विश्व की सर्वशक्ति सम्पन्न केंद्र सरकार, राज्य सरकारों में तालमेल का अभाव का जिम्मेदार कौन ?

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केंद्र राज्य सरकारों में तालमेल का अभाव का जिम्मेदार कौन ?

Who is responsible for the lack of coordination among the central state governments?

किसी भी आपात स्थिति या वैश्विक महामारी की स्थिति (Global epidemic situation) में अगर केंद्र और राज्यों में तालमेल का अभाव (Lack of coordination between central and state governments) होता है किसी भी योजना क्रियान्वयन ध्वस्त कर सकता है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार की सारी योजना बिगाड़ रख दी और अब केंद्र सरकार असहाय हो अपना मुंह आईने में देख रही है।

केंद्र और यूपी, दिल्ली तीनों आपस में नहीं जानते हैं क्या ? उत्तर प्रदेश के अकुशल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक ऐलान 1000 बसें यूपी बॉर्डर भेज रहा हूँ, ने कामगारों को घर से निकलने का साहस दिया और ऊपर से आकर दिल्ली के केजरीवाल सारी फैक्ट्रियों के कामगारों को दिल्ली से निकाल कर यूपी सीमा पर छोड़ आने की जिद से विश्व की सर्व शक्ति सम्पन्न बेचारी केंद्र सरकार यह सब होते हुए देखती रह जाती है।

हमें कितनी मासूमियत की बात दिखाई दे रही है कि कैसे केजरीवाल और योगी ने चार दिन के लॉक डाउन को विफल कर भीड़तंत्र में तबदील कर दिया। और कोई भारतीय मीडिया, पैरा मिलिट्री फोर्स कुछ भी नहीं कर पाए क्योंकि केंद्र सरकार का कोई आपातकालीन प्लान था ही नहीं, तो उसका क्रियान्वयन कैसे करते ?

वैसे भी सरकार को यह तो पता है कि केजरीवाल एक आतंकी है, वह अर्बन नक्सली है, बस उसके पास इन सब चुनौतियों से लड़ने का इलाज नहीं है।

पिछले छह-सात साल से हमारी देश की राजनीति में एक नई परंपरा और नई राजनीतिक शब्दावली का विकास हुआ है, जिसमें अगर कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री जी की किसी नीतियों का विरोध करता है वह देशद्रोही है, अगर कोई व्यक्ति गरीबों की बात करता है तो वह अर्बन नक्सली कहलाएगा। जो भी वामपंथी सरकार के खिलाफ बोलता है उसे टुकड़े-टुकड़े गैंग की उपाधि मिलती है। अगर कोई धर्म में व्याप्त पाखंड की बात करे वह तो पक्का धर्मद्रोही, आदि नयी शब्दावली ने देश के मजबूत, सुसंगठित संघीय ढांचे को, बहुदलीय व्यवस्था को और बहुलतावादी राजनीतिक विचारधारा के परस्पर मान्य मतभेदों को आपस मे शत्रुता में ही बदल कर रख दिया है। यही कारण है कि केंद्र और राज्यों में जहां अलग-अलग दलों की सरकार हैं उनके बीच केवल वैमनस्य ही दिख रहा है, सामजंस्य की तो बात ही मत करिए।

बल्कि देखा जाए तो इनकी यह शत्रुता से हमारे देश का ही नुकसान हो रहा है, जिसे जहाँ मौका मिल रहा है वहीं एक दूसरे को रगड़ देने में पीछे नहीं है।

इसीलिए केंद्र के अड़ियल रवैये से अक्सर राज्यों के समन्वय में कमी हर बड़े फैसले में रहती है।

जब तक परस्पर अविश्वास रहेगा, कोई भी योजना चाहे कितनी ही मानवीय हो, जितनी भी उपयोगी हो सफल हो ही नहीं सकती है।

कभी किसी राष्ट्रीय समस्या पर सर्वदलीय बैठक या औपचारिक अनौपचारिक भेंट मुलाकात केंद्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ हुयी है ? शायद नहीं। क्यों ? कभी किसी राष्ट्रीय मसले पर सभी दलों के नेता एक साथ सामने आए हैं ? शायद ही कभी।

केंद्र ने कितने ही अपने अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों, चाहे वह जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 2019 हो, या कश्मीर में लंबे समय तक लॉक डाउन करने की बात हो, या एनआरसी, एनपीआर, सीएए से उपजा व्यापक असंतोष हो, या फिर अब यह कोरोना वैश्विक महामारी के विषय पर केंद्र और राज्य के बीच कोई समन्वय बैठक नहीं हुयी है। क्यों ? क्या इसमें आपको केंद्र सरकार का अहंकार नहीं दिखता है।

ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि भाजपा और अन्य राजनैतिक दलों के बीच अब केवल वैचारिक मनभेद हैं, बल्कि उनमे अब एक ऐसा झगड़ा पनप चुका है जैसे ख़ानदानों के आपस मे पट्टीदारी के झगड़े हो। जब नेताओं में देश ज्यादा अपनी शत्रुता और वैमनस्य का भाव निजी स्तर पर संक्रमित करे तो ऐसी ही समस्याएं आएंगी कि सरकार और विपक्ष, जिसे जहां मौका मिलेगा एक दूसरे को नीचा दिखाने का अवसर नहीं छोड़ेंगे, बल्कि ऐसे अवसर गढ़े भी जाएंगे। इन सब रस्साकशी में सबसे पीड़ित और ठगे जाएंगे हम भारतवासी।

सोचिए अगर ये दिल्ली की भीड़ आनन्द विहार और यूपी बॉर्डर के तरफ ना जाकर अपना रुख लुटियन ज़ोन की ओर कर जाती तो क्या दिल्ली पुलिस उन्हें नहीं रोकती ?

ऐसी स्थिति में एमसीआर समेत लगभग सभी केंद्रीय पुलिस बल की टुकड़ियां लग जातीं और पूरी सरकारी मशीनरी दोनों सरकारों की अब तक व्यवस्था में जुट जाती, क्योंकि चौपट राजा और राजनय की नींद में भारी खलल पड़ जाता। लेकिन इन भेड़ो की जमात को सरकारों की नींद प्यारी है और खुद की जान और नींद में खलल डालने की आदत पड़ चुकी है इसलिए उधर नहीं गई।

उस भेड़ चाल भीड़ को यह भी पता है कि समाधान उधर भी नहीं है क्योंकि उधर बेऔलाद वाले राज कर रहे हैं, उन्हें क्या पता औलाद के भूख प्यास का दर्द क्या होता है। जब कोई समाधान नहीं रहता है तो ये भीड़ अपने गांव घर की तरफ ही निकलती है, क्योंकि आज भी भारत की गरीब जनता अपने को गाँव में ही सुरक्षित महसूस करती है। ये पलायन किसी अमीरी और गरीबी के बंटवारे से कम नहीं है

इस पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं

Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स - इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं

  दिल्ली तेरे पर धिक्कार है।

मानवता की तू गद्दार है।।

तू सिर्फ अपना पेट भरना जानती है,

प्रवासियों को कहां ये पहचानती है,

तभी तो मचता आया

यहां हमेशा ही हाहाकार है,

दिल्ली तेरे पर धिक्कार है।

शुरू से ही मानवता की तू गद्दार है।।

खपरभरणी, मरजाणी,

तू जमा खून की प्यासी है

गरीबों को मारण खातिर बने डायन,

अमीरों की तू बनकर रहे दासी है,

 

युगों युगों से नहीं तेरा उपचार है

यहां की जनता हुई लाचार है

निरंकुश शासकों ने ही किया

हमेशा लोगों पर अत्याचार है,

दिल्ली तेरे पर धिक्कार है।

शुरू से ही मानवता की तू गद्दार है।।

अमित सिंह शिवभक्त नंदी

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