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Rupesh Kumar Singh Dineshpur

कोरोना काल से- जमीन से कटा साहित्यकार घमंडी, झूठा, धूर्त और अवसरवादी होता है

“मुँह पर उंगली उठाकर कड़ी आलोचना करने से आज के स्वयंभू मूर्धन्य साहित्यकारों की गीली-पीली हो जाती है। आज के दौर में जो जितना बड़ा साहित्यकार, लेखक है, वो उतना ही जमीन से कटा हुआ, घमंडी, झूठा, धूर्त और अवसरवादी है। किताबों की सेटिंग से ऐय्याशी करने वाले लेखक यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई उनसे मुँह पर उंगली उठाकर सवाल दाग सके। मैंने बड़े-बड़े ढ़ोंगी तथाकथित राइटर्स देखें हैं, बहुत गुस्सा आता है उन्हें देखकर जो मक्कारी की खा-बजा रहे हैं।

बाबा नागार्जुन जैसा सहज, सरल और मनमोजी साहित्यकार ही अपने मुँह पर सवालों की उंगली बर्दाश्त कर सकता है और उसके बाद जवाब देते वक्त खिलखिला सकता है।”

वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास जी की जीवन साथी सविता जी ऐसे ही बिंदास होकर बाबा से बात करती थीं। किस्सों की बात बाद में। फोटो-1995 के आसपास कोलकाता में पलाश जी के घर का है, जहां महीनों बाबा नागार्जुन रहा करते थे।

लॉकडाउन में पैदल गाँव की रिपोर्टिंग और साहित्य का प्रचार-प्रसार

बरमूडा पहनकर मैं गर्मी में भी बाजार नहीं जाता। पिछली गर्मी का एक मात्र पैजामा गंदा हो गया था, भतीजे के पेशाब करने से। सो आज काली टी-शर्ट और बरमूडा पहनकर निकल लिया। टीका-टिप्पणी करने वाले कम नहीं होते हैं। अरे सर, आप और पैदल? मस्ती भरी बात कर लोगों से दूर से मिलने-जुलने और उनकी कुशलक्षेम पूछने में आनन्द आ रहा है।

नोटिस करने वाले यह न भूलें मेरे पास लाकडाउन में रिपोर्टिंग करने के लिए अपना और गाड़ी का पास है। लेकिन यह महत्वपूर्ण समय है। इतना खाली समय फिर कहाँ मिलेगा? सो मैं घर पर बैठकर एक किताब पर काम कर रहा हूँ। आस-पास के मित्र, संबंधी, जानने वाले बड़े परेशान हो रहे हैं घर में बैठे-बैठे। मैं उन्हें मिलकर किताबें दे रहा हूँ और पढ़ने की आदत डालने को बातचीत कर रहा हूँ।

मास्साब की किताब गाँव और किसान इन दिनों बहुत प्रासंगिक हो गयी है। गाँव और किसान राष्ट्रीय विमर्श का विषय कभी नहीं बने, लेकिन अब लोग गाँव को लौट रहे हैं, तो उम्मीद है हालात सामान्य होने पर गाँव और किसान पर चर्चा व्यापक होगी।

दुर्गापुर नं.2 पहुंचा पैदल-पैदल। विक्रम सिंह जी से बात हुई। उनकी गौशाला में मैंने हमेशा चार-छः जानवर देखे थे। लेकिन आज सिर्फ एक गाय जुगाली कर रही थी। मेरे सवाल पर बापू जी बोले,

“बेटा चारा कहाँ से लायें, दाना कहाँ से लायें, एक गाय पालने में एक साल का खर्च 35-40 हजार आता है। दूध चार माह भी चढ़कर नहीं मिलता। दूधिया 30 का भाव दे रहा है। गाय खाली हो तो और मुसीबत। पहले तो वो ले जाते थे जिनके नाम पर आज राजनीति हो रही है। कुल मिलाकर जानवर पालना टेड़ी खीर है।”

बापू जी के समय घर पर डेयरी होती थी। मतलब 15-20 जानवर। विक्रम भाई के समय में यह संख्या घटकर 5-7 हो गयी। अब उनका बेटा बालिग़ हो चला है, लेकिन गाय बची एक। तीन पीढ़ी का चक्र देखिए।

खैर, कॉफी पी व गाँव और किसान किताब देखकर मैं सतिन्दर सर के घर की ओर बढ़ लिया। फोन पर उन्होंने बताया कि वो सुभाष सर के ग्राउंड में हरी घास पर नंगे पैर टहल रहे हैं। मैं भी जा धमका। मेघना मैम ने दरवाजे पर स्वागत किया। वो फोन लेकर टहलने में बिजी हो गयीं और हम लोग देश-दुनिया की बातों में। बीमारी के राजनीतिकरण और समाज में छद्म प्रोपेगेन्डा पर विस्तार से बात हुई। जीवन कितना चुनौतीपूर्ण हो चला है आम जन मानस का और कैसे साम्प्रदायिक तनाव जहर बनकर लोगों की नशों में बहने को आतुर है, आदि-आदि बहुत मुद्दों पर बात हुई।

सतिन्दर सर अपनी आलीशान कोठी पर ले गये। भाभी जी ने कोल्ड कॉफी, काजू और इमरती बिस्कुट पेश किए। चलने के बाद कुछ भूख तो जोर मार रही थी, इसलिए काफी के साथ आधा मुट्ठी बादाम तो निगल ही लिये होंगे मैंने। वैसे इस महंगाई में बादाम मिल कहाँ रहे हैं?

शुक्रिया इस बात का, सतिन्दर सर ने पत्रिका के लिए कुछ आर्थिक सहयोग भी दिया। इस लॉकडाउन में यह बड़ी मेहरबानी है। कोठी में सब कुछ शानदार है, बस एक छोटी सी बुक कॉर्नर की कमी लगी। जल्द ही सतिन्दर सर इसे पूरा करेंगे। वास्तव में हर घर में एक मिनी लाइब्रेरी होनी चाहिए।

गार्गी प्रकाशन की मेरी दोस्त रेनू को मैंने कुछ किताबें सेलेक्ट करने को कह दिया है। घर आने पर दस बजे दो रोटी लौकी की सब्जी से खाकर सोने जा रहा हूँ। आसपास के जिन साथियों को गाँव और किसान किताब चाहिए, मुझे फोन करें उनके घर पर मैं किताब, प्रेरणा-अंशु और अन्य बुक भी उपलब्ध करा दूँगा। आप घर पर रहे और स्वस्थ रहें, पढ़ने की आदत डालें। किसी जरूरतमंद को राशन आदि की आवश्यकता हो तो भी बताना।

पिछले चार दिन से मैं शाम को दिनेशपुर पैदल ही नाप रहा हूँ, यह सुखद है मेरे बढ़े पेट की लिए भी और क्षेत्र के प्रति अपनी समझदारी बढ़ाने के लिए भी।

गाँव-गाँव में मिनी लाइब्रेरी की है जरूरत, पैदल रिपोर्टिंग

शाम के सवा पाँच बजे हैं। धूप में धीरे-धीरे ठंडक पसर रही है। सूरज पश्चिम की ओर अपनी गति से बढ़ रहा है। लाल टी-शर्ट, हल्का खाकी कलर का पैजामा और कांटे वाली हवाई चप्पल पहनकर मैं घर से निकल चुका हूँ। हाथ में गाँव और किसान की तीन प्रतियां हैं। मछली बाजार के बगलके बड़े नाले के दोनों ओर बच्चे खेल रहे हैं। जानने वाले छोटे बच्चों ने शाम होने के बावजूद गुडमार्निंग की। गुडमार्निंग नहीं बेटा, यह समय गुडईवनिंग का है। बच्चे झेंप गये। कुछ बड़े लोग चिलम सुलगाकर ताश खेल रहे हैं। अजीम प्रेमजी संस्थान के पीछे छोटी गली में महिलाओं का एक झुंड बीड़ी बांध रहा है।

कुछ बच्चियां नाले की पुलिया पर हैडफोन कान में लगाये मोबाइल की स्क्रीन पर आँखें गड़ाये बैठीं हैं। ज्यादातर मुझे पहचानती हैं। नमस्ते के बाद सीधा सवाल था, ‘‘सर जी आप यहाँ?’’

मैंने उनके सवाल को इग्नार किया और अपना प्रश्न दाग दिया, ‘‘सोशल डिस्टैंस कहाँ है? यह गलत बात है। आप लोग सरकार के नियम का पालन नहीं कर रहे हैं।’’

बच्चियां हँस पड़ी बोलीं,

‘‘सर जी कब तक घर में कैद रहें ? हम सब आसपास रहने वालीं हैं, इसलिए शाम को एक-दो घंटा एक साथ बैठ गप्पे मार लेते हैं।’’

ठीक है, लेकिन सावधानी बरतो, यह नपा-तुला जुमला कहकर मैं नाले के रास्ते पर चल दिया।

दोनों ओर बेमौसमी धान लगा है। हालांकि, इस धान की पैदावार करना मना है, लेकिन किसान छोटे फायदे के लिए सरकारी फरमान नहीं मानते हैं और विभाग भी किसान को जागरूक नहीं कर पाया है कि हमें चाइना धान नहीं लगाना चाहिए। खेत में पानी है। धान की पौध हवा में लहलहा रही है। मन प्रफुल्लित है। नाले में जगह-जगह कूड़ा जमा है। कहीं-कहीं तो भयंकर बास आ रही है।

दरअसल यह नाला आधे दिनेशपुर की लाइफ लाइन है। 15 साल पहले तकरीबन 30 लाख की लागत से यह नाला बनाया गया था। नगर का गंदा पानी निकासी का बड़ा स्रोत था। लेकिन बेतरतीब नियम और भविष्य को ध्यान में रखकर कोई प्लानिंग न करने से यह नाला महामारी का खतरा बन गया है। नगर पंचायत की हीलाहवाली के चलते दोनों ओर पक्के मकान बन चुके हैं। जेसीबी आ नहीं सकती और सफाई कर्मी हाथ से सफाई कर नहीं सकते, ऐसे में यह नाला नगर के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

खैर, मैं वार्ड न. तीन होते हुए कालीनगर रोड़ पर पहुँचा। वहाँ से वार्ड न. दो के लिए निकल लिया। आरसीसी रोड़ बीच-बीच में टूट चुकी है। सड़क पर कुर्सी डाल कर बैठी महिलाओं ने बताया कि पिछले साल ही सड़क बनी थी, लेकिन सड़क एक बरसात भी नहीं झेल सकी। अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस किस्म का काम किया गया है। कमीशनखोरी नगर पंचायत में भी खूब फलफूल रही है। महिलाएं दिहाड़ी-मजूदरी करने वाली हैं।

उन्होंने बताया कि अब तक सभासद और चेयरमैन के जरिए दो बार राशन मिल चुका है, लेकिन उनके पास कैश नहीं है, जिससे कई परेशानी आ रही हैं। यह सब जल्द लाकडाउन खुलने की प्रार्थना कर रहे हैं। मैं चलते-चलते राधाकान्तपुर तक पहुँच गया। रास्ते में कई पुराने छात्र मिले। उन्होंने बताया कि वैसे तो मस्ती आ रही है, लेकिन मोमो-चाऊमीन खाने को नहीं मिल रही है।

बेमौसमी बरसात से ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ, लेकिन जिन खेतों में गेहूँ खड़ा है और जिस को भूसे के लिए हाथ से काटा गया है, वो फसल नष्ट हो गयी है। ऐसा 15-20 फीसदी ही हुआ होगा। राधाकान्तपुर स्कूल के ग्राउंड में नौजवान फुटबाल खेल रहे हैं। कुछ स्कूल की बाउंडरी पर बैठकर खेल का आनन्द ले रहे हैं। लड़कियां सड़क पर टहल रही हैं। मैं यह नजारा देखते हुए निरंजन कविराज के घर लक्खीपुर पहुँचा। निरंजन जी पिछले 20 साल से हमारे घर में दूध दे रहे हैं। पिछले सप्ताह ब्रेनहेमरेज से उनका निधन हो गया था। मैं सांत्वना देने पहुँचा। उनके बेटे प्रकाश और प्रशान्त के अलावा पत्नी और बहू से बातचीत हुई। निरंजन जी 1998 में मास्साब के संगठन से जुड़े थे। अपनी जमीन के मसले को लेकर वे मास्साब के पास आये थे। उस समय गाँव के दबंग पटवारी से साँठगाँठ करके गरीब, अनपढ़, मेहनतकश लोगों की जमीन के कागज में हेराफेरी करके हथिया लेते थे। निरंजन जी की जमीन भी आन्दोलन और कानूनी लड़ाई के बाद वापस मिली थी। तभी से इस परिवार से संबंध है। यह सब कुछ याद करते और बच्चों को बताते हुए मैं कुछ परेशान होकर वहाँ से विदा हुआ।

मास्साब के परम सहयोगी और हमारे मामू पियूष कान्त विश्वास के घर पहुँचा। वहाँ पर मुकेश राणा भी बैठे थे। मुकेश मेरे छात्र रहे हैं। अब गाँव के प्रधान हैं। गाँव और किसान किताब दी और उस पर चर्चा हुई। गाँव में एक मिनी लाइब्रेरी खोलने पर भी बात हुई। जल्द अस्तित्व में आएगी, ऐसा भरोसा मुकेश ने जताया है।

मेरी भांजी अनीता 26 साल की है और एचडीएफसी बैंक में नौकरी करती है। वो बोली, ‘‘मैं शादी नहीं करूँगी। आपकी तरह रहूँगी।’’

मैं मुस्करा दिया। अभी उसके पास काफी समय है। वो अपना फैसला खुद करे, तो बेहतर।

रात चढ़ने लगी है। मैंने तेजी से रास्ता नापना शुरू किया। गाँव में फिलहाल लाइट नहीं है, इसलिए नौजवान और बच्चे सड़क पर हैं। गाँव के लोग कोरोना के खौफ से आजाद हैं। लेकिन गाँव में बाहर से आने-जाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रख रहे हैं। सावधानी जरूरी भी है। वास्तव में गाँव और किसान बचेंगे तभी हमारा देश सही दिशा में प्रगति करेगा।

नौ बजे घर पहुँचा। आज लगभग आठ किमी पैदल चल लिया हूँ।

-रूपेश कुमार सिंह

(रूपेश कुमार सिंह  की कोराना डायरी के अंश)

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