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Lalit Surjan

जब बहुत से कांग्रेसी खुलकर या दबे-छिपे भाजपा के मददगार बन गए थे

देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार – 31

अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ ने प्रदेश को चार मुख्यमंत्री दिए- प्रथम मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल, राजा नरेशचंद्र सिंह, श्यामाचरण शुक्ल और मोतीलाल वोरा। इस लिस्ट में रिकॉर्ड के लिए चाहें तो क्रमश: कसडोल व खरसिया से पद ग्रहण के बाद उपचुनाव जीते द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा अर्जुन सिंह के नाम भी जोड़ लें। मुद्दे की बात यह है कि ये सभी कांग्रेसी थे। राजा नरेशचंद्र सिंह एक क्षणिक अपवाद हैं जो संविद से मुख्यमंत्री बने, फिर अपने मातृसंगठन में वापस आ गए। दूसरे ध्रुव पर, जैसा कि मैं पहले भी ज़िक्र कर आया हूं, मालवा ने तीन मुख्यमंत्री दिए- कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सकलेचा व सुंदरलाल पटवा। ये सभी जनसंघी अर्थात वर्तमान के भाजपाई थे।

इसके अलावा एक और तथ्य गौरतलब है। कांग्रेस ने 1993 में ही अगली पीढ़ी को कमान सौंप दी थी, जबकि भाजपा के युवा नेता मंच पर अपने जौहर दिखला पाने की प्रतीक्षा में नेपथ्य में ही रुके हुए थे।

सन् 2003 के विधानसभा चुनावों ने यह दृश्य पूरी तरह बदल दिया। मध्यप्रदेश में सुश्री उमा भारती के रूप में बुंदेलखंड को पहली बार प्रदेश का राजनीतिक नेतृत्व करने का मौका मिला, तो वहीं छत्तीसगढ़ में रमन सिंह को यह अवसर प्राप्त हुआ। भारतीय जनता पार्टी के लिए देश के मध्यांचल में यह पार्टी की बढ़ती स्वीकार्यता सिद्ध करने के साथ-साथ अगली पीढ़ी को आगे लाने का भी समय था।

मेरा यह कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि रमन सरकार बनने के तुरंत बाद प्रदेश में, ख़ासकर शहरी क्षेत्रों में, सामान्य तौर पर ख़ुशी और किसी हद तक राहत का माहौल देखने में आया था। इसका बड़ा कारण तो यही था कि मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी रमन सिंह हर वर्ग के लोगों से सहज भाव से मिलजुल रहे थे और उसमें किसी प्रकार बनावट नज़र नहीं आती थी।

इसके अलावा मुख्यमंत्री निवास हो या मंत्रालय, खुलापन अभी कायम था। विधानसभा में भी कोई ख़ास चौकसी नहीं थी। यह स्थिति कब बदली उसकी चर्चा हम यथासमय करेंगे। फिर चूंकि भाजपा समर्थकों का मुखर तबका शहरों में ही था तो उसने भी अपनी सरकार के पक्ष में वातावरण बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी।

यहां नोट करना आवश्यक होगा कि छत्तीसगढ़ भाजपा में आपसी मतभेदों की कमी नहीं थी तथा मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदार भीतर ही भीतर कसमसा रहे थे लेकिन कैडर आधारित पार्टी होने के कारण असंतोष ऊपर नहीं आ सका।

तीन साल पहले विपक्ष का नेता पद न मिलने से गुस्साए तीसरी बार के विधायक बृजमोहन अग्रवाल ने जो खुला विरोध किया था उसका हश्र सबको पता था। इसी कड़ी में भाजपा सरकार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने में कांग्रेसजनों ने जो भूमिका निभाई उसका भी उल्लेख होना चाहिए।

राज्य में नई सरकार ने काम सम्भाला ही था कि लोकसभा चुनाव सिर पर आ गए। ऐसे नाजुक समय में वी सी शुक्ल ने अप्रत्याशित रूप से भाजपा का दामन थाम लिया। इस बीच और भी बहुत से कांग्रेसी खुलकर या दबे-छिपे भाजपा के मददगार बन गए।

मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा को जल्दी ही एक और बड़ी कामयाबी मिली जब लोकसभा की ग्यारह सीटों में से दस पर उसके उम्मीदवार जीते और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा। इसके बावजूद भीतर और बाहर चुनौतियां कम नहीं थीं। इनका सामना करने के लिए उन्होंने धीरे-धीरे खुद को इस नए रोल के अनुरूप ढालना प्रारंभ किया। इस सिलसिले में एक उल्लेख शायद उचित होगा। मैंने रमन सिंह को उनकी पूर्व भूमिकाओं- विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष- में सदा ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा था जिसे बतरस में आनंद आता था।

मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने जैसे सायास ही अपनी इस आदत को सुधारने की कोशिश की! इसमें सार्वजनिक अवसरों पर तो कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया, लेकिन उनसे मिलने वालों से अलक्षित नहीं रहा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते साथ ही गोया वे बदल जाते थे। वे मुलाकातियों की बात सुनते अवश्य थे, लेकिन हाव-भाव में प्रगट अधीरता और जवाब सकारात्मक होने पर भी शब्दों की मितव्ययिता उनकी नई शैली बन गई थी। कहा जा सकता है कि उनकी जिम्मेवारियां कई गुना बढ़ गईं थीं जिसमें पहले की तरह इत्मीनान से मिलना-जुलना, बातचीत करना संभव नहीं रह गया था! इस एक बदलाव के बावजूद मुख्यमंत्री तक पहुंचना दुष्कर नहीं था। अगले साल-डेढ़ साल तक वे आम जनता के लिए लगभग बेरोकटोक उपलब्ध थे।

इन प्रारंभिक दिनों की ही बात है जब मुख्यमंत्री मायाराम सुरजन फाउंडेशन की वार्षिक गृह पत्रिका स्पर्द्धा के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि बनकर आए। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के विकास पर उनका व्याख्यान तथा जैसी कि परिपाटी थी, श्रोताओं के साथ प्रश्नोत्तर का सत्र भी हुआ। यह एक यादगार कार्यक्रम सिद्ध हुआ क्योंकि उपस्थित प्रबुद्धजनों ने डॉ रमन सिंह को एक बिल्कुल नए रूप में देखा।

अपने लगभग चालीस मिनट के वक्तव्य और उसके पश्चात लगभग उतनी ही देर के प्रश्नोत्तर में उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार और उसके मुखिया पर जम कर कटाक्ष किए लेकिन एक बार भी न तो कांग्रेस पार्टी का और न ही अजीत जोगी का नाम लिया। उनसे ऐसी वाकपटुता, प्रत्युत्पन्नमति और संयमित भाषा प्रयोग की अपेक्षा किसी ने भी नहीं की थी।

एक और प्रसंग का जिक्र मैं करना चाहूंगा।

रायपुर से कोई चालीस किमी दूर सोमनाथ नामक स्थान पर शिवनाथ और खारून नदी का संगम है। यह एक सुरम्य स्थल है जहां पिकनिक मनाने वालों के कारण गंदगी फैली रहती है। भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटैक) में हमने बुद्धिजीवी नागरिकों, छात्रों व एनसीसी के सहयोग से यहां सफाई का बीड़ा उठाया व अभियान प्रारंभ करने के लिए मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। वे निर्धारित समय पर कुछेक मंत्रियों व सांसदों को साथ लेकर आए और फ़ोटो खिंचवाने की औपचारिकता के बाद भी हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करने में जुटे रहे। इस अभियान को वांछित सफलता नहीं मिल सकी तो उसकी वजह कुछ और ही थी जिसकी चर्चा का यह स्थान नहीं है।

मायाराम सुरजन फाउंडेशन के उपरोक्त आयोजन के अलावा एक और प्रसंग स्मरण हो आता है जब मैं डॉ. रमन की वक्तृत्व कला से प्रभावित हुए बिना न रह सका।

साल तो याद नहीं लेकिन तारीख थी 8 सितंबर अर्थात विश्व साक्षरता दिवस। इस कार्यक्रम में वे मुख्य अतिथि थे और मैं अध्यक्षता कर रहा था। प्रदेश के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी राजकमल नायक ने साक्षरता पर एक बेहद सुंदर कविता पोस्टर बनाया था जिसका लोकार्पण होना था। रमन सिंह ने मंच पर धीरे से मुझसे पूछा कि उन्हें क्या बोलना है। यह जानकर भी कि वे शिष्टतावश ऐसा पूछ रहे हैं, मैंने उत्तर दिया कि इसी पोस्टर में लिखी कविता का पाठ कर दीजिए। लोकार्पण व भाषण दोनों काम सध जाएंगे।

उनकी बारी आई तो पहले उन्होंने पोस्टर से तीन-चार लाइनें पढ़ीं और फिर अगले पंद्रह मिनट में उसी कविता को आधार बना प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन आदि को उद्धृत करते हुए अवसर के अनुकूल ऐसा भाषण दिया जिसमें कोई झोल नहीं था।

इन्हीं दिनों एक ऐसा मौका आया जब मुख्यमंत्री ने पुरातत्व के किसी पहलू पर आयोजित एक अखिल भारतीय संगोष्ठी का उद्घाटन करने हेतु सहमति दे दी, लेकिन ऐन वक्त पर उनके बस्तर जाने का प्रोग्राम बन गया। उद्घाटन समय सुबह का था। मुख्यमंत्री के न आने की सूचना पाकर आयोजकगण हताश हो गए थे। उन्होंने मुझसे सहायता चाही। मैंने भी आव देखा न ताव, मुख्यमंत्री निवास जा धमका। सी एम से कहा- अखिल भारतीय स्तर का कार्यक्रम है। आप चलिए, दो शब्द बोल कर दौरे पर निकल जाइए। उन्होंने मेरी बात मान ली। सभा में आए। दूर-दूर से आए प्रतिभागियों से भेंट की, आराम से उद्घाटन भाषण दिया, फिर अगले गंतव्य के लिए विदा ली।

लीक से हटकर अपनी छवि गढ़ने की इच्छा रखते थे डॉ. रमन सिंह

भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली को लेकर कुछ सामान्य धारणाएं बनी हुई हैं। उनमें बड़ी हद तक सच्चाई है, किंतु मेरे अपने अनुभवों पर आधारित उपरोक्त दृष्टांत इस ओर इंगित करते हैं कि डॉ. रमन सिंह लीक से हटकर अपनी छवि गढ़ने की इच्छा रखते थे। पिछले तीन बरसों के दौरान प्रदेश की जनता ने, सही या गलत, जो देखा-समझा उससे अनायास तुलना करने से भी यदि इस छवि निर्माण में सहायता मिली हो तो अचरज की बात नहीं होगी।

कुल मिलाकर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री ने अपनी पहली पारी का प्रारंभ प्रकट रूप से सद्भावना तथा सकारात्मकता के साथ किया। इसे वे कितना निभा सके यह आगे अध्ययन का विषय है।

ललित सुरजन

(अगले सप्ताह जारी)

यह आलेख पूर्व लिखित है। अभी कुछ सप्ताह पूर्ववत इस लेखमाला की कड़ियां देशबन्धु में प्रकाशित होंगी।

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Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

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