इस तरह चुपचाप निकल गया शशिभूषण द्विवेदी

शशिभूषण द्विवेदी के असामयिक निधन (Untimely demise of Shashibhushan Dwivedi) से स्तब्ध हूँ। गम्भीर सिंह पालनो, ज्ञानेंद्र पांडेय और अवधेश प्रीत हमारी पीढ़ी के लेखक रहे हैं, जो एक साथ पले, पढ़े बढ़े और साथ ही बिखर गए।

शशि हमसे जूनियर था।

जब मेरे पिता पुलिनबाबू कैंसर से मरणासन्न थे तब वह उन्हें देखने रुद्रपुर से किसी के साथ आया था। कोलकाता में होने की वजह से इससे पहले उससे मुलाकात नहीं हुई थी। तब भी मैं कविता कहानी लिख रहा था और मेरा उपन्यास अमेरिका से सावधान छप रहा था। इसलिए पत्र पत्रिकाओं पर नज़र रहती थी। वह तभी से बहुत अच्छा लिख रहा था। हंस और शायद कथादेश में भी उसकी कहानियां छप चुकी थीं।

दूसरी मुलाकात उससे तब हुई जब पिताजी के निधन के बाद 2001 में ट्रेन से रामपुर उतरकर बस से देर रात रुद्रपुर पहुंचा। वह बस अड्डे पहुंचकर स्टेट बैंक के पीछे आवासीय कालोनी में अपने घर मुझे ले गया। उसकी मां और पिताजी से मुलाकात हुई।

उसके घर जाने का सिलसिला बना तो पता चला कि वह बेरोज़गार था। मैंने कहा कि पत्रकारिता करोगे तो नौकरी मिल जाएगी। वह राजी नहीं था, लेकिन मां के कहने पर किसी तरह राजी हुए वह।

मैंने दैनिक जागरण के प्रबंधक चंद्रकांत त्रिपाठी और अमर उजाला के लिए वीरेन दा डंगवाल को पत्र लिखकर उसे बरेली भेज दिया।

वह पत्रकार बन गया और बाद में सुना कि दिल्ली निकल गया है। फिर उससे कोई मुलाकात न हो सकी। उसने सम्पर्क भी नहीं किया।

बहुत प्रतिभाशाली था। पत्रकार खोजने में कभी मेरी खूब साख थी। मैंनं देखते ही उसकी सम्भावनाओं को पहचान कर लिया था। लेकिन उसके लिखे का मूल्यांकन करने की नौबत नहीं आई। न उससे कोई ज्यादा सम्वाद बना।

वह मेरे इलाके का है और लिखता पड़ता है, इसलिए दिलो दिमाग में वह हमेशा बना हुआ था।

आज फेसबुक से जानकारी मिली तो अमलेंदु को फोन लगाकर खबर कन्फर्म की।

कहने को कुछ है नहीं। उसे ठीक से जान भी नहीं सका कि वह इस तरह निकल गया।

बहुत दुख हो रहा है।

विनम्र श्रद्धांजलि

पलाश विश्वास

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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