बोलियों का साहित्य कहाँ गायब हो गया?

बोलियों का साहित्य कहाँ गायब हो गया?

Where did the literature of dialects disappear?

बांग्ला में दो तरह की भाषा प्रचलित रही है। बंकिम चंद्र की तत्सम संस्कृतमुखी बांग्ला (Bankim Chandra’s Tatsam Sanskritmukhi Bangla) और जनभाषा, जो लोग बोलते हैं। बांग्लादेश का समूचा साहित्य लोक संस्कृति में रचे बसे जनपदों की बोलियां हैं। जैसे हम हिंदी के संत साहित्य में पाते हैं। बृज भाषा, अवधी, मैथिली, बुंदेलखंडी आदि।

हिंदी की बोलियां कुछ कवियों की रचनाओं की जमीन है अब भी। लेकिन मैथिली और भोजपुरी की अलग भाषा बतौर विकास को छोड़ दिया जाए तो हिंदी की समृद्ध बोलियां आधुनिक हिंदी गद्य से सिरे से गायब हैं और इसके साथ ही कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, रसखान, बिहारी, जायसी, रैदास जैसा जन साहित्य का भी अवसान हो गया।

कुमाऊँनी, गढ़वाली, राजस्थानी बोलियों का साहित्य जबकि आज भी समृद्ध है।

हिंदी की खड़ी बोली कुलीन भद्रलोक की भाषा हो गई है और इसी के साथ साहित्य संस्कृति में आम जनता की हिस्सेदारी न के बराबर हो गई। पाठक भी लगातार घटते चले गए।

पश्चिम बंगाल की भाषा बांग्लादेश की बोलियों के बदले कोलकाता की कुलीन भद्रलोक भाषा है और बंगाल में लिखा जा रहा सारा साहित्य जनपदों के बदले कोलकाता केंद्रित साहित्य है।

आनंद बाजार और देश पत्रिका में संपादकीय बंकिम की साधु भाषा में लिखी जाती है, जिसका इस्तेमाल बांग्लादेश में नहीं होता।

बंगाल से बाहर बसे 22 राज्यों के विभाजनपीड़ित बंगाली जनपदों की भाषा बोलते हैं। न साधु भाषा और न चलती कोलकाता की भाषा। इनकी बांग्ला साहित्य संस्कृति में कोई पहचान नहीं है।

आज से आनंदबाजार पत्रिका समूह ने बंकिम की तत्सम भाषा को विदाई दे दी, जैसे बंगाल माकपा ने बूढ़ों को इतिहास में डाल दिया।

इसका स्वागत है। लेकिन जनपदों की बोलियों का क्या?

यह सवाल हिंदी भाषा, खासकर सरकारी कामकाज की तत्सम पीड़ित भाषा और जनता से कटे साहित्य के लिए समान रूप से प्रासंगिक है।

पलाश विश्वास

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