दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा : किधर जा रहे कामरेड? 

दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा : किधर जा रहे कामरेड? 

किसान आंदोलन पर फ़ोकस वाट्सअप ग्रुप में जनवादी कवि और साहित्यकार मित्र की फारवर्डेड पोस्ट देखी। पोस्ट के मजमून ने चौंकाया। जाते थे जापान पहुंच गए चीन, समझ गए ना! 

विभिन्न स्रोतों के हवाले से अंग्रेज़ी में लिखी यह पोस्ट नींद की अहमियत और उसकी ज़रूरत, नींद से जुड़े नफे नुकसान वगैरह को विस्तार से सामने रखती है।

आख़िर जनवादी कविवर को इसे पोस्ट करने की क्या ज़रूरत थी? ज़रूरत थी, हड़बडी भी थी। कामरेड सोशल मीडिया पर बने रहना है ना। बस, जैसे भी हो। यह जैसे रिवाज़ बनता जा रहा है कि कहीं से ज्ञान उठाया और फौरन कहीं उगल दिया। स्रोत को परखे, जाने बगैर। कुछ सोचना नहीं कि किस ग्रुप में भेजा जा रहा है, कि उस ग्रुप के सरोकार क्या हैं?

अब किसान आंदोलन का नींद फ़ोकस ज्ञान से क्या लेना देना? यह तो ग्रुप सदस्यों का समय बर्बाद करना हुआ। 

यह सरोकारों के क्षरण का दौर है। इसकी ज़द में अब जनवादी भी शामिल हो रहे हैं, कहें कि सरोकार मुक्त हो रहे हैं। 

ज़िंदगी के सवाल मुंह बाये खड़े हैं, सोने नहीं देते। मकान का किराया, बिजली का बिल, गैस सिलेंडर, बच्चों की फीस, कापी किताब, कपड़ा लत्ता, अम्मा की दवाई, राशन पानी, स्कूटी की किस्त, बीज खाद और सिंचाई, होली दीवाली ईद बकरीद, शादी ब्याह… लंबी लिस्ट है और सब ज़रूरी है, और हाथ बेतरह तंग हैं। नींद कहां से आये? केवल जानकारी या प्रवचन से तो आने से रही। 

आदमी जैसे चकरघिन्नी होता जा रहा है। ऐसा कोई सिलसिला भी नहीं जो दिल दिमाग़ में यह बात चस्पा कर दे कि चकरघिन्नी से आज़ाद होना है तो लड़ना है, इंसानी हैसियत में जीना है तो लड़ना है, लड़ना है और लड़ना है, लड़ने से ही पाना है। चैन की नींद के लिए भी संघर्ष ज़रूरी है। इत्मीनान नहीं तो बेहतर नींद भी नहीं। इत्मीनान  तभी होगा जब इंसान की तरह जीने का सपना पूरा होगा। 

तो नींद पर बात करने का क्या तुक? सपनों या संघर्षों पर बात करें। बात करें इस उलटबांसी पर कि जहां सत्तर फीसदी बच्चों को दूध नसीब नहीं होता वहीं शिवलिंग के दुग्ध स्नान में लाखों लीटर दूध बहा दिया जाता है, कि अनाज के गोदाम लबालब भरे हैं और पेट खाली हैं, प्यासों का हुजूम है और नदियां कहीं ठहर गयी हैं। हौसला जगाते कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो उत्पीड़ित जनता के अधिकतर हिस्से में डर, चुप्पी और नाउम्मीदी का डेरा है। बात करें इस पर कि जनता कैसे जागे। अडानी अंबानी जैसे घाघ लुटेरों और उनके वतनफ़रोश सरपरस्तों की नींद कैसे हराम करे। देखियेगा कि नींद अच्छी आयेगी। 

विकट समय है। आफ़त दर आफ़त है, मुसीबतों का पहाड़ है, हाय हाय है। लेकिन आहें अधिकतर भक्ति की शरण में हैं, जातपात की गिरफ़्त में हैं, हिंदू होने के गर्व में हैं। उसी तरह अधिकतर मुसलमान डर के साये में हैं, मुंह सी कर रखने की आदत डाल चुके हैं, भेड़ हो गए हैं। कहें कि लुटपिट रही अधिकतर जनता कुंभकरणी नींद के हवाले हो गयी है। 

कहना होगा। बहुत सो चुकी जनता।

जीवित रहना है तो उसे नींद से जागना ही होगा। हमारा काम नींद के ख़िलाफ़ हवा बांधना है- लोरियों से या नगाड़ों से, फ़िल्मों से या किताबों से। करवट बदल रही जनता को जाग चुके लोगों के क़िस्से सुनाना है। जागते रहो की लालटेन हमेशा जलाये रखनी है। 

अभी सोने का समय नहीं कामरेड!  

सृजनयोगी आदियोग

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