डाइवर्सिटी के हिमायती रहे रामविलास पासवान!

Ram Vilas Paswan

A special tribute meeting was organized online in memory of Ram Vilas Paswan Saheb by eminent educationist of JNU, Dr. Rajesh Paswan.

8 अक्तूबर को परिनिवृत्त हुए माननीय रामविलास पासवान साहब की स्मृति में जेएनयू के प्राख्यात शिक्षाविद् डॉ. राजेश पासवान द्वारा ऑनलाइन एक विशेष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ, जिसमें डॉ संजय पासवान, डॉ. जगदीश प्रसाद, रवीश कुमार जैसे जाने माने देश के लगभग 5 दर्जन नेताओं, शिक्षाविद, लेखक- पत्रकारों ने अपना उद्गार व्यक्त किया. इन विशिष्ट शख्सियतों के मध्य मुझे भी 12- 14 मिनट अपनी बात रखने का अवसर मिला, जिसके लिए डॉ. राजेश पासवान के प्रति आभारी रहूँगा.

मैंने अपने सक्षिप्त संबोधन में कहा था, ‘पासवान साहब का व्यक्तित्व इतना विशाल और व्यापक था कि उस पर कुछ मिनटो में ठीक से प्रकाश नहीं डाला जा सकता, महज कुछ बातों का संकेत मात्र ही किया जा सकता है. उन्हें याद करते हुए जिस बात की ओर सबसे पहले ध्यान जाता है, वह यह कि वे एक असाधारण प्रशासक थे. 6- 6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके पासवान साहब ने जिस किसी भी मंत्रालय का भार लिया, उसमें सफलता का एक नया अध्याय रच दिये. इस लिहाज से आजाद भारत के जिस नेता से उनकी तुलना हो सकती है, वह बिहार के ही बाबू जगजीवन राम रहे.

5 Top Nayak of Mandal

लेकिन भारत का इतिहास खासतौर से उन्हें मंडल महानायक के रूप में याद रखेगा. 7 अगस्त, 1990 को प्रकाशित मंडल रिपोर्ट स्वाधीन भारत के इतिहास की संभवतः सबसे बड़ी राजनीतिक परिघटना थी, जिसके असर से भारतीय राजनीति आज भी नहीं उबर पायी है. मंडल से पिछड़ों के सशक्तीशरण का तो मार्ग प्रशस्त हुआ ही, इससे भी आगे बढ़कर शत्रुता से लबरेज परस्पर कलहरत हजारों वंचित जातियों में भ्रातृत्व का ऐसा लंबवत विकास हुआ, जिसके फलस्वरूप जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का राजनीतिक वर्चस्व हमेशा के लिए ध्वस्त हो गया. ऐसी युगांतरकारी मंडल रिपोर्ट के सामने आने में जिन थोड़े से लोगों की खास भूमिका रही, उनमें से एक पासवान साहब भी रहे, जिन्हें मंडल के 5 टॉप महानायकों में एक माना जा सकता है. मेरा दावा है 7 अगस्त, 1990 के बाद के भारत का राजनीतिक इतिहास का लेखन, पासवान साहेब के विशेष उल्लेख के बिना अधूरा रहेगा.

वैसे तो वे भारतीय राजनीति के अजातशत्रु रहे, जिन्हें सभी वर्ग के लोग समान रूप से चाहते रहे, किंतु उनकी एक छवि दलित नेता के रूप में रही. उन्होंने इस रूप में संसद के केंद्रीय कक्ष में बाबा साहेब की तस्वीर लगवाने तथा अम्बेडकरवाद के प्रसार के लिए बने अम्बेडकर फाउंडेशन के पीछे जो भूमिका अदा की है, उसे दलित कभी नहीं भूल सकते.

उन्होंने दलित साइक को बदलने में जो बड़ा काम, उसके आधार पर उन्हें स्वाधीनोत्तर भारत के टॉप के 3 दलित नेताओं में जगह दी जा सकती है.

जहां तक व्यक्ति के रूप में उनकी भूमिका का सवाल है, वे सचमुच अजात शत्रु रहे. जो भी उनसे एक बार मिला, हमेशा के लिए उनका मुरीद हो गया. मुझे भी उनसे मिलने के कुछेक अवसर मय्यसर हुए थे.

मेरी पहली मुलाकात उनसे संभवतः अगस्त 1991 में हुई थी. उन दिनों मैं बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर एक सीरियल का प्रोजेक्ट मंडी हाउस में डाला था, जिसके अनुमोदन के लिए विभिन्न नेताओं से संपर्क बना रहा था. उन्हीं दिनों जब दलित – सेना से जुड़े मेरे परिचितों को पासवान साहब के कोलकाता आगमन की जानकारी मिली, वे मुझे उनसे मिलवाने कोलकाता के एमएलए होस्टल ले गए, जहां उनसे एक यादगार मुलाकात हुई, जिसमें उनके और स्वामी अग्निवेश के साथ चार घंटे गुजारने का अवसर मिला. उन्हें जब यह पता चला कि मैं बाबा साहेब पर सीरियल बनाने के लिए प्रयास कर रहा हूं तो वे काफी खुश हुए और प्रोजेक्ट को पास करवाने के लिए प्रयास करने का आशावसन दिये. बाद में मंडी हाउस ने सारे प्रपोजल खारिज कर दिये और मैं सबकुछ छोड़कर पूर्णकालिक तौर पर लेखन से जुड़ गया.

1991 की पहली मुलाकात के बाद 2014 के आसपास पत्रकार दिलीप मंडल के सौजन्य से दुबारा मिला. यह सिलसिला 5- 6 मुलाकातों तक चला. मैं जब भी उनसे मिलने 12 जनपथ जाता, वो उत्साह से लोगों को बताते कि दुसाध जी हमारे समाज के लेखक हैं, जो डाइवर्सिटी आंदोलन चलाते हुए वंचित वर्गो के लिए नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग- व्यापार हर क्षेत्र में हिस्सेदारी के लिए 50 से अधिक किताबें लिखे हैं और अब भी इसके लिए दिन- रात लिखे जा रहे हैं. उनका यह उत्साहवर्द्धन बड़ा ही अच्छा लगता.

दलितों के आर्थिक सशक्तीकरण के हिमायती थे राम विलास पासवान | Ram Vilas Paswan was an advocate of economic empowerment of Dalits

बाद में जब मैंने उनके सुपुत्र चिराग पासवान के फिल्म की समीक्षा लिखा, वह बहुत प्रसन्न हुए थे. बहरहाल डाइवर्सिटी मैन के रूप में लोगों से मेरा परिचय कराना महज औपचारिकता नहीं थी, वे सचमुच दलितों के आर्थिक सशक्तीकरण के हिमायती थे, जिसका जिक्र मिलिंद कांबले साहब ने अपने संबोधन में करते हुए कहा है कि वह खाद्य व अन्यान्य क्षेत्रों में दलितों को हिस्सेदारी दिलाने के लिए सदा आग्रही रहे. शायद यही कारण है कि इस्पात मिनिस्टर रहते हुए उन्होंने स्टील प्रोडक्ट में डीलर शिप लागू किया था.

पासवान साहब डाइवर्सिटी के बड़े हिमायती थे, इसका साक्ष्य 2010 का बिहार विधानसभा चुनाव है.

आप सब जानते हैं कि पासवान साहब ने वह चुनाव राजद के साथ मिलकर लड़ा था, इसलिए उनका चुनावी घोषणापत्र भी राजद के साथ संयुक्त रूप से तैयार हुआ था, ऐसे में लोजपा – राजद के घोषणापत्र में तो डाइवर्सिटी की बात नहीं आई. किन्तु 15 अक्तूबर से लेकर 6 नवम्बर, 2010 तक टीवी और रेडियो पर लोजपा को अपना पक्ष रखने के जो 7- 8 बार अवसर मिले, उसमें हर बार प्रमुखता से यह बात उठाई गयी.

‘ठेकेदारी, सप्लाई, वितरण, फिल्म, मीडिया इत्यादि धनोपार्जन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं और इसमें दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का कोई स्थान नहीं है. सदियों से व्याप्त आर्थिक – सामाजिक असमानता को खत्म करने के लिए राज्य सरकारें नीतिगत फैसला न कर सकीं. धनोपार्जन के सभी संसाधनों और स्रोतों में सभी वर्गों को डाइवर्सिटी के आधार पर संख्यानुपात में समान भागीदारी और हिस्सेदारी की जरूरत है और लोजपा इसका समर्थन करती है’. ‘

बिहार विधान सभा चुनाव 2010 में लोजपा की ओर से उठाई गयी उपरोक्त बातें, इस बात की पुष्टि करती हैं कि पासवान साहब डाइवर्सिटी के हिमायती रहे और वंचित वर्गों को अर्थोपार्जन के हर क्षेत्र में संख्यानुपात में हिस्सेदारी मिले, इसकी चाह उनमें थी. आज जबकि वह नहीं रहे, पैनल में शामिल लोगों को चाहिए कि इस बात को आगे बढ़ाएं.

अंत में! उनके नहीं रहने पर जीतन राम मांझी सहित ढेरों लेखक – पत्रकार और शिक्षाविद यह मांग उठा रहे हैं कि दिल्ली के 12 जनपथ को राष्ट्रीय संग्रहालय का रूप दिया जाय तथा पासवान साहब को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाय. ‘ मैं इस मांग का समर्थन करता हूँ. शेष में अपनी बात समाप्त करने के पहले मैं पासवान साहब के परिवार और उनके करोड़ों चाहने वालो के प्रति हृदय की अतल गहराइयों से संवेदना प्रकट करता हूं.

जय भीम- जय भारत! पासवान साहब अमर रहें!       

    – एच एल दुसाध

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
लेखक एच एल दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इन्होंने आर्थिक और सामाजिक विषमताओं से जुड़ी गंभीर समस्याओं को संबोधित ‘ज्वलंत समस्याएं श्रृंखला’ की पुस्तकों का संपादन, लेखन और प्रकाशन किया है। सेज, आरक्षण पर संघर्ष, मुद्दाविहीन चुनाव, महिला सशक्तिकरण, मुस्लिम समुदाय की बदहाली, जाति जनगणना, नक्सलवाद, ब्राह्मणवाद, जाति उन्मूलन, दलित उत्पीड़न जैसे विषयों पर डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हुई हैं।

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