जनता अब क्या करे? जब राजनीतिक दल फासिस्ट ताकतों का मुकाबला करने में सक्षम नहीं रह गये हैं

opinion

What should the public do now? When political parties are no longer able to counter fascist forces

जनता अब क्या करे? जब राजनीतिक दल फासिस्ट ताकतों का मुकाबला करने में सक्षम नहीं रह गये हैं। विरोधी राजनीतिक दलों ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, जिसकी वजह से किसी भी राजनीतिक दल की इतनी सर्व स्वीकार्यता नहीं रह गई है कि वह इन नफरतियों से ज्यादा लोगों को एकजुट कर समर्थन हासिल कर सके।

लेकिन सीएए के मुद्दे पर जिस तरह से देश की जनता में जागृति आई है और स्वतःस्फूर्त आंदोलन चला है, उससे यह पक्का है कि सत्ता के खिलाफ एक जनमानस तैयार है, वह कम है या ज्यादा है यह कहना अभी सम्भव नहीं है। लेकिन यह बात मैं गारंटी से कह सकता हूँ कि सीएए के मार्फ़त सत्ता रूढ़ दल ने अपने दक्षिण पंथी सोच के समर्थकों की नफरत को पोषण देकर उनको, और मजबूती, से अपने पक्ष में एकजुट कर लिया है। यद्यपि पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण के कुछ इलाकों में इसका नुकसान इन लोगों को होगा लेकिन कुल जमा फायदा इन्हें सत्ता में बनाये रखने लायक रहता हुआ दिखता है।

अब इस समय जो चुनौती है वह देश के उस स्वरूप को बनाये रखने की है जिससे हिंदुस्तान पहचाना जाता है। इस देश में साम्प्रदायिक दंगे हुये, जातीय उत्पीड़न और शोषण भी हुआ, राष्ट्रद्रोही गतिविधियां भी व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर हुई। लेकिन उनको 2002 से पहले सत्ता का संरक्षण नहीं मिला। देश ने आजादी के बाद युद्ध लड़े, जीते भी – हारे भी पर उन युद्धों का उपयोग चुनाव जीतने के लिये नहीं किया गया।

राजनीतिक विरोधियों को राष्ट्रद्रोही बता देना, असहमतों का पुलिस से उत्पीड़न करना। विरोध प्रदर्शनों को बदनाम करने की साजिश के तहत अपने लोगों को भेज कर राष्ट्रद्रोही नारे लगवाना, हिंसा करवा देना। संविधान की शपथ लेकर मंत्री बने व्यक्ति द्वारा पीड़ितों को धार्मिक आधार पर चिन्हित करना। सत्ता के मुखिया द्वारा सीधे-सीधे “बदला लेने” की धमकी देना। महिलाओं के प्रति होने बाले अपराधों के अपराधियों को भी धर्म के आधार पर ट्रीट करना। यह वह प्रवृत्ति है जो हमें राजनीतिक दृष्टि से फेल कर रही है और सामाजिक दृष्टि से हमें अराजकता की तरफ ले जा रही है।

बढ़ती अराजकता में बचेगा तो कोई नहीं पर अभी कट्टरता की अफीम की पिनक में मस्त लोग इतना समझने को तैयार नहीं है।

तब फिर लौट कर बात वहीं आ जाती है कि हम लोग करें तो क्या करें? इसका हल हमें अपने यहां से ही मिलता है।

राजनीतिक नेतृत्व की दृष्टि से देखें तो पश्चिम बंगाल में ममता दीदी, ओडीसा में नवीन पटनायक, दिल्ली में केजरीवाल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, गुजरात, केरल में कांग्रेस बिहार में लालू/तेजस्वी पर जनता चाहे तो भरोसा कर सकती है पर यूपी, हरियाणा, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश किसके पक्ष में एकजुट हो यह बड़ा सवाल हो जाता है!!

पीयूष रंजन यादव

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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