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sarvamitra surjan

मक्खन पर नयी लकीर : क्वीन की धाकड़ फ्लॉप होने बाद नयी फिल्म इमरजेंसी

वो कैसा राष्ट्रवादी जो अपनी तकलीफों का इज़हार कर दे

धाकड़ सिनेमाघरों में धड़ाम हो गई, कोई धमाल नहीं दिखा पाई। बॉलीवुड क्वीन के सपने (bollywood queen dreams) ताश के महल की तरह गिर गए। अब बॉक्स ऑफिस है, कोई ईवीएम बॉक्स तो नहीं, जिसके बूते जीत की गारंटी दी जा सके।

क्या धाकड़ को पिटवाने में परिवारवाद का हाथ है?

वैसे भी बॉलीवुड में रोज़-रोज़ कौन जीतता है, कभी-कभी हारना भी पड़ता है!

अब ये मत कहना कि हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं। क्योंकि फिर तो ये नेपोटिज़्म लॉबी (nepotism lobby) से लाइन चुराने वाली बात हो जाएगी। वैसे भी शक होता है कि कहीं धाकड़ को पिटवाने में परिवारवाद का हाथ तो नहीं है। बॉलीवुड में वैसे भी वंशवाद से बहुत नुकसान हुआ है।

यहां के लोकतंत्र को इन परिवारवालों ने अपनी कठपुतली बना कर रखा है। मान लिया कि अब तक टू मच डेमोक्रेसी (Too Much Democracy) थी, जिसके कारण फिल्मी दुनिया की भूलभुलैया में अभिषेक बच्चन पीछे रह गए और कार्तिक आर्यन आगे हो गए। लेकिन इस लोकतंत्र में राष्ट्रवादियों का सम्मान भी तो होना चाहिए था न। और कुछ नहीं तो इस बात का ख्याल ही रख लिया होता कि धाकड़ नायिका ने अब तक अपनी धाकड़ बातों से सरकार विरोधियों की कैसी खबर ली और देश की जनता का मुफ्त में मनोरंजन किया, सो अलग।

भला इस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी कौन सी नायिका है, जो अपने अभिनय और फिल्मों से अधिक ध्यान इस बात पर देती हो कि देश की राष्ट्रभाषा संस्कृत क्यों नहीं है

कितनी अभिनेत्रियों ने देश को आजादी 1947 में मिली या 2014 में मिली, इस पर शोध करके अपनी राय सामने रखी है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत से लेकर किसान आंदोलन और उद्धव ठाकरे से लेकर ममता बनर्जी तक कितने मामलों में फिल्म इंडस्ट्री के किसी कलाकार ने बिना जरूरत मुंह खोला है। लेकिन क्वीन हैं कि हर बार अपने धाकड़ विचारों के साथ सामने आती रही हैं। उनके ट्विटर एकाउंट को भी इससे खतरा हो गया। अब उस खतरे पर तो सरकार कुछ कर नहीं सकती थी।

क्वीन की फिल्म क्यों पिट गई?

लेकिन क्वीन की सुरक्षा का भी इंतजाम सरकार ने किया है। इसके बावजूद फिल्म पिट गई। और यह कोई पहली बार नहीं है, जब क्वीन के साथ यह बदसलूकी हुई हो। पिछली और फिल्में भी लगातार ऐसी ही फ्लॉप हुई हैं। न थलाइवी को देखने दर्शक पहुंचे, न पंगा में कोई दिलचस्पी दिखाई और जजमेंटल है क्या, को तो पूरी तरह नकार दिया गया। वो तो लॉकअप शो आ गया, तो क्वीन पर्दे पर दिखती रहीं। हालांकि इसमें भी मुनव्वर फारुकी के विजेता घोषित होने से राष्ट्रवादियों तो तकलीफ तो पहुंची होगी।

लेकिन वो राष्ट्रवादी ही क्या जो अपनी तकलीफ का इज़हार कर दें। देश में इस वक्त कितने तरह की मुश्किलों में आम आदमी जी रहा है। पढ़ाई, इलाज, खाना-पीना, नौकरी सबके लाले पड़े हैं, लेकिन फिर भी मजाल है कि ये तकलीफें किसी मस्जिद के सर्वे या शिवलिंग की तलाश में आड़े आई हों। भविष्य तबाह होता है, तो हो जाए, लेकिन इतिहास को जब तक जड़ समेत खोद न लिया जाए, तब तक हम क्या खाक भगीरथ के वंशज कहलाएंगे। हमारे पूर्वजों ने न जाने कहां-कहां से कंकड़-पत्थर लाकर मंदिर बनाए होंगे, शिवलिंग रखे होंगे, ताकि 21वीं सदी और उसके बाद के भारत में उनकी भावी संतानों को पूजा-पाठ में कोई तकलीफ न हो। हो सकता है दो-चार शिवलिंग या हनुमान चालीसा की प्रतियां मंगलग्रह और चांद पर भी रखी हों।

इससे पहले कि अमेरिका, रूस या चीन जैसे किसी देश के हाथ ये अनमोल खजाना लग जाए, भारत सरकार को पहले ही वहां अपना दावा ठोंक देना चाहिए।

हमारे प्रधानमंत्री जिनकी इतने बड़े-बड़े वैश्विक नेताओं से पक्की दोस्ती है, जिनके कंधे पर वो हाथ रखते हैं या गले मिलते हैं, उन्हें इस बात का करार अपने दोस्तों से कर लेना चाहिए कि मंगल या चांद पर भारत अभी पहुंचे न पहुंचे, हमारे पुरखों की छोड़ी विरासत की रक्षा दूसरे ग्रहों पर भी होनी चाहिए।

क्वाड की तरह श्वाड जैसा कोई समूह भी प्राचीन धर्म और उसकी निशानियों की रक्षा के लिए बन जाए, तो क्या बुरा है। अपने पुरखों की मेहनत को खोद-खोद कर तलाशना ही इस वक्त राष्ट्रवादियों का सबसे बड़ा धर्म बन गया है। आगे भी खुदा है, पीछे भी खुदा है और जहां नहीं खुदा है, वहां काम बंद है।

तो जहां-जहां काम बंद दिखता है, वहां हमारे राष्ट्रवाद और धर्म के रक्षक पहुंच रहे हैं और खुदाई की मांग कर रहे हैं। क्वीन को भी अपनी फिल्म का कोई कनेक्शन इस खुदाई से जोड़ देना चाहिए था। एकाध बयान ही ऐसा दे देतीं कि खुदाई में कोई ऐसी देवी की मूर्ति मिल सकती है, जो देश को हर मुसीबत से छुटकारा दिला सकती है, तो इस बयान से प्रभावित होकर ही जनता फिल्म देखने जा पहुंचती और फिल्म का कनेक्शन चार-पांच दिनों में चार-पांच करोड़ से ऊपर तो पहुंच ही जाता।

तो ये तय है कि धाकड़ फिल्म के पिटने में इस देश के गैरराष्ट्रवादियों का ही हाथ है। जो अपनी तकलीफों का रोना रोते बैठे हैं और भक्ति साबित करने के लिए सिनेमाघरों तक नहीं जा पाए

जब क्वीन भक्ति में कोई कमी नहीं दिखाती हैं, तो क्या जनता का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह भी अपनी जेब थोड़ी ढीली करती। माना कि महंगाई है, लेकिन ये तो ध्यान दिया होता कि सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दामों को दो महीने पुराने स्तर पर पहुंचा दिया है। क्या इतनी राहत के बदले देशभक्ति दिखाने के लिए धाकड़ फिल्म देखने दर्शकों को नहीं जाना चाहिए था। या फिर दर्शकों ने ये मान लिया था कि धाकड़ लोगों के नमूने तो रोजाना ही होते रहते हैं, उसके लिए सिनेमाघर तक क्या जाना।

लोग चाहें न चाहें मीडिया पर मोदीजी ही नजर आते हैं, अगर वो टीवी न चलाएं तो सड़कों पर सरकार के काम की तारीफों से पोस्टर भरे हुए हैं। अनाज के थैलों से लेकर वैक्सीन के प्रमाणपत्र तक हर जगह मोदीजी की तस्वीर चिपकी हुई है।

उनके जैसा धाकड़ क्या देश में इस वक्त कोई दूसरा है। अभी वो जापान गए थे, तो वहां भी उनके धाकड़पन को जिंदाबाद कहने के लिए न जाने कहां-कहां से लोग पहुंचे। अनुच्छेद 370 हटाने, राम लला को लाने, काशी को क्योटो बनाने वाले का पदार्पण टोक्यो में हुआ, इसी बात पर हाथों में सिंह वाले पोस्टर, गले में भगवा गमछा और जयश्री राम के नारे लगाते हुए लोग मोदीजी की जय-जयकार करते दिखे। दुनिया भर में नेता इसी तरह दूसरे देशों की यात्रा करते हैं, मगर कभी किसी और नेता का स्वागत इस धूमधड़ाके से होता नहीं दिखा। अब तक लोग अपने प्रिय नेता को देखने उमड़ते थे, लेकिन मोदीजी का स्वागत जिस अंदाज में होता है, वो निराला है। अब बताइए हुए न वो धाकड़ नेता। हां जापान जाकर भी वो चीन को नाम लेकर फटकार नहीं सके, ये अलग बात है। मगर उन्होंने क्या पंच लाइन वहां से दी है कि वो मक्खन पर नहीं, पत्थर पर लकीर खींचते हैं।

क्वीन ने धाकड़ के फ्लॉप होने से बेपरवाह होते हुए अपनी नयी फिल्म इमरजेंसी का ऐलान किया है। उन्हें बिन मांगी सलाह है कि मक्खन और पत्थर वाला ऐसा ही कोई संवाद फिल्म में जरूर बोलें, क्या पता फिल्म हिट हो जाए। और इस लाइन पर पहले ही अपना अधिकार जमा लें, कहीं अमूल के विज्ञापन में मक्खन पर नयी लकीर खींच दी गई, तो मुश्किल हो जाएगी।

– सर्वमित्रा सुरजन

लेखिका देशबन्धु की संपादक हैं।

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