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भारी संकट में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था

भारी संकट में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था

उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का हाल क्या है

सरकारी व स्वतंत्र स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है और इससे उबरने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है। प्रदेश के ऊपर वित्तीय वर्ष 2022-23 में लगभग 6.66 लाख करोड़ रूपये का कर्जा है और प्रति व्यक्ति कर्ज 26000 रूपये से ज्यादा है।

यूपी में प्रति व्यक्ति सालाना आय  कितनी है?

उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति सालाना आय 81398 रूपये है यानी एक माह में 7 हजार रूपये से भी कम आय है। रोजगार की हालत बेहद खराब है। प्रदेश में करीब 6 लाख सरकारी पद खाली पड़े हुए हैं। निजी क्षेत्र में महज 5616 स्टार्टअप का पंजीकरण हुआ है।

विकास का अर्थ क्या है? क्या शहरीकरण बेरोजगारी का समाधान है?

प्रदेश में विकास के नाम पर मेट्रो, ग्लोबल समिट, एक्सप्रेस वे, स्मार्ट सिटी आदि की ही चर्चा होती है। एक डिलॉयट कम्पनी ने विकास के लिए राज्य सरकार को बड़े पैमाने पर शहरीकरण का सुझाव दिया है। उसका कहना है कि उत्तर प्रदेश की शहरी आबादी (Urban population of Uttar Pradesh) अभी भी 22 फीसदी है, जिसकी संख्या बढ़ाकर ही प्रदेश विकास कर सकता है। हालांकि अभी भी प्रदेश में बहुत सारे जिले हैं जिनकी शहरी आबादी अधिक है जैसे गौतमबुद्ध नगर 83.6 प्रतिशत, गाजियाबाद 81 प्रतिशत, लखनऊ 67.8 प्रतिशत, कानपुर नगर 66.7 प्रतिशत, झांसी 43.2 प्रतिशत, वाराणसी 43 प्रतिशत आदि। इन शहरों में भी बड़े पैमाने पर बेकारी है और आम शहरी की आमदनी में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता है।

स्मार्ट सिटी और शहरीकरण का मकसद क्या है?

सरकार भी बड़े पैमाने पर प्रदेश में स्मार्ट सिटी बनाने की बात कर रही है। मकसद साफ है किसानों की जमीन जैसे-तैसे दाम पर खरीद कर बिल्डर्स और कम्पनियों के हवाले करना। विपक्षी दल भी इसी तरह के विकास के मॉडल की बात करते हैं और सरकार से इसी क्षेत्र में प्रतिद्वंद्विता में उतरते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि पूंजी और उच्च तकनीक केन्द्रित इस तरह के विकास की योजनाएं लोगों की गरीबी और बेकारी दूर करने में कतई सक्षम नहीं हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 2018-19 में दो पहिया वाहन की खरीद में 36 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहीं कार की खरीद में 9 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 2015-16 की तुलना में 2019-21 में 22 प्रतिशत लोगों की जोत में कमी आयी है। स्वतः स्पष्ट है कि किसान अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए जमीन बेच रहे हैं।

यह भी रिपोर्ट है कि इसी गरीबी के दौर में कारपोरेट घराने खासकर अम्बानी और अडानी ने अकूत सम्पत्ति बनाई है।

केन्द्र की मोदी सरकार के सहयोग से अडानी ने अपनी सम्पत्ति में भारी इजाफा किया है। इस समय उनकी सम्पत्ति 10.94 लाख करोड़ है जबकि 2014 में उनकी सम्पत्ति न्यूज क्लिक की रिपोर्ट के अनुसार महज 50.4 हजार करोड़ रूपये थी। उनकी सम्पत्ति अभी अम्बानी की सम्पत्ति से 3 लाख करोड़ रूपये अधिक है।

संसद में यह भी बताया गया कि पिछले पांच वित्तीय वर्षों में कर्जे के लगभग 10 लाख करोड़ रूपये कारपोरेट के माफ कर दिए गए।

उच्च मध्य वर्ग के एक छोटे से हिस्से की भी आमदनी बढ़ी है। 2021 वर्ष की तुलना में 2022 में मर्सडीज, बेंज जैसी कारों की खरीद में 64 प्रतिशत वृद्धि हुई है। यह भी स्वतः स्पष्ट है कि आर्थिक असमानता में भी बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है। 

प्रदेश में श्रमशक्ति के लिहाज से देखा जाए तो गरीब किसानों और निम्न मध्यम वर्ग के किसानों की संख्या सबसे बड़ी है। एक हेक्टेयर से कम छोटी जोतों की संख्या राजस्व परिषद् उत्तर प्रदेश से लिए आंकड़ों के अनुसार 1.91 करोड़ यानी 80 फीसदी है। एक से दो हेक्टेयर जोत के अंदर किसानों की संख्या 30 लाख यानी 12.6 फीसदी है। इन छोटी जोतों को सहकारी आधार पर यदि पुनर्गठित किया जाए तो फसलों की उपज में बढोत्तरी तो होगी ही साथ ही पूंजी निर्माण और प्रदेश के विकास में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है। सहकारिता को प्रोत्साहन देने की बात दूर रही पूरे कृषि विकास पर सरकार अपने 6.15 लाख करोड़ के बजट का 2.8 प्रतिशत यानी 16-17 हजार करोड़ रूपये ही खर्च करती है। जो किसान गन्ना, धान, गेहूं आदि बाजार के लिए पैदा कर पाते हैं उन्हें अपनी उपज को बेचने और भुगतान पाने में गंभीर किस्म के संकट का सामना करना पड़ता है। हजारों करोड़ रूपये गन्ना किसानों के मिल मालिकों के ऊपर बकाया रहता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए धारावाहिक बड़े किसान आंदोलन के बावजूद सरकार ने लागत पर डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देने से इंकार कर दिया है। यदि तीन-चार ग्रामसभाओं के क्लस्टर के आधार पर किसानों और व्यापारियों के सहयोग से नौकरशाही मुक्त मंडी समितियां बनती और समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद और भुगतान किया जाता तो किसानों की आर्थिक हालत में बड़ा बदलाव होता। कृषि आधारित उद्योग लगते तो खेती पर निर्भर अतिरिक्त श्रम से बचा जाता और बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिलता। इसी तरह डेयरी, मत्स्य और अन्य क्षेत्रों में सहकारी उत्पादन की प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है।

खेत मजदूरों, दलितों, आदिवासियों, अति पिछड़े वर्गों में जमीन की बड़ी भूख दिखती है और काम के अभाव में बड़े पैमाने पर इन वर्गों के लोगों का पलायन दूसरे प्रदेशों में होता है। उनकी श्रम शक्ति का उपयोग अपने प्रदेश के विकास में नहीं होता है।

वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों और वनाश्रितों को वन भूमि बहुत सीमित संख्या में दी गई है। गांव में हमारे सर्वे के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि दो जून भरपेट भोजन का भी संकट उनके ऊपर रहता है।

सोनभद्र जिले में यह भी देखा गया कि लड़कों के अलावा लड़कियां भी समूह बनाकर बंगलौर जैसे शहर में जाकर काम करती हैं। यदि उनको यहां उच्च शिक्षा व काम के अवसर मिलते तो उनका पलायन रूक जाता और उनकी श्रम शक्ति प्रदेश के विकास में लगती।

यह तथ्य नोट करने लायक है कि हमारे प्रदेश में बैंक क्रेडिट डिपोजिट अनुपात में बड़ा अंतर है। वर्ष 2020-21 में बैंकों में यहां के लोगों का जमा धन 1287176 करोड़ और दिया गया ऋण 525691 करोड़ रूपये है। प्रदेश से पूंजी का पलायन प्रति वर्ष महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में हो जाता है। बैंकों में लोगों की जमा की गई धनराशि से स्व रोजगार के लिए ऋण मिलता तो लोगों का प्रदेश से पलायन एक हद तक रूक जाता। प्रदेश में साढ़े तीन लाख आंगनबाड़ी व सहायिकाएं और दो लाख दस हजार आशाएं है। इन लोगों को बहुत कम पैसे में काम करना पड़ता है। यदि इन्हें न्यूनतम वेतनमान मिलता तो मंदी के संकट से निपटने में बड़ी मदद मिलती और देश निर्माण में महिलाओं की बड़ी भूमिका बनती।

खेत मजदूरों की संख्या प्रदेश में 97.50 लाख है और उनकी क्रय शक्ति नगण्य है। बगैर उनकी आमदनी को बढ़ाए हुए पूंजी संचय की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि ऊसर, परती, कृषि योग्य बेकार जमीनों का उनके बीच में वितरण किया जाए, उनके रहने के लिए आवासीय जमीन दी जाए तथा मनरेगा में 200 दिन के काम की गारंटी की जाए और जिन जिलों में मनरेगा की उपेक्षा हो वहां के जिला प्रशासन को जवाबदेह बनाया जाए।

ज्ञातव्य है कि मनरेगा में महज 34 दिन ही साल में एक मजदूर को औसतन काम मिल पाता है। गरीबों के शहरी रोजगार के लिए भी मनरेगा जैसी योजना बनाई जानी चाहिए।

उत्तर प्रदेश में कुटीर व छोटे उद्योग फैले पड़े हैं, उन्हें पुनर्जीवित और विकसित करने की जरूरत है। रोजगार, पूंजी विकास और सेवा क्षेत्र के विस्तार में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है।

आगरा में चमड़ा और हस्तशिल्प उद्योग, अमरोहा में वाद्य यंत्र व रेडिमेड कपड़े, अलीगढ़ में ताला, आजमगढ़ में मिट्टी के बर्तन, बरेली में जरी जरदोई व बांस की सामग्री, भदोही में कालीन, चित्रकूट में लकड़ी के खिलौने, एटा में घुघंरू, घंटी और ब्रास के उत्पाद, हरदोई में हैण्डलूम, झांसी में नर्म खिलौने, कन्नौज में इत्र, कानपुर देहात में एलमोनियम, कानपुर में चमड़ा, लखनऊ में चिकनकारी, मेरठ में खेल के सामान, मिर्जापुर में कालीन और ब्रास के बर्तन, मुरादाबाद में धातु शिल्प और ब्रास के बर्तन, वाराणसी में बनारसी सिल्क साड़ी, मऊ में पावरलूम वस्त्रों आदि का उत्पादन होता है। प्रदेश का कोई ऐसा जिला नहीं है जहां कुटीर उद्योग न हो।

राज्य की सकल घरेलू उत्पाद का 49 प्रतिशत सेवा क्षेत्र का है। खुदरा व्यापार के विस्तार से सेवा क्षेत्र मजबूत हुआ था लेकिन जीएसटी, कोविड और नोटबंदी की वजह से इसमें बड़ी गिरावट आयी है और आनलाइन कारोबार ने इनके सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में कृषि, कुटीर उद्योग और श्रम आधारित उद्योग के विकास के बिना सेवा क्षेत्र का भी विस्तार नहीं हो सकता। अच्छी तकनीकी, पूंजी केन्द्रित और कुशल श्रम आधारित उद्योग प्रदेश के बाहर हैं क्योंकि प्रदेश में उद्योग के फलने फूलने जैसा सामाजिक वातावरण भी नहीं है। फिर भी प्रदेश में सेवा क्षेत्र के दो तीन सेक्टर ऐसे हैं जिन पर सरकार ध्यान दे तो प्रदेश की अर्थव्यवस्था सुधर सकती है। मसलन प्रदेश का स्वास्थ्य क्षेत्र – कोविड महामारी ने यह साबित कर दिया कि सरकारी अस्पतालों की स्थिति बेहद खराब है और निजी अस्पताल भी बेहतर चिकित्सा सुविधा देने में अक्षम हैं। यदि प्रदेश में ऑक्सीजन सिलेंडर की उपलब्धता होती तो बहुत सारी जिंदगियों को बचाया जा सकता था। यानी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं और उसके लिए जरूरी उपकरण के लिए आवश्यक है कि सेवा क्षेत्र के साथ-साथ मैन्यूफैक्चरिंग पर सरकार पर्याप्त निवेश करे।

यही हाल शिक्षा का है प्राथमिक विद्यालयों के कमजोर होने से गांव-गांव तक अंग्रेजी के नर्सरी स्कूल खुल रहे हैं। उच्च शिक्षा क्षेत्र में भी प्राइवेट मैनेजमेंट स्कूल और कालेजों की भरमार है। लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में विकास नहीं हुआ। आईटीआई और पालिटेक्निक जैसे संस्थानों को मजबूत करना चाहिए।

आज्ञापालक नागरिक, विभाजित समाज और डण्डे का लोकतंत्र

प्रदेश में राजनीति और लोकतंत्र की संस्कृति को बदलना होगा। यहां भी मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन सूत्र एक चालक अनुवर्तिता यानी एक नेता के अधिनायकत्व में चलते हैं। इसकी जगह सामूहिकता की संगठन संस्कृति और राजनीति को विकसित करना होगा। 1990 के बाद की अर्थनीति ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया, नौकरशाही और ताकतवर हुई, लोकतांत्रिक अधिकारों का दायरा सिमटता चला गया। सार्वजनिक सम्पत्ति जैसे चीनी मिल व सीमेंट उद्योग आदि को भारी कमीशन लेकर औने पौने दाम पर निजी पूंजीपतियों को बेच दिया गया। क्रमशः लोकतांत्रिक अधिकारों का क्षरण होता चला गया। 2017 के बाद स्थिति और बदतर हुई है।

आज के दौर में सरकार की हर सम्भव कोशिश है कि नागरिकों को आज्ञापालक बनाया जाए, समाज में साम्प्रदायिक जहर घोला जाए और कानून के राज की जगह ‘ठोक दो’ की प्रशासनिक संस्कृति विकसित की जाए।

अमूमन राजनीतिक गतिविधियों को ठप कर दिया गया है। शांतिपूर्ण धरने, प्रदर्शन, यात्रा और सम्मेलन तक की गतिविधियों पर किसी न किसी बहाने प्रतिबंध लगा दिया जाता है। संविधान के मूल तत्व न्याय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए पहल लेना सरकार की नजर में असंवैधानिक हो गया है। साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे बड़ा शिकार लोकतंत्र ही हुआ है। लोग राजनीतिक, सामाजिक कर्म से विमुख हो जाएं इसके लिए कठोर कानून बना दिए गए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी सम्पत्ति क्षति वसूली अधिनियम 2020 है। यदि आप सरकार के आलोचक हों तो आपको किसी आंदोलन में शरीक न होते हुए भी आंदोलन खड़ा करने के षड़यंत्र के अभियुक्त के बतौर आईपीसी की धारा 120 बी के तहत गिरफ्तार कर महीनों जेल में रखा जा सकता है। शारीरिक प्रताड़ना और सार्वजनिक रूप से बदनाम करने के साथ ही आपकी सम्पत्ति को जब्त करने की कार्यवाही इस वसूली अधिनियम के तहत हो सकती है। स्वतंत्र भारत में आंदोलन के दमन का यह एक नया हथियार है। इस तरह के कानून से नागरिक आमतौर पर भयभीत है। जिसका प्रभाव उनकी राजनीतिक सामाजिक गतिविधियों पर पड़ रहा है। रासुका, गुण्डा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट जैसे काले कानूनों का भारी पैमाने पर दुरूपयोग हो रहा है। याद रहे नागरिकता आंदोलन के दौर में ऐसे नागरिकों को जिन्हें सरकार ने अभियुक्त घोषित कर दिया था, के फोटो सार्वजनिक स्थानों पर लगा दिए गए थे। जिसे उच्च न्यायालय ने भी अनुचित मानते हुए हटा देने का आदेश दिया था, लेकिन न्यायालय के आदेश के बावजूद योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उन्हें नहीं हटाया।

इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों के बारे में इस सरकार का क्या रूख है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करके और नागरिक अधिकारों की रक्षा करके ही प्रदेश में समावेशी विकास की गारंटी हो सकती है।

सामाजिक न्याय और पंचायती राज

सामाजिक न्याय के क्षेत्र में दो समुदाय आदिवासी और अति पिछड़ों का प्रतिनिधित्व अभी कम दिखता है। यदि कोल जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल कर लिया जाए तो आदिवासियों की आबादी प्रदेश में लगभग 25 लाख हो जायेगी। यह विडम्बना है कि साढ़े सात लाख की आबादी वाले आदिवासी कोल को अभी तक जनजाति की सूची में शामिल नहीं किया गया। जिसकी वजह से संसद में प्रदेश से किसी भी आदिवासी का प्रतिनिधित्व नहीं है। नगर पंचायतों में इन्हें महज एक सीट दी गई है वह भी इटावा जिले के बकेवर नगर पंचायत में जहां एक भी आदिवासी नहीं है। दूसरी बड़ी आबादी अति पिछड़ों की है उनका भी प्रतिनिधित्व आबादी के हिसाब से नौकरियों और पंचायतों में कम है। उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। पंचायतों में उनकी हिस्सेदारी की व्यवस्था बिहार माडल पर हो सकती है जिसमें अति पिछड़ों और महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व है। जातीय जनगणना प्रदेश सरकार को भी कराना चाहिए।

सत्ता का विकेन्द्रीकरण भी एक प्रमुख जनवादी मांग रही है। पंचायती राज व्यवस्था प्रदेश में जरूर कायम है लेकिन ये लोकतांत्रिक संस्थाएं नौकरशाही के भारी दबाव में हैं। जिला पंचायतों के अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुखों के चुनाव में भारी पैमाने पर खरीद फरोख्त होती है। यहां भी सीधे मतदान हो और लोग चुने जाएं। पंचायतों का जनतंत्रीकरण और चुने हुए प्रतिनिधियों की संस्थाओं का पूर्ण वित्तीय अधिकार सुनिश्चित करना होगा।

बड़ी संख्या में अदालतों में मुकदमें लम्बित हैं और बिना ट्रायल के ढेर सारे लोग जेलों में बंद हैं। त्वरित और सस्ते न्याय के लिए न्यायिक व्यवस्था पंचायतों तक विकसित करना होगा और यदि मुकदमों का निस्तारण निचले स्तर पर न्यायिक पंचायतों से हो जाए तो सबसे बेहतर होगा।

इस समय पूरे प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद 20.48 लाख करोड़ है। उत्तर प्रदेश सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार एक ट्रिलियन डालर यानी 80 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य लेकर काम कर रही है।

सरकार कहने को तो कुछ भी कह सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि जिस ग्लोबल निवेश का सपना प्रदेश सरकार दिखा रही है उसमें न कोई प्रदेश में बड़ा निवेश करने आ रहा है और न ही उसके बूते प्रदेश की अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है।

यह तथ्य नोट करने लायक है कि दुनिया में मंदी का दौर चल रहा है और हमारा प्रदेश भी उससे प्रभावित है। मंदी से निपटने के लिए जरूरी है कि लोगों की आमदनी बढ़े जिससे उनकी खरीदने की क्षमता बढ़े यानी लोगों की क्रयशक्ति और बाजार में मांग बढ़ाई जाए। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो कारपोरेट को मदद देने वाली सप्लाई साइड इकोनाॅमी यानी आपूर्ति आधारित अर्थव्यवस्था से सरकार पीछे हटे, आम लोगों को राहत देने वाली डिमांड साइड इकोनॉमी (demand side economy) यानी मांग बढ़ाने वाली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिले।

इसके लिए यह जरूरी है कि प्रदेश सरकार आर्थिक विकास की दिशा बदले। प्रदेश में रिक्त पड़े 6 लाख पदों को तत्काल भरा जाए और सरकार बेरोजगार लोगों के लिए नौकरी की गारंटी करे।  कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग को बढ़ावा दे, किसानों की फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी की जाए, सब्जी के रखरखाव के लिए स्टोरेज बनाया जाए, रोजगार पैदा किया जाए, व्यापारियों के जीएसटी में कमी लाई जाए, ई-कॉमर्स के बिजनेस का सही नियमन हो, डीजल-पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए, ठेका मजदूरों व मानदेय कर्मियों को वेतनमान दिया जाए, पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल की जाए और स्वास्थ्य, शिक्षा पर खर्च बढ़ाया जाए तो ठहरी हुई अर्थव्यवस्था में गति आ सकती है। साथ ही सामाजिक राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध न लगाया जाए, काले कानून उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी सम्पत्ति क्षति वसूली अधिनियम 2020 को रद्द किया जाए और आईपीसी की धारा 120 बी, रासुका, गैंगस्टर व गुण्ड़ा एक्ट का दुरूपयोग रोका जाए। सर्वोपरि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भाजपा साम्प्रदायिक आधार पर समाज का विभाजन बंद करें और सदियों से लोगों में बने मैत्री भाव को नष्ट न करें। तब बेहतर लोकतांत्रिक वातावरण में उत्तर प्रदेश भी अपने अंतर्निहित क्षमताओं को विकसित कर सकता है और हर क्षेत्र में देश में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

लेखक प्रसिद्ध विचारक हैं

मोदी जी से न अर्थव्यवस्था संभल रही, न महामारी और न देश संभल रहा | hastakshep | हस्तक्षेप |

Uttar Pradesh’s economy in deep trouble

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