लेकिन तुम उस महामानव के विचारों से अब भी क्यों डरते हो?

महामानव के विचार

जब हम चढ़ाते हैं

ऐसे महामानव पर दो फूल

तो डगमगा जाता है…!

उनका सिंहासन

वे डर जाते हैं

कहीं ठप्प न हो जाए

उनकी दुकान…!!

हम चुपचाप फिर भी

उस महामानव के बताए

रास्ते पर चलना चाहते हैं…!

वे मिटाना चाहते हैं

उनकी पहचान

और उनके विचारों को भी

पर वे बंधे हुए हैं

ऐसे विचारों से…!!

कुछ क्षण के लिए

उनको दबा सकते हो

पर उनको मार नहीं सकते…!

वे उभरकर आएगें

फिर से एक नए

जनसैलाब के साथ…!!

लेकिन तुम उस महामानव के

विचारों से अब भी क्यों डरते हो?

कहीं उनकी वजह से

बंद न हो जाए तुम्हारा रोजगार

(9 जुलाई 2020, वर्धा में लिखी गई)

 

रजनीश कुमार अम्बेडकर

पीएचडी, रिसर्च स्कॉलर, स्त्री अध्ययन विभाग

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

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