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shesh narain singh

60 साल के बूढ़े या 60 साल के जवान : अब यादें ही शेष हैं

दादाजी यानी ललितजी (ललित सुरजन) कहा करते थे चाचा तीन प्रकार के होते हैं, चचा बुजुर्गवार, चचा यार और चचा बरखुरदार। यदि चाचा की उम्र आपके पिता की आयु के आसपास है, तो वे बुर्जुगवार हुए, यदि वे आपकी उम्र के आसपास हुए तो वे चचा यार हुए और अगर आपकी उम्र से छोटे हों तो चचा बरखुरदार हुए।

गुजरे जमाने में जब अक्सर घरों में दो से अधिक बच्चे होते थे और उनमें उम्र का अंतर भी काफी होता था, तब इस तरह के वर्गीकरण सटीक बैठते थे। अब परिवारों की संरचना बदल गई है, लेकिन चाचा का ये वर्गीकरण अब भी कुछ लोगों के साथ के रिश्तों पर सटीक उतरता है।

देश के वरिष्ठ पत्रकार शेषनारायण सिंह जी के हमारे साथ रिश्तों में ये वर्गीकरण लागू होता था। कहने को तो वे चचा बुजुर्गवार थे, क्योंकि ललितजी से कुछ बरस छोटे थे, लेकिन हमसे रिश्ते निभाए उन्होंने चचा यार की तरह। कभी भी अपनी बुजुर्गियत को उन्होंने हम पर हावी नहीं होने दिया। हमेशा एक मित्र की तरह व्यवहार किया।

देशबन्धु से शेष नारायण सिंह जी का रिश्ता 11 बरस पहले बना और यह उनके व्यवहार की खूबी थी कि उन्होंने इस रिश्ते को महज व्यावसायिक स्तर तक नहीं रखा, बल्कि इसे आखिर तक पारिवारिक तौर पर निभाया।

शेष जी की गिनती देश के वरिष्ठ पत्रकारों में होती थी। 7 मई को उनके निधन पर देश के प्रधानमंत्री से लेकर कई केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, अफसरों, लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने शोक संवेदना प्रकट की। कई लोगों ने उनके जाने पर इस तरह का दुख महसूस किया, मानो कोई उनका अपना चला गया हो।

यह शेष नारायण सिंह जी की व्यवहारकुशलता और तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद संबंधों को निभाने की खासियत का प्रमाण है। बीते कुछ बरसों में वे लगातार कई न्यूज चैनलों में बतौर पैनलिस्ट बैठते रहे और बिल्कुल आम बोलचाल में देश के ज्वलंत मुद्दों पर अपने विचार रखते थे। उनकी बातों से सहमति या असहमति अपनी जगह थी, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनके चाहने वालों की तादाद निरंतर बढ़ती गई। इस बात को कई बार मैंने प्रत्यक्ष महसूस किया है।

शेषजी भीतर से अपने गांव -जमीन से जुड़े इंसान ही रहे

एक बार हमारे दिल्ली स्थित दफ्तर में कुछ लोग बिहार से आए हुए थे, जब उनमें से एक ने देखा कि शेषजी बैठे हुए हैं, तो उनसे गुजारिश की कि एक सेल्फी उनके साथ लेने दें ताकि फेसबुक पर डाल कर अपने परिचितों को बता सकें कि हम ने शेषनारायण सिंह जी से मुलाकात की है।

इसी तरह किसान आंदोलन पर चर्चा के लिए डीबी लाइव की ओर से जब हम गाजीपुर सीमा पर बैठे किसानों के बीच पहुंचे तो वहां भी कई लोगों ने शेषजी से मिलना और फोटो खिंचवाना चाहा। अपनी इस लोकप्रियता से वे आनंदित हुआ करते थे, लेकिन इसे घमंड उन्होंने कभी बनने नहीं दिया। भीतर से वे अपने गांव से जुड़े, जमीन से जुड़े इंसान ही रहे।

आज दुर्लभ है ऐसी सहजता

दफ्तर में वे हमेशा संपादक जी कहकर बात करते थे, और किसी से मिलवाने पर भी इसी तरह परिचय कराते थे। देशबन्धु में हर शुक्रवार उनका आलेख प्रकाशित होता था, जिसमें यदा-कदा अखबार की रीति-नीति के अनुसार मैं कुछ संपादन करती, तो उन्होंने उसका कभी बुरा नहीं माना। न ही अपनी वरिष्ठता को अहं का सवाल बनाया। कई बार मेरे लेखन पर तारीफ की। अक्षरपर्व में जब पहली बार उनका लेख मैंने प्रकाशित किया तो हंसकर कहने लगे अब हम भी साहित्यकार हो गए हैं। ऐसी सहजता आज दुर्लभ है। दिल्ली को अक्सर बेदिलवालों की कहा जाता है, लेकिन शेषजी जैसे कुछ लोगों के कारण दिल्ली में सौहार्द्रपूर्ण रिश्तों का दिल धड़कता था।

शुरुआती दिनों में जब कभी वे घर आते और मैं खुद उनके लिए पानी लेकर जाती या उन्हें भोजन परोसती, तो थोड़े संकोच के साथ कहते थे अरे आप संपादक हैं, आप बैठिए। मेरा जवाब होता, घर पर तो संपादक नहीं हूं। कुछ दिनों की इस झिझक के बाद औपचारिकता का यह आवरण हट गया। इसके बाद कई बार अकेले होने पर वे हमारे साथ भोजन किया करते, और साथ में अपने गांव के, घर के कई किस्से सुनाया करते।

2014 के आम चुनावों में उन्हें एक टीवी चैनल से पैनल में शामिल होने की अनुबंध राशि मिली। वे फौरन घर आए और मेरे पैर छुए। मैंने कहा, ये आप क्या कर रहे हैं। तो उनका जवाब था, बेटी के पैर छू रहा हूं, एक बड़ा काम मिला है। मेरे पास कहने के लिए तब शब्द बाकी न रहे। दादाजी यानी ललितजी की जगह तो कोई नहीं ले सकता, लेकिन शेषजी ने दिल्ली में हमेशा ये अहसास कराया कि मैं यहां अभिभावक की तरह मौजूद हूं। और कई बार वक्त पड़ने पर एक अभिभावक की तरह ही काम भी किया। अगर कभी हममें से कोई बीमार पड़ जाए, तो शेषजी हमसे ज्यादा परेशान हो जाया करते।

तीन साल पहले ऐसा ही वाकया हुआ।

देशबन्धु के समूह संपादक और मेरे जीवनसाथी राजीव रंजन श्रीवास्तव तेज बुखार से पीड़ित हुए, दो-चार दिन तो शेषजी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन जब घर पर दवाओं से तबियत में सुधार नहीं आया तो खुद आए और नजदीक के अस्पताल ले गए। वहां सारी जांच करवाई, अगले दिन हमसे पहले जांच रिपोर्ट भी उन्होंने ही ली और फिर सही दिशा में इलाज शुरु हुआ। उनके कारण दिल्ली के कुछ अच्छे डाक्टरों से परिचय भी हो गया।

मेरी बेटी आन्या को भी वे अपने पोते-पोतियों की तरह दुलार दिया करते थे। जब वे अपने पोतों के किस्से सुनाते तो उनकी आंखों में बालसुलभ चंचलता आ जाती और जब कभी उनसे मिलकर मुंबई या बंगलुरु से लौटते तो कुछ और अधिक ऊर्जावान हो जाते।

दरअसल उन्हें मैंने हमेशा युवकोचित उत्साह से भरपूर पाया। 60 साल के बूढ़े हैं या 60 साल के जवान जैसी लाइनें शायद शेषजी जैसे लोगों को देखकर ही लिखी गई होंगी। वे हमेशा एक हड़बड़ी में रहते। हालांकि कुछ साल पहले वे गंभीर रूप से बीमार पड़े थे। बीमारी से ठीक होने के बाद उन्हें कुछ दिनों तक छड़ी के साथ चलते देखना दुखदायी था। लेकिन जल्द ही शेषजी ने छड़ी से छुटकारा पा लिया। डाक्टर की सलाह पर जिम जाने लगे, अपने खान-पान पर कड़ा नियंत्रण बरता और कुछ ही दिनों में वही फुर्ती उनमें फिर नजर आने लगी। हां, जब वे दफ्तर की सीढ़ियां उतरते वक्त हाथ का सहारा लेते, तो समझ आता कि बीमारी का शरीर पर असर अभी गया नहीं है। लेकिन यह असर केवल शरीर तक ही रहा, दिलो-दिमाग से वे पहले की तरह चुस्त रहे और थोड़ा अधिक काम करने लगे।

संसद सत्र चल रहा हो, तो शेषजी वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराते ही। उनका जोर रहता कि मुझे भी वहां जाना ही चाहिए। वीमेन्स प्रेस क्लब की सदस्यता भी उनके कहने पर ग्रहण की।

अक्षरपर्व में जब भीष्म साहनी पर विशेषांक निकलने की योजना बनी, तो शेषजी ने फौरन उनकी बेटी कल्पना साहनी से बात की और मुझे साथ लेकर उनके घर गए। भीष्म जी के कई परिचितों से बात करवाई ताकि अंक बेहतर निकल सके।

वे महिलाओं को बिल्कुल बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर थे। एक बार करवा चौथ के दिन घर आए और आते ही सवाल दागा, तुम तो व्रत नहीं कर रही हो। अगर कर रही हो तो मैं अपनी फ्रैंड्सलिस्ट से नाम हटा दूंगा, आज बहुत सारे लोगों का हटाया है।

मैंने कहा, नहीं ऐसा कुछ नहीं है, तो फिर हंसने लगे। यादों की पोटली में ऐसे ढेरों किस्से भरे हुए हैं।

देशबन्धु के साथ-साथ ललितजी के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता रहा। पिछले साल ललितजी की बीमारी की खबर सुनकर वे व्यथित हुए और दफ्तर आए, जबकि राजीवजी ने उन्हें कोरोना के कारण दफ्तर आने से मना किया हुआ था।

इस बार भी वे कोलकाता गए तो राजीव को बताया नहीं, दो दिन बाद राजीव को कहा कि भैया आ गया हूं, लेकिन आप फिक्र न करो, मैं लगभग आइसोलेशन में ही हूं। लेकिन होनी को उनका ये आइसोलेशन मंजूर न हुआ।

कोलकाता से लौटकर वे कोरोना से पीड़ित हुए, और अस्पताल से फिर घर न लौट सके।

2 दिसंबर को ललितजी के न रहने पर उन्होंने मुझे कहा एक पिता जो दोस्त के समान है, उसके जाने का खालीपन कभी भर नहीं सकता। लेकिन काम तो करना ही पड़ता है।

बड़ी सहजता से उन्होंने मुझे सांत्वना और हिम्मत एक साथ दे दी। अब उनके न रहने पर चचा बुजुर्गवार और चचा यार दोनों का खालीपन तारी हो गया है, लेकिन काम तो करना ही पड़ता है।

–  सर्वमित्रा सुरजन

(लेखिका देशबन्धु की संपादक हैं। )

sarvamitra surjan सर्वमित्रा सुरजन लेखिका देशबन्धु की संपादक हैं।
सर्वमित्रा सुरजन
लेखिका देशबन्धु की संपादक हैं।

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Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

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