पत्थलगड़ी आंदोलन की प्रमुख नेत्री बबीता कच्छप को गुजरात एटीएस ने ‘नक्सली’ बताकर किया गिरफ्तार

पत्थलगड़ी आंदोलन की प्रमुख नेत्री बबीता कच्छप Babita Kachhap, the leader of the Pathalgadi movement,

Babita Kachhap, the leader of the Pathalgadi movement, was arrested by Gujarat ATS as ‘Naxalite’

Three activists of Pathalgadi movement arrested for conspiracy to wage war against govt in Gujarat

आदिवासी क्षेत्र में ‘पत्थलगड़ी आंदोलन’ के प्रमुख नेताओं में से एक बबीता कच्छप को ‘नक्सली’ बताकर गुजरात में गिरफ्तार कर लिया गया है।

रूपेश कुमार सिंह

स्वतंत्र पत्रकार

खबरों के मुताबिक इनकी गिरफ्तारी गुजरात आतंकवाद निरोधी दस्ता (एटीएस) द्वारा गुजरात के महिसागर जिले के संतरामपुर से हुई है। गुजरात से गिरफ्तार ‘नक्सली’ बिरसा सुईल ओड़ैया और इनके छोटे भाई सामू सुईल ओड़ैया की निशानदेही पर बबीता की गिरफ्तारी बतायी जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एटीएस का कहना है कि ये दोनों सूरत के समीप व्यारा के पास के आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों को उकसा रहे थे। तभी व्यारा के पास इन दोनों की गिरफ्तारी हुई, फिर इनकी निशानदेही पर बबीता को गिरफ्तार किया गया। ये दोनों भाई मूलतः झारखंड के खूंटी जिला के रहनेवाले हैं। एटीएस ने आरोप लगाया है कि ये तीनों सतीपति संप्रदाय (Satipati community) के लोगों को सरकार के खिलाफ उकसा रहे थे। गुजरात एटीएस ने इन तीनों पर आईपीसी की धारा 124 (ए), जो कि राजद्रोह से संबंधित है और 120 (बी) के तहत मुकदमा दर्ज किया है।

In 2018-19 in Jharkhand, large-scale Pathalgadi movement started in tribal dominated areas,

मालूम हो कि झारखंड में 2018-19 में आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसे तत्कालीन भाजपा की रघुवर दास सरकार ने पत्थलगड़ी आंदोलन के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर दबा दिया था। उस समय हजारों आदिवासियों पर देशद्रोह का मुकदमा भी किया गया था। उस समय बबीता कच्छप पर भी कई मुकदमे हुए थे, लेकिन वे कभी झारखंड पुलिस के हाथ नहीं आयी। दिसंबर 2019 में झारखंड में हेमंत सरकार के मुख्यमंत्री बनने के बाद झारखंड सरकार ने सभी पत्थलगड़ी समर्थकों पर दर्ज देशद्रोह के मुकदमे को वापस ले लिया था।

पत्थलगड़ी आंदोलन के बारे में मनोज लकड़ा को दिये गये साक्षात्कार में बहुत ही विस्तार से बतायी थी, जो 15 फरवरी 2020 को ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित हुई थी। यही साक्षात्कार इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिका ‘दस्तक’ के मार्च-अप्रैल 2020 के अंक में भी छपी थी।

 प्रश्न- नये तरह के पत्थलगड़ी आंदोलन पर यह आरोप लगा कि यह चर्च द्वारा समर्थित था. शुरुआत वाले ज्यादातर गांव ईसाई बहुल थे, जैसे कि काकी, कोचांग, सोड़हा आदि. इसे लेकर गिरफ्तार लोगों में भी ज्यादातर ईसाई थे. ऐसा क्यों? खूंटी क्षेत्र में विवादित पत्थलगड़ी के प्रमुख नेता विजय कुजूर भी ईसाई है़ं

उत्तर- सबसे पहले, यह आरोप गलत है कि यह आंदोलन केवल चर्च द्वारा समर्थित था. वास्तव में भाजपा छोड़कर हर सामाजिक संगठन, राजनीतिक संगठन, हर पार्टी व आदिवासी समुदाय इसका समर्थन करता था. पत्थलगड़ी आंदोलन न केवल झारखंड बल्कि ओड़िशा, मध्य प्रदेश ,राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी हुआ. आंदोलन के केंद्र खूंटी में इसे दबाने के लिए फर्जी केस लगाये गये, क्योंकि इसे संविधान प्रदत्त मांग से नहीं बल्कि सत्ता जाने के आंदोलन से जोड़कर देखा गया.

इस आंदोलन में न सिर्फ गांव में रहने वाले आदिवासी शामिल हुए, बल्कि गांव में वंशानुगत रहनेवाले गैर आदिवासी भी शामिल और गिरफ्तार हुए. गिरफ्तार होनेवालों में शामिल ग्राम प्रधान बिरसा पहान, सुखराम टूटी, ज्योति मांझी, शक्ति हांसदा, इंद्रो मुर्मू ईसाई नहीं थे. मैं खुद ईसाई नही हूं. इस आदिवासी स्वशासन आंदोलन को दबाने के लिए ही ‘ईसाई प्रायोजित’ टर्म का इस्तेमाल किया गया. यह आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था, जिसमें धर्म की नहीं बल्कि आदिवासियत और संविधान प्रदत्त मांगे छिपी थी, जिसका उल्लंघन हो रहा है.

प्रश्न- बुरुगुरिकेला गांव में सामूहिक नरसंहार हुआ है, जिसमें पत्थलगड़ी समर्थकों का हाथ बताया जा रहा है, इस पर आपका क्या कहेंगी?

उत्तर- अखबारों के माध्यम से जितनी बातें निकल कर आयी हैं, इससे यही लगता है कि ग्रामसभा ने आपसी मतभेद में सामाजिक निर्णय लेकर अपने गांव के सात लोगों की हत्या की है. इसमें पत्थलगड़ी समर्थकों का हाथ है, यह कहना गलत होगा़  जब प्रशासन ने अन्य बाहरी तत्वों का प्रवेश निषेध नहीं किया है, तो इस घटना में उनके शामिल होने से इनकार नहीं किया जा सकता है. इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

मुंडा क्षेत्र में ग्रामसभा द्वारा सजा के तौर पर जुर्माना या हाथ, पैर, सर आदि काटने की रूढ़ि प्रथा, ओड़का की चर्चा एससी रॉय की किताब ‘मुंडाज एंड देयर कंट्री’ में मिलेगी, जो पत्थलगड़ी आंदोलन शुरू होने के सालों पहले लिखी गयी थी़. वर्तमान समय में यह सही नहीं है और आदिवासी महासभा इसका समर्थन नहीं करता़ लेकिन मामलों का निपटारा करने की शक्ति आदिवासियों की ग्रामसभा को अनु 13(3) (क), सीआरपीसी 1973 का सेक्शन पांच देता है़।

इसमें हस्तक्षेप के लिए राज्यपाल को आदिवासियों की रूढ़ि परंपरा के अनुसार पांचवी अनुसूची के पैराग्राफ दो के तहत सीआरपीसी 1973 का विस्तार करना चाहिए था.

प्रश्न- खूंटी में हो रही अफीम की खेती पर आपका क्या कहना है, आरोप ये है कि पत्थलगड़ी का मकसद अफीम खेती को बढ़ावा देना है?

उत्तर- खूंटी क्षेत्र सिर्फ अफीम की खेती के लिए ही नहीं, बल्कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग के लिए भी पत्थलगड़ी आंदोलन शुरू होने के पहले से ही यह इलाका विवाद में है. यह आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी लोगों के आने के कारण है़ यह जानना महत्वपूर्ण है कि उरांव, मुंडा, गोंड आदि की बोली में बलात्कार शब्द और अलिखित संविधान, कस्टमरी लॉ में उसकी सजा की व्याख्या कहीं नहीं मिलेगी.

प्रश्न- खूंटी मुंडा बहुल क्षेत्र है, इस मुंडा क्षेत्र में नये तरह की पत्थलगड़ी की शुरुआत में विजय कुजूर, बबीता कच्छप (दोनों उरांव), कृष्णा हांसदा (संथाल) आदि ने प्रमुख भूमिका निभायी. ऐसा कैसे और क्यों हुआ?

उत्तर- हम आदिवासी की बात करते हैं. उरांव, मुंडा, संथाल की नहीं. आदिवासी कहने से हमारा तात्पर्य 500 से अधिक आदिवासी जनजातियां हैं. यह नयी तरह की पत्थलगड़ी नहीं है, बल्कि लिपि सीख जाने के बाद इसका इस्तेमाल आदेश देने, सूचना देने के लिए ‘हुकुमदिरी, टाइडीदिरी’ के रूप में किया गया. पत्थलगड़ी की शुरुआत ओड़िशा के उरांव क्षेत्र से हुई. झारखंड में मोमेंटम झारखंड के नाम पर 4000 विदेशी कंपनियों को झारखंड में निवेश करने की चर्चा के बाद हम तीनों, विजय कुजूर, कृष्णा हंसदा व मैंने पत्थलगड़ी के सामने खड़े होकर पत्थलगड़ी में लिखित संविधान के माध्यम से आदिवासी भूमि बचाने का आह्वान किया था. इसके बाद देशभर के पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत हुई.

इसमें खूंटी का मुंडा क्षेत्र भी था, जहां लैंड बैंक के नाम पर मुंडाओं की जमीन अधिसूचित की गयी, जो संविधान का उल्लंघन था . रही बात मुंडा क्षेत्र में उरांव और संताल के प्रवेश की. इसे गैर मुंडा के रूप में न देखकर सत्य और संवेदनाओं से जुड़ाव के रूप में देखना चाहिए. न सिर्फ मुंडा क्षेत्र में, बल्कि देश के सबसे बड़ी जनजाति भीलों और गोंडो ने भी हमें और हमारी विचारधारा को स्वीकार किया है.

प्रश्न- झारखंड की महिलाएं पगड़ी नहीं पहनती हैं, तो आप पगड़ी कैसे पहनती हैं?

उत्तर- झारखंड की महिलाएं पगड़ी नहीं पहनतीं, पर झारखंड से बाहर बस्तर, छत्तीसगढ़ में भारत की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति गोंड द्वारा ‘बेलोसा’ यानी आदिवासी समाज की राष्ट्रीय मार्गदर्शक की उपाधि मिली है़

उस दिन गोंड जनजाति द्वारा सम्मान में पगड़ी पहनाकर मेरा स्वागत किया गया था़  इसके बाद भारत की सबसे बड़ी जनजाति भील द्वारा सामाजिक कार्यक्रम के दौरान मुझे बुजुर्गों द्वारा पगड़ी पहनायी गयी, क्योंकि भीलों में खुले सिर वाली महिलाओं को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता़  उनका सम्मान रखते हुए मैं लगभग हर सामाजिक कार्यक्रम में पगड़ी पहनती हू़ं।

प्रश्न- आप देश की आजादी के पहले के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 व इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 की बात करती हैं, पर संविधान के लागू होने के बाद गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 को भारत में 26 जनवरी 1950 से और इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 395 से निरस्त कर दिया गया है़. आप इसे आदिवासी स्वशासन के लिए आधार कैसे बना सकती हैं?

उत्तर- संविधान का अनुच्छेद 395 जरूर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 और इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 को निरस्त करता है, पर संविधान का अनुच्छेद 372 (1) इन दोनों को संविधान के अनुच्छेद 13 के अधीन सुरक्षित रखता है़.

इसे विस्तार से समझने के लिए फोर्स ऑफ लॉ/प्रवृत्त विधि और विद्यमान विधि को समझना होगा़ यह इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के सेक्शन 8, 9 और 18 द्वारा आदेशित है, आजादी को लेकर शर्त है़ इसको ही संविधान के अनुच्छेद 13 (3)( क) में आर्डर, आदेश, नियम कहा गया है़. संविधान पूर्व (15 अगस्त 1947-26 जनवरी 1950 तक) भारत में दो तरह के अंग्रेजी कानून लागू थे. पहला, ऐसा अंग्रेजी कानून जो भारत या ब्रिटेन की संसद, विधानमंडल ने बनाया, जिस एग्जिस्टिंग लॉ या विद्यमान विधि कहा जाता है़. संविधान के अनुच्छेद 372 (2) द्वारा राष्ट्रपति को शक्ति दी गयी कि वह पुराने एग्जिस्टिंग लॉ को संशोधित कर लागू कर सकते हैं. इसी 372 (2) द्वारा राष्ट्रपति ने एडॉप्शन ऑफ लॉ ऑर्डर द्वारा 3000 से अधिक ब्रिटिश कानूनों को लागू किया है. इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 सेक्शन 18 (3) संविधान के अनुच्छेद 13 द्वारा लागू है़ 13(1) के अनुसार अंग्रेजी कानून के संशोधन करने पर, लोकतंत्र (अनुच्छेद 13 के अनुसार विरोध, प्रदर्शन, ज्ञापन आदि) द्वारा विरोध पर, संशोधन खत्म कर पुराना कानून ज्यों का त्यों लागू हो जाता है.

दूसरा, अनुच्छेद 13 (2) में 1950 के बाद के बनाये संसद, विधानमंडल के नये कानून और नये कानून में संशोधन है़ं, जिनके हमारे अनुरूप नहीं होने पर, लोकतंत्र द्वारा विरोध प्रदर्शन के बाद पूरा संशोधन रद्द होता है, साथ ही नया कानून भी रद्द हो जाता है़. 13(3) में फोर्स ऑफ लॉ/प्रवृत्त विधि को रखा गया है, जिसे अनुच्छेद 372 (1) द्वारा भी देखा जा सकता है़. वैसे कानून जिन्हें ब्रिटिश संसद या ब्रिटिश विधानमंडल में नहीं बनाया गया है, 372(1) द्वारा स्वत: लागू हो गये हैं, जिन्हें अनुच्छेद 13 (3)(क) में ऑर्डर/आदेश, अध्यादेश, उपविधि, नियम, रुढ़ि और प्रथा में लिखा गया है. इससे ही इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 और इंडियन इंडिपेंडेंस के आदेश के तहत गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 प्रभाव में आया और आदिवासियों के कस्टमरी लॉ यानी रुढ़ि और प्रथा स्वतः लागू हो गये.

ऐसे मामलों में सक्षम अधिकारी भारत का संसद और विधानमंडल नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 13(3)( क) में लिखित बातों को बदलने का अधिकार भी इन्हें नहीं है़. सक्षम प्राधिकारी होने के कारण आदिवासी ही स्वयं इसका रूप बदल सकते हैं, संशोधन कर सकते हैं, कोई अन्य नही़ं. 13 (3) (क) के तहत रुढ़ि प्रथा को विधि का बल है, कानून की शक्ति है़. यही पत्थलगड़ी आंदोलन था़. जब सब कुछ संविधान से होकर ही जाता है, तो आदिवासी स्वशासन के लिए इसे आधार कैसे नहीं बनायें?

प्रश्न- ब्रिटिश काल के पार्शियली एक्सक्लूडेड एरिया को संविधान की पांचवीं और एक्सक्लूडेड एरिया को छठी अनुसूची के तहत रखा गया है, क्या आप इसे मानती हैं. संविधान 26 जनवरी 1949 को लागू हुआ और 26 जनवरी 1950 से भारत की भौगोलिक सीमा में रहने वाले सभी भारतीयों को इससे मानना है?

उत्तर- बिल्कुल मानती हूं. यही नहीं बल्कि शिडयूल्ड डिस्ट्रिक्ट 1874, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 का सेक्शन 52ए, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 का सेक्शन 91, 92 से चले आ रहे रेगुलेशन को भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 में राष्ट्रपति को आदिवासी समाज के लिए रेगुलेशन बनाने के लिए दिया गया है.

जिसे देश के सभी राज्यपालों को पांचवी अनुसूची के लिए केंद्रीय रेगुलेशन को ध्यान में रखते हुए अनुसूचित क्षेत्र के साथ ही पूरे भारत के सामान्य क्षेत्रों के आदिवासियों पर लागू करना है़ जिसकी व्याख्या जनरल क्लॉज एक्ट से होती है. संविधान 1950 के लागू होने के बाद भारत की भौगोलिक सीमा के अंदर रहने वाले सभी भारतीयों को इसे मानना है.

प्रश्न- आरोप है कि पत्थलगड़ी का मकसद पांचवीं अनुसूची के खनिज बहुल क्षेत्र खूंटी व आसपास के इलाकों को अशांत और देशद्रोही घोषित कराना था, ताकि उन क्षेत्रों में खनन कराने के लिए पुलिस-प्रशासन का आसानी से प्रवेश हो सके. इस पूरे प्रकरण में क्षेत्र के हजारों आदिवासियों पर देशद्रोह का आरोप लगा और यह पूरा क्षेत्र आशांत हो गया़ इस पर क्या कहेंगी?

उत्तर- गलत आरोप है. यदि ऐसा होता तो पत्थलगड़ी आंदोलन के प्रमुख नेताओं पर देशद्रोह और अन्य तरह के ​केस नहीं लगते. सुप्रीम कोर्ट का समता जजमेंट 1997 आदिवासी क्षेत्रों, अनुसूचित क्षेत्रों में खनन लीज को अवैध साबित करता है.

उसके अनुसार आदिवासी भूमि पर दबे खनिज को आदिवासी ही निकालेगा या आदिवासी द्वारा बनी समिति के माध्यम से निकाला जायेगा. पर पिछली सरकार के साजिशों से भी इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि विधानसभा चुनाव से पहले एसी भारत सरकार के नाम पर कुछ लोग विधानसभा चुनाव बहिष्कार के नाम पर खूंटी क्षेत्र में गये थे, जबकि एसी कुंवर केशरी के बेटे केशरी रविंद्र सिंह ने इससे साफ मना किया है. फिर वे कौन थे जिन्होंने उन क्षेत्रों में प्रवेश किया?

प्रश्न- विवादित पत्थलगड़ी नेता जोसेफ पूर्ति ने वोटर आइडी कार्ड, आधार कार्ड आदि के बहिष्कार का आह्वान किया था. क्या सरकारी सुविधाएं नहीं लेने, सरकारी स्कूलों को बंद करने की बातें भोले-भाले आदिवासियों को सरकार के खिलाफ खड़ा करना नहीं था?

उत्तर- जोसेफ पूर्ति ने जितनी बातें कही, वह संविधान सम्मत है. वोटर आइडी कार्ड और आधार कार्ड क्या नागरिकता का सबूत पेश करता है? संविधान के अनुच्छेद पांच के तहत भारत के राज्य क्षेत्र में बसने वाले सभी भारतीय नागरिक हैं, तो फिर 70 सालों से एक समान नागरिक संहिता/ कॉमन सिविल कोड क्यों नहीं लागू हुआ? य​​ह इसलिए क्योंकि पूरे भारत में दो तरह की व्यवस्था है. विवाद यहीं से शुरू है.

ब्रिटेन ने जहां भी शासन किया, वहां पर एक देश दो व्यवस्था चलायी और वर्तमान में भी उसी तरह की व्यवस्था हस्तांतरित डोमिनियन में लागू है. ब्रिटिश नागरिक यानी जिन पर अंग्रेजों ने शासन किया, उसे कॉमनवेल्थ नागरिकता कहा गया़ जिसे भारत का नागरिक कहा गया. वहीं, वैसे क्षेत्र के लोग जिन पर अंग्रेजों ने शासन नहीं किया, वे ब्रिटिश नागरिक नहीं, भारत के नागरिक नहीं, बल्कि नेटिव (मूल मालिक), अबोरिजिन हैं (रेफेरेंस, अडॉप्शन ऑफ लॉ आर्डर 1950). यह क्षेत्र इंपीरियल गजेटियर के अनुसार देश के अंदर देश था. पांचवीं अनुसूची को भी संविधान के अंदर संविधान ​ही कहा जाता है.

Rupesh Kumar Singh Freelance journalist Jharkhand
Rupesh Kumar Singh Freelance journalist Jharkhand

आदिवासियों को मुख्यधारा में लाना तो ठीक है, पर वोटर आइडी, आधार कार्ड को नागरिकता का आधार देना असंवैधानिक है. आधार कार्ड और वोटर आइडी कार्ड के माध्यम से आदिवासियों को नागरिक बनाकर कॉमन सिविल कोड लागू करने के बाद भूमि के सारे कानून खत्म कर दिये जायेंगे. जबकि वर्तमान में नागरिक नहीं होकर नेटिव होने के कारण उनके भूमि संरक्षण के बहुत सारे कानून लागू हैं. आधार कार्ड वोटर आइडी कार्ड की जगह आदिवासियों को नेटिव अमेरिकन जैसा अलग आइडी कार्ड देना चाहिए.

प्रश्न- आरोप है कि आपने लोकसभा चुनाव के बहिष्कार की बात की थी. खूंटी में 21 हजार लोगों ने नोटा का बटन दबाया और वहां भाजपा लगभग 1500 वोटों से जीत गयी. इस पर आपका क्या कहना है? यदि वोट का बहिष्कार करना ही था, तब नोटा का बटन दबाकर चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा क्यों बने?

उत्तर- लोकसभा चुनाव को रोकने की मेरी प्रक्रिया बिल्कुल संवैधानिक थी. इसके लिए मैंने और हमारे लोगों ने राष्ट्रीय चुनाव आयोग, राष्ट्रपति, राज्यपाल, कलेक्टर को आवेदन दिया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन डाला. देर से पिटीशन डालने की वजह से चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, पर माननीय चीफ जस्टिस ने केंद्र सरकार, विधि और न्याय विभाग, राष्ट्रीय जनजातीय मंत्रालय, राष्ट्रीय चुनाव आयोग को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है. अगर खूंटी के लोगों तक मेरी बात पहुंचती तो वे नोटा ही नहीं दबाते, चुनाव में शामिल नहीं होते.

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