आत्महत्या क्या है ? – एमिल दुर्खीम

Things you should know

Suicide is not a specific form of insanity

आत्महत्या क्या है ? – एमिल दुर्खीम | इमाईल दुर्खीम का सिद्धांत

What is suicide – Émile Durkheim (इमाईल दुर्खीम)

‘आत्महत्या’ शब्द के बारे में वार्तालाप में निरंतर चर्चा होती रहती है। अत: ऐसा सोचा जा सकता है कि इसके बारे में सब जानते हैं और इसकी परिभाषा देना फुजूल है। वास्तव में रोजमर्रा की भाषा के शब्द और उनसे जो अवधारणाएं व्यक्त की जाती हैं उनके हमेशा एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। जो विद्वान उनका प्रयोग उनके स्वीकृत अर्थ में करते हैं और कोई परिभाषा नहीं देते वे गंभीर गलतफहमी का शिकार हो सकते हैं। उनका अर्थ इतना अनिश्चित होता है कि हर मामले में तर्क तकाजे के अनुरूप बदलता रहता है। जिस वर्ग से उन्हें लिया जाता उसे किसी विश्लेषण द्वारा तैयार नहीं किया जाता। उन्हें भीड़ की भ्रमित धारणाओं के आधार पर तैयार कर लिया जाता है। तथ्य के बहुत भिन्न रूपों को बगैर सोचे-समझे एक श्रेणी में डाल दिया जाता है या एक जैसी वास्तविकताओं को अलग-अलग नाम दे दिए जाते हैं। इस प्रकार यदि हम आम प्रयोग का अनुसरण करेंगे तो हम जिसे जोड़ा जाना चाहिए उसे अलग-अलग कर देंगे और जिसे अलग-अलग किया जाना चाहिए उसे इकट्ठा कर देंगे। हम वस्तुओं की सादृश्यता को लेकर गलती कर बैठेंगे और उनके स्वरूप को नहीं पकड़ पाएंगे। केवल तुलनीय तथ्यों पर विचार करके ही वैज्ञानिक अनुसंधान किया जा सकता है और इसमें अधिक निश्चित सफलता तभी मिल सकती है जब सभी तुलनीय तथ्यों को इकट्ठा कर दिया जाए। लेकिन सत्ताओं की स्वाभाविक सादृश्यताओं को सतही जांच द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता, जैसा कि आम शब्दावली में किया जाता है।

इस प्रकार विद्वान आम प्रयोगों के शब्दों के अनुरूप इकट्ठे किए गए तथ्य समूहों को अपने अनुसंधान का विषय नहीं बना सकता। उसे अपने अध्ययन के लिए खुद समूह बनाने चाहिए ताकि उन्हें सदृश्यता और विशेष अर्थ दिया जा सके। तभी वे वैज्ञानिक विचार के काबिल बन सकेंगे। फूलों या फलों की बात करने वाला वनस्पतिज्ञ और मछलियों या कीड़ों की बात करने वाला प्राणिविज्ञानी पूर्व निर्धारित अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग करता है।

हमारा पहला काम आत्महत्या शीर्षक के अंतर्गत अध्ययन के लिए तथ्यों का क्रम निर्धारण होना चाहिए। हमें यह जांच करनी चाहिए कि क्या मृत्यु के विभिन्न रूपों में से कुछ में ऐसी वस्तुपरक सामान्य विशेषताएं हैं जो सभी ईमानदार प्रेक्षकों को नजर आती हैं और इतनी विनिर्दिष्ट हैं कि अन्यत्र नहीं पाई जातीं और सामान्य तौर पर आत्महंतक कहे जाने वाले व्यक्तियों से संबद्ध हैं। तभी हम इस शब्द को उसके सामान्यत: प्रयुक्त अर्थ में रख सकते हैं। यदि ऐसे रूप मिलते हैं तो हम इस शीर्षक के अंतर्गत उन सभी तथ्यों को रखेंगे जिनमें ये पृथक विशेषताएं हैं भले ही इस कवायद से इस वर्ग में वे सभी मामले शामिल न हो पाएं जिन्हें सामान्यत: इसमें शामिल किया जाता है या अन्यथा दूसरे वर्ग में रखे जाने वाले मामले इसमें शामिल हो जाएं। महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि औसत बुद्धि किसे आत्महत्या मानती है बल्कि इस तरह के वर्गीकरण को संभव बनाने वाली वस्तुओं की श्रेणी को निर्धारित करना है। यह निर्धारण वस्तुपरक होना चाहिए और वस्तुओं के निश्चित पक्ष के अनुरूप होना चाहिए।

मृत्यु के विभिन्न प्रकारों में कुछ में यह खास विशेषता होती है कि वह खुद शिकार व्यक्ति का ही कृत्य होती है, ऐसे कृत्य का परिणाम जिसका कर्ता पीड़ित व्यक्ति ही होता है। आत्महत्या संबंधी सामान्य विचार में यही विशेषता निश्चित रूप में बुनियादी तत्व है। इस तरह से होने वाले कृत्यों के आंतरिक स्वरूप का कोई महत्व नहीं है।

आत्महत्या की परिभाषा | Definition of suicide

सामान्यतः: आत्महत्या को एक सकारात्मक हिंसक कार्रवाई माना जाता है (In general: suicide is considered a positive violent act) जिसमें शारीरिक ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है लेकिन किसी विशुद्ध रूप में नकारात्मक रवैए या मात्र अकारण का भी वही परिणाम हो सकता है। खाना खाने से इनकार उतना ही आत्महत्यात्मक है जितना कि खंजर या गोली से खुद को नष्ट करना। मृत्यु को कृत्य का परिणाम मानने के लिए उसका मृत्यु से ठीक पहले होना जरूरी नहीं है। तत्व के स्वरूप को बदले बगैर कारण-कार्य संबंध अप्रत्यक्ष हो सकता है। जब कोई बागी व्यक्ति शहीद सम्मत विजय की उम्मीद में बहुत बड़ा समझा जाने वाला द्रोह करता है और जल्लाद के हाथों मारा जाता है तो वह बिलकुल वैसे ही अपनी मृत्यु को प्राप्त करता है जैसे कि उसने स्वयं अपने ऊपर आघात किया हो। इस तरह की दो स्वैच्छिक मृत्युओं को अलग वर्गों में डालने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि उनके अंत के भौतिक हालातों में ही अंतर है।

इस तरह से हम अपने पहले सूत्र पर पहुंचते हैं : आत्महत्या शब्द किसी भी ऐसी मृत्यु के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है जो खुद शिकार व्यक्ति के सकारात्मक या नकारात्मक कृत्य का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम हो।

The causes of death are not internal but external

लेकिन यह परिभाषा अपूर्ण है। यह दो एकदम अलग प्रकार की मृत्युओं में भेद नहीं करती। किसी भ्रमित व्यक्ति के खिड़की से यह सोचकर बाहर कदम रखने कि वह समतल जमीन पर कदम रख रहा है और गिर कर मर जाने और दूसरे होशोहवास वाले व्यक्ति द्वारा जानबूझकर ऐसा करके मर जाने में अंतर है। मृत्यु के कुछ ऐसे मामले भी हैं जो सीधे-सीधे या दूर-दूर तक कर्ता के कृत्य का परिणाम नहीं हैं। मृत्यु के कारण भीतरी नहीं बल्कि बाहरी हैं

क्या आत्महत्या उसी समय मानी जाएगी जब मृत्यु में परिणत होने वाला कृत्य शिकार व्यक्ति द्वारा इसी परिणाम के लिए किया गया हो?

क्या उसी व्यक्ति को खुद को मारने वाला कहा जाएगा जिसमें ऐसा करने की इच्छा थी और क्या आत्महत्या जानबूझकर स्वयं को मारना है?

सबसे पहले तो यह आत्महत्या की ऐसी विशेषता हुई जिसका आसानी से प्रेक्षण और संज्ञान नहीं किया जा सकता, भले ही इसका कितना भी महत्व हो। एजेंट की अभिप्रेरणा का कैसे पता लगाया जाए, जब उसने संकल्प किया तो क्या वह उस समय स्वयं को मारना चाहता था या उसका और कोई उद्देश्य था। मंशा इतनी अंतरंग चीज है कि दूसरा व्यक्ति उसकी लगभग से अधिक व्याख्या नहीं कर सकता। इसका आत्मप्रेक्षण भी नहीं किया जा सकता। कितनी ही बाद हम अपने कृत्यों का सही कारण नहीं समझ पाते। हम क्षुद्र भावनाओं के साथ या अंधे होकर नैमी तौर पर किए गए कृत्यों को बड़े जोश और उच्च इरादों के साथ किए गए कृत्य बताते हैं।

इसके अलावा सामान्य तौर पर भी किसी कृत्य को उसके कर्ता के लक्ष्य द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता क्योंकि आचरण की समरूप प्रणाली को उसके स्वरूप को बदले बगैर अलग-अलग लक्ष्यों की ओर मोड़ा भी जा सकता है। यदि आत्मनाश की मंशा ही आत्महत्या है तो उन तथ्यों को आत्महत्या नाम नहीं दिया जा सकता जो स्पष्ट अंतरों के बावजूद उन तथ्यों से मेल खाते हैं जिन्हें आत्महत्या कहा जाता है और इस शब्द को निकाल कर ही उनकी अन्यथा व्याख्या की जा सकती है। अपनी रेजिमेंट को बचाने के लिए निश्चित मौत का सामना करने वाला सिपाही मरना नहीं चाहता, लेकिन क्या वह अपनी मृत्यु का वैसा ही कर्ता नहीं है जैसा कि दिवालिएपन से बचने के लिए स्वयं को मारने वाला विनिर्माता या व्यापारी? अपने धर्म के लिए मरने वाले शहीद या अपने बच्चे के लिए कुर्बानी देने वाली मां आदि की भी यही स्थिति है। मृ

त्यु को अपरिहार्य उद्देश्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम के रूप में स्वीकार किया जाता है या वास्तव में उसे मांगा और चाहा जाता है, दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति अस्तित्व का परित्याग करता है। इसके लिए अपनाए गए विभिन्न तरीके एक ही वर्ग के प्रभेद हैं। उनमें इतनी अधिक अनिवार्य समानताएं हैं कि उन्हें एक सामान्य अभिव्यक्ति में इकट्ठा करना पड़ेगा। वे इस प्रकार स्थापित एक वर्ग के प्रभेद होंगे। सामान्य भाषा में आत्महत्या एक ऐसे व्यक्ति का हताश कृत्य है जो जीना नहीं चाहता। बहरहाल जीवन का परित्याग किया जाता है क्योंकि इसे त्यागने के क्षण में व्यक्ति ऐसा चाहता है। यदि कोई जीव संभवत: सर्वाधिक प्रिय चीज को त्यागना चाहता है तो ऐसे कृत्यों की स्पष्ट रूप में अनिवार्य सामान्य विशेषताएं होनी चाहिए। इस तरह के संकल्पों को कामयाब बनाने वाली अभिप्रेरणाओं में भिन्नताएं गौण भिन्नताएं ही मानी जाएंगी। इस प्रकार यदि

संकल्प जीवन के बलिदान में तब्दील होता है तो वैज्ञानिक तौर पर इसे आत्महत्या ही कहा जाएगा, किस तरह की आत्महत्या यह हम बाद में देखेंगे।

सर्वोच्च परित्याग के इन सभी संभव रूपों की सामान्य विशेषता यह है कि निर्धारक कृत्य जान बूझकर किया जाता है। कृत्य के समय शिकार व्यक्ति अपने आचरण के निश्चित परिणाम के विषय में जानता है भले ही उस कृत्य के पीछे कोई भी कारण रहे हो। इस प्रकार की विशेषता वाले प्राणघातक तथ्य उन सभी तथ्यों से स्पष्ट रूप में भिन्न हैं जिनमें शिकार व्यक्ति अपना अंतकर्ता नहीं है या केवल अनजानकर्ता है। उनमें एक आसानी से पहचाना जा सकने वाला अंतर है। यह पता लगाना असंभव नहीं है कि अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणामों की व्यक्ति को अग्रिम तौर पर जानकारी थी या नहीं। इस प्रकार वे एक निश्चित समरूप समूह हैं जिन्हें अन्य समूह से अलगाया जा सकता है। इसलिए उन्हें एक विशेष शब्द दिया जा सकता है। आत्महत्या उनके लिए उपयुक्त शब्द है; और कोई शब्द गढ़ने की जरूरत नहीं है; क्योंकि इस नाम वाली बहुसंख्यक घटनाओं का ताल्लुक इसी वर्ग से है।

आत्महत्या किसे कहा जाएगा | Who will be called suicide

अब हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं : मृत्यु के उन सभी मामलों को आत्महत्या कहा जाएगा जिनमें मृत्यु खुद शिकार व्यक्ति के सकारात्मक या नकारात्मक कृत्य का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम होती है और जब व्यक्ति यह जानता हो कि इसका यही परिणाम होगा। आत्महत्या का प्रयास भी इसी प्रकार परिभाषित कृत्य है। इसमें बस मृत्यु नहीं होती।

इस परिभाषा के चलते पशुओं द्वारा आत्महत्या से संबंधित बात हमारे अध्ययन के दायरे से बाहर हो जाती है। पशु-समझ के बारे में अपनी जानकारी के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि उन्हें अपनी मृत्यु के बारे में पूर्व समझ होती है या उन्हें इस कृत्य के साधनों की जानकारी होती है। यह पक्की बात है कि कुछ पशु ऐसे स्थान पर नहीं जाना चाहते जहां पर दूसरे मारे गए हैं। ऐसा लग सकता है कि उन्हें मृत्यु का पूर्व ज्ञान होता है। वास्तव में इस सहज प्रतिक्रिया का कारण रक्त की गंध है। जिन मामलों को पूरी प्रामाणिकता के साथ आत्महत्या बताया गया वहां वास्तव में दूसरी ही बात हो सकती है। यदि कोई चिढ़ा हुआ बिच्छू स्वयं को डंक मार देता है (जो कि निश्चित नहीं है) तो यह संभवत: स्वत:स्फूर्त, अविचारित प्रतिक्रिया है। उसकी चिढ़ से उत्पन्न अभिप्रेरणा ऊर्जा संयोग से और यों ही विसर्जित हो जाती है। जीव इसका शिकार हो जाता है, हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसे अपने कृत्य परिणाम की पूर्व कल्पना थी। दूसरी ओर यदि कुछ कुत्ते अपने मालिकों को खो देने के बाद खाना खाने से इनकार करते हैं तो यह इस वजह से है कि क्योंकि दु:ख के कारण उनकी भूख मिट गई है। उनकी मृत्यु हो जाती है, लेकिन बगैर किसी पूर्वाभास के। न तो इस मामले में भूखा रहने और ऊपर वाले मामले में जख्म को ज्ञातप्रभाव का माध्यम माना जा सकता है। इसलिए हम आगे केवल मानव आत्महत्या पर ही विचार करेंगे।

लेकिन इस परिभाषा से न केवल गलत संहतियों और स्वेच्छाचारी बहिष्करणों का अंत होता है बल्कि इससे हमें समूचे नैतिक जीवन में आत्महत्या के स्थान के बारे में विचार प्राप्त होता है। इससे पता चलता है कि आत्महत्याएं एक पूरी तरह पृथक समूह, किसी विकराल तत्व का कोई अलग- थलग वर्ग नहीं है, जिसका आचरण के अन्य रूपों के साथ कोई संबंध नहीं है, बल्कि इनका बीच के मामलों की निरंतर शृंखला के द्वारा आचरण के अन्य रूपों के साथ संबंध रहता है। ये आम प्रथाओं का अतिरंजित रूप मात्र है। हमारा कहना है कि आत्महत्या उस समय मानी जाती है जब शिकार व्यक्ति घातक कृत्य को करने के समय उसके सामान्य परिणाम के बारे में निश्चित रूप से जानता है। यह निश्चितता अधिक या कम हो सकती है। उसमें यदि थोड़ा सा संदेह हो जाए तो नया तथ्य सामने आएगा, आत्महत्या नहीं बल्कि उसके नजदीक की कोई चीज, क्योंकि उनमें केवल मात्रा का अंतर है। घातक परिणाम की निश्चितता के बगैर यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिए जानबूझकर जोखिम उठाता है और मर भी जाता है तो इसे आत्महत्या नहीं कहेंगे। उसका कृत्य किसी निडर दुस्साहसी के कृत्य से अधिक नहीं है जो मृत्यु से खेलता है और उससे बचना चाहता है या किसी ऐसे विरक्त मनुष्य का कृत्य जिसकी किसी चीज में रुचि नहीं है, जो अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखता और उपेक्षा द्वारा उसे खराब कर देता है। लेकिन कृत्य के ये विभिन्न रूप सच्ची आत्महत्या से मूलभूत रूप में भिन्न नहीं हैं। ये एक जैसी मानसिक अवस्था के परिणाम होते हैं, एजेंट को ज्ञात प्राणघातक जोखिम रहते हैं और इन जोखिमों की संभावना निवारक का काम नहीं करती। अंतर केवल यही है कि इसमें मृत्यु की संभावना कम होती है। इसी प्रकार यदि कोई विद्वान अपने अध्ययन के प्रति अत्यधिक समर्पण के कारण मर जाता है तो यह कहना उचित ही होगा कि उसने खुद को अपनी मेहनत से मार दिया। ये सब तथ्य एक तरह की अविकसित आत्महत्या है। प्रणाली विज्ञानिक रूप से यह पक्की आत्महत्या नहीं है और इसे पूर्ण आत्महत्या नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन साथ ही इसके साथ उसके निकट संबंध की उपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए। आत्महत्या उस समय बिलकुल अलग चीज लगने लगती है जब उसका अटूट संबंध साहस और समर्पण के कृत्यों और विवेकहीनता और स्पष्ट उपेक्षा से जुड़ जाता है। इन संबंधों के स्वरूप को हम आगे देखेंगे।

कौन से सामाजिक कारण हैं जो आत्महत्या दर को प्रभावित करते हैं. | What are the social causes that affect the suicide rate.

दो तरह के सामाजिक कारण हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे आत्महत्या दर को प्रभावित करते हैं। ये हैं कायिक मानसिक विन्यास और भौतिक पर्यावरण का स्वरूप। व्यक्ति स्वभाव या व्यक्तियों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के स्वभाव में आत्महत्या की ओर ले जाने वाली प्रत्यक्ष प्रवृत्ति हो सकती है। इसकी तीव्रता में देशों के अनुसार अंतर हो सकता है। दूसरी ओर कायिक रचना पर जलवायु तापमान की क्रिया के अप्रत्यक्ष रूप में वही प्रभाव हो सकते हैं। किसी भी स्थिति में इस परिकल्पना को बगैर विचार किए अस्वीकार नहीं किया जा सकता। हम इन तत्वों पर एक-एक करके विचार करेंगे और देखेंगे कि वे हमारे अध्ययनाधीन विषय पर प्रभाव डालते हैं और यदि डालते हैं तो कितना।

Should suicide be considered the result of insanity in all cases?

किसी निश्चित समाज के मामले में निश्चित बीमारियों की वार्षिक दर अपेक्षाकृत स्थिर होती है हालांकि इसको लेकर विभिन्न आवामों में काफी अंतर होता है। विक्षिप्तता भी ऐसी ही बीमारी है। प्रत्येक स्वैच्छिक मौत में यदि विक्षिप्तता पाई जाती है तो हमारी समस्या हल हो जाती है और आत्महत्या को वैयक्तिक रोग मान लिया जाएगा।

इस बात का बहुत से मनोचिकित्सकों ने समर्थन भी किया है। एस्कुइरोल के अनुसार : ‘आत्महत्या में दिमागी पागलपन के सभी लक्षण मौजूद हैं।’ ‘कोई व्यक्ति उन्माद की अवस्था में ही आत्महत्या का प्रयास करता है। और आत्महंतक दिमागी तौर पर पागल होते हैं। इस सिद्धांत से उसने निष्कर्ष निकाला कि आत्महत्या अनिच्छा से की जाती है, इसलिए कानून में उसके लिए दंडविधान नहीं होना चाहिए। फलरेट5 और मोरो डि टूर्स ने भी लगभग इसी शब्दावली का प्रयोग किया है। टूर्स ने जिस पैसेज में अपना सिद्धांत रखा है उसी में ही वह एक ऐसी टिप्पणी कर देता है जो उसे संदेहास्पद बना देती है : क्या आत्महत्या को सभी मामलों में पागलपन का परिणाम माना जाना चाहिए ? इस मुश्किल सवाल का उत्तर देने के बजाए हम सामान्य तौर पर कह सकते हैं कि जो व्यक्ति जितना अधिक अनुभव प्राप्त करेगा, जितने अधिक पागल लोगों की जांच करेगा वह उतना ही अधिक इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा।’

1845 में अपने एक ब्रोशर, जिसने चिकित्सा जगत में तुरंत तहलका मचा दिया, में डॉ. बोरडिन ने यही बात रखी बल्कि अधिक निस्संकोच रूप में।

इस सिद्धांत की पैरवी दो रूपों में की जा सकती है और की गई है। आत्महत्या को या तो अपने आप में ही एक अद्वितीय बीमारी माना गया है, एक विशेष प्रकार का पागलपन; या इसे अलग वर्ग न मानकर पागलपन के एक या विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली बीमारी मान लिया जो कि स्वरूप व्यक्तियों में नहीं पाई जाती। इनमें से पहला बोरडिन का सिद्धांत है।

जीन-एटिनेन डोमिनिक एस्क्वायरोल द्वारा आत्महत्या की परिभाषा | suicide definition by Jean-Étienne Dominique Esquirol | Esquirol psychology

एस्कुईरोल दूसरा विचार रखने वाला प्रमुख विद्वान है। उसका कहना है, ‘जो पाया गया है उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि आत्महत्या कई विभिन्न कारणें का परिणाम होती है और कई विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। जाहिर है कि यह किसी बीमारी की विशेषता नहीं होती। आत्महत्या को एक अद्वितीय बीमारी मानकर कई सामान्य बातें कह दी गई हैं जो अनुभव की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।’

आत्महत्या को विक्षिप्तता की अभिव्यक्ति साबित करने की इन दो विधियों में से दूसरी कम श्रमसाध्य और निश्चयात्मक है क्योंकि इसके कारण निषेधात्मक अनुभव असंभव हैं। आत्महत्या के सभी मामलों की पूरी सूची नहीं बनाई जा सकती और न ही प्रत्येक में पागलपन के प्रभाव को दर्शाया जा सकता है। केवल इक्का-दुक्का उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन उनकी संख्या चाहे जितनी हो उन्हें वैज्ञानिक सामान्यीकरण का आधार नहीं बनाया जा सकता। साथ ही इस बारे में हालांकि विरोधी उदाहरण नहीं दिए गए हैं, लेकिन उनके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि आत्महत्या को अपनी विशेषताओं और अपने अलग अस्तित्व वाली मानसिक बीमारी दर्शाया जा सकता है तो समस्या सुलझ जाती है। प्रत्येक आत्महंतक एक पागल व्यक्ति है।

Is there such a thing as suicidal madness?

लेकिन क्या आत्महत्यात्मक पागलपन जैसी कोई चीज है? आत्महत्या की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप में विशेष और निश्चित होती है। यदि यह एक तरह की विक्षिप्तता है तो यह एक कृत्य तक सीमित आंशिक विक्षिप्तता होगी। एक कृत्य तक सीमित होने पर ही इसे उन्माद कहा जा सकता है, क्योंकि यदि उन्माद कई कृत्यों को लेकर है तो शेष को छोड़कर एक कृत्य द्वारा उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। मानसिक रोग विज्ञान की परंपरागत शब्दावली में इन सीमित उन्मादों को एकोन्माद कहा जाता है। एकोन्मादी ऐसे बीमार व्यक्ति को कहते हैं जिसका दिमाग केवल एक मामले को छोड़कर शेष सभी मामलों में स्वस्थ रहता है। उसमें केवल एक दोष होता है। उदाहरण के लिए, उसमें शराब पीने, चोरी करने या गाली देने की असंगत और बेतुकी कामना होती है; लेकिन उसके अन्य कृत्य और अन्य विचार पूरी तरह से सही होते हैं। इसलिए यदि कोई आत्महत्यात्मक उन्माद होता है तो वह एकोन्माद ही हो सकता है और सामान्यत: इसे यही कहकर पुकारा गया है।

दूसरी ओर यदि एकोन्माद कही जाने वाली इस विशेष बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है तो यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि उसमें आत्महत्या को क्यों शामिल किया जाता है। अभी दी गई परिभाषा के अनुसार इस तरह की बीमारियों का स्वरूप ऐसा होता है कि इनसे बौद्धिक कार्य में कोई अनिवार्य गड़बड़ी नहीं होती। एकोन्मादी और स्वस्थ व्यक्ति के मानसिक जीवन का आधार एक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि एकोन्मादी के मामले में एक निश्चित मनोदशा इस सामान्य आधार से कटी होती है। संक्षेप में एकोन्माद मनोवेगों में से एक उग्र मनोवेग, विचारसमूह में से एक गलत विचार है लेकिन इसकी तीव्रता इतनी अधिक होती है कि वह दिमाग को अभिभूत कर लेता है और उसे पूरी तरह से अपना दास बना लेता है। उदाहरण के लिए, जब महत्वाकांक्षा विकराल रूप धारण कर लेती है और बाकी सभी दिमागी कार्य पंगु हो गए लगते हैं तो वह विकृत होकर भव्य एकोन्माद का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार दिमागी संतुलन को गड़बड़ा देने वाला हिंसक मनोवेग एकोन्माद का पर्याप्त कारण बन सकता है।

Suicides generally appear to be influenced by abnormal impulses.

सामान्यत: आत्महत्याएं असामान्य आवेग से प्रभावित लगती हैं। इस आवेग की ऊर्जा का अचानक विस्फोट हो सकता है या वह धीरे-धीरे विकसित हो सकती है। यह आावेग इस आधार पर तर्कसंगत भी लग सकता है कि आत्मरक्षण की बुनियादी सहजवृत्ति का प्रतिकार करने के लिए इस तरह का बल हमेशा चाहिए। इसके अलावा आत्महत्या के कृत्य को छोड़कर आत्महंतक बिलकुल दूसरे आदमियों जैसे होते हैं। उन्हें सामान्य रूप में उन्मादी नहीं कहा जा सकता। इस तर्क के आधार पर आत्महत्या को एकोन्माद की संज्ञा देकर विक्षिप्तता की अभिव्यक्ति माना गया है।

लेकिन क्या एकोन्मादियों का वास्तव में कोई वजूद है? काफी लंबे समय तक इस पर सवाल नहीं उठाया गया। सभी मनोचिकित्सक (Psychiatrist) बगैर किसी चर्चा के आंशिक उन्माद के सिद्धांत पर सहमत थे। इसे न केवल चिकित्सकीय दृष्टि से पक्का मान लिया गया बल्कि मनोविज्ञान के निष्कर्षों के अनुरूप मान लिया गया। मानव बुद्धि के विषय में कहा गया है कि उसमें पृथक आत्मिक ऊर्जाएं और अलग शक्तियां हैं जो सामान्यत: मिलकर काम करती हैं। लेकिन वे अलग होकर भी कार्य कर सकती हैं। अत: स्वाभाविक तौर पर ऐसा लगा कि ये शक्तियां अलग-अलग रोगग्रस्त हो सकती हैं। जब मानव-बुद्धि बगैर संकल्पशक्ति के और भावनाएं बगैर बुद्धि के प्रकट हो सकती हैं तो भावनाओं में बगैर गड़बड़ी के बुद्धि या संकल्प संबंधी और बुद्धि या संकल्प में बगैर गड़बड़ी के भावनाओं संबंधी विकार क्यों नहीं हो सकते? इस नियम को जब आत्मिक ऊर्जाओं के विशेषीकृत रूपों पर लागू किया गया तो यह सिद्धांत उभर कर सामने आया कि कोई आघात केवल किसी मनोवेग, कृत्य या अलग-थलग विचार को प्रभावित कर सकता है।

लेकिन आज इस विचार को सब जगह त्याग दिया गया है। प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण से एकोन्मादियों की गैरमौजूदगी सिद्ध नहीं की जा सकती लेकिन साथ ही उनकी मौजूदगी का भी कोई निर्विवाद उदाहरण नहीं दिया जा सकता। चिकित्सीय अनुभव के दौरान कोई बिलकुल अलग मनोवेग नजर में नहीं आया है। जब किसी एक आत्मिक ऊर्जा पर आघात लगता है तो दूसरियों को भी आघात पहुंचता है। एकोन्माद में विश्वास करने वाले इन सहगामी आघातों को इसलिए नहीं देख पाए हैं क्यों उनका पर्यवेक्षण बहुत कमजोर है।

Insanity is a limited part of mental life

फलरेट ने लिखा है कि ‘उदाहरण के लिए धार्मिक विचारों से आविष्ट किसी विक्षिप्त व्यक्ति को लें जिसे धार्मिक एकोन्मादियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। वह स्वयं को दिव्य प्रेरित कहता है; अपने दिव्य मिशन के तहत वह संसार में नया धर्म लाता है…इस विचार को पूरी तरह से विक्षिप्तता कहा जा सकता है; फिर भी उसके धार्मिक विचारों को छोड़कर उसकी बाकी बातें दूसरे आदमियों की तरह युक्तियुक्त होती हैं। उससे ध्यान से पूछताछ करने पर कुछ और रुग्ण विचार सामने आएंगे। उदाहरण के लिए, धार्मिक विचारों के समानांतर उसमें गर्व की प्रवृत्ति मिलेगी। वह ऐसा विश्वास करता है कि उसे न केवल धर्म बल्कि समाज को सुधारने के लिए पैदा किया गया है। वह शायद यह कल्पना भी करेगा कि उसकी नियति में बहुत बड़ा काम करना लिखा है। यदि इस रोगी में आपको गर्व की प्रवृत्तियां नहीं मिलती हैं तो उसमें नम्रता के विचार या भय की प्रवृत्तियां मिलेंगी। धार्मिक विचारों के भंवर में फंसकर वह स्वयं को ध्वस्त, विनाश नियति वाला आदि मानेगा।’ उन्माद के ये सभी रूप किसी एक व्यक्ति में इकट्ठे नहीं मिलेंगे, लेकिन कुछ रूप इकट्ठे मिल सकते हैं। यदि वे बीमारी के किसी विशेष क्षण में नजर नहीं आते तो बाद में एक के बाद बहुत जल्दी नजर आ सकते हैं।

इन लक्षणों के अलावा इन तथाकथित एकोन्मादियों की एक सामान्य मानसिक अवस्था होती है जो बीमारी की बुनियाद होती है। उन्मादी विचार तो इसकी बाहरी और क्षणिक अभिव्यक्ति हैं। आनंदातिरेक या गहरा अवसाद या सामान्य विकृति इसकी अनिवार्य विशेषता हैं। विचार और कृत्य में संतुलन और समन्वय का अभाव रहता है।

रोगी सोच-विचार करता है, लेकिन उसके विचारों में रिक्ति होती है। उसके कृत्यों में विसंगति नहीं होती लेकिन उनमें कोई तारतम्य नहीं होता। अत: यह कहना गलत है कि विक्षिप्तता मानसिक जीवन का एक हिस्सा, एक सीमित हिस्सा है। यह जब बुद्धि में घुसता है तो उसे पूरी तरह से आच्छादित कर देता है।

इसके अलावा एकोन्माद की परिकल्पना का बुनियादी सिद्धांत विज्ञान के वास्तविक आंकड़ों का प्रतिवाद करता है। अत: शक्ति के पुराने सिद्धांत के अब बहुत कम पैरोकार हैं। अब विभिन्न प्रकार की सचेत गतिविधियों को अलग-अलग, असंबद्ध और केवल गूढ़ तत्व में जुड़ी ताकतें नहीं माना जाता। उन्हें अब एक दूसरे पर आश्रित तत्व माना जाता है। यदि एक को आघात पहुंचता है तो दूसरा उससे अप्रमादित नहीं रह सकता। यह बात अन्य अवयवों के बजाए मानसिक जीवन के मामले में अधिक सही है क्योंकि मानसिक कार्यों के लिए इस तरह से अलग-अलग अवयव नहीं होते कि अन्यों को छोड़कर केवल एक को प्रभावित किया जा सके। मस्तिष्क के विभिन्न भागों में उनका वितरण बहुत स्पष्ट नहीं होता।

यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि यदि किसी एक भाग को अपना कार्य करने से रोका जाता है तो अन्य भाग बड़ी तत्परता के साथ एक दूसरे का स्थान ले लेते हैं। ये इस कदर एक दूसरे से संबद्ध हैं कि विक्षिप्तता अन्यों को छोड़ कर केवल कुछ पर आघात नहीं कर सकती। मानसिक जीवन को पूरी तरह से बदले बगैर विक्षिप्तता द्वारा किसी एक भावना या विचार को प्रभावित कर दिया जाना तो बिलकुल असंभव है। विचारों और आवेगों का कोई अलग-अलग अस्तित्व नहीं है। वे ऐसे बहुत से छोटे तत्व, आध्यात्मिक एटम नहीं हैं जिनके इकट्ठे होने से मस्तिष्क बनता है। वे चेतना के केंद्रों की सामान्य अवस्था की बाह्य अभिव्यक्ति मात्र हैं। चेतना ही उनका स्रोत है और वे उसी की अभिव्यक्ति करते हैं। इस प्रकार वे इस अवस्था की विकृति के बगैर रुग्ण नहीं हो सकते।

यदि मानसिक दोषों का स्थान निर्धारण नहीं किया जा सकता तो अपने वास्तविक अर्थ में एकोन्मादी भी नहीं हो सकते। इससे जुड़ी और स्थानिक लगने वाली गड़बड़ी वास्तव में बहुत व्यापक उथल-पुथल होती है। वे अपने आप में बीमारियां नहीं होतीं बल्कि अधिक सामान्य बीमारियों की गौण अभिव्यक्ति होती हैं। इस प्रकार यदि एकोन्मादी नहीं हैं तो आत्महत्यापरक एकोन्माद भी नहीं हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप हम कह सकते हैं कि आत्महत्या विक्षिप्तता का विशिष्ट रूप नहीं है

एमिल दुर्खीम के लेख के संपादित अंश – प्रस्तुति –  प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी

 नोट्स – David Émile Durkheim was a French sociologist. He formally established the academic discipline of sociology and—with Karl Marx and Max Weber —is commonly cited as the principal architect of modern social science. Wikipedia

Jean-Étienne Dominique Esquirol was a French psychiatrist. Wikipedia

Jean-Étienne Dominique Esquirol BooksMental Maladies: A Treatise on InsanityA Treatise on Insanity

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