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driven in bjp for the first time in 70 years under modi's rule

यूपी चुनाव 2022 : हो चुकी है मोदी राज के अंत की शुरूआत!

UP Elections 2022: The end of Modi Raj has begun! | 70 सालों में मोदी राज में पहली बार भाजपा में खदेड़ा

ओमिक्रॉन से संचालित कोरोना की तीसरी लहर (Omicron-powered third wave of corona) के ज्वार को देखते हुए, चुनाव आयोग को विधानसभाई चुनावों के अगले चक्र की तारीखों की घोषणा के साथ ही, चुनाव सभाओं, जुलूसों, आदि पर फिलहाल रोक लगानी पड़ी है। फिर भी मतदान की तारीखों के ऐलान के बाद के थोड़े से अर्से में ही काफी कुछ ऐसा घटा है, जिसने उत्तर प्रदेश समेत इन सभी राज्यों के चुनाव को, एक खुला मुकाबला बनाकर काफी दिलचस्प बना दिया है। हमारा इशारा मोदी राज में संभवत: पहली ही बार देखने में आए इस दृश्य से है कि चुनावों की ऐन पूर्व-संध्या में, दूसरे पार्टियों के नेताओं के तथा विशेष रूप से संभावित उम्मीदवारों के भाजपा की ओर पलायन का जो तांता लगा रहता था, इस बार उससे उल्टा हो रहा है।

भाजपा में मची भगदड़ के चुनावी अर्थ

इकतरफा तौर पर भाजपा से पलायन न सही, पर भाजपा से दूसरी पार्टियों की ओर उल्लेखनीय पलायन हो रहा है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) तथा दारा सिंह चौहान (Dara Singh Chauhan) के योगी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के साथ भाजपा में मची भगदड़, जिसके चुनावी अर्थ (Election meaning of stampede in BJP) की हम जरा बाद में चर्चा करेंगे, हवा में इस बदलाव का जाहिर है कि सबसे प्रमुख उदाहरण है। लेकिन, यह रुझान सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही देखने को नहीं मिल रहा है।

गोवा, उत्तराखंड में भी भाजपा में भगदड़

चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से गोवा में भी, भाजपा सरकार के एक मंत्री तथा एक विधायक, अब तक कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं, जबकि कांग्रेस से दलबदल कराने के अलावा जिन सहयोगी पार्टियों के सहारे भाजपा ने पांच साल गोवा में चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी रहने के बावजूद पांच साल सरकार चलाई थी, उनके भाजपाविरोधी खेमों के साथ जुड़ जाने से, भाजपा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

हरक सिंह रावत की उत्तराखंड कैबिनेट से त्यागपत्र की धमकी

इसी तरह, चुनाव की तारीखों की घोषणा से चंद रोज पहले उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, हरखसिंह रावत ने मंत्रिमंडल की बैठक से बहिर्गमन करने के बाद, इस्तीफा देने की धमकी (Harak Singh Rawat threatens to resign from Uttarakhand cabinet) दे दी थी। बाद में भाजपा बेशक इस संकट को टालने में कामयाब रही लगती है, लेकिन यह संकट सचमुच टल गया है या सिर्फ तत्काल टाला गया था, इसका पता उम्मीदवारों की सूचियां जारी होने के बाद ही चलेगा।

याद रहे कि उत्तराखंड में, कार्यकाल के बीच में से ही हटाए गए, दो पूर्व-मुख्यमंत्री भी बैठे हुए हैं, जिनकी मौजूदगी से वर्तमान मुख्यमंत्री की मुश्किलें बढ़ने ही जा रही हैं।

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के केंद्र में है उत्तर प्रदेश का चुनाव

इस तरह विधानसभाई चुनावों का यह चक्र, जिसके केंद्र में उत्तर प्रदेश का चुनाव (The election of Uttar Pradesh is at the center of the assembly elections of 5 states.) है, ऐसा चक्र है जिसमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की निर्णायक रूप से हार भी हो सकती है। बेशक, पिछले साल के पूर्वार्द्ध में हुए विधानसभाई चुनावों में भी भाजपा को बाकायदा तगड़ा झटका लगा था। उस चक्र में वह सिर्फ असम में, वह भी वोटों के बहुत ही मामूली अंतर से ही, अपनी सरकार को बचाए रख पाई, जबकि केरल में उसका खाता ही बंद हो गया और तमिलनाडु में उसकी सहयोगी, एआईएडीएमके के हाथ से सरकार निकल गई। और बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद, मोदी-शाह जोड़ी को जैसी भारी हार झेलनी पड़ी, उसका दर्द तो अभी तक गया नहीं लगता है।

फिर भी, विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में, पिछले चक्र से यह बड़ा अंतर है कि इस चक्र में चुनाव में जा रहे पांच राज्यों में से, चार में भाजपा की सरकारें हैं, जबकि पिछले चक्र में असम में ही भाजपा की सरकार थी, जबकि तमिलनाडु में उसकी सहयोगी पार्टी की सरकार तो थी, लेकिन उसमें भाजपा की परोक्ष हिस्सेदारी ही थी।

पिछले विधानसभा चुनावों और उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन खराब तक ही रहा

इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि विधानसभा चुनाव के पिछले चक्र में ही नहीं बल्कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अब तक आए तमाम विधानसभाई चुनावों में और इसमें हम कुछ ही महीने पहले हुए करीब ढाई दर्जन विधानसभाई और तीन लोकसभाई सीटों के उपचुनाव के नतीजे भी जोड़ सकते हैं, मोदी के खुद चुनाव प्रचार का नेतृत्व करने के बावजूद, भाजपा का प्रदर्शन मामूली से लेकर खराब तक ही रहा है।

इसके बावजूद, मोदी के दूसरे कार्यकाल में हुए इन विधानसभाई चुनाव के नतीजों को, उस तरह से मोदी निजाम के भविष्य के संकेतक के रूप में नहीं देखा जा रहा था, जैसे इस फरवरी-मार्च में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों के नतीजों को देखा जाएगा। और इसकी वजह सिर्फ इतनी ही नहीं है कि विधानसभाई चुनावों का यह चक्र आने तक, मौजूदा मोदी सरकार के कार्यकाल का उत्तरार्द्ध शुरू हो चुका है और सरकार के कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में, अगले चुनाव की अटकलें लगना शुरू हो ही जाता है।

क्यों महत्वपूर्ण हैं उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव (Why is the Uttar Pradesh assembly election important?)

बेशक, इसका संबंध इससे भी है कि विधानसभाई चुनाव के इस चक्र में, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की भी किस्मत का फैसला होना है और लोकसभा में मोदी सरकार के पूर्ण बहुमत में, सबसे बड़ा हिस्सा इस राज्य का ही है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में तो यह हिस्सा और भी बड़ा था।

उत्तर प्रदेश के चुनाव के इस असाधारण महत्व के बावजूद, विधानसभाई चुनाव के इस चक्र को मोदी राज के भविष्य का संकेतक मानने के कारण, इससे कहीं बड़े हैं।

चुनाव के इस चक्र के विशेष रूप से भविष्य के लिए संकेत माने जाने का संबंध इस तथ्य से है कि जिस तरह विधानसभाई चुनावों का यह चक्र, हिंदी हार्टलैंड पर केंद्रित है, उस तरह विधानसभाई चुनावों का हाल का कोई चक्र केंद्रित नहीं था। बेशक, इस चक्र में गोवा तथा मणिपुर के विधानसभाई चुनाव भी शामिल हैं, फिर भी इस चुनाव के महत्व का पलड़ा हिंदीभाषी क्षेत्र की धुरी, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के पक्ष में ही झुका हुआ है, जो वैसे भी दो दशक पहले तक उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करता था। पंजाब बेशक, सीधे-सीधे इस क्षेत्र का हिस्सा नहीं है और वहां के राजनीतिक समीकरण भी इस क्षेत्र से काफी भिन्न हैं, जहां भाजपा सत्ता की दावेदार न पहले कभी थी और न अब है। फिर भी, अपनी इन विशिष्टïताओं के बावजूद, उत्तरी भारत के हिस्से के तौर पर पंजाबियों का राजनीतिक झुकाव हमेशा, शेष उत्तरी भारत यानी हिंदी पट्टी की संगति में ही रहा है।

दरक चुका लगता है हिंदी पट्टी का भाजपा का आधार (BJP’s base of Hindi belt seems to have cracked)

और हिंदी-भाषी क्षेत्र, भाजपा-आरएसएस की सत्ता का ही नहीं, उसकी सत्ता को वैचारिक आधार मुहैया कराने वाले विचारों तथा मूल्यों का भी, मुख्य आधार रहा है। इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक-सामाजिक-वैचारिक वर्चस्व के आधार पर ही आरएसएस-भाजपा के लिए, देश के दूसरे अनेक हिस्सों में अपने पांव फैलाना संभव हुआ है, हालांकि दक्षिण भारत में और उससे कम हद तक पूर्वी भारत में भी, उसे अब भी बहुत उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिल पाई है। यह उसके बहुसंख्यक सांप्रदायिक गोलबंदी (majority communal mobilization) और इजारेदार पूंजी के आशीर्वाद की चमक-दमक के सारे योग को आजमाने के बावजूद है। लेकिन, मोदी राज के दुर्भाग्य से, हिंदी पट्टी का उसका यही आधार, कम से कम राजनीतिक स्तर पर काफी दरक चुका लगता है। मोदी के राज में ही पहले दिल्ली तथा बिहार और उसके बाद, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने, उसके राजनीतिक वर्चस्व को नकार दिया था। यह दूसरी बात है कि भाजपा ने बाद में, कर्नाटक की ही तरह, मध्य प्रदेश में भी नंगी खरीद-फरोख्त के जरिए, जोड़-गांठ कर फिर से अपनी सरकार बना ली।

संघ-भाजपा ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी सारी ताकत क्यों झोंक दी है?

हिंदी पट्टी के नक्शे पर रखकर देखें तो, मोदी की भाजपा का राजनीतिक बोलबाला पहले ही, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा हिमाचल तक ही सिमट कर रह गया है। इसे ध्यान में रखें तो, चुनावों के इस चक्र का मोदी राज के भविष्य के लिए अर्थ, खुद ही उजागर हो जाता है। अचरज की बात नहीं है कि संघ-भाजपा ने खासतौर पर उत्तर प्रदेश में और उत्तराखंड में भी, अपनी सारी ताकत झोंक दी है। इसमें एक ओर मोदी सरकार का, खुद प्रधानमंत्री के तथा उनके अधिकांश मंत्रियों के समय समेत, सरकारी एजेंसियों सहित केंद्र व राज्य के सभी संसाधनों का झोंका जाना शामिल है, तो दूसरी ओर भाजपा द्वारा बढ़ती नंगई से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (communal polarization) की अपनी तुरप का सहारा लिया जाना भी शामिल है। इसमें मुख्यमंत्री, आदित्यनाथ द्वारा आने वाले चुनाव को 80 फीसद बनाम 20 फीसद का चुनाव कहकर, इसे हिंदू-मुसलमान के चुनाव के रूप में पेश किए जाने से लेकर, इस चुनाव की ही संगति में सांप्रदायिक ताप बढ़ाने के लिए तथाकथित ‘धर्म-संसदों’ के ऐलान तक शामिल हैं। अचरज नहीं कि इसमें मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव में उतारे जाने के जरिए, राम मंदिर के मुद्दे को और भी प्रत्यक्ष रूप से भुनाने की कोशिश भी जुड़ जाए।

मोदी निजाम की बदहवासी क्यों बढ़ गई है?

कहने की जरूरत नहीं है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ज्यादा से ज्यादा खुलकर इस्तेमाल करने की ये कोशिशें, संघ-भाजपा के चरित्र को ही नहीं, मोदी निजाम की बदहवासी को भी दिखाती हैं। यह बदहवासी, इसलिए और भी बढ़ गई है कि 2014 से भाजपा ने, जाहिर है कि अपनी सांप्रदायिक दुहाई के सीमेंट के सहारे, अपने मूल सवर्ण-संपन्न आधार के गिर्द, गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के अच्छे-खासे हिस्से की, जो सपा-बसपाविरोधी या यादव-जाटव विरोधी लामबंदी कर ली थी, वह अब बिखरती नजर आ रही है। जाहिर है कि इस गोलबंदी के बिखरने में भाजपा की डबल इंजन सरकारों की हर मोर्चे पर विफलता (BJP’s double engine governments failure on every front) से लेकर, योगी की ठाकुरशाही में पिछड़ी जातियों व दलितों के साथ अन्यायों का बहुत बढ़ जाना तक शामिल हैं।

भाजपा में पिछड़े वर्ग के नेताओं की बगावत का क्या कारण है?

भाजपा में संघ के रास्ते नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से आए पिछड़े वर्ग के नेताओं की बगावत, संघ-भाजपा के किले की इसी दरकन की शुरूआत है। इनमें से ज्यादातर ताकतों के समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के नेतृत्ववाली कतारबंदी की ओर बढ़ने ने, उत्तर प्रदेश में भाजपा राज के लिए सचमुच खतरा पैदा कर दिया है।

तो क्या अमित शाह भाँप गए थे यूपी से शुरुआत हो गई है मोदीराज के अंत की?

अमित शाह ने लखनऊ में एक रैली में ऐलान किया था कि 2024 के चुनाव का रास्ता, 2022 से होकर जाता है। जाहिर है कि इस तरह वह मोदी राज के भविष्य को, उत्तर प्रदेश के चुनाव से जोड़कर, इस प्रदेश के चुनाव को मोदी राज के लिए चुनाव बताकर, तमाम मोदी समर्थकों को इस चुनाव में गोलबंद करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन, लगता है कि 2022 के चुनाव और खासतौर पर उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के चुनावों से, 2024 में मोदी राज के अंत की ही शुरूआत हो सकती है।

राजेंद्र शर्मा

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हमारे बारे में राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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