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हिंदी पत्रकारिता दिवस : उत्तराखंड के जनांदलनों का प्रतिबिंब रहा है ‘नैनीताल समाचार’

उत्तराखंड नैनीताल समाचार | Uttarakhand Nainital Samaachaar

पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था ।

उसी ऐतिहासिक दिन की याद में और हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है।

उदन्त मार्तण्ड के बाद से सैंकड़ों हिंदी समाचार पत्र- पत्रिकाएं आयी, उनमें से कुछ अब भी हैं और कुछ भारतीय जनमानस के मन में अपनी अमिट छाप छोड़कर चली गयी। स्वतंत्रता पूर्व जहां समाचार पत्रों का मुख्य कार्य देश को आज़ादी दिलाने में सहयोग कराते हुए अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध देश को एकजुट करना था तो स्वतन्त्र बाद उनके कार्यों में सामाजिक कुरूतियों को दूर करना भी शामिल हो गया।

आज़ाद भारत के तंत्र में भी कई खामियां सामने आते रही और बहुत से हिंदी व अन्य भाषाओं के समाचार पत्र उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हुए जनता के साथ खड़े रहे।

एक आंदोलनकारी अख़बार का जन्म

नैनीताल के तीन युवाओं राजीव लोचन साह, हरीश पन्त और राकेश लाम्बा ने भी लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को ‘नैनीताल समाचार’ की शुरुआत करने के लिए चुना। यह एक पाक्षिक अखबार के रुप में शुरू हुआ जिसको अपनी शुरुआत से ही गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मार्गदर्शन मिला।

लेखकों, पत्रकारों की बात की जाए तो वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के साथ नवीन जोशी, गोविंद पन्त जैसे भविष्य के नामी पत्रकारों के साथ इस अखबार की शुरआत हुई।

उत्तराखंड की मुख्य समस्या प्रवास पर इस अख़बार के दूसरे अंक से ही ‘प्रवास की डायरी’ छपी जो अगले सात साल तक जारी रही और तीसरे अंक में तवाघाट दुर्घटना पर एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें पत्रकार के नाम की जगह लिखा तो विशेष प्रतिनिधि गया था पर वह ख़बर सुंदर लाल बहुगुणा ने लिखी थी।

मई 1982 में समाचार पत्र का कार्य पूरा समझकर इसके कर्ताधर्ताओं ने इसे बंद करने की ठानी और इसको लेकर अख़बार में एक छोटा सा सन्देश भी लिख दिया पर उसके बाद पत्रों से पाठकों के इसे बंद न करने की गुज़ारिश पर अख़बार चलता रहा।

वर्ष 1983 में ‘उत्तराखंड की बाढ़, भूस्खलन और तबाही’ शीर्षक से छपा आलेख उत्तराखंड के इतिहास में हुई प्राकृतिक आपदाओं को दिखाता है।

इतिहास पर नित्यानन्द मिश्रा की लिखी श्रृंखला पर तो ‘कुर्मांचल गौरव गाथा’ नाम से पुस्तक भी छप गई है।

जनांदोलनों का प्रतिबिंब

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है। प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया।

वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन को ख़बर को समाचार पत्र ने ‘नशा नही रोज़गार दो’ शीर्षक से छापा।

‘अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड’ को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है’।

वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी ‘मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ’।

नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा। अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर ‘बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते’ नाम से ख़बर छपी।

वर्ष 2020 में समाचार पत्र में प्रकाशित दो खबरों के शीर्षक थे ‘देश को सुलगा गया अमित शाह का नागरिकता कानून’ और ‘अफ़सोस कि सरकार भूमाफियाओं के साथ खड़ी है’।

अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा।

नैनीताल समाचार में विशेष

आज जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान है तब भी बहुत से क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेब पोर्टल्स वहां घटित कोई घटना पर किसी अन्य की ली तस्वीरों, वीडियो के माध्यम से अपनी ख़बर देते हैं पर जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान नही था तब वहां घटित किसी आपदा में नैनीताल समाचार के संवाददाता पहुंच जाते थे।

नैनीताल समाचार अपने पाठकों के साथ जुड़ने के लिए नए-नए प्रयोग करता रहा है।

1990 में चल रहे आरक्षण आंदोलन के दौरान दो पृष्ठ के परिशिष्ट छाप सड़कों पर बेचे गए थे।

वर्ष 1993 में राकेश लाम्बा द्वारा शुरू गई निबंध प्रतियोगिता का छात्रों को इंतज़ार रहता था।

साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का ‘सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन’ बेहद लोकप्रिय हुआ। 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया। जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया।

अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई।

समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं। ‘आशल कुशल’ उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है।

साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे। होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित हो उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं।

उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है।

डिजिटल, कोरोना काल में नैनीताल समाचार

मोबाइल इंटरनेट लोकप्रिय होने के बाद बहुत से समाचार पत्रों, टीवी चैनलों ने अपने संस्थान के वेब पोर्टल बनाए तो कुछ समाचार संस्थानों ने वेब पोर्टल पर ही जन्म लिया। समय की मांग को देखते हुए नैनीताल समाचार भी वेब पर उपलब्ध है।

कोरोना काल में लगभग सभी समाचार पत्र विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बुरी स्थिति से गुज़र रहे हैं, नैनीताल समाचार भी इससे अछूता नही रहा फिर भी अपने पाठकों के सहयोग से यह अब भी निरंतर प्रकाशित हो रहा है।

समाचार पत्र में सितंबर 2020 के अंक में प्रकाशित आलेख ‘खुद तलाशनी होगी राह रोज़गार की’ उत्तराखंड की जनता को कोरोना काल में स्वरोज़गार के कई उपायों से परिचित कराता है।

नैनीताल समाचार वेब में 17 सितंबर 2020 को प्रकाशित आलेख ‘ 18 सितंबर नैनीताल क्लीनअप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा’ पढ़ने के बाद नैनीताल में स्वच्छता अभियान से जुड़ी संस्था ‘ग्रीन आर्मी’ के जय जोशी कहते हैं कि यह आलेख पढ़ने के बाद उनमें कुछ करने का जोश भर गया।

वर्ष 2021 के अप्रैल अंक की ख़बर ‘ये आग तो बुझ जाएगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे’ के साथ उत्तराखंड की वनाग्नि पर सवाल उठाते नैनीताल समाचार भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अपना काम करते जा रहा है।

आजकल दो-तीन वर्ष चलने के बाद ही बंद होते समाचार पत्रों और समाचार वेब पॉर्टलों के लिए नैनीताल समाचार एक उदाहरण है कि कैसे जन की खबरों से वर्षों पत्रकारिता कर सकते हैं।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

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