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ग्लेशियर हादसे पर उमा भारती ने, नदियों पर पावर प्रोजेक्ट को जिम्मेदार ठहराया, भाजपा सरकार की नीति पर सवाल ?

ग्लेशियर हादसे पर उमा भारती ने, नदियों पर पावर प्रोजेक्ट को जिम्मेदार ठहराया, भाजपा सरकार की नीति पर सवाल ?

Uma Bharti blamed on glacier accident, power project on rivers, questioning BJP government policy?

ग्लेशियर हादसे पर उमा बोलीं, नदियों पर पावर प्रोजेक्ट पर मंत्रालय ने चेताया था

नई दिल्ली, 7 फरवरी 2021. उत्तराखंड के चमोली में हुए ग्लेशियर हादसे पर बड़ा बयान देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा है कि उनके मंत्री रहते हुए मंत्रालय ने हिमालय क्षेत्र में नदियों पर पॉवर प्रोजेक्ट निर्माण को लेकर चेतावनी दी थी। ऐसे में यह घटना एक बड़ी चेतावनी है। उमा भारती इस समय हरिद्वार में हैं।

भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी आदि जिलो में रहने वाले लोगों से आपदा पीड़ितों की मदद करने की अपील की है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने इस संबंध में सिलसिलेवार कई ट्वीट किए

उन्होंने कहा, कल मैं उत्तरकाशी में थी आज हरिद्वार पहुंची हूं। हरिद्वार में भी अलर्ट जारी हो गया है यानी की तबाही हरिद्वार आ सकती है। यह हादसा जो हिमालय में ऋषि गंगा पर हुआ यह चिंता एवं चेतावनी दोनो का विषय है।

उन्होंने कहा, जब मैं मंत्री थी, तब अपने मंत्रालय की तरफ से हिमालय उत्तराखंड के बांधो के बारे में दिए एफिडेविट में यही आग्रह किया था कि हिमालय एक बहुत संवेदनशील स्थान है, इसलिए गंगा एवं उसकी मुख्य सहायक नदियों पर पॉवर प्रोजेक्ट नही बनने चाहिए। तथा इससे उत्तराखंड की जो 12 प्रतिशत की क्षति होती है वह नेशनल ग्रिड से पूरी कर देनी चाहिए।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा,

“जोशीमठ से 24 किलोमीटर दूर ग्लेशियर फटने से ऋषि गंगा पर बना हुआ पावर प्रोजेक्ट जोर से टूटा। मैं गंगा मैया से प्रार्थना करती हूं कि सबकी रक्षा करें। मैं इस दुर्घटना से बहुत दुखी हूं। उत्तराखंड देवभूमि है। वहां के लोग बहुत कठिनाई का जीवन जीकर तिब्बत से लगी सीमाओं की रक्षा के लिए सजग रहते हैं।”

बता दें कई अध्ययनों में मानव की विकास की भूख और जलवायु परिवर्तन को ऐसे हादसों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया के ध्रुवों और पहाड़ी इलाकों में बर्फ पिघलने की दर पिछले तीन दशकों में बहुत ज्यादा बढ़ी है।

शोध पत्रिका द क्रायोस्फीयर में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1990 के दशक में प्रति वर्ष बर्फ पिघलने की दर 8 खरब टन थी, जो वर्ष 2017 तक बढ़कर 12 खरब टन प्रतिवर्ष तक पहुँच गई थी। भारी मात्रा में पिघलती बर्फ से समुद्री जल-स्तर में खतरनाक वृद्धि देखी जा रही है। इस स्थिति का सबसे बुरा असर पूरी दुनिया में तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ेगा। उपग्रह चित्रों के विश्लेषण से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।

लीड्स यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डॉ इसोबेल लॉरेंस के मुताबिक,

“महासागरों की बर्फ सिकुड़ने के साथ महासागर और वायुमंडल विपुल मात्रा में सौर ऊर्जा अवशोषित करने लगते हैं। इससे ध्रुवीय क्षेत्र तेजी से गर्म होने लगता है, और वहाँ जमी बर्फ पिघलने की दर बढ़ने लगती है।

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