीआई के लिए आपने नियमों में बदलाव किया, लेकिन इन सबसे भी आप विदेशी कम्पनियों को नहीं लुभा पाये। आप जब रोजगार नहीं दे पा रहे थे तो नौजवानों से कहा कि ‘रोजगार मांगने वाला नहीं रोजगार देने वाला बनो’ और आपने ‘स्टार्टअप’ की शुरूआत की। ‘स्टार्टअप’ और ‘मेक इन इण्डिया’ का जो हस्र हुआ, हम जानते हैं। आप के 2019 के चुनाव में इसके नाम पर वोट मांगना भी मुनासिब नहीं समझा। ऐसा तो नहीं कि देश भर में बढ़ती बेरोजगारी और गिरती अर्थव्यवस्था को देखते हुए आपने एक नया जुमला ‘आत्मनिर्भर’ का दिया। मेरे मन में इस बात से भी आशंका होती है कि जब देश घोर संकट के दौर से गुजर रहा है उसी समय टाइम्स नाऊ आपकी लोकप्रियता को लेकर सर्वे करता है जिसमें उछाल दिखाई देता है। आपकी वित्त मंत्री, जिनका महत्वपूर्ण काम है देश की अर्थव्यवस्था को सम्भालना, वह अपके लोकप्रियता को लेकर ट्वीट करने लगती है। इन्हीं कारणों से मुझे लगता है कि मौजूदा दौर को देखते हुए सरकार में एक बेचैनी है, उस बेचैनी को किसी तरह से सरकार छुपाना चाहती है।

आप ने कहा-

‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा देश ऐसा कर सकता है। आपके प्रयासों ने तो हर बार, आपके प्रति मेरी श्रद्धा को और बढ़ाया है। मैं गर्व के साथ एक बात महसूस करता हूं, याद करता हूं। जब मैंने आपसे देश से खादी खरीदने का आग्रह किया था। ये भी कहा था कि देश के हैंडलूम वर्कर्स को सर्पोट करें। आप देखिए, बहुत ही कम समय में खादी और हैंडलूम दोनों की ही डिमांड और बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इतना ही नहीं उसे आपने बड़ा ब्रांड भी बना दिया। बहुत छोटा सा प्रयास था, लेकिन परिणाम मिला, बहुत अच्छा परिणाम मिला।’’

आपने सही कहा कि आप जब लोगों से खादी खरीदने को बोले तो खादी की बिक्री बढ़ गई। यह भी सही है कि जब कोरोना माहामारी के दौरान लोगों से कहा कि ताली-थाली बजाओ तो लोगों ने बजाया। जब आप ने कहा कि दीये-मोमबत्ती जलाओ तो लोगों ने जलाया। लेकिन जब आप इन्ही खादी पहनने वालों से कहा कि आप किसी श्रमिक को नहीं निकालेंगे, इनके पैसे नहीं काटेंगे तो वे आपके आग्रह को नहीं सुने। उन्होंने खुलेआम मीडिया से कहा कि हम पैसे नहीं दे सकते, सरकार को जो ऐक्शन लेना है ले और उन्होंने नहीं दिया। कई लोगों ने तो मजदूरों के कमाये हुए पैसे तक नहीं दिये हैं।

सुनील कुमार sunil kumar
सुनील कुमार sunil kumar

मोदी जी जहां सच में देशभक्ति दिखानी होती है वहां ये ताली-थाली, दीये-मोमबत्ती, खादी-हैंडलूम वाले खड़े नहीं होते हैं। अगर आप देश की बहुसंख्यक जनता के श्रम को त्याग-तपस्या के रूप में देखते रहेंगे तो देश कभी आत्मनिर्भर नहीं बनेगा। देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मजदूरों-किसानों को आत्मनिर्भर बनाना होगा, तभी भारत आगे बढ़ेगा। यही वे वर्ग हैं जो गांव में किसानी और शहर में आकर मजदूरी करता है।

भारत अगर आज यह कहता है कि हम किसी को भूखे नहीं रहने देंगे, हमारे पास अनाज का बफर स्टॉक है तो वह इन मेहनतकश के दम पर ही है। अगर आप बोलते हैं कि देश दो करोड़ पीपीई किट और दो करोड़ एन-95 मास्क रोज बना रहा है तो वह इन्हीं मेहनतकश जनता के कारण। भारत का मजदूर वर्ग केवल मजदूर ही नहीं है वह किसान भी है अगर उसका एक परिवार शहर में काम करता है तो दो गांव में किसानी करते हैं, जरूरत पड़ने पर गांव से शहर और शहर से गांव आते-जाते रहते हैं। मैं फिर से कहूंगा कि आपको आत्मनिर्भर बनाना है तो देश के मजदूर-किसान को बनाईये। आपको पैकेज देना है तो उनको दीजिये। जब वह आत्मनिर्भर बनेंगे तो देश आत्मनिर्भर बन जायेगा। आपका 20 लाख करोड़ का यह पैकेज देश को आत्मनिर्भर नहीं, देश को कंगाल बना देगा।

सुनील कुमार

 

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