बेरोजगारी : हुनर का जीवन, जीवन का हुनर

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बेरोजगारी की समस्या (unemployment problem) विकराल है। आज़ादी के बाद से ही देश इस समस्या से लगातार जूझ रहा है और किसी को कोई हल नहीं सूझ रहा। लगातार बढ़ती आबादी ने आग में घी का काम किया है। योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं पर आगे कुछ नहीं होता। नई तकनीक ने कइयों को अरबपति बना दिया तो बहुत से लोगों को बेरोज़गार भी किया। कोरोना वायरस ने जो हाहाकार मचाई वो अलग। बेरोज़गार आदमी हर रोज़ उम्मीद लेकर निकलता है, इंटरव्यू देता है और असफल होकर लौट आता है। बड़ी बात यह है कि यह परेशानी उन लोगों के साथ ही है जिन्होंने मां-बाप के पैसे खर्च करके पढ़ाई की, स्कूल-कालेज में सालों-साल लगाए, डिग्री हासिल की और अब वो बेरोजगारी का ज़हर पी रहे हैं।

आत्मविश्वास खत्म कर देती है बेरोजगारी

बेरोजगारी व्यक्ति का आत्मविश्वास खत्म कर देती है (Unemployment kills confidence), आदमी का रुतबा घट जाता है, सम्मान घट जाता है, और व्यक्ति अक्सर अपनी ही नज़रों में गिर जाता है। ऐसे व्यक्ति को एक तरफ तो यह अभिमान है कि वह शिक्षित है इसलिए वह कोई “छोटा” काम नहीं कर सकता, दूसरी तरफ हालत ये है कि जेब ही फटी हुई है। उच्च शिक्षा का अभिमान है और मजबूरी का श्राप है। ऐसे में आदमी पूरी तरह से टूट जाता है, लेकिन शायद जल्दी सबक नहीं ले पाता।

चपरासी के पद का विज्ञापन निकलता है और पचास हज़ार लोग आवेदन कर देते हैं। इन आवेदनकर्ताओं में ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो उच्च शिक्षित हैं। नौकरी का लालच और उसमें भी सरकारी नौकरी का लालच (government job greed) इतना बड़ा है कि वह आदमी की सोचने-समझने की शक्ति कुंद कर देता है।

क्या बेरोजगारी वास्तव में समस्या है? (Is unemployment really a problem?)

इसमें कोई दो राय नहीं कि बेरोजगारी का ज़हर बहुत खतरनाक है पर समस्या बेरोजगारी नहीं है। दरअसल, हम जिसे समस्या मान रहे हैं, वह समस्या नहीं, हमारी गलत सोच का नतीजा है। हमने खुद ही एक बड़े अवसर को समस्या बना डाला है।

इस समस्या के तीन पहलू हैं। पहला तो यह कि हम यह मान कर चलते हैं कि नौकरी देना सरकार का काम है, दूसरा यह कि पढ़े लिखे होने का मतलब यह है कि हम बहुत से कामों को “छोटा” मानने लग गए, उसे “छोटे आदमियों का काम” मानने लग गए और श्रम को सम्मानित करने के बजाए उसे हिकारत की निगाह से देखने लग गए, और तीसरा यह कि हमने यह मान लिया है कि रोज़गार का मतलब नौकरी है। नौकरी तो रोज़गार की एक किस्म है, खेती भी रोज़गार है, बिज़नेस भी रोज़गार है।

हम पढ़ाई करें, उच्च शिक्षित हों, हमें तकनीक का ज्ञान हो, हमें नये रुझानों की जानकारी हो, यह तो अच्छा ही है पर इस सब के कारण हमारे अहंकार का गुबारा यूं न फूल जाए कि हम ” डिग्निटी ऑफ लेबर(Dignity of Labor) को भूल जाएं, श्रम की महत्ता को भूल जाएं और उसे सम्मान देने के बजाए नीची निगाहों से देखने लगें।

अगर कोई पढ़ा-लिखा युवक खाली है तो वह नये हुनर सीख सकता है, खुद को और ज्यादा काबिल बना सकता है और समाज के लिए ज्यादा लाभदायक व्यक्ति बन सकता है। नई तकनीक और मार्केटिंग के नये तरीकों और साधनों से वाकिफ एक युवा खेती की उपज बढ़ा सकता है, अपनी फसल को ऑनलाइन बेच सकता है, औरों से ज्यादा पैसे कमा सकता है।

एक हुनरमंद नौजवान कई तरह के बिज़नेस कर सकता है और नौकरी के पीछे भागने वालों के बजाए नये रोज़गार पैदा कर सकता है, खुद नौकरी देने वाला आदमी बन सकता है।

पढ़े-लिखे लोगों में काबलियत है पर कल्पनाशक्ति के अभाव और झूठे अहंकार के चलते वे ऐसे लोगों के पास नौकरी करने को मजबूर हैं जो उनसे बहुत कम पढ़े-लिखे हैं।

यह एक कड़ुवा सच है कि हमारे देश में 90% रोजगार वे लोग कर रहे हैं जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। कल्लू नाम का एक अनपढ़ नौजवान बाल काटना सीख कर नाई का काम करने लगता है, धीरे-धीरे वह एक सैलून खोल लेता है, फिर शहर के अलग-अलग बाज़ारों में उसके पांच सैलून हो जाते हैं, फिर वह अपने सैलून के फ्रेंचाइज़ देना शुरू कर देता है और फिर कोई “मिस्टर पढ़ा-लिखा” उसके यहां फ्रेंचाइज़ मैनेजर की नौकरी करने लगता है।

सच तो यह है कि लगभग 6 महीने की ट्रेनिंग से हम स्कूटर मैकेनिक बन सकते हैं, कार मैकेनिक बन सकते हैं, दर्जी का काम सीख सकते हैं, मधुमक्खी पालन सीख सकते हैं, डेयरी फार्मिंग सीख सकते हैं, हलवाई का काम सीख सकते हैं, इलेक्ट्रीशियन बन सकते हैं, प्लंबर बन सकते हैं, मोबाइल रिपेयरिंग का काम सीख सकते हैं, कारपेंटर बन सकते हैं, वेल्डर बन सकते हैं, योगाचार्य बन सकते हैं।

काम की कमी नहीं है, अवसरों की कमी नहीं है।

केवल छह महीने में स्वरोज़गार के ऐसे बहुत से काम सीखे जा सकते हैं जो किसी परिवार को भूखा नहीं सोने देगा।

हमारे देश में आज सबसे अधिक दुखी वही लोग हैं जो बहुत अधिक पढ़-लिख कर बेरोजगारी झेल रहे हैं पर इस समस्या के एक आसान हल की तरफ से आंखें मूंदे बैठे हैं।

पढ़ा-लिखा होने का अर्थ

पढ़ा-लिखा होने का मतलब (meaning of being educated) तो यह होना चाहिए कि  हम में नई सोच विकसित हो, हम कुछ नया सोच सकें, कुछ नया कर सकें। पर जो हो रहा है, वह तो इसका बिलकुल उल्टा है। रोजगार के लिए हमारा अधिक पढ़ा लिखा होना कोई मायने नहीं रखता। यह हमारी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि हम किसी के नौकर बनना पसन्द करते हैं या खुद अपने कारोबार के स्वतन्त्र मालिक। इस एक मंत्र को समझ लें तो पढ़े-लिखे नौजवानों के बीच नौकरी को लेकर जो मारा-मारी लगी हुई है, वह खत्म हो जाएगी।

बेरोजगारी की समस्या के समाधान का कारगर उपाय

हर व्यक्ति की रुचियां अलग होती हैं, स्थितियां अलग होती हैं, हर किसी को एक ही नाप का कपड़ा नहीं पहनाया जा सकता, हर किसी की समस्या का एक ही इलाज संभव नहीं है। बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं पर भी यही बात लागू होती है, इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि हर व्यक्ति उद्यमी ही बने। मैं बस यह कहना चाहता हूं कि रोज़गार के लिए जैसे नौकरी एक विकल्प है, वैसे ही उद्यम भी एक अच्छा विकल्प है और युवाओं को इस विकल्प को भी ध्यान में रखना ही चाहिए।

कॉरपोरेट जगत में जब हम किसी समस्या का समाधान करने की कोशिश करते हैं तो सभी संबंधित व्यक्तियों के सुझाव लिये जाते हैं। इस तरह अलग-अलग सोच, अनुभव और पृष्ठभूमि वाले लोगों के सुझाव जब सामने हों तो समस्या के समाधान के कई नए दरवाज़े खुल जाते हैं। फिर उनमें से सबसे बढ़िया तीन सुझावों पर तो विचार होता ही है, इसके अलावा दो-तीन या ज्यादा सुझावों को मिलाकर कोई नया एक्शन प्लान बनाने की भी कोशिश होती है। यही काम हम अपने जीवन में भी कर सकते हैं। बेरोजगारी भी तो एक समस्या है। परिवार के सभी सदस्यों, रिश्तेदारों, मित्रों और शुभचिंतकों से राय मांगी जा सकती है, फिर उनमें से सर्वाधिक उपयुक्त सुझाव चुनकर उस पर अमल किया जा सकता है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान का यह कारगर उपाय है। 

हैपीनेस गुरू पी. के. खुराना

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