कोरोना, केरल, कम्युनिस्ट!

P. Vijayan Chief Minister of Kerala & Politburo Member, Communist Party of India (Marxist)

Today the whole world is accepting the success of Kerala in combating the corona epidemic.

कोरोना की महामारी का मुकाबला करने में केरल की कामयाबी की बात तो आज सारी दुनिया मान रही है। हमारे देश का ही नहीं दुनिया भर का मीडिया इस बात को मान रहा है। दुनिया के करीब-करीब सभी बड़े अखबारों और पत्रिकाओं ने, इस संबंध में विशेष लेख छापे हैं। इनमें सबसे प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशनों में गिने जाने वाले, द इकॉनमिस्ट का नाम भी शामिल है। इस अखबार ने खासतौर पर जोर देकर यह बताया है कि कैसे भारत में केरल ने और उसी की तरह वियतनाम ने, अपनी कई बुनियादी खासियतों के बल पर, काफी कम संसाधनों में ही कोविड-19 की महामारी पर अंकुश (COVID-19 epidemic curbed) लगाकर दिखाया है।

इस अखबार ने केरल और वियतनाम की जिन खासियतों की ओर ध्यान खींचा है, उन पर हम जरा आगे चर्चा करेंगे।

यहां मैं उक्त लेख का एक छोटा सा अंश उद्यृत करना चाहूंगा, जो बहुत ही संक्षेप में शेष भारत के मुकाबले में, केरल की कामयाबी का बयान कर देता है। यह लेख, 9 मई को प्रकाशित हुआ था। लेख पहले तो यह दर्ज करता है कि भारत में कोरोना का पहला केस, 30 जनवरी को केरल में ही सामने आया था। यह एक मैडिकल छात्र था, जो चीन के उसी वुहान शहर से आया था, जहां सबसे पहले यह वाइरस फैला था। लेख दर्ज करता है कि, ‘24 मार्च को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महामारी से लडऩे के लिए देशव्यापी लॉकडाउन का एलान किया, उस समय तक भारत में सामने आए कोविड-19 के संक्रमण के कुल केसों में से, पांचवां हिस्सा केरल में ही था, जो दूसरे किसी भी राज्य से ज्यादा संख्या थी। लेकिन, इसके सिर्फ छ: हफ्ते में केरल, भारत के राज्यों में 16वें स्थान पर आ गया है। जहां भारत की कोविड-19 के सक्रिय केसों की संख्या इसी अवधि में बढ़कर 71 गुनी हो गयी है, केरल में यही संख्या दो-तिहाई घट गयी है।’

बेशक, द इकॉनमिस्ट के उक्त लेख के छपने के बाद से केरल की स्थिति भी कुछ बदली है। केरल में कोविड-19 के सक्रिय केसों की संख्या अब और घटने के बजाए, बढ़ रही है। जाहिर है कि इस बढ़ोतरी के दो मुख्य स्रोत हैं। एक तो लॉकडाउन चार के समय से, दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों, छात्रों तथा अन्य लोगों की अपने राज्यों में घर वापसी शुरू होना। दूसरा, परदेश में फंसे केरलवासियों का और खासतौर पर पर खाड़ी देशों में फंसे केरलवासियों का स्वदेश लौटना।

इस सिलसिले में इसका भी जिक्र करते चलें कि कम से कम केरल, इन्हें अनचाही मुसीबत के रूप में नहीं देख रहा है। ऐसा क्यों और उसका क्या अर्थ है, इस पर भी हम जरा बाद में आएंगे। अभी तो सिर्फ इतना याद दिला दें कि चाहे प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष रेलगाड़ियां चलाने का सवाल हो, केरल ने ही सबसे पहले इसकी मांग की थी।

इसी तरह विदेश में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए विशेष विमान सेवाएं जुटाए जाने की भी केरल ने ही सबसे पहले मांग की थी

प्रधानमंत्री द्वारा बुलायी गयी बैठकों समेत सभी मंचों से, वह इनकी मांग करता आ रहा था। इस हिसाब से देखा जाए तो यह ऐसी चुनौती है, जो केरल खुद आगे बढ़कर न्यौत रहा था। देश के दूसरे ज्यादातर राज्यों का अपने प्रवासी मजदूरों के प्रति जो रुख रहा है उसके मुकाबले में, केरल का रुख बिल्कुल अलग दिखाई देता है।

बहरहाल, केरल इस चुनौती को सिर्फ न्यौत ही नहीं रहा था, इसका सामना करने के लिए अपनी तरफ से हरेक संभव तैयारी भी कर रहा था।

इसीलिए, इस बढ़ती चुनौती के सामने केरल न तो बदहवास दिखाई दे रहा है और लडख़ड़ाता हुआ हुआ नजर आता है। उल्टे वह इस बढ़ी हुई चुनौती का भी पूरे विश्वास के साथ मुकाबला करता नजर आ रहा है। और कोरोना से लड़ाई के इस चक्र में भी, इससे पहले के चक्र की तरह ही कामयाब होता नजर आता है। इसके सबूत क्या हैं? इसी से तो यह साबित होता है कि कोरोना का मुकाबला करने में केरल की कामयाबी की कहानी, महज किसी संयोग का मामला नहीं है। इस कामयाबी के पीछे केरल की कुछ बुनियादी खासियतें हैं और ये खासियतें फौरी उतार-चढ़ावों के बावजूद, केरल की कामयाबी की हिफाजत कर रही हैं और करेंगी।

         इस दावे के पक्ष में हम सिर्फ दो तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहेंगे।

8 मई से 29 मई तक, 21 दिन में केरल में केस भले ही 503 से बढ़कर 1150 हो गए हों, इस राज्य में जहां हर एक लाख पर देश भर में सबसे ज्यादा टैस्ट किए जा रहे हैं, टैस्ट पॉजिटिविटी दर सिर्फ 1.7 फीसद है। टैस्ट पॉजिटिविटी दर यानी किए जाने वाले टैस्टों में से पॉजिटिव निकलने वालों का अनुपात। तो सचाई यह है कि सबसे ज्यादा टैस्ट करने के बावजूद, इस राज्य में 100 लोगों का टैस्ट किया जाता है, तो उनमें सिर्फ 1.7 कोविड पॉजिटिव निकलते हैं। याद रहे कि देश भर के लिए यही आंकड़ा, सौ टैस्टों पर 5 का है। दुनिया भर के देश, 2 फीसद से कम की दर हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।

एक और तथ्य पर नजर डाल लें।

केरल में केस फेटलिटी रेट (Case Mortality Rates in Kerala,) सिर्फ 0.5 फीसद है। यानी 200 कोविड-19 मरीजों में से सिर्फ एक की मौत होती है। याद रहे कि भारत के पैमाने पर यही आंकड़ा सौ मरीजों पर ही 3 से ज्यादा मौतों का है और दुनिया भर में करीब 4 मौतों का।

एक और दिलचस्प आंकड़े पर भी चलते-चलते नजर डाल लेते हैं।

केरल में कोविड की आपदा के बावजूद, कुल मिलाकर मौतों की संख्या, पिछले साल के मुकाबले काफी घट गयी लगती है। पिछले साल 1 जनवरी से 15 मई तक, केरल में कुल 93,717 मौतें दर्ज हुई थीं, जबकि इस साल इसी अवधि में कुल 73,155 मौतें दर्ज हुई हैं। यानी कोविड काल में कुल मौतों की संख्या में पूरे 20,562 की कमी हो गयी है। मौतों में इस भारी कमी को हम, महामारी का मुकाबला करने की चौतरफा मुस्तैदी और तैयारियों के सुफल के रूप में ही समझ सकते हैं। यह भी केरल की कामयाबी का ही एक और उल्लेखनीय पहलू है, हालांकि इसके लिए ठीक-ठीक कौन से कारक कितने जिम्मेदार हैं, इसे जानने के लिए हमें इन आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण की प्रतीक्षा करनी होगी।

पर केरल ने यह अनोखी कामयाबी पायी कैसे? इस सवाल के कई जवाब हो सकते हैं। या हम कह सकते हैं कि इस सवाल के जवाब के कई स्तर हो सकते हैं। सबसे पहला स्तर तो यही कि केरल में 30 जनवरी को जब पहला केस सामने आया, केरल की सरकार उसके पहले से वाइरस का मुकाबला करने की तैयारियों में जुट चुकी थी। पहला केस आने से एक हफ्ता पहले, 24 जनवरी को ही इस संक्रमण पर अंकुश लगाने के लिए राज्यस्तरीय नियंत्रण सैल का गठन किया जा चुका था। इसका अगला चरण राज्य स्तर पर रैपिड रिस्पांस टीम का गठन था, जिसने फौरन बैठक कर, स्वास्थ्य इमर्जेंसी का सामना करने के लिए, संक्रमण को रोकने तथा उस पर अंकुश लगाने की नीचे तक तैयारियां शुरू कर दीं। 1

3 फरवरी को जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व स्वास्थ्य इमर्जेंसी की घोषणा की, तब तक इस बीमारी फैलने के तरीके तथा इस पर नियंत्रण के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के सभी जिलों तथा ले जाए जाने और लागू कराए जाने की व्यवस्था, पूरी तरह से चल पड़ी थी।

इस तरह, जब देश की सरकार, विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्वास्थ्य इमर्जेंसी की चेतावनी को भुलाकर, दिल्ली के चुनाव की हार के बाद, ‘‘नमस्ते ट्रम्प’’ की तैयारियों में जुटी हुई थी, उस समय केरल भारत में इस महामारी के पहले धक्के को रोकने और पहले संक्रमितों को नीरोग करने में लगा हुआ था। और जब देश की सरकार, कोरोना की रोक-थाम पर ध्यान देने के लिए, पहले होली और उसके बाद, मध्य प्रदेश में तख्तापलट के गुजरने का इंतजार कर रही थी, तब तक केरल एक ओर तो ‘ब्रेक द चेन’ जैसे सफल अभियान के जरिए, साबुन से सैनिटाइजर तक के बार-बार उपयोग के जरिए, संक्रमण को फैलने से रोकने का राज्यव्यापी जन जागरण अभियान पूरा कर चुका था। और दूसरी ओर, ज्यादातर बाहर से आने रहे संक्रमितों के साथ ही, उनके संपर्क में आए सभी लागों की ट्रेसिंग, उन्हें क्वारेंटीन करने तथा संभावित संक्रमितों को आइसोलेशन में रखने और आवश्यकता होने पर उन्नत से उन्नत उपचार मुहैया कराने तक की व्यवस्थाएं खड़ी कर चुका था।

आज कोरोना के मामले में केरल और मिसाल के तौर पर गुजरात के हालात में जमीन-आसमान का जो अंतर दिखाई दे रहा है, बेशक उसका काफी संबंध इस मामले में केरल सरकार द्वारा दिखाई गयी गंभीरता और गुजरात जैसी सरकारों की लापरवाही से भी है।

बेशक, केरल ने इस मामले इसलिए और भी ज्यादा मुस्तैदी दिखाई होगी क्योंकि तब तक यह साफ हो चुका था कि यह वाइरस, मनुष्य से मनुष्य के संपर्क के जरिए फैलता है। इस पहलू से केरल के लिए चुनौती दूसरे राज्यों से कहीं बड़ी तथा गंभीर थी क्योंकि दूसरे राज्यों के मुकाबले में उसकी आबादी का अनुपात में कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा, दूसरे देशों में काम कर रहा था। इसके अलावा केरल, दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित करता है। इसलिए, स्वाभाविक रूप से विदेश से आवाजाही यहां दूसरे राज्यों से ज्यादा थी।

इसके अलावा, दो साल पहले केरल कोविड से बीसियों गुना ज्यादा मारक, निपाह वाइरस का हमला झेल चुका था और उस पर काबू पाकर भी दिखा चुका था, जिसे सारी दुनिया ने लगभग चमत्कार ही कहकर सराहा था। निपाह वाइरस से मुठभेड़ के इस अनुभव ने, शासन समेत केरल को वाइरस के खतरे के प्रति ज्यादा गंभीर बना दिया, और दूसरी ओर वाइरस का मुकाबला करने के लिए कांटैक्ट ट्रेसिंग, क्वारेंटीन, आइसोलेशन की पूरी व्यवस्था का बड़े पैमाने पर अभ्यास भी करा दिया था, जो कोविड की रोकथाम का रामबाण उपाय साबित हुई है।

इसमें एक बहुत ही जरूरी चीज और जोड़ लें।

देश भर में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, सबसे जीवंत तथा सबसे सक्षम, केरल में ही है। बेशक, यह दसियों वर्षों के प्रयासों का इकट्ठा होता गया प्रभाव है। इसे वर्तमान एलडीएफ सरकार द्वारा बनते ही शुरू किए गए आद्र्म मिशन ने और भी सक्षम व जीवंत बना दिया है। इस मिशन में एक ओर प्राइमरी स्वास्थ्य केंद्रों को उन्नत कर, परिवार स्वास्थ्य केंद्रों में बदला  जा रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य व्यवस्था के उच्चतर स्तरों पर, ढांचागत संसधनों को मजबूत किया जा रहा है, जिसमें सैकड़ों की संख्या में डाक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों की नयी भर्तियां भी शामिल हैं।

फिर भी, यह नहीं कहा जा सकता है कि सिर्फ इस मुस्तैदी से या इन तैयारियों से या पिछले अनुभव समेत, इन संसाधनों से ही, केरल जैसी कामयाबी को हासिल किया जा सकता था। अलग-अलग तो नहीं ही, इन सब को मिलाकर भी उस कामयाबी को हासिल करना मुश्किल था। क्यों? इस क्यों का जवाब उस तरीके में है, जिससे केरल ने यह कामयाबी हासिल की है। इस तरीके के अलग-पहलुओं का एकदम संक्षेप में इशारा करते चलें।

जरा याद कीजिए कि अखिल भारतीय लॉकडाउन की घोषणा (All India Lockdown Announced) के कितने दिन बाद, मोदी सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रु0 के पहले पैकेज की घोषणा की थी, जिसमें नये खर्चे के प्रस्ताव आधे से भी कम थे। लेकिन, केरल की एलडीएफ सरकार, लॉकडाउन की पाबंदियां शुरू होने से बहुत पहले ही 20 हजार करोड़ रु0 के पैकेज की घोषणा कर चुकी थी, जिसमें सारी घोषणाएं कोविड का मुकाबला करने से जुड़े नये खर्चों की ही थी।

खर्चे का संभवत: सबसे बड़ा आइटम, 57 लाख लोगों के लिए कई महीने की सामाजिक सुरक्षा पेंशनों का अग्रिम भुगतान था, जिस पर 4,709 करोड़ रु0 खर्च किए जा रहे थे। इसके अलावा कल्याण बोर्डों से 73 लाख लोगों के लिए नकद सहायता की व्यवस्था की गयी। गरीबी की रेखा के नीचे के परिवारों को 35 किलोग्राम और गरीबी की रेखा से ऊपर वालों को 15 किलोग्राम चावल प्रतिमाह मुफ्त देने की व्यवस्था की गयी। इस सब के अलावा आवश्यक वस्तुओं के 87 लाख 79 हजार किट गरीबी की रेखा के नीचे के परिवारों के बीच मुफ्त बांटे गए। लॉकडाउन के ‘घर पर ही रहने’ के आदेश के पहुंचने से पहले, यह मदद गरीबों समेत सभी प्रभावितों तक पहुंच चुकी थी या पहुंच रही थी। इसीलिए, केरल में कोई यह कहते नहीं सुना गया कि कोरोना तो बाद में मारेगा, हम तो पहले ही भूख से मर जाएंगे।

एक और गौरतलब पहलू, प्रवासी मजदूरों के साथ सलूक का है। केरल में उन्हें अतिथि वर्करों का नाम ही नहीं दिया गया, वैसे ही रखा भी गया। राज्य भर में करीब 20 हजार कैंपों में, साढ़े तीन लाख से ज्यादा अतिथि वर्करों के लिए रहने-खाने की मुफ्त व्यवस्था ही नहीं की गयी, उनके लिए मोबाइल रिचार्ज तक की व्यवस्था की गयी ताकि अपने परिवारों के साथ संपर्क बनाए रख सकें। अतिरिक्त संवेदनशीलता का प्रदर्शन करते हुए, उनके लिए उनकी रुचि के अनुसार भोजन से लेकर, अपनी परेशानियां साझा करने के लिए संवाद रखने वालों तथा मनोचिकित्सकीय सहायता तक की व्यवस्था की गयी। बेशक, प्रवासी मजदूर फिर भी सुविधाएं मिलते ही अपने राज्यों के लिए गए हैं, लेकिन केरल से कोई मजदूर इस कटुता के साथ नहीं गया है कि बस चला तो फिर कभी लौटकर नहीं आएगा।

इसी प्रकार उन लोगों का पूरा ख्याल रखा गया है, जो लॉकडाउन के चलते खाने को मोहताज हो सकते थे। 1034 पंचायतों में, कुटुंबश्री की मदद से 1137 सामुदायिक रसोइयों से 1 लाख 30 हजार लोगों को खाना, एक लाख से ज्यादा को मुफ्त और बाकी को, जो पैसा देने में सक्षम थे, 20 रु0 में खाना। केरल के प्रयास की कुछ और ऐसी उल्लेखनीय विशेषताएं रही हैं, जो दूसरे राज्यों में शायद ही दिखाई देती हैं। इनमें एक तो उसका शुरू से ही ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के बजाए, ‘शारीरिक दूरी के साथ सामाजिक एकजुटता’ पर जोर देना है।

इसी प्रकार, स्वशासी निकायों की जैसी सक्रियता तथा भूमिका केरल में देखी गयी, वह अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिली है। ऊपर से नीचे की ओर विकेंद्रीकरण पर केरल में वामपंथ का जितना जोर रहा है, जिसे विकेंद्रीयकृत नियोजन ने एक और ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, उसके बिना इन निकायों की ऐसी भूमिका और इसलिए जमीनी स्तर पर एक-एक परिवार तक पहुंच, सुनिश्चित की भी नहीं जा सकती थी। ऐसा ही एक और कारक, इस प्रयास में तमाम जनसंगठनों तथा सामाजिक संगठनों के असाधारण रूप से विस्तृत ताने-बाने की सक्रियता रही है। इसी सामथ्र्य के बल पर, जिसका संबंध में केरल की वामपंथी विरासत से है, केरल के इस प्रयास को लाखों वालंटियरों की ताकत हासिल हुई है।

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
 कुटुंबश्री के महिला स्वयं-सहायता ग्रुपों के ताने-बाने ने इस प्रयास को एक-एक घर तक पहुंचाने में अनोखी भूमिका अदा की है।

जाहिर है कि यह विराट तथा एकजुट सामाजिक प्रयास, एक ऐसे समग्रतापूर्ण दृष्टिकोण से ही संभव है, जो न सिर्फ सब को साथ लेकर चल सकता हो बल्कि व्यवहार में पूरे समाज को गोलबंद करने में भी समर्थ हो। और ऐसा चौतरफा प्रयास, कम्युनिस्ट आंदोलन से निकली एक सरकार ही संगठित कर सकती है। पिनरायी विजयन ऐसी ही सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। यह संयोग ही नहीं है कि इकॉमिक टाइम्स भी कोविड-19 पर अंकुश लगाने के संदर्भ में कम्युनिज्म की भूमिका की इस सचाई को स्वीकार करता है—

‘यह कोई संयोग ही नहीं है कि वियतनाम में, कम्युनिज्म का जबर्दस्त प्रभाव रहा है और वही वहां के शासन की निर्विवाद विचारधारा है और कम्युनिज्म ही उन वामपंथी पार्टियों की विचारधारा है, जो 1950 के दशक से केरल पर छायी रही हैं।’

0 राजेंद्र शर्मा

 

 

 

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