एय बे उसूल ज़िंदगी/ फ़ाश कहाँ हुए तुझपे/अब तलक जन्नतों के राज़ …

डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।

एय बे उसूल ज़िंदगी

फ़ाश कहाँ हुए तुझपे

अब तलक जन्नतों के राज़ …

सय्यारों के पार रहते हैं जो

ज़मीन पर हमने तो नहीं देखे

हज़ारों साल से लगी है तू

अपनी पुरज़ोर कोशिशों में …

मगर अब तक

धूल तक ना पा सकी है वहाँ की …

देखा …,

कितने परदों में संभाल रखा है

उन्होंने अपनी हर शय को

और एक तू और तेरा बेछलापन …

एय ज़मीं …..

गैरतें क्या हुयी तेरी ?

हमने तो सयानों से सुना था

बहुत कशिश है तुझमें …

खींचती है सबको तू ….

अपनी तरफ़ कूँ…..

मगर कब से देख रही हूँ

तेरी उकताई-उकताई तबियत ….

तेरे मुँह ज़ोर फ़ैसले ….

तेरी बेपरवाहियाँ …

ना इत्तलाह, ना एलान,

ना कोई मुहर लगे काग़ज़,

सीधा फ़रमान …..

कैसे छाती पर से

उतार-उतार कर उछाले जा रही है

अपनी ही रौनकें

तारों की तरफ़ कूं….

डॉ. कविता अरोरा

Donate to Hastakshep
नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे। OR
उपाध्याय अमलेन्दु:
Related Post
Leave a Comment
Recent Posts
Donate to Hastakshep
नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे। OR
Donations