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Trump's last bet and lesson for us. ट्रम्प का आखिरी दांव और हमारे लिए सबक : सिर्फ अमरीका तक ही सीमित नहीं ट्रम्पवाद की राजनीति

अगर भारत का कोई ट्रम्प, जबर्दस्ती जीत का सेहरा अपने सिर बांधने पर तुल जाए, तो उसे कौन और कैसे रोकेगा?

ट्रम्प का आखिरी दांव और हमारे लिए सबक : सिर्फ अमरीका तक ही सीमित नहीं ट्रम्पवाद की राजनीति

Washington dc to India: Trump’s last bet and lesson for us

ट्रम्प समर्थकों का संसद भवन में उपद्रव

अमरीकी सत्ता के प्रमुख केंद्र, वाशिंगटन के कैपिटल में संसद भवन में ट्रम्प समर्थकों ने जैसा उपद्रव (Trump supporters fuss in Parliament House) किया है, वह बेशक ट्रम्प के लिए उल्टा पड़ा है। ट्रम्प ने अपनी रैली से एक तरह से प्रत्यक्ष रूप से अपने समर्थकों को बल्कि भक्तों को कहना ही ज्यादा सही होगा, संसद को अपनी ताकत दिखाने के लिए उकसाया था। इस रोज संसद में राष्ट्रपति के चुनाव के नतीजों पर अंतिम रूप से औपचारिक मोहर लगाए जाने की प्रक्रिया चल रही थी। यह एक तरह से राष्ट्रपति के  पद से चिपके रहने के लिए ट्रम्प का आखिरी दांव था। कुछ खबरों के अनुसार, ट्रम्प ने उपराष्ट्रपति पेंस पर भी इस आखिरी वक्त पर ही सही, राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे अपने पक्ष में पलटने के लिए दबाव डाला था।

यह खबर अगर सच हो तो इस दबाव के बाहरी पूरक के रूप में, अन्यथा बाहरी दबाव के ही औजार के रूप में, ट्रम्प ने अपने समर्थकों की हिंसक भीड़ को संसद पर धावा बोलने के लिए लहकाया था।

         इसलिए, अचरज की बात नहीं है कि अमरीका के आधुनिक इतिहास की इस अभूतपूर्व तथा अकल्पनीय घटना के बाद, वाशिंगटन में पंद्रह दिन के लिए बहुत कड़ी पाबंदियां ही नहीं लगा दी गयी हैं, जो हुआ है उसके लिए ‘तख्तापलट’ की कोशिश की संज्ञा का इस्तेमाल भी किया जा रहा है और ऐसी कोशिश के लिए ट्रम्प के व्हाइट हाउस में बचे करीब दो हफ्ते भी पूरे होने का और इंतजार न कर के, उन्हें फौरन पद से हटाए जाने की पुकारें भी उठ रही हैं। इस बीच सीनेट में डैमोक्रेटों का बहुमत हो जाने और इस तरह, निर्वाचित राष्ट्रपति के अलावा संसद के दोनों सदनों में डैमोक्रेट बहुमत के बावजूद, वास्तव में ऐसा कोई कदम उठाए जाने के आसार भले ही ज्यादा नहीं हैं। इसके बजाए नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन के, ट्रम्प से तथा वास्तव में उसके समर्थकों से ऐसे किसी टकराव से शुरूआत करने की जगह, सुलह-समझौते की अपनी अपील पर ही जोर देने की ही ज्यादा उम्मीद की जाती है।

         बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने ट्रम्प की राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को पलटने की कोशिशों को जरूर अंतिम रूप से दफ्न कर दिया है।

ट्रम्प समर्थकों के संसद भवन पर धावे के बाद, पूरे अमरीका से ही नहीं, दुनिया भर से आयी तीखी प्रतिक्रिया ने, अपनी प्रकृति के प्रतिकूल ट्रम्प को शायद पहली बार सार्वजनिक रूप से बचाव पर जाने पर मजबूर कर दिया। उसने एक वीडियो संदेश जारी कर न सिर्फ अपने समर्थकों से शांति कायम करने की खातिर अपने घर जाने के लिए कहा, बल्कि चुनाव के नतीजों पर अपनी आपत्ति दोहराते हुए भी, शायद पहली ही बार सार्वजनिक रूप से यह भी कबूल किया कि निर्धारित तिथि पर, 20 जनवरी को घोषित परिणाम के हिसाब से नये राष्ट्रपति का सत्ता संभालेंगे।

उपराष्ट्रपति पेंस पहले ही चुनाव नतीजों को पलटने की किसी भी कोशिश से खुद को अलग कर चुके थे, जिसके लिए संसद पर धावा बोलने वाले उन्हें ‘गद्दार’ का खिताब भी दे चुके थे।

बहरहाल, संसद पर ट्रम्प समर्थकों के धावे के बाद तो, ट्रम्प के पक्के समर्थक माने जाने वाले अनेक सीनेटर भी उखड़ गए और संसद ने न सिर्फ बाइडेन के चुनाव पर जोरदार तरीके से मोहर लगायी बल्कि दोनों सदनों ने लगभग एक राय से संसद पर हमले की तीखे शब्दों में भर्त्सना भी की।

The whole incident exposed the weak bottom of the American democracy

         बेशक, इस पूरे घटनाक्रम ने अमरीकी जनतंत्र की कमजोर तली को सबके सामने कर दिया है। बाकी दुनिया में और खासतौर पर तीसरी दुनिया के देशों में, ‘दुनिया के सबसे पुराने जनतंत्र’ की पोल खुलने पर, दबे-छुपे तौर पर एक तरह का परपीड़ा-आनंद लिए जाने में भी किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

आखिरकार, न सिर्फ इन देशों के कान ‘डैमोक्रेसी’ के अमरीका के उपदेश सुन-सुनकर पक चुके हैं बल्कि वे जिस तरह से अमरीका के साम्राज्यवादी लक्ष्यों के लिए, डैमोक्रेसी को हथियार बनाने के अमरीकी खेल का बराबर निशाना बने रहे हैं, इस डैमोक्रेसी के पीछे से झांकते साम्राज्यवाद को वे बखूबी पहचानते हैं।

बहरहाल, दूसरे देशों के लोगों के लिए खुद अमरीका में जनतंत्र की इस दुर्गति पर विकृत-आनंद लेने से ज्यादा जरूरी है, इस पूरे घटनाविकास के अर्थ को समझना, ताकि वे खुद अपने देशों में सब को दोहराने से बच सकें।

         यह इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अमेरिका में ट्रंप की राजनीति (Trump’s politics in America) या ट्रम्पवाद की राजनीति (Politics of trumpism) न तो एकाएक सत्ता में पहुंच गयी थी और न यह बीमारी सिर्फ अमरीका तक ही सीमित है।

ट्रम्पवाद की राजनीति, जो बुनियादी तौर पर जनता के विभिन्न हिस्सों को, उनके वास्तविक हितों के आधार पर नहीं बल्कि संकीर्ण भावनात्मक आग्रहों के आधार पर, जनता के ही कुछ अन्य तबकों के खिलाफ गोलबंद करने की विभाजनकारी राजनीति है, उस नवउदारवादी व्यवस्था के लिए ज्यादा से ज्यादा जरूरी होती गयी है, जो जनता के बहुमत और खासतौर पर मेहनतकश जनता के बहुमत की आकांक्षाएं तो दूर, न्यूनतम जरूरतें तक पूरी करने में ज्यादा से ज्यादा विफल होती गयी है। इसलिए, अचरज की बात नहीं है कि पिछले कई वर्षों से दुनिया के बड़े हिस्से में इस तरह की विभाजनकारी राजनीति  के उभार की लहर सी चल रही है, जो धर्म, नस्ल, इथनिसिटी, क्षेत्रीयता के विभाजनों को हथियार बनाकर, जनता को बांटती है और उसके अपने वास्तविक हितों के लिए एकजुट होकर हालात का बदलने की संभावनाओं के दरवाजे बंद करती है।

ट्रम्पवाद, इस विभाजनकारी राजनीति के जैसे हमले का और नवजागरण के स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे के मूल्यों पर उसके जैसे उग्र हमले का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी अभिव्यक्तियां विकसित से लेकर, अर्द्ध-विकसित तथा अविकसित तक, अधिकांश देशों में देखने को मिल जाएंगी। ब्राजील के बोल्सेनेरो, हाल ही में हटे जापान के शिंजे आबे, इस्राइल के नेतन्याहू तथा भारत के नरेंद्र मोदी जैसे ट्रम्प के पक्के दोस्त ही नहीं, अन्य अनेक देशों के भी नेता, अपने-अपने तरीके से इसी खेल में शामिल हैं।

         वास्तव में अमरीका का ताजातरीन घटनाक्रम इसी की गवाही देता है कि अमरीकी शायद इस मामले में दूसरे अनेक देशों से ज्यादा खुशकिस्मत निकलेंगे। अगर चुनाव के नतीजों को पलटने की ट्रम्प की जिद के पीछे काम कर रही बीमारी को पहचानना जरूरी है, तो इसे भी समझना जरूरी है कि सारी कोशिशों के बावजूद, ट्रम्प को इसमें कामयाबी क्यों नहीं मिली?

याद रहे कि ट्रम्प ने सबसे पहले चुनाव अपने हाथ से निकलता देखकर, चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्यों में रिपब्लिकन पार्टी की प्रांतीय सरकारों से चुनाव नतीजे अपने पक्ष में मोड़ने की उम्मीद की थी। लेकिन, कोई फायदा नहीं हुआ। उसने प्रांतीय उच्चतर न्यायालयों की मदद से अपने खिलाफ जा रहे राज्यों में चुनावों को विवादित बनाने की कोशिश की थी, कोई फायदा नहीं हुआ। उसने खासतौर पर अपने नियुक्त किए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से मदद की उम्मीद की थी, कोई फायदा नहीं हुआ। संसद ने और अंतत: उपराष्ट्रपति तक ने चुनाव नतीजों को पलटने में ट्रम्प की कोई मदद नहीं की। और मुख्यधारा के मीडिया के बड़े हिस्से ने तो खैर, ट्रम्प की जरा सी भी मदद नहीं ही की। पश्चिमी योरप के अपवाद को छोड़ दें तो, शेष दुनिया में ऐसी मजबूत संस्थाएं मुश्किल से ही मिलेंगी, जिन पर कार्यपालिका प्रमुख की मनमानी के रास्ते में बाधा बनकर खड़ी होने का भरोसा किया जा सकता हो।

इस नुक्ते को मोदी के न्यू इंडिया के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।

जम्मू-कश्मीर को संविधान की धारा-370 के अंतर्गत हासिल विशेषाधिकारों से ही नहीं, राज्य के दर्जे से भी मोदी सरकार द्वारा महरूम कर दिया गया तथा बांट भी दिया गया, पर न संसद ने कोई बाधा डाली, न राष्ट्रपति ने और सुप्रीम कोर्ट को तो अब तक इस सिलसिले में दर्ज हुई ढेरों याचिकाओं की सुनवाई करने का वक्त ही नहीं मिला है। ऐसा ही संविधान विरोधी, नागरिकता संशोधन कानून के मामले में हुआ। और अब इससे शह पाकर, न सिर्फ कार्यपालिका अपने विरोध की सभी आवाजों को कुचलने के लिए मनमानी कार्रवाइयां कर रही है, वह बड़े धड़ल्ले से कथित ‘लव जिहाद’ कानून जैसे सरासर संविधानविरोधी कानून भी बनाने में लगी हुई है। कानूनों की ये लहर, पहले के गोहत्या कानून तथा धर्मांतरणविरोधी कानून आदि के ऊपर से है।

इसी गैर-कानूनी कानून के राज का विस्तार करते हुए अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा अन्य भाजपा-शासित राज्यों में सरकार का विरोध करने से लेकर, सत्ताधारी संघ-परिवार के हमलों तक का विरोध करने वालों तक की संपत्तियां जब्त करने से लेकर घर गिराने तक  की कार्रवाइयां की जा रही हैं, जो कम से कम ब्रिटिश राज के जाने के बाद से भारत में पहली बार ही हो रहा है। जैसाकि हमने पहले ही कहा, यह कोई अलग-थलग कार्रवाई का मामला नहीं है बल्कि एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति का मामला है।

         इसलिए, जब प्रधानमंत्री मोदी संदेश देकर अमरीकी जनतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंता जताते हैं, तो बरबस यह पूछने का मन करता है कि हुजूर, खुद आप के राज में भारत के जनतंत्र की जो दुर्गति हो रही है, क्या कभी उसकी भी खबर लेंगे? न्यायपालिका समेत सभी संस्थाएं ध्वस्त की जा चुकी हैं, जो जाहिर है कि ट्रम्प के चार साल अमरीका में नहीं कर पाए थे? अगर भारत का कोई ट्रम्प, जबर्दस्ती जीत का सेहरा अपने सिर बांधने पर तुल जाए, तो उसे कौन और कैसे रोकेगा?   

                                                                                                  0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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