Home » Latest » तानाशाह का मिजाज, तानाशाह का दिमाग
Tractor-trolley trip in Malwa-Nimar in support of farmer movement

तानाशाह का मिजाज, तानाशाह का दिमाग

Tyrant‘s mood, dictator‘s mind

कहते हैं कि संकट के वक्त में आदमी का सबसे अच्छा भी सामने आ जाता है और सबसे बुरा भी। पर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों के देशव्यापी आंदोलन और छ: महीने से ज्यादा से जारी इस किसान आंदोलन के हिस्से के तौर पर राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर ढ़ाई महीने से ज्यादा से चल रहे लाखों किसानों के अविराम सत्याग्रह की चुनौती से निकले राजनीतिक संकट ने तो, मोदी सरकार का बदतरीन पहलू ही ज्यादा सामने लाया लगता है।

संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के बहाने से, किसान आंदोलन से उठे सवालों के प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में दिए गए जवाब, उनके तानाशाहाना मिजाज और तानाशाहाना दिमाग का, खासतौर पर प्रदर्शन करते हैं।

बेशक, एक के बाद एक आए दो लंबे भाषणों में प्रधानमंत्री ने बड़ा झूठ बोलकर और बार-बार बोलकर, उसे लोगों के दिमाग में बैठा देने के गोयबल्सीय सूत्र का भी जमकर सहारा लिया, जिसे मोदी राज के सात साल में साध-साधकर, एक कला के दर्जे में पहुंचा दिया गया है। लेकिन, उसमें कुछ भी इस अर्थ में नया नहीं था कि पिछले दो-ढ़ाई महीने से, किसान आंदोलन की वैधता पर सवाल खड़े करने के लिए, झूठ तथा अर्द्ध-सत्य पर टिके इन हथियारों का मोदी सरकार द्वारा संघ परिवार द्वारा,बराबर इस्तेमाल किया ही जाता रहा है। इनमें इसके दावे शामिल हैं कि मोदी सरकार ने जो कृषि कानून बनाए हैं, उन पर वास्तव में राष्ट्रीय आम सहमति ही रही है और कांग्रेस से लेकर एनसीपी तक लगभग सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियां, इन कदमों का समर्थन करती रही हैं। लेकिन, अब सिर्फ मोदी शासन का विरोध करने के लिए, ये पार्टियां इन कदमों का विरोध कर रही हैं।

         अर्द्ध-सत्य पर टिकी इस दलील के जरिए, इसकी आलोचनाओं की काट करने की विफल कोशिश की जा रही थी कि इन कानूनों से प्रभावित होने वालों, खासतौर पर किसानों से, उनके संगठनों से इस कानूनों को बनाने से पहले बात क्यों नहीं की गयी? और भी सामान्य स्तर पर यह दलील दी जा रही थी कि ये कदम कोई अचानक नहीं उठाए लिए गए हैं बल्कि कृषि सुधारों पर चर्चा तो दसियों साल से चल रही थी, बस मोदी सरकार ने ये कदम उठाने की हिम्मत दिखाई है। जाहिर है कि इस दलील से कम से कम संसद में कोई प्रभावित नहीं हो सकता था। इन कानूनों से पहले न सिर्फ किसानों से तथा उनके संगठनों से कोई चर्चा नहीं की गयी थी कि बल्कि वास्तव में संसद में भी लगभग कोई चर्चा नहीं होने दी गयी थी।

एक तो ये कानून ‘आपदा को अवसर’ को अवसर बनाते हुए, उस समय में अध्यादेशों के रूप में देश पर थोपे गए थे, जब देश कोविड-19 महामारी (COVID-19 Epidemic) से न सिर्फ जूझ रहा था बल्कि महामारी अपने शिखर पर थी।

जाहिर है कि मोदी सरकार ने शुरू से ही यह सुनिश्चित करने की कोशिश की थी कि, जनता को इन कानूनों पर अपनी असहमति या विरोध जताने का मौका ही नहीं मिले। इसी कोशिश को एक बार फिर तब दोहराया गया, जब इन अध्यादेश पर टिके कानूनों पर, कटे-छंटे मानसून सत्र में संसद से मोहर लगवायी गयी। मोदी सरकार ने न सिर्फ लोकसभा में अपने प्रचंड बहुमत की तानाशाही के बल पर यह सुनिश्चित किया कि संबंधित विधेयकों को, विस्तृत विचार के लिए तथा विभिन्न हितधारकों की राय लेने के संसदीय समिति में विचार की प्रक्रिया के लिए भेजने के बजाए, उस पर बिना समुचित चर्चा के हाथ के हाथ मोहर लगायी जाए बल्कि राज्यसभा में, जहां इन विधेयकों को सदस्यों के बहुमत का समर्थन मिलना मुश्किल था, उपाध्यक्ष के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि समुचित चर्चा तो दूर, मत विभाजन के भी बिना ही, कथित ध्वनि मत के आधार पर  ही, इन विधेयकों को पारित घोषित कर दिया जाए।

संसदीय नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए, न सिर्फ सदस्यों के मांग करने के बावजूद राज्यसभा में मत विभाजन नहीं कराया गया बल्कि ऐसा करने के लिए मत विभाजन की मांग कर रहे विपक्षी सांसदों को निलंबित भी कर दिया गया।

इसका नतीजा भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार, निलंबित सांसदों के संसद परिसर में अनिश्चितकालीन धरना देने के रूप में सामने आया।

वास्तव में अपने खास दरबारी इजारेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए लाए गए इन कानूनों को बनाने से पहले सिर्फ किसानों को ही नहीं, संसद को ही नहीं बल्कि खुद सत्ताधारी गठजोड़ तथा मंत्रिमंडल तक को, विश्वास में नहीं लिया गया था। यह सच तब सामने आ गया, जब कथित एनडीए में भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी, अकाली दल ने इन्हीं कानूनों पर विरोध जताते हुए, न सिर्र्फ मोदी मंत्रिमंडल में अपनी प्रतिनिधि को हटा लिया बल्कि एनडीए से नाता भी तोड़ दिया। जाहिर है कि इस सिलसिले में यह सचाई भी खुलकर सामने आ गयी कि न सिर्फ भाजपा के सहयोगियों से इन कानूनों पर कोई वास्तविक चर्चा नहीं हुई थी बल्कि मोदी के मंत्रिमंडल में भी इन कानूनों पर किसी वास्तविक चर्चा की जरूरत नहीं समझी गयी थी। उल्टे मंत्रिमंडलीय सहयोगी के सवालों को बहुत हल्के में लिया गया और बुहार कर एक तरफ कर दिया गया। पर नरेंद्र मोदी के तानाशाहाना मिजाज के शासन में, मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी की संस्कृति के अभाव की शिकायत करने का, मतलब ही कहां बनता है। यहां तो ‘हम दो बल्कि हम पौने दो और हमारे दो’ का राज है!

फिर भी यह सब तो मोदी के संसद में भाषण से पहले से सब को पता था। इस भाषण में दो चीजें महत्वपूर्ण रूप से नयी थीं। पहली नयी चीज जो मोदी के तानाशाहाना मिजाज को दिखाती है, उनका किसान आंदोलनकारियों पर ‘‘आंदोलनजीवी’’ कहकर हमला बोलना था। बेशक, मोदी के राज में यह तो  नियम ही बन गया है कि  विरोध या असहमति की हरेक आवाज को, इस राज और वास्तव में सुप्रीम लीडर के लिए चुनौती की तरह देखा जाता है और उसे अवैध साबित करने से लेकर कुचलने तक  पर, सत्ताधारी भगवा गुट की ही नहीं, उसके द्वारा नियंत्रित शासन की भी पूरी ताकत को झोंक दिया जाता है। इसकी शुरूआत, जेएनयू समेत रैडीकल व जनतांत्रिक छात्र आंदोलन का गढ़ माने जाने विश्वविद्यालयों के खिलाफ अभियानों से हुई थी और धीरे-धीरे दलितों, पिछड़ों समेत, जनतांत्रिक तबकों की सभी गोलबंदियों को इसके दायरे में घसीट लिया गया था। ‘अर्बन नक्सल’ और ‘माओवादी’ के लेबल, इसका वैचारिक हथियार बने।

भीमा कोरेगांव में हुई संघी दलितविरोधी हिंसा को सिर के बल खड़ा कर, जाने-माने सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यूएपीए का अभियुक्त बना कर जेलों में ठूंसना, इसी सिलसिले की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। मोदी के पहले कार्यकाल में भूमि-अधिग्रहण कानून में प्रस्तावित किसानविरोधी संशोधनों के खिलाफ किसानों का व्यापक आंदोलन ही, इस शिकंजे को किसी तरह तोड़ पाया था और उसने मोदी सरकार को पांव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था।

बहरहाल, दूसरे कार्यकाल में मोदी के इस तानाशाहाना हमले का दायरा और बढ़ गया और इस हमले की धार और तीखी हो गयी है। बेशक, इसका संबंध मोदी 2.0 की धार और सांप्रदायिक होने से भी है, जिसमें दूसरे कार्यकाल में गृहमंत्री के पद पर मोदी के सांप्रदायिक अभियानों के अनन्य संगी, अमित शाह को लाए जाने ने भी योग दिया है। पहला हमला, जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे तथा वास्तव में राज्य के दर्जे पर और उसकी भौगोलिक अखंडता पर भी मरणांतक चोट कर के, आरएसएस के पुराने सपने को पूरा कर के किया गया। जम्मू-कश्मीर पर अभूतपूर्व मुकम्मल लॉकडाउन थोपकर, विरोध की आवाजों का लगभग पूरी तरह से गला दबाने के बाद, वैसे ही सांप्रदायिक आग्रहों से संचालित, दूसरा हमला सीएए-एनपीआर-एनआरसी की तिकड़ी के जरिए किया गया। और इस हमले के  खिलाफ उठे बहुत ही व्यापक आंदोलन को, जिसने शाहीनबाग के नमूने के अभूतपूर्व सत्याग्रह को जन्म दिया, हिंदूविरोधी करार देकर वैचारिक रूप से पीटने तथा शासन की ताकत का इस्तेमाल कर कुचलने की, हर संभव कोशिश की गयी। इस सिलसिले का अंत, इस आंदोलन को कुचलने के लिए उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण सांप्रदायिक दंगा कराए जाने पर हुआ।

         लेकिन, अब अभूतपूर्व किसान आंदोलन की चुनौती के समाने आने के बाद, असहमति और विरोध मात्र को ‘‘शत्रु’’ बनाने में मोदी सरकार और आगे बढ़ गयी है। मोदी ने ठीक इसी तानाशाहाना नफरत को स्वर दिया, ‘‘आंदोलनजीवी’’-परजीवी की संज्ञा गढ़ने के जरिए।

बेशक, राज्यसभा में किसान आंदोलन के सिलसिले में इस संज्ञा का इस्तेमाल किए जाने के बाद, देश भर में ही नहीं बल्कि शेष दुनिया में भी उठे शोर के सामने, मोदी ने अपनी मुद्रा में कुछ सुधार करने की कोशिश की। खासतौर पर किसान आंदोलन के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसानों के आंदोलन को आंदोलनजीवी नहीं कहा था। उनका आशय तो सिर्फ आंदोलनों में ही जीवन तलाश करने वाले परजीवियों से था। लेकिन, इस रस्मी स्पष्टीकरण के बावजूद, यह साफ था कि उनकी नफरत का निशाना, जनता के हितों से जुड़े हर प्रकार के आंदोलनों के नेतृत्व पर और नेतृत्व के रास्ते से आंदोलन मात्र पर ही है। इस नफरती बोल की ब्यूटी ही यह है कि इसके जरिए, जनहित के हरेक आंदोलन को इस तर्क से अवैध बनाया जा सकता है कि इसके पीछे जनहित नहीं, आंदोलनजीवियों का निजी स्वार्थ है।

पर वह इतने पर ही नहीं रुकते हैं। इससे आगे बढ़कर वह इसे विचारधारा से जोड़ना नहीं भूलते हैं और इस तरह, अपने तथा अपनी सरकार के विरोध को, बहुत ही नरमी बरतें तो देश में राजनीतिक विरोधियों का और कठोर हों तो विदेशी राष्ट्रविरोधी ताकतों का, मामला बनाने का रास्ता खोल देते हैं।

दूसरी इतनी ही महत्वपूर्ण चीज, जो मोदी के तानाशाहाना दिमाग को दिखाती है, किसान आंदोलन के बीच से उठ रही इसकी आलोचनाओं के जवाब के तौर पर सामने आयी कि अगर ये कृषि कानून, किसानों के हित के लिए हैं, तो उनके मांगे बिना ही ये कानून क्यों बनाए गए? और जब वे कह रहे हैं कि उन्हें नहीं चाहिए तो इन कानूनों को वापस क्यों नहीं ले लिया जाता। अब प्रधानमंत्री के इस पूरी तरह से झूठे या अर्द्ध-सत्य पर आधारित दावे में हम नहीं जाएंगे कि दहेज विरोधी कानून से लेकर संपत्ति में महिलाओं के अधिकार के कानून तक, सुधार के कितने ही कानून किसी के भी मांग किए बिना ही बनाए गए थे! इस झूठ के सहारे प्रधानमंत्री मोदी न सिर्फ यह दावा करते हैं कि सुधार के इन कानूनों को बनाना भी जरूरी था बल्कि यह सिद्धांत ही पेश करते नजर आते हैं कि सुधार के लिए, प्रगति के रास्ते पर बढ़ने के लिए, शासक को प्रभावित होने वालों की मांग के बिना ही, ऐसे कानून बनाने पड़ते हैं। यानी शासक को अपने ही विवेक से निर्णय लेने होते हैं, न कि जनता की इच्छा से! इसमें वह यह और जोड़ देते हैं कि किसी भी कदम से, देश के किसी एक हिस्से में लोगों को परेशानी हो भी सकती है!

भारतीय जनतंत्र के इतिहास में, प्रजा के लिए निर्णय लेने के राजा के दैवीय और निरंकुश अधिकार का, इससे नंगई से दावा पहले किसी ने नहीं किया होगा। यह राजशाही का परफेक्ट मॉडल है। हिंदू राष्ट्र तो वैसे भी, निरंकुश शासन वाला ही होना है!                                                                        

राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Donate to Hastakshep
नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

Science news

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस : भारतीय विज्ञान की प्रगति का उत्सव

National Science Day: a celebration of the progress of Indian science इतिहास में आज का …

Leave a Reply