भारत और दुनिया के लिए यूएसए की प्रासंगिकता तथा ट्रम्प-कार्ड फेल होने के निहितार्थ

Donald Trump

USA’s Relevance to India and the World and Implications of Trump-Card Failure

Donald Trump has lied more than 22,247 times in his four-year term

(डोनॉल्ड ट्रम्प ने अपने चार साल के कार्यकाल में 22,247 बार से अधिक झूठ बोला है। ट्रम्प ने हजारों बार भ्रामक, अवैज्ञानिक, अतथ्यात्मक बातें कही, जनमानस को गुमराह करने वाले तथ्यों का सहारा लिया। दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति का दावा करने वाले देश के सत्ता प्रमुख का इस तरह का चरित्र जहां अमेरिका की छवि एवं पहचान के लिए शर्मनाक है, वहीं यूएसए एवं दुनिया के करोड़ों युवाओं के लिए यह एक झंझावात जैसा है; जो इस पद, इसकी गरिमा एवं प्रतिष्ठा को एक आदर्श के रूप में देखते हैं)

डॉ. लखन चौधरी

इस सप्ताह पूरी दुनिया में अमेरिकी चुनाव और चुनाव परिणामों की उत्सुकता, चर्चा, परिचर्चा छाई रही। इस समय अमेरिका दुनिया का अगुआई करने वाला सबसे अमीर, विकसित और सबसे अधिक सम्पन्न एवं संवृद्ध राष्ट्र है, इसलिए दुनियाभर की निगाहें, नजरें होना स्वााभाविक है। आज दुनिया का हर कोई जो अपने देश से बाहर जाकर विदेश में रहना, बसना अथवा नौकरी करना चाहता है वह जरूर अमेरिका का सपना देखता है। अमेरिकी प्रगति, संवृद्धि एवं चकाचौंध के साथ अमेरिकी जीवनशैली ने आज पूरी दुनिया को अपनी ओर मोहित, आकर्षित किया है, कर रखा है, तो वहां के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले पद एवं पदासीन व्यक्ति के लिए उत्सुकता बनती है। यह जरूरी भी है, क्योंकि आने वाले वक्त में उसकी नीतियां बहुत हद तक उनके सपनों को पूरा करने में मददगार जो होते हैं, हो सकते हैं।

अंततः भारी उलटफेर और कांटे की टक्कर के बाद यूएसए या अमेरिका में डोनॉल्ड ट्रम्प (रिपब्ल्किन, 2016-20) 2020 का चुनाव हारते दिख रहे हैं, और अब अमेरिका की कमान जो. बाइडन (डेमोक्रेट्स) के हाथों आती लग रही है।

Who would be more useful, suitable or friendly to India- Trump or Biden?

भारी कश्मकश भरे इस चुनाव में इस बार तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं हैं कि भारत के लिए ट्रम्प अथवा बाइडन कौन अधिक उपयोगी, उपयुक्त या हितैशी होगा ? डी ट्रम्प अमेरिकन इतिहास के सबसे अधिक संदिग्ध चरित्र एवं सबसे कम औसत बुद्धि वाले राष्ट्रपति रहे ? जिन्होने अमेरिका का अधिक नुकसान कराया एवं वैश्विक स्तर पर अमेरिका की छवि धूमिल की। ट्रम्प, अपनी झूठ बोलने एवं कहीं भी कुछ बोलने की आदत के लिए, जो व्यक्ति को अविश्वसनीय बनाता है; के लिए भी अपने पूरे कार्यकाल में चर्चित रहे। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति ने चार साल पूरी दुनिया को गुमराह किया।

वैसे अमेरिका के राष्ट्रपतियों की चर्चा की जाये तो अमेरिका के 231 वर्षों के इतिहास और इस पद के 58 टर्म में मात्र 45 व्यक्ति ही इस महत्वपूर्णं राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए हैं, जो दुनिया का सबसे शक्तिशाली पद है। राष्ट्रपति ट्रम्प 45वें व्यक्ति थे तथा उनका इस पद का 58वां टर्म था। अमेरिका के इतिहास में 32वें राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट (डेमोक्रेट्स), जो 1932 से 1944 तक तीन टर्म अमेरिका के राष्ट्रपति रहे को छोड़कर अभी तक 19 लोग दो-दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके हैं। इसके पूर्व अब्राहम लिंकन (1860-1868) यूएसए के वह पहले राष्ट्रपति थे, जो अमेरिका के इतिहास के पहले रिपब्ल्किन राष्ट्रपति हुए, और लगातार दो कार्यकाल इस पद पर रहे। तब से लेकर यूएसए में लगभग बारी-बारी से डेमोक्रेट्स एवं रिपब्ल्किन ही सत्ता पर काबिज हैं।

1992 से 2016 तक क्रमशः बिल क्लिंटन (डेमोक्रेट्स), जार्ज बुश (रिपब्ल्किन) एवं बराक ओबामा (डेमोक्रेट्स) दो-दो टर्म 8-8 साल यूएसए के राष्ट्रपति रहे हैं।

वर्तमान राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प (रिपब्ल्किन, 2016-20) के साथ यह परम्परा टूटते हुए यूएसए अब जो. बाइडन (डेमोक्रेट्स) के हाथ शासित होने जा रहा है। तो क्या अब यूएसए या अमेरिका की भारत के प्रति रूख या नजरिया, भारतीय नीतियों में भारी बदलाव एवं परिवर्तन की उम्मीद है ? हकीकत यह है कि यूएसए का राष्ट्रपति कोई भी बने या वहां डेमोक्रेट्स या रिपब्ल्किन किसी भी दल सत्ता में आये भारत को कोई खास लाभ-हानि की संभावना नहीं है। हालांकि यह कहा जाता रहा है कि पिछले कुछ दशकों में डेमोक्रेट्स की नीतियां भारत के लिए अधिक अनुकूल रहीं हैं, आगे देखना है कि बातें कितनी एवं कहां तक सच होती है ?

मतलब साफ है कि यूएसए का राष्ट्रपति कोई बने, यूएसए में सत्ता किसी के हाथ में आये ? भारत के लिए कोई खास फायदे-घाटे का नहीं रहेगा, यानि यूएसए-भारत के संबंधों पर कोई बहुत फर्क आने वाला या पड़ने वाला नहीं है।

इस बार के अमेरिकी चुनाव में जो दिलचस्प बातें सामने उभरकर आ रही हैं उसमें प्रमुख हैं कि इस बार जो. बाइडन को अमेरिका की महिला मतदाताओं का 15 प्रतिशत अधिक मत (42-57, ट्रम्प-बाइडन) प्राप्त हुआ है। 87 प्रतिशत अश्वेतों, 64 प्रतिशत एशियाई मूल के साथ 18 से 29 वर्ष के 64 प्रतिशत युवाओं और अमेरिका के 57 प्रतिशत ग्रेजुएट ने बाइडेन को चुना है। 30 से 64 साल के मतदाओं में 54 प्रतिशत ने बाइडन को चुना, इसी अमेरिका में रहने वाले लैटिन आदि अन्य मूल के लगभग 58 से 67 प्रतिशत मतदाताओं ने बाइडन को चुना है। यह निश्चित रूप से डोनॉल्ड ट्रम्प की व्यक्तिगत छवि का नतीजा है, जिसकी बगैर परवाह किये ट्रम्प ने अपने चार साल के कार्यकाल में मनमानी की है।

30 अप्रैल 1789 को अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन के साथ दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका की जो विकास यात्रा आरंभ हुई है, आज पूरी दुनिया उसकी आगेाश में है। मात्र दो सौ वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) ने विकास, प्रगति, उन्नति एवं संवृद्धि की दुनिया के सामने एवं दुनिया के लिए ऐसी मिशाल पेश की है, कि आज पूरी दुनिया इसकी चकाचैंध में गुम है। अमेरिका, आज एक ऐसा नाम है जो दोनों महाद्वीपों के सारे राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए पूरी दुनिया को अपनी महाशक्ति होने का प्रमाण दे चुका है। यूरोप, जो कभी पूरी दुनिया का नेतृत्त्व करता था अब यूएसए जो अमेरिका के नाम से जाना जाने लगा है; के समक्ष कहीं नहीं टिकता है, और इसी अमेरिका से टक्कर लेने के लिए आजकल चीन हाथपांव मार रहा है। यही यूएसए की समकालीन प्रासंगिकता है, यही यूएसए की पहचान है, यही यूएसए की विकास, प्रगति, तरक्की, उन्नति एवं संवृद्धि का प्रमाण है।

लगभग पिछले एक दशक से चीन अमेरिका से टक्कर लेने की फिराक में है। यूएसए को पछाड़कर चीन दुनिया की नई महाशक्ति बनना चाहता है। कई बार तो यह लगता है कि चीन, यूएसए को पीछे छोड़ते हुए दुनिया पर कब्जा कर चुका है।

कोविड-19 के मामले को ही देख लीजिए, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह लड़खड़ा गईं, कोरोना से यूएसए भी पस्त हो गया लेकिन चीन पर इसका कोई दुष्प्रभाव खुले तौर पर देखने को नहीं मिला। हालांकि इससे यह साबित होना मुश्किल है कि दुनिया की नई महाशक्ति अब चीन है ? इतना जरूर है कि चीन ने आर्थिक रूप से अपनी अर्थव्यवस्था को बेहद मजबूती के साथ न केवल विकसित किया है, बल्कि पूरी दुनिया में अपने कारोबार को इस कदर फैलाया है कि अब चीन से मुकाबला करना आसान नहीं रहेगा। पूरा यूरोप एवं अमेरिका मिलकर भी शायद अब चीन को पछाड़ न सकें ?

इधर इस बार के अमेरिकी चुनाव में बहुत सी ऐसी तथ्यात्मक बातों का खुलासा भी हुआ है जिसके लिए अमेरिका अभी तक दुनिया का सरताज बना हुआ है, कहलाता है। मसलन जाति-धर्म, रंग-नस्ल, पंथ-संप्रदाय जैसी तमाम मानवीय कमतरियों से यूएसए की ऊपर उठ चुके समाज की जो पहचान थी, वह इस बार के चुनाव परिणाम के बाद धूमिल होती नजर आ रही है। इस बार के चुनाव में यूएसए में जिस तरह से वोटिंग हुई है उससे साफ है कि अब अमेरिका भी स्थानीय-बाहरी, श्वेत-अश्वेत, ग्रेजुएट-नॉन ग्रेजुएट जैसे मसलों से जूझता दिखने लगा है। आने वाले वक्त में निश्चित तौर पर इस तरह के मुद्दे और बढ़ेंगे जिससे अमेरिका की दुनिया के समक्ष बनी छवि का और धूमिल होना तय है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने इस तरह के बेतुकी, निरर्थक मुद्दों से निःसंदेह यूएसए की पहचान को नुकसान पहुंचाया है। उम्मीद करनी चाहिए कि यूएसए का नया राष्ट्रपति इस दिशा में सकारात्मक पहल करेगा और जाति-धर्म, रंग-नस्ल, अमेरिकन-बाहरी जैसे तमाम मानवीय कमतरियों से उपर उठकर केवल और केवल विकास एवं संवृद्धि के मसले पर काम करेगा जो उसकी पहचान रही है।

(लेखक; अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं)

Dr-Lakhan-Choudhary
Dr-Lakhan-Choudhary

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