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जनतंत्र खत्म होने की कीमत क्या है? क्या आप जानते हैं?

जनतंत्र खत्म होने की कीमत क्या है? क्या आप जानते हैं?

गुजरात विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद बीती 12 तारीख को भूपेंद्र पटेल ने फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह एक सामान्य राजनैतिक प्रक्रिया है कि जब कोई दल बहुमत हासिल करता है, तो फिर उसके विधायक सर्वसम्मति से अपना एक नेता चुनते हैं, जो मुख्यमंत्री बनाया जाता है।

शक्तिप्रदर्शन का माध्यम बन गए शपथग्रहण समारोह

पद संभालने के लिए शपथग्रहण की प्रक्रिया भी तय है और उसी मुताबिक भारत के विभिन्न राज्यों में निर्वाचित सरकारों के मुख्यमंत्री शपथ लेते आए हैं। बदलते वक्त के साथ शपथग्रहण समारोह भव्य से भव्यतम होने लगे। इन्हें शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाया जाने लगा। जिस राज्य में जितना अधिक बहुमत मिले, उस राज्य में उतने बड़े पैमाने पर शपथग्रहण के तामझाम होने लगे।

लोकतंत्र में राजतिलक का आडंबर

चुनाव जीतने के लिए पहले प्रचार में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, उसके बाद जीत मिल गई, तो उसका उत्सव मनाने के लिए बेदर्दी से करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। लेकिन जब जनता के हितों का सवाल आए, तो बजट का रोना रोया जाता है। संविधान के नाम की शपथ लेने के समाचार ताजपोशी जैसी शब्दावली के साथ दिए जाते हैं। शपथग्रहण राजतिलक के आडंबर के साथ संपन्न होता है।

क्या हम लोकतंत्र से फिर राजतंत्र की तरफ जा रहे हैं?

समझना कठिन है कि समय के साथ हम अधिक आधुनिक और लोकतांत्रिक हो रहे हैं, या फिर समय का पहिया घुमाकर हम उसी दौर में पहुंचने की कोशिश में लगे हैं, जहां राजा को भगवान का दर्जा दिया जाता था। उसके हर फैसले को भगवान का आदेश मानकर प्रजा सिर-माथे पर लेती थी। और अपने सुख-दुख को किस्मत का खेल मान लेती थी। राजा के प्रशासनिक कामकाज के लिए मंत्री, दरबारी हुआ करते थे, उसके अधीन सामंत हुआ करते थे, जिनका काम जनता से कर वसूली कर राजकोष को भरना होता था। राजा के गुणगान के लिए दरबार में चारण कवि होते थे। राजा का नाम आने वाली पीढ़ियां याद रखें, इसलिए प्रशस्तियां लिखवाई जाती थीं।

जिन लोगों ने इतिहास का अध्ययन किया है, वे जानते हैं कि इन प्रशस्तियों में अधिकतर में तथ्यों से अधिक चाटुकारिता भरी हुई है। जब कलम में राजा के धन की स्याही भरी हो, तो फिर वह राजा के गुण ही देखेगी, दोष नहीं और जहां गुण न दिखाई दें, वहां कल्पना से काम चला लेगी। चारण कवियों ने यही किया।

क्या होता था राजतंत्र में?

राजशाही के सैकड़ों-हजारों बरसों आम लोग गुलामों की तरह ही रहे, मानवाधिकारों के अधिकतर पहलुओं से वंचित। आम जनता पढ़ सकती है या नहीं। कौन सा व्यवसाय किसके लिए है। कौन धार्मिक अनुष्ठानों का हकदार है, कौन नहीं। किसी सभा का सदस्य कौन बन सकता है, कौन नहीं। न्याय का हक किन लोगों के पास है। ऐसे तमाम बुनियादी अधिकारों के लिए भी राजशाही की कृपा पर लोग निर्भर रहते थे। राजा दयालु हुआ, तो उनकी खुशकिस्मती, क्रूर हुआ तो उनकी बदकिस्मती।

राजशाही ने तमाम कुरीतियों को प्रश्रय क्यों दिया?

वर्गभेद, वर्णभेद, जातिप्रथा, ऐसी तमाम कुरीतियों को राजशाही ने पर्याप्त प्रश्रय दिया, ताकि सिंहासन पर कोई आंच न आए। राजशाही की इन जकड़नों के बाद लगभग दो सौ साल भारत की जनता ने गुलामी की जकड़न भी खूब सही। हजारों साल लग गए, इन बंधनों को ढीला करने में। मानवीय गरिमा पर लगी गांठों को खोलने में।

आजादी मिली, तो देश के नीति निर्माताओं ने सबसे अधिक ऊर्जा भारत को अपने पैरों पर खड़े करने के साथ-साथ इस बात पर लगाई कि हिंदुस्तान का हर नागरिक अतीत के अत्याचारों से मुक्त होकर सम्मान का जीवन जी सके। इसलिए भारत को लोकतांत्रिक देश बनाया गया। संविधान के जरिए इस लोकतंत्र को और मजबूत किया जा सके, इसलिए संविधान निर्माताओं ने हर पहलू पर सुदीर्घ विचार-विमर्श के बाद व्यवस्थाएं बनाईं। भारत के हर नागरिक को समानता के अधिकार से लैस किया गया, ताकि हजारों बरसों की गैरबराबरी की घुटन से राहत मिल सके। लोगों को ये अहसास हो कि वे अपने देश में हैं, जहां उनका हक है, उनका हुक्म है, और उस हुक्म के पालन के लिए उनके जनप्रतिनिधि निर्वाचित सदनों में बैठे हैं। मगर आज की जो तस्वीर है, वो तो इससे बिल्कुल उलट है। ताजपोशी और राजतिलक जैसे शब्द हमें फिर से इतिहास की उन्हीं अंधेरी गुफाओं में धकेल रहे हैं, जहां से लोकतंत्र की मशाल लिए हम बड़ी मुश्किल से बाहर निकले थे।

क्या गुजरात में भाजपा की जीत अंतरराष्ट्रीय महत्व की घटना है?

संविधान ने तो लोकतंत्र के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनाकर दे दी, मगर हम खुद उस व्यवस्था को ढहाने में लगे हुए हैं। भूपेंद्र पटेल जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तो वहां भाजपा के तमाम नेताओं का जमावड़ा था। प्रधानमंत्री से लेकर, कई मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री भी मौजूद थे। और इनके साथ खुद को बड़े पत्रकार मानने वाले तमाम लोग पल-पल की खबरें देने में लगे हुए थे। समाचार चैनलों ने समर्पित भाव से पूरे शपथ ग्रहण समारोह का जीवंत प्रसारण किया और इसके साथ ही पहले और बाद के माहौल का वर्णन करने में भी अच्छा-खासा वक्त दिया।

प्रधानमंत्री कहां जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, यह तो खबर है। एक राज्य में नई सरकार के गठन में वहां की जनता और दर्शकों के लिए भी दिलचस्पी होगी। लेकिन बाकी देश को एक राज्यस्तरीय घटना को राष्ट्र स्तरीय बनाकर परोसने का क्या औचित्य। यह सवाल बहुत से लोगों को अटपटा लग सकता है। क्योंकि गुजरात में भाजपा की जीत को मीडिया ने इतना बड़ा बनाकर दिखाया है कि यह राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय महत्व की घटना लगने लगी है।

सत्ता के दबाव में क्यों रहते हैं मीडिया मालिक?

मीडिया मालिक अपने कार्पोरेट हितों के कारण सत्ता के दबाव में रहते हैं, बल्कि अब तो अधिकतर मीडिया कंपनियों में उद्योगपतियों की पूंजी ही लगी है। इसलिए वे व्यावसायिक हितों के अनुसार अपने चैनल पर खबरों का प्रसारण चाहेंगे।

अब सवाल ये है कि जो लोग खुद को पत्रकार कहते हैं, उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं। अगर वे जनहित और देशहित से जुड़ी खबरों के ऊपर सत्ताहित को रख रहे हैं, तो क्या वे अपने पेशे से न्याय कर रहे हैं? क्या वे लोकतंत्र के साथ न्याय कर रहे हैं या फिर लोकतंत्र के पैर खींचकर राजशाही में धकेलने की प्रक्रिया में उनकी भी भागीदारी ह?। क्या इन पत्रकारों को जरा भी एहसास है कि खबरें लिखते-बताते, वे कब प्रशस्तियां लिखने के अभ्यस्त हो गए?

समाचार चैनलों में सुखविंदर सिंह सुक्खू का शपथग्रहण समारोह सुर्खी क्यों नहीं बना?

पिछले दिनों दो राज्यों में चुनाव हुए और दोनों में अलग-अलग दलों की सरकारें बनीं। 11 ताऱीख को हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री के तौर पर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शपथ ली। उनके भी शपथ ग्रहण का आयोजन हुआ, लेकिन गुजरात की तरह भव्य और ताकत के प्रदर्शन के साथ नहीं हुआ। समाचार चैनलों में इस शपथग्रहण को सामान्य खबर की तरह दिखा दिया गया। जबकि एक बस ड्राइवर के बेटे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, यह बात लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाने वाली है, इस नाते ही इस खबर को पर्याप्त जगह और समय मिलना चाहिए था। मगर ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ, इसका विश्लेषण ऊपर किया जा चुका है।

क्या फिर से प्रजा बनने के लिए तैयार है जनता?

कांग्रेस अभी केंद्र की सत्ता में नहीं है। उद्योगपतियों के हित अभी कांग्रेस की जगह भाजपा से जुड़े हैं। इसलिए भाजपा की खबरों को ही अधिक स्थान मिलेगा, यह तय है। अब देखना ये है कि क्या जनता फिर से प्रजा बनने के लिए तैयार है। हजारों सालों की मेहनत और संघर्ष पर किस तरह पानी फिर गया है, इसकी समीक्षा अब जनता को कर लेनी चाहिए। याद रहे कि जनतंत्र खत्म होने की सबसे बड़ी कीमत उसे ही चुकानी पड़ेगी।

सर्वमित्रा सुरजन

लेखिका देशबन्धु की संपादक हैं।

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