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चुनाव में हार का डर लगा तो पब्लिक याद आयी! बड़े-बड़ों की अकड़ ढीली कर देता है चुनाव में हार का डर

When there was a fear of defeat in the election, then the public remembered!

उपचुनाव के ताजा चक्र के नतीजों ने मोदी-शाह की भाजपा की ‘कड़े फैसले’ लेने की तानाशाहीपूर्ण ठसक निकाल दी है। जाहिर है कि ये ‘कड़े फैसले’ आम जनता के लिए ही ‘कड़े’ साबित होने वाले फैसले रहे हैं और ऐसे फैसले लेने की अकड़ के पीछे, जन मानस को मैनिपुलेट करने की अपनी सामर्थ्य पर मौजूदा निजाम का बेपनाह यकीन रहा है।

2019 के चुनाव में मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद तो, अपनी इस सामर्थ्य में मौजूदा निजाम का यकीन इतना बढ़ा है कि उसने आरएसएस के घोषित हिंदुत्ववादी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए, विरोध की आवाजों को न सिर्फ अनसुना करने बल्कि कुचलने के लिए भी, लगभग खुल्लमखुल्ला तानाशाहीपूर्ण तौर-तरीकों का सहारा लिया है।

बढ़ते और मुसलसल विरोध के बावजूद, पहले जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा-370 तथा उसके राज्य के दर्जे का ही ध्वंस, सीएए के जरिए नागरिकता कानून में सांप्रदायिक बदलाव और अब काले कृषि कानूनों को थोपने का हठ, इसी के उदाहरण हैं।

लेकिन, यह मामला सिर्फ इन्हीं प्रसंगों तक सीमित नहीं था, जिनके खिलाफ जारी अंतहीन प्रतिरोध आंदोलनों ने, एक बड़े दायरे में मौजूदा निजाम के जनमत के मैनिपुलेशन के आख्यान के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। एक भिन्न स्तर पर ऐसा ही सिलसिला लगातार गहराते आर्थिक संकट तथा खासतौर पर तेजी से घटते रोजगारों के चलते, मेहनत की रोटी खाने वाले मजदूरों, किसानों, छोटे-छोटे धंधों में लगे लोगों, मध्यवर्गीय कर्मचारियों की बिगड़ती आर्थिक हालत के रूप में सामने आ रहा था।

इन अप्रिय सचाइयों को छुपाने के लिए मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के आखिर तक आते-आते, आंकड़ों को अपने हिसाब से घुमाने की कोशिशें छोड़कर, आंकड़ों को सीधे-सीधे दबाने-दफ्र करने का रास्ता अख्तियार किया था।

महामारी की आपदा में अवसर खोज लिया मोदी सरकार ने

और जब कोरोना महामारी ने जनता की इस आर्थिक दुर्दशा पर, अभूतपूर्व स्वास्थ्य आपदा की तबाही (अभूतपूर्व स्वास्थ्य आपदा की तबाही) और थोप दी, तब भी मोदी सरकार ने जनता की दुर्दशा की परवाह ही नहीं करने की अपनी अकड़ में कोई कमी नहीं होने दी। उल्टे उसने महामारी की आपदा में भी अवसर खोज लिया, पहले अंधाधुंध और बिना किसी तैयारी के तथा नोटबंदी की ही तरह सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर देश भर में मुकम्मल लॉकडॉउन थोपने के जरिए, अपनी असाधारण ‘निर्णायकता’ साबित करने के लिए। और आगे चलकर, महामारी से पैदा हुई अव्यवस्था, दुश्चिंताओं तथा पाबंदियों को अवसर बनाकर, मजदूरविरोधी श्रम संहिताओं और किसान विरोधी नये कृषि कानूनों को सारे विरोध के बावजूद थोपने के जरिए, अपने जनविरोधी तथा कार्पोरेटपरस्त एजेंडा को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए।

इसी क्रम में मोदी निजाम ने एक काम और किया। बढ़ते आर्थिक संकट से, मेहनत की रोटी खाने वाली जनता को कोई राहत दिलाने के बजाए, उसके लिए किसी भी संकट को ही नकारने की अपनी आम नीति को, महामारी का मुकाबला करने के तकाजों के सामने उसने छोड़ा नहीं। उल्टे उसने महामारी के तकाजों के सामने इस नकार को और आगे बढ़ा दिया। न सिर्फ उसने महामारी की स्वास्थ्य चुनौती का मुकाबला करने के लिए करने के लिए, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का विस्तार करने के लिए कोई उल्लेखनीय खर्चे करने से इंकार ही कर दिया बल्कि महामारी की आर्थिक चुनौती (महामारी की आर्थिक चुनौती) और खासतौर पर असंगठित क्षेत्र में रोजगार में लगे श्रम शक्ति के प्रचंड बहुमत की आय तथा जीवन-रक्षा की चुनौती की ओर तो देखना भी मंजूर नहीं किया। इनमें से पहले इंकार का नतीजा, खासतौर पर कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान, लाखों टाली जा सकने वाली मौतों से लेकर, आक्सीजन की कमी के चलते लोगों के सडक़ों पर, गलियों में तड़प-तड़पकर मरने तक के रूप में सामने आया।

और दूसरे इंकार का नतीजा, पहली लहर में लॉकडाउन की घोषणा के फौरन बाद, छोटे-बड़े शहरों से दसियों लाख प्रवासी मजदूरों के अपने गांवों की ओर पांव-पांव उलट-पलायन और शहरों में बचे रह गए मजदूरों के काम व कमाई के अभाव में, जिंदा रहने के लिए, एक वक्त की खिचड़ी के लिए, कई-कई घंटे लंगरों के सामने लाइनों में लगे रहने के दृश्यों रूप में सामने आया।

लॉकडाउन के कई दिन बाद ही मोदी सरकार को 5 किलो अनाज और एक किलो दाल राशन से मुफ्त दिलाने का ध्यान आया और करीब महीने भर बाद यह याद आया कि प्रवासी मजदूरों के पास चूंकि राशन कार्ड ही नहीं हैं, बिना कार्ड के भी यह राशन दिलाया जाए। लेकिन, आम तौर पर मोदी राज ने आम लोगों की सिर्फ इतनी ही मदद करने पर पूर्ण विराम लगा दिया।

मोदी सरकार ने आपदा में जनता को भगवान भरोसे ही छोड़ दिया! (The Modi government left the people in the disaster in God’s faith!

कामबंदी के चलते, आय ही नहीं रहने के मारे लोगों को, प्रति परिवार 8,500 रुपए महीना की सहायता देने की विपक्ष की सर्वसम्मत मांग, मोदी सरकार ने सुनना ही जरूरी नहीं समझा। हां! काश्तकारों के लिए 2,000 रुपए तिमाही की पहले से जारी सहायता को जरूर उसने तत्परता से, कोविड के दौरान घोषित, अपने आर्थिक पैकेज में जोड़ लिया। इसी का नतीजा था कि जहां विकसित देशों ने अपने जीडीपी का 10 फीसद तक, अपने मेहनतकशों को प्रत्यक्ष सहायता देने पर खर्च किया था, मोदी सरकार के तीन-तीन पैकेजों में मुश्किल से जीडीपी का एक फीसद, इस आपदा में जनता को किसी प्रकार की सहायता देने पर खर्च करने का प्रस्ताव किया गया।

यानी इस संकट के बीच मोदी सरकार ने जनता को, शब्दश: भगवान भरोसे ही छोड़ दिया!

लेकिन, मोदी सरकार आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ देती तो फिर भी गनीमत थी। उसने तो इसके ऊपर से संकट की मारी जनता को पैट्रोल, डीजल, रसोई गैस जैसे तेल उत्पादों पर करों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी के जरिए और ज्यादा निचोडऩे का रास्ता अपना लिया।

दरअसल, हर कीमत पर देशी-विदेशी कार्पोरेटों के  मुनाफों को ज्यादा से ज्यादा करने के लिए कसम खाए बैठी मोदी सरकार, लगातार कार्पोरेटों तथा दौलतमंदों को प्रोत्साहन देने के नाम पर, उनकी कमाई तथा दौलत पर कर घटाने में और इससे होने वाली राजस्व में कमी की भरपाई, आम जनता को ज्यादा निचोडऩे वाले अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ाने के जरिए करने में शुरू से ही लगी हुई थी। इसके लिए उसने तेल उत्पादों को दुधारू गाय बना लिया। उसने न सिर्फ तेल के दामों में विश्व बाजार में पिछले दशक के उत्तरार्द्ध में आयी भारी गिरावट का सारा लाभ, करों का हिस्सा बढ़ाकर खुद बटोर लिया बल्कि बाद में जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम ऊपर उठने शुरू हुए, इस बढ़ोतरी का सारा बोझ जनता पर डाल दिया।

मोदी राज में पेट्रोल तथा डीजल के दाम ४० फीसदी बढ़ गए

महामारी के बीच, अपने राजस्व में कमी की भरपाई करने की बदहवास कोशिश में मोदी सरकार ने तेल के जरिए अपनी यह लूट और बेतहाशा बढ़ा दी। यह तब था जबकि तेल की बढ़ी हुई कीमतों की सीधी मार के अलावा, इसके चलते महंगाई में आम बढ़ोतरी की भी भारी मार, पहले ही आय में कमी की मारी जनता पर पड़ रही थी। इसी का नतीजा था कि मोदी राज में न सिर्फ पेट्रोल तथा डीजल के दाम (Petrol and diesel prices increased by 40 percent under Modi Raj), सात साल पहले के मुकाबले 40 फीसद से ज्यादा बढक़र सेंचुरी लगा चुके थे बल्कि उनकी कीमत में करों का हिस्सा भी लगभग चौथाई से बढ़कर, करीब आधा हो गया था।

इस लूट के आकार का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2020-21 में ही केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी की मद में पूरे 3.44 लाख करोड़ रुपए बटोरे थे। जहां कथित रूप से दीवाली गिफ्ट कहकर पैट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में 5 रुपए तथा डीजल पर 10 रुपए की कमी किए जाने के बाद भी, एक लीटर पैट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी की मद में 27.70 रुपए तथा डीजल पर 21.80 रुपए की वसूली की जा रही है, मोदी के राज में ही 2017 में एक्साइज ड्यूटी की ही मद में पैट्रोल पर 19.48 रुपए तथा डीजल पर 15.33 रुपए प्रति लीटर की ही वसूली की जा रही थी।

बहरहाल, 13 राज्यों में फैले तीन लोकसभाई तथा 29 विधानसभाई सीटों के उपचुनाव के नतीजों के धक्के ने, मोदी राज को कोई समस्या ही नहीं होने का प्रचार कर, जनता की दुर्दशा की परवाह ही नहीं करने के अपने हवाई घोड़े से उतरने पर मजबूर कर दिया है

बेशक, ऐसा भी नहीं है कि यह मोदी-शाह की भाजपा के लिए यह पहला ही चुनावी झटका हो। इसके विपरीत, 2019 के बाद से हुए ज्यादातर विधानसभाई चुनावों में उन्हें हार का या कम से कम संसदीय चुनाव के अपने प्रदर्शन से उल्लेखनीय गिरावट का ही, मुंह देखना पड़ा है। पहले चक्र में महाराष्ट्र तथा झारखंड की सरकारें भाजपा के हाथ से निकल गयीं, जबकि हरियाणा में उसे सरकार में रहने के लिए गठजोड़ करना पड़ा। उसके बाद दिल्ली की हार आयी। फिर बिहार में राम-राम कर के सरकार बची। फिर इसी साल के पूर्वाद्र्ध में हुए चार राज्य विधानसभाओं के चुनाव में, सिर्फ असम में ही भाजपा दोबारा सत्ता में आ पायी और वह भी वोटों के बहुत ही मामूली अंतर से।

दूसरी ओर तमिलनाडु में उससे गठबंधन करने वाली एआइएडीएमके सत्ता से बाहर हो गयी; बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा बहुमत के आस-पास भी नहीं पहुंच पायी; और केरल में विधानसभा में उसका खाता फिर से बंद हो गया। इससे पिछली विधानसभा में ही पहली बार उसे नाम के वास्ते प्रवेश मिला था। यानी मोदी-शाह की भाजपा की अजेयता का मिथक होने की भी बस अफवाह ही है।

फिर भी हाल के उपचुनावों के नतीजों के एक खास संदेश ने मोदी राज को हिला दिया। यह संदेश उस उत्तरी भारत से है, जिसमें बढ़त पर मोदी राज टिका है। हिमाचल में, जहां भाजपा सत्ता में है, उसका सूपड़ा साफ हो गया। राजस्थान में, जहां भाजपा सत्ता में नहीं है, वहां भी उसका सूपड़ा साफ हो गया। हरियाणा में, सत्ता में होते हुए भी भाजपा-जजपा गठजोड़, आइएनएलडी के अभय चौटाला को नहीं हरा सकी। यहां तक कि मध्य प्रदेश में जहां भाजपा सत्ता में है, लोकसभा की सीट पर कब्जा बरकरार रखने और विधानसभा की तीन में से दो सीटें जीतने के बावजूद, कांग्रेस के कड़े मुकाबले से भाजपा के पसीने छूट गए। बिहार में भी दोनों सीटें जीत लेने के बावजूद, जदयू को ऐसे ही कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा।

इशारा साफ है। अब उत्तरी भारत में भी जनता को अपने पाले में ही मानकर नहीं चला जा सकता।

ऐसे में किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में, अगले साल के शुरू में होने जा रहे खासतौर पर उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के विधानसभाई चुनाव, मोदी की विदाई की इबारत लिखने की शुरूआत भी कर सकते हैं। इसीलिए, मोदी जी को अचानक तेल का दाम घटाकर जनता को राहत देने की सुध आ गयी। पर वह इसी पर नहीं रुकेंगे।

योगी जी कब्रिस्तान बनाम मंदिर जन्मस्थान पहले ही शुरू कर चुके हैं। शाह साहब उत्तराखंड में याद दिला चुके हैं कि वे लोग तुष्टीकरण को खत्म करने वाले हैं। अब मोदी जी केदारनाथ में हैं। चुनाव में हार का डर बड़े-बड़ों की अकड़ ढीली कर देता है।                                                                     

0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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