हम भुतहा, खौफनाक और विवेकहीन समय में जी रहे हैं — रविभूषण

We are living in terrible, creepy and unscrupulous times – Ravibhushan

राँची से विशद कुमार,

पीयूसीएल (PUCL) द्वारा मानवाधिकार दिवस (Human Rights Day) पर आयोजित ‘मानवाधिकार के लिए उठ खड़े हों’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में बोलते हुए रांची विश्वविद्यालय हिन्दी के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जसम के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डा. रविभूषण ने कहा कि धरती पर और जल में रहने वाले जीव-जंतुओं ने अपनी प्रकृति नहीं छोड़ी, लेकिन मनुष्य अपनी पहचान मनुष्यता का ही त्याग कर दिया। राज्य अपनी भूमिका से पीछे हट कर उत्पीड़क की भूमिका में है। संविधान, कानून व संवैधानिक प्रावधान निष्प्रभावी हो रहे हैं। प्रतिरोध, विरोध व असहमति की गुंजाइश समाप्त हो रही है। हम भुतहा, खौफनाक और विवेकहीन समय में जी रहे हैं। पढ़ने, पढ़ाने और सत्ता वाले विवेकहीन होते जा रहे हैं। डिग्री धारकों को अब शिक्षित होना भूल होगी।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे समय में मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने का आह्वान करना सराहनीय काम है। सचमुच मौजूदा खौफनाक समय को जनता के सहयोग से ही बदला जा सकता है। पीयूसीएल को अपना जागरूकता अभियान जारी रखना चाहिए और इसे आगे बढ़ाने में हर न्यायप्रिय व्यक्ति को गंभीरता से साथ खड़ा होना चाहिए।

‘मानवाधिकार के लिए उठ खड़े हों’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में बोलते हुए रविभूषण ने मौजूदा समय के निर्माण में सभी राजनीतिक दलों की भूमिका को भी जिम्मेवार बताया।

End of rule of law is murder of democracy

वरिष्ठ पत्रकार श्री निवास ने CAB और NRC पर समाज की चुप्पी को खतरनाक बताया। ऐसे प्रावधान हमारे ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ वाली संस्कृति पर प्रहार है। कानून के शासन का समाप्त होना जनतंत्र की हत्या है। मौजूदा संकट से निपटने का सामूहिक प्रयास ही एक उपाय है।

Disagreement is the primary condition of democracy

अवसर पर विषय प्रवेश कराते हुए भारत भूषण चौधरी ने दुनिया के अधिकांश देशों की शासन व्यवस्था को जनतंत्र से जोड़ा। भारत के विश्व में सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि असहमति जनतंत्र की प्राथमिक शर्त है, जिसकी गुंजाइश नहीं बची है। सवाल खड़े करने वाले, असहमति जताने वाले, सरकारी कदमों की आलोचना करने वाले जेल में डालें जा रहे हैं, तब आवाज उठाना ही उपाय है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित चार्टर व भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना ही गोष्ठी का उद्देश्य है।

बदलती परिस्थितियों में पीयूसीएल ‌की भूमिका पर झारखंड के महासचिव अरविन्द अविनाश ने कहा कि विविधता को बरकरार रखते हुए समाज को साथ लेकर पीयूसीएल चुनौतियों का सामना करेगा।

उन्होंने बताया कि इस संगठन का गठन आपातकाल के दौरान 1976 में जनतांत्रिक अधिकारों की बहाली, विस्तार व संरक्षण के लिए हुआ था। जयप्रकाश नारायण के पहल से अस्तित्व में आया यह संगठन तब से मानवाधिकार के लिए प्रतिबद्ध लोगों के सहयोग से सक्रिय है। विभिन्न राजनीतिक व्यवस्था आर्थिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले लोगों की सहमति व प्रयास से मानवाधिकार के संरक्षण में हम कामयाब हुए हैं। लेकिन आपातकाल से भी कठिन समय में हम रहते हुए हिम्मत नहीं खोते हैं। डा. विधायक सेन, सीमा आजाद जैसे सदस्यों ने इसकी कीमत चुकाई है। आज तो मानवाधिकार के लिए आवाज़ उठाने वाले ही निशाने पर हैं।

उन्होंने आगे कहा कि हमारी राष्ट्रीय सचिव सुधा भारद्वाज समेत भीमा कोरेगांव मुकदमे में कई मानवाधिकार कार्यकर्ता बंद हैं। सबसे दुःखद बात है कि मानवाधिकार वाले संविधान का संरक्षक न्यायलय की भूमिका भी बदली-बदली दिखती है। बावजूद हमें विश्वास है कि जनता के सहयोग से हम कोहरे से बाहर निकलने में कामयाब होंगे। पीयूसीएल मानवाधिकार हनन पर सवाल उठाते रहेगा। हालांकि हमारे साधन और सामर्थ्य दोनों जरूरत से कम हैं, लेकिन इसे जनता से पूरा करेंगे। सबसे सहयोग की अपेक्षा है।

गोष्ठी का संचालन डॉ. अनिल अरूण ने किया। उन्होंने समाज की बदलती मानसिकता पर गहरी चिंता व्यक्त की। मीडिया, सरकार व सिविल सोसायटी की बदलती भूमिका पर भी सवाल उठाया। धन्यवाद ज्ञापन रांची इकाई के सचिव डेविड सोलोमन ने किया।

गोष्ठी में पीयूसीएल के सदस्यों के साथ ही शहर के विभिन्न संगठनों के लोगों की भागीदारी रही।

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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