जब पं. नेहरू के मंच से कांग्रेस के खिलाफ भाषण देकर एनडी तिवारी बन गए थे विधायक

जब पं. नेहरू के मंच से कांग्रेस के खिलाफ भाषण देकर एनडी तिवारी बन गए थे विधायक

कैसे चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं से मिले बिना, उनसे संवाद किये बिना लोग चुनाव जीत जाते हैं?

कैसे बड़ी-बड़ी रैली, रोड शो, विज्ञापन और आईटी सेल के जरिये चुनाव प्रचार में मतदाताओं से सम्पर्क किये बिना चुनाव नतीजे तय होते हैं?

कैसे होती है कारपोरेट फंडिंग और विदेशी फंडिंग, पार्टियों और उम्मीदवार के करोड़ों के खर्च का क्या हिसाब है? कोई इसका विरोध क्यों नहीं करता?

कैसे पेड समाचार छपते हैं?

चुनावी घोषणा, खैरात और शराब मांस बांटकर, दंगाई रणनीति से चुनाव जीतते हैं लोग?

बदमाश, भ्रष्टाचार में गले तक डूबे, गुंडा, अपराधी के मुकाबले ईमानदार साफ छवि वाले उम्मीदवार के बदले हर मामले में उससे ज्यादा बदमाश, दागी, अपराधी और दंगाई को मैदान में उतरती है पार्टियां?

सड़क, नाली जैसी बुनियादी सुविधाओं के वायदे करके कैसे वायदा पूरा किये बिना एक के बाद एक चुनाव जीत जाते हैं प्रत्याशी?

चुनाव आयोग चुनाव कितना निष्पक्ष बना पाता है?

सड़कों पर चुनाव के दौरान उड़ाए जाने वाले अरबों रुपये कहाँ से आते हैं?

क्या पहले भी राजनेता इस तरह मतदाताओं को हाशिये पर रखकर चुनाव जीत सकते थे?

हमारे जन्म से पहले 1952 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हल्द्वानी में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू चुनाव सभा करने आये थे।

कांग्रेस के प्रत्याशी थे स्वतंत्रता सेनानी श्याम लाल वर्मा जी। पंडित जी ने अपने भाषण में वर्मा जी को जिताने की अपील की।

इसके बाद बोलने का मौका आया वर्मा जी का, जो तुतलाकर बोलते थे। वे तुतलाते रहे तो नेहरू जी उखड़ गए और उनसे माइक छीनकर कहा- मैंने कांग्रेस को वोट देने की अपील की थी, अयोग्य उम्मीदवार को नहीं। कहकर वे चल दिये।

पहली बार चुनाव लड़ने वाले लखनऊ में कानून के छात्र नारायण दत्त तिवारी श्रोताओं में शामिल थे। वे फौरन मंच पर चढ़ गए और माइक पकड़ ली। इतना अच्छा बोले कि कांग्रेस को हराकर वे चुनाव जीत गए।

आज ऐसा सम्भव है?

1967 के आम चुनाव की मुझे याद है। मैं तब कक्षा 6 का छात्र था। काशीपुर विधानसभा सीट से नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के उम्मीदवार थे। केसी पंत लोकसभा उम्मीदवार।

पिताजी पुलिनबाबू कांग्रेस का विरोध कर रहे थे। वे एमएलए के लिए एस एन शर्मा और लोकसभा के लिए अपने मित्र स्वतंत्रता सेनानी रामजी त्रिपाठी का समर्थन करते थे।

नारायण दत्त तिवारी ने बसंतीपुर आकर हमारे घर में डेरा डाल दिया। बोले ,आप चाहे किसी का समर्थन करें, हम तो आपके घर से ही चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने मुझसे नागरिक शास्त्र और राजनीति विज्ञान पर ढेरों बातें की। बसंतीपुर वालों को अपने पक्ष में करने के लिए बार-बार आते रहे। लेकिन बसंतीपुर वालों ने उनको वोट नहीं दिए।

क्या अब कोई राजनेता अपने मतदाताओं की इतनी परवाह करता है? क्यों नहीं करता है?

तिवारी जी हार गए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के गरीब और ईमानदार प्रत्याशी रामदत्त जोशी से। वे भी पिताजी के मित्र थे जैसे तिवारीजी।

पंत जी लोकसभा चुनाव जीते। लेकिन नैनीताल खटीमा सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप भैया ने कांग्रेस को हरा दिया। वे संविद सरकार में मंत्री भी बने।

क्या आज ऐसा सम्भव है?

कहीं से भी कोई गरीब और ईमानदार आदमी विधानसभा लोकसभा की छोड़िए, गांव की प्रधानी का चुनाव भी जीत सकता है?

1952 से आज तक लोकतंत्र कितना मजबूत हुआ चुनाव से और राजनीतिक चेतना का विकास कितना हुआ।

कौन जीतता है, कौन हारता है, चुनावी समीकरण पर करोड़ों पन्ने रंगे जाएंगे।

लेकिन हम इन सवालों का जबाब खोज रहे हैं।

है कोई जवाब आपके पास?

जनता से मतलब नहीं, पैसे और प्रचार के जरिये हम किन्हें चुनते हैं और इससे हमारा और देश का कितना भला होता है तो लोकतंत्र का क्या बनता है?

क्या इस पर संवाद और गहन चिन्तन मनन की जरूरत नहीं है?

पलाश विश्वास

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