कोरोना वायरस से लड़ने में एक शल्य चिकित्सीय रणनीति, लॉकडाउन में किस तरह की कसरत करना है?

Corona virus

What type of exercise to do in lockdown, a surgical strategy in fighting the corona virus?

स्वास्थ्य सेवा पर चौतरफा विचार All-round thoughts on healthcare

लेखक: डॉक्टर संजय नागराल- Sanjay Nagral (जनरल सर्जन, हेपेटोपैंक्रैथोबिलरी सर्जरी, मुम्बई- General Surgeon, Hepatopancreatobiliary Surgery, Mumbai)। मूल लेख, 27 मार्च, मुंबई मिरर में छपा है: “ A surgical Strategy to fight Coronavirus”। अनुवाद अनुराग मोदी

यह लेख हाथ धोने, मास्क पहनने, और सोशल डिसटेंसिंग आदि के बारे में नहीं है। इसलिए नहीं कि वो जरूरी नहीं है, बल्कि इसलिए कि अभीतक उसकी तो आपको आदत कर दी गई होगी। जो आप कुछ दिन पहले टीवी में देख रहे थे, वो अब मैं मुम्बई के अस्पताल में घटता देख रहा हूँ। महामारी तेजी से बढ़ रही है। हम घर पर बैठकर, क्या अपने आपको तैयार करने के लिए कुछ कर सकते हैं?

मैं कुछ ऐसे सुझावों के बारे में चर्चा कर रहा हूँ, जो हमें कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तैयार करने में मदद करेगा। यह कोई ईलाज नहीं है बल्कि एक तरह कि मददगार रणनीति है, जिसका वैज्ञानिक आधार है। और, सबसे बड़ी बात है, इसे किसी भी दवाई और उपकरण के बिना घर पर ही अपने से किया जा सकता है। इसे ‘प्रिहेब्लीटेशन’ कहते हैं – यह एक सोच है, जिसका उद्देश्य इन्सान के शरीर को कुछ गतिविधि के जरिए आने वाली बीमारी के लिए तेजी से तैयार करना, जिससे बीमारी के भारी असर को शरीर बेहतर तरीके से झेल सके।

आधुनिक स्वास्थ्य सेवा के अन्य तरीकों की तरह, इसकी शुरुआत भी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई। ढेर सारे आदमी जो ब्रिटिश सेना में भर्ती के लिए आते थे, लेकिन शारीरिक और मानसिक रूप कमजोर होने के कारण उनको सेना में नहीं लिया जाता था। चूंकि, ब्रिटेन एक छोटा सा देश है इसलिए वो बहुत ज्यादा लोगों को इस आधार पर नकार नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने लोगों के शैक्षणिक, शारीरिक और पोषण के स्तर में सुधार के लिए एक प्रोग्राम शुरू किया।

जो 12,000 लोग इस ‘प्रिहेब्लीटेशन’ प्रोग्राम में शामिल हुए, उसमें से 85% लोगों में शारीरिक और मानसिक रूप से सुधार देखा गया। पर्वतारोही भी इसी विधि से किसी भी बड़े अभियान के पहले कुछ हफ्ते तक अपने आपको तैयार करते हैं। यह पर्वतारोही ज्यादा ऊँचाइयों पर ज्यादा टिक पाते हैं।

हाल ही में, इसका स्वास्थ्य सेवा में भी उपयोग होने लगा है। यह अब आधुनिक शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का भी हिस्सा बन गया है।

पूरे विश्व में शल्य प्रक्रियाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, सर्जरी की तकनीक काफी आधुनिक हुई है, लेकिन फिर भी कई तरह जटिलता का सामना करना पड़ता है। खासकर, मधुमेह, हृदय रोग और फेफेड़े के रोग से पीड़ित बूढ़े मरीज की सर्जरी में काफी दिक्कत आती है; और अब भारत में ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है।

What is hepatopancreatobiliary surgery

आप जो भी कहो, सर्जरी से एक तरह से शरीर पर अचानक काफी तनाव पड़ता है, एक हिंसक तनाव। इस सबके चलते सर्जरी के पहले कुछ हफ्तों में मरीज को तैयार करने के लिए ‘प्रिहेब्लीटेशन’ की प्रक्रिया का उपयोग शुरू हुआ। और अब कुछ देशों में यह एक तरह का मानक बना गया है।

इसमें यह बातें शामिल हैं : शारीरिक अनुकूलन और कसरत के जरिए मांस पेशियों को बनाना और हृदय और फेफड़ों की कार्य क्षमता बढ़ाना, पोषक खाना, सिगरेट पीना बंद करना, शुगर लेवल पूरी कड़ाई से सही रखना, फेफड़ों को मजबूत करने के लिए प्राणायाम आदि सांस की कसरत करना और अपने आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाना।

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि इस सब नियमों का तीन-चार हफ्तों तक कड़ाई से पालन करने से सर्जरी में होने वाली कई जटिलता में कमी लाता है, और जिन लोगों को जल्दी कैंसर सर्जरी के जरुरत होती है, उनके लिए इस तकनीक का उपयोग होता है।

इस बात के काफी शोध हैं कि जब आपकी शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है, तब आपकी मांसपेशिया कमजोर हो जाती हैं और आपके हृदय और फेफड़े में भी शिथिलता आती है। और फेफड़ों का संक्रमण (इन्फेक्शन) होने की दशा में, इन दोनों का असर आपके शरीर में आक्सीजन का स्तर बनाए रखने या वेंटीलेटर पर रखने के समय आपकी क्षमता पर पड़ता है।

किस तरह की कसरत करना है?

आप शुरुआत ज्यादा समय बैठे ना रहने से कर सकते हैं। लॉक डाउन के कारण घर में ही चलते रहना, एक जगह खड़े रहकर जॉगिंग करने से लेकर एरोबिक कर सकते हैं। या आप कोई उच्च तीव्रता वाली कसरत कर सकते हैं। डांस करना एक विकल्प हो सकता है। जैसा प्राणायाम में करते हैं, वैसे गहरी सांस लेकर उसे कुछ समय तक सांस रोके रखने की कसरत दिन में अनेक बार कर सकते हैं, इससे फेफड़े मजबूत होंगे।

भारतीय लोगों बीमारी के दौरान कई तरह के भोजन से परहेज करते हैं। भारत में किए गए शोध के अनुसार सर्जरी के लिए आने वाले मरीजों में प्रोटीन की भारी कमी पाई जाती है। और थोड़े समय के लिए पौष्टिक खाना देने से सर्जरी के बेहतर परिणाम आते है। प्रचुर मात्रा में प्रोटीन लेना जरूरी है। मांसाहारी लोगों के लिए अंडा, चिकन, मछली जैसे अनेक विकल्प हैं। शाकाहारी लोग पनीर, अंकुरित अनाज, सोया, दाल, दूदूध आदि एक अच्छा स्रोत है।

मैं अपने ऐसे शाकाहारी मरीज जिन्हें मांसाहार से परहेज नहीं है या जो पहले से ही मांसाहारी है, उन्हें सर्जरी के पहले खूब अंडे और चिकन खाने की सलाह देता हूँ। बाजार में मिलने वाले प्रोटीन पाउडर इसका विकल्प नहीं है।

कुछ और बातें ‘प्रिहेब्लीटेशन’ का हिस्सा है। पहला है, धूम्रपान बंद करना। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सर्जरी के बाद धूम्रपान करने वाले मरीजों को काफी जटिलता का सामना करना पड़ता है। इन लोगों को कोरोना होने पर भी मौत का खतरा है। मधुमेह वालों को अपना शुगर का लेवल सही रखना है – किसी भी बीमारी से लड़ने में सबसे जरूरी बात। अस्थमा पीड़ित लोगों को अपनी दवाई और बाकी चीजों का बराबर ध्यान रखना है।

‘प्रिहेब्लीटेशन’ का संक्रामक महामारी में क्या असर होगा, इसका अभी तक कोई आकलन नहीं किया गया है। हालांकि, यह एक आम समझ और तार्किक भी है और इससे कोई नुकसान भी नहीं होगा। एक हावर्ड प्रोफेसर ने भी इस बात की सलाह दी है, हालांकि अमेरिका में अब देर हो चुकी है।

हालांकि, भारत के पास अभी भी मौका है। सोशल डिसटेंसिंग, क्वारंटाइन और प्रिहेब्लीटेशन सब साथ-साथ हो सकता है। जिन लोगों को बीमारी का खतरा ज्यादा है, यह उनके लिए ठीक है – खासकर ऐसे बूढ़े जिन्हें पहले से कोई बीमारी है।

महामारी का फैलाव रोकने में लॉक डाउन एक महत्वपूर्ण कदम है, मगर ना चाहते हुए भी इसमें लोगों की शारीरिक गतिविधि कम हो जाएगी जिससे से हृदय और फेफड़े में शिथिलता आती है।

मुझे इस बात की गहरी समझ है कि, इसमें से अनेक सलाह का पालन करना आसान नहीं है, खासकर गरीबों के लिए। खासकर पोषण के मामले में, मुख्य रूप से खाने में प्रोटीन, इस मामले में सरकार को लोगों की मदद करना चाहिए।

जैसा मैंने पहले लेखों में भी लिखा है, सरकार को स्वास्थ्य सेवा में बढ़ोतरी करना, इसमें जरूरी राशि उपलब्ध करना, जैसे निर्णायक कार्यवाही करना ईलाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मगर बहुत सारी स्वास्थ्य सबंधी चुनौतियों का सामना बड़े कदम से नहीं, मगर सारे समुदाय के व्यवहार और जीवन शैली में छोटे-छोटे बदलाव से किया गया है।

भारत पहले से ही गैर संक्रामक की बीमारी से स्थाई रूप से पीड़ित है। ‘प्रिहेब्लीटेशन’ एक ऐसी रणनीति जो सिर्फ अभी ही नहीं मगर भविष्य में भी हमारे लिए लाभकारी हो सकती है।

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