नेहरू के बाद सबसे ज़्यादा मनमोहन सिंह से क्यों चिढ़ता है संघ? उसे राहुल से क्यों लगता है डर?

नेहरू के बाद सबसे ज़्यादा मनमोहन सिंह से क्यों चिढ़ता है संघ? उसे राहुल से क्यों लगता है डर?

जनता को ताक़तवर बनाने वाला शासक हमेशा विनम्र होगा और उन्हें कमज़ोर बनाने वाला हमेशा अकडू

मौजूदा राजनीति का मुख्य द्वंद्व क्या है? | What is the main conflict of current politics?

लोगों को मजबूत और कमज़ोर करने के बीच का द्वंद ही मौजूदा राजनीति का मुख्य द्वंद्व है

संघ परिवार हिंदू समाज के बीच शुरू से ही प्राचीन सामाजिक व्यवस्था की तरफ वापस लौट चलने की वक़ालत करता रहा है। खोखले वर्तमान और अनिश्चित भविष्य के बीच झूलते समाजों में ‘प्राचीनता’ के प्रति एक अलग तरह का भावनात्मक सममोहन होता है। लेकिन इस ‘प्राचीनता’ की कोई ठोस व्याख्या जानबूझ कर नहीं की जाती। सिर्फ़ इस शब्द के आडम्बर से ही काम चलाया जाता है।

अगर ‘प्राचीन’ के बदले इसके समानार्थी शब्दों जैसे- बहुत पुराना, पूर्वकालीन भूतकालीन, आदिम का प्रयोग किया जाए तो इसके प्रति दलितों के आकर्षण में आपको साफ कमी दिखने लगेगी क्योंकि तब लोग उस समय का मूल्यांकन तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक संबंधों और स्थितियों पर करेंगे।

आरएसएस आरक्षण का विरोध क्यों करता है? | Why does RSS oppose reservation?

इसीलिए संघ कुछ तबकों के वर्चस्व वाली प्राचीन व्यवस्था को फिर से निर्मित करने के लिए घुमा फिरा कर माहौल बनाता है। मसलन, वो आरक्षण का विरोध करता है क्योंकि उसे जो प्राचीन व्यवस्था बनानी है उसके लिए आवश्यक श्रम शक्ति फिर से तभी इकट्ठी हो पायेगी जब आरक्षण खत्म हो और लोग फिर से गांव लौट आयें।

संघ को आरक्षण, संविधान, नेहरू, अंबेडकर और कांग्रेस से चिढ़ क्यों है?

याद रखिये संघ के इस प्राचीन व्यवस्था की धुरी गांव रहे हैं। आरक्षण के आते ही नौकरी पाने वाले गांवों से निकल कर शहरों में आ गए और धीरे- धीरे अपने परिवारों को भी अपने साथ लेकर शहरों में रहने लगे। अब ज़ाहिर है कि जिसके घर के लोग सरकारी नौकरी करने लगेंगे वो उस प्राचीन व्यवस्था को ढोते हुए ‘दूसरे के लिए श्रम’ तो करेंगे नहीं। आज भी जो लोग दूसरों के खेतों पर काम करने वाले हैं उनमें वही हैं जिनके घर का कोई व्यक्ति आरक्षण के तहत नौकरी न पाया हो।

यानी आरक्षण ने दलितों- पिछड़ों की मजबूत कही जाने वाली जातियों पर आर्थिक निर्भरता खत्म कर दी। संघ को आरक्षण, संविधान, नेहरू, अंबेडकर और कांग्रेस से इसीलिए तो चिढ़ है।

90 के दशक में आरक्षण के खिलाफ़ लोगों के तर्कों को फिर से याद कीजिये। मैं तो सन् 2000 के बाद के तर्कों को बता रहा हूँ जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय यानी प्लेटो, रूसो और प्रेमचन्द को कोर्स में पढ़ने वाले अधिकतर सवर्ण छात्र रखते थे। उनका सबसे पसंदीदा तर्क होता था कि सभी लोग अगर बराबर हो जाएंगे तो उनके खेतों और घरों में काम कौन करेगा। यानी उन्हें बराबरी से इसीलिए डर लगता था कि उनके नियंत्रण वाली श्रम शक्ति उनके क़ाबू से निकल जाएगी। किसी दलित के धर्मांतरित हो कर मुसलमान, ईसाई या बौद्ध बन जाने से भी उसे यही नुकसान होता है। इसीलिए वो धर्मांतरण से भी डरे रहते हैं।

प्राचीन व्यवस्था की बहाली के लिए ज़रूरी है दरिद्रता (Poverty is necessary for the restoration of the ancient system)

इसी तरह संघ की सोच के अनुरूप ही भाजपा सरकारों में नौकरियां कम की जाती हैं, क्योंकि रोज़गार से लोग आत्मनिर्भर बनते हैं, गांव से शहर भागते हैं। यानी गांव का प्राचीन ढांचा टूटने लगता है।

क्या जानबूझकर महंगाई बढ़ा रही है भाजपा सरकार? | Is the BJP government deliberately increasing inflation?

इसी तरह महंगाई बढ़ती है तो लोगों की निर्भरता भी अपने से मजबूत लोगों और जातियों पर बढ़ती है। मसलन, अगर महंगाई बढ़ती है तो तीन बच्चों वाला एक अति पिछड़ा – दलित परिवार उनमें से एक ही को बड़े शहर में भेज कर पढ़ा पाएगा। दो को गांव में ही रह कर खेती किसानी करनी होगी। यही अगर महंगाई कम होती तो उसके तीनों बच्चे बाहर पढ़ते। और वहीं से कहीं नौकरी पा जाते और गांव के सामंती संबंधों वाली परिधि से बाहर निकल जाते। लेकिन महंगाई के कारण तीन में से दो उसी व्यवस्था का हिस्सा बनने को अभिशप्त हैं।

इसीलिए संघ भाजपा सरकारों में बेरोजगारी, महंगाई और आरक्षण में कटौती को मोदी या भाजपा सरकार की विफलता के बतौर मत देखिये। अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ने की दिशा में ये उनके लिए उपलब्धि है। इसीलिए इन मुद्दों पर घेरने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें लगता है कि अगर वो इन मुद्दों पर चुनाव हार भी जाते हैं तो भी वो लोगों का ठीक-ठाक दरिद्रीकरण कर के जा रहे हैं जिन्हें फिर से पटरी पर लाने में उनकी जगह आई सरकार को काफी वक़्त लगेगा।

वर्चस्व की कुंठा

दरअसल एक असमानता वाले सामाजिक ढांचे में सबको किसी न किसी पर वर्चस्व चाहिए। इसके लिए वो किसी भी हद तक कि महंगाई और बेरोजगारी सह सकता है। जितनी गुरबत बढ़ेगी वर्चस्व की कुंठित इच्छा भी उतनी ही बढ़ेगी। उसे लगातार बढ़ाया भी जाएगा। आप देखिये ना योगी ने कहा कि चंद्रगुप्त ने सिकंदर को हरा दिया था। ठीक इसी तरह राजस्थान की पूर्व भाजपा सरकार ने इतिहास की पुस्तकों में तथ्यों को बदलते हुए लिख दिया था कि महाराणा प्रताप ने अकबर को हरा दिया था। ये फ़र्ज़ी वर्चस्व का खुराक है जो दरिद्र बनाने के बाद लोगों को चाहिए होता है। सरकार यही दे रही है।

आप इसे ऐसे भी देख सकते हैं कि जब जीडीपी अच्छी थी, लोग खुशहाल थे, भारत विकासशील देशों की श्रेणी में था, आम हिंदू अपने सभी बच्चों को पढ़ने के लिए बाहर भेजने लायक था तब तक पानीपत में अकबर से महाराणा प्रताप के हार के तथ्य को बदलने की ज़रुरत महसूस नहीं की गयी थी।

इसीलिए नेहरू के बाद सबसे ज़्यादा मनमोहन सिंह से चिढ़ता है संघ

इसे आप मनमोहन सिहं सरकार के उदाहरण से और बेहतर समझ सकते हैं। उन्हें संघ ने देश के सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री के बतौर प्रचारित किया। जबकि 70 सालों में आम आदमी को विभिन्न अधिकारों से लैस करने वाले वही प्रधानमंत्री हुए हैं। भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, मिड डे मील, रोजगार की गारंटी का अधिकार और सूचना का अधिकार उन्होंने ही दिया।

यानी जिस आदमी ने लोगों को सबसे ज़्यादा ताक़तवर बनाया उसे ही सबसे कमज़ोर बताया गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि लोगों के अधिकार संपन्न होने से सबसे ज़्यादा नुकसान सामंती ढांचे को हुआ। क्योंकि अब कोई भी गांव के प्रधान से सवाल पूछ सकता था। उसी तरह याद कीजिये जब मनरेगा आया था तब गांवों में सवर्ण इसका यह कह कर विरोध करते थे कि इससे मजदूरी बढ़ गयी है क्योंकि उन्हें भी सरकारी रेट पर मजदूरी देनी होती थी। यह भी कहते थे कि उन्हें कटनी करने के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। कुछ नैतिक लफ़्फ़ाज़ तो यह तक तर्क देते थे कि मनरेगा मजदूरों ( दलितों) को आलसी और शराबी बना रहा है।

उसी तरह मिड डे मील में दलित रसोइया महिलाओं द्वारा बनाये गए खाने को ले कर भी सवर्ण लोग विरोध करते थे, या दलित बच्चों के साथ अपने बच्चों के खाने से उनका अहंकार आहत होता था। इसीतरह  शिक्षा के अधिकार जिसके तहत हर प्राइवेट स्कूल को हर कक्षा में 25 फीसदी गरीब (ज़्यादातर दलित और अति पिछड़े) परिवारों को पढ़ाने की अनिवार्यता थी उसे लागू ही नहीं होने दिया गया।

उस समय ऐसी खबरें खूब आती थीं जहाँ सवर्ण परिवार इस पर आपत्ति करते थे कि उनके बच्चों के साथ गरीब ( दलित) बच्चे कैसे बैठ सकते हैं। कई स्कूलों के मालिकों पर उन्होंने दबाव डाल कर धमकी दी कि अगर गरीब बच्चों को उनके बच्चों के साथ पढ़ाया गया तो वो अपने बच्चों को वहाँ से निकाल लेंगे। उनका पसंदीदा तर्क होता था कि अगर गरीब और अमीर के बच्चे एक साथ ही पढ़ने लगें तो फिर प्राइवेट स्कूलों का क्या मतलब है। वो इतनी फीस क्यों दें जब उनके बच्चों को गरीब लोगों के बच्चों के साथ ही पढ़ना है। यानी उनके लिए पैसा गरीब से उचित दूरी बनाये रखने  का ज़रिया मात्र था।

गौर करिए, मनमोहन सिहं सरकार अपने नागरिकों को अधिकार दे कर उन्हें ताक़तवर बना रही थी, उनमें आत्म विश्वास भर रही थी। सरकारी और संवैधानिक संस्थाओं को जनता के प्रति जवाबदेह बना रही थी। यानी वह सब कुछ कर रही थी जिससे लोग सामंती जकड़न और निर्भरता से मुक्त हों। यानी उन्होंने उस ‘प्राचीन’ ढांचे को हिला कर रख दिया था जिसकी तरफ संघ हिंदू जनमानस को वापस ले जाने की संगठित कोशिश पिछले कई सालों से कर रहा है।

आप मनमोहन सिंह के प्रति संघ की नफ़रत की तुलना नेहरू के प्रति उसके नफ़रत से ही कर सकते हैं। जिन्होंने एक झटके में ही सभी को समान मानने वाला संविधान दे कर संघ की प्राचीन व्यवस्था के प्रति आकर्षण पैदा करने की राजनीति को निर्णायक तौर पर नुकसान पहुंचाया था। आज मोदी ने नागरिकों को अधिकार संपन्न बनाने वाले उन कानूनों का क्या हश्र किया है सबको मालूम है। सवाल पूछने पर लोग जेल भेजे जा रहे हैं। मिड डे मील की गुणवत्ता पर खबर लिखने वाले पत्रकारों को पुलिस पीट रही है। मनरेगा पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। प्राइवेट स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के ऐडमिशन पर कोई चर्चा अखबारों में नहीं दिखती। ज़ाहिर है इन अधिकारों के छीने जाने से लोग कमज़ोर हुए हैं, सरकार और उसकी संस्थाओं की जनता के प्रति जवाबदेही कम हुई है। और कमाल देखिये कि नागरिकों से उसके अधिकार छीनने वाले को मजबूत प्रधान मंत्री बताया जा रहा है। दरअसल वो बिल्कुल सही हैं। सामंती ढांचे में सबको दबा कर रखने वाला ही मजबूत माना जाता है।

राहुल गांधी से डर

ऐसी कोई भी घटना या योजना जिससे सामंती ढांचा मजबूत होता है, संघ के लिए मुफीद होता है। नोटबंदी ने अचानक से गरीब और अमीर के रिश्ते के बीच सामाजिक वर्चस्व के पहलू को फिर से सामने ला दिया। गांव देहात में घरेलू कामगारों जिनमें 90 फीसदी लोग दलित और अति पिछड़े हैं उन्हें अपने सवर्ण मालिकों से कर्जा और उधार लेने पर मजबूर कर दिया। यानी एक घोषणा ने अचानक आर्थिक संबंधों के गणित को बदल दिया। उसी तरह कोरोना से टूटे लोग जिस तरह वापस गांव लौटे और फिर से बाहर कमाने जाने से पहले की स्थिति में आ गए उससे भी गांव का संरचना फिर से पहले जैसा हो गया। आप इसे मुंबई, दिल्ली से लौट कर गांव आये कमज़ोर तबक़ों के लोगों के आत्मविश्वास में आई कमी के अंतर से समझ सकते हैं। चूंकि राहुल गांधी शुरू से ही नोटबंदी और कोरोना के मिस मैनेजमेंट से गरीब लोगों के बदहाल किये जाने पर सवाल उठाते रहे हैं। इसलिए संघ उन्हें निशाना बनाता है। उनका गरीबों के साथ खड़े होना और वो भी एक स्पष्ट वैचारिकी के साथ, संघ और उसकी सामंती सोच पर खड़े लोगों को खटकता है।

2019 के लोकसभा चुनाव के प्रचार में मजबूत कही जाने वाली एक जाति के लोगों जो भाजपा के समर्थक थे, से एक गांव में जब मैंने राहुल गांधी के न्याय योजना के बारे में बताया कि इससे हर गरीब परिवार की मुखिया महिला को हर महीने 6 हज़ार यानी साल भर में 72 हज़ार रूपये दिये जायेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया में कहा गया कि तब तो हम लोगों का वोट कांग्रेस को नहीं मिलेगा। उनका कहना था कि मनमोहन सिंह सरकार ने मनरेगा से ‘उन लोगों’ का मन बढ़ा दिया था और अब राहुल उन्हें हर महीने पैसा दे कर फिर मन बढ़ाना चाहते हैं।

यानी इतिहास के इस मोड़ पर कांग्रेस और भाजपा के बीच का संघर्ष सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं है। सत्ता के माध्यम से लोगों को अधिकार देकर मजबूत बनाने और उनसे अधिकार छीन कर उन्हें कमज़ोर बनाने के बीच का संघर्ष है।

याद रखिये जनता को ताक़तवर बनाने वाला शासक हमेशा विनम्र होगा और उन्हें कमज़ोर बनाने वाला हमेशा अकडू।

  शाहनवाज़ आलम

(लेखक अल्पसंख्यक कांग्रेस उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं)

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