अब तुझे कौन बचाएगा री, डेमोक्रेसी!

अब तुझे कौन बचाएगा री, डेमोक्रेसी!

महाराष्ट्र के बाद अगला नंबर झारखंड (Jharkhand is the next number after Maharashtra)

यह संयोग ही नहीं है कि महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार का तख्तापलट (Coup of Maha Vikas Aghadi (MVA) government in Maharashtra) कराने के बाद, भाजपा की सत्ता में वापसी की तारीख की चर्चा गर्म होते-होते, सोशल मीडिया में ज्यादातर व्यंग्य में, किंतु कई मामलों में गंभीरता से भी यह सवाल पूछा जाना शुरू हो चुका था कि, अगला नंबर किस का है?

इस प्रश्न के उत्तर में ज्यादातर लोग यही आशंका जता रहे थे कि अगला नंबर, झारखंड की शिबू सोरेन सरकार का हो सकता है। बेशक, इस संभावना को लेकर इतने सारे लोगों के सहमत होने का कुछ न कुछ संबंध, शिबू सोरेन सरकार की अपनी आंतरिक कमजोरी को लेकर, लोगों की सही या गलत आम धारणा से भी है।

इसमें एक तत्व प्रभुत्वशाली राजनीतिक पार्टियों द्वारा बनायी गयी और मौजूदा  भाजपा निजाम में और पुख्ता कर दी गयी इस धारणा का भी है कि गठबंधन सरकार, अपनी प्रकृति से ही कमजोर होती है। लेकिन, झारखंड के अगला निशाना बनाए जाने की संभावना की ये विशिष्टताएं अपनी जगह, इस तरह के अनुमान लगाया जाना सबसे बढ़कर, देश की मौजूदा सत्ताधारी पार्टी की एकाधिकारी सत्ता की भूख की पहचान के, एक कॉमनसेंस बन जाने की ओर इशारा करता है।

एकाधिकारी सत्ता की यह भूख, किसी अन्य पार्टी की या गठबंधन की सरकार को आसानी से सहन नहीं कर सकती है। और ऐसी किसी सरकार को तो हरगिज सहन नहीं कर सकती है, जो उसकी सरकार को हटाकर या हराकर बनी हो।

जाहिर है कि महाराष्ट्र की एमवीए सरकार, मोदी-शाह की भाजपा की एकाधिकारी सत्ता की हवस की न तो पहली शिकार है और न आखिरी शिकार होगी। इससे पहले, कर्नाटक की कांग्रेस-जदयू गठबंधन सरकार का और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का इसी प्रकार तख्तापलट कर, वहां चुनाव में भाजपा की हार को, दलबदल के जरिए सरकार बनाने के लिए जीत में तब्दील किया था, जबकि राजस्थान में तख्तापलट के जरिए सरकार में पहुंचने की उसकी कोशिश, कामयाब होते-होते रह गयी थी। चाहें तो इस सूची में गोवा, मणिपुर, मिजोरम आदि, दूसरे कई और ऐसे राज्यों को भी जोड़ सकते हैं, जहां चुनाव में पीछे रह जाने के बावजूद, भाजपा ने राज्यपालों की मदद से सरकार पर कब्जा कर लिया और उसके बाद, अपने डबल इंजन राज के विभिन्न तंत्रों का इस्तेमाल कर के, दलबदल से लेकर छोटी-छोटी पार्टियों को खरीदने तक के जरिए, विधानसभाओं में अपने अल्पमत को बहुमत में भी तब्दील कर लिया।

इस खेल का सबसे नंगा रूप पांच साल पहले के गोवा तथा उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों के चुनाव में देखने को मिला था, जब गोवा में चुनाव में जनता द्वारा बाकायदा ठुकरा दिए जाने और दूसरे नंबर पर पहुंचा दिए जाने के बावजूद, भाजपा ने दोबारा सरकार बनवा ली, जबकि अन्य राज्यों में सरकार बनवाने के जरिए, उसके अल्पमत को बहुमत में बदलने के इंतजामात किए गए।

मोदी के राज के आठ सालों में भाजपा और उसके संघ परिवार ने विपक्षी सरकारों का तख्तापलट कराने और किसी न किसी तरह से सत्ता हथियाने के इस खेल को कला के स्तर पर पहुंचा दिया है।

हैरानी की बात नहीं है कि विरोधियों के बहुमत को अल्पमत में और अपने अल्पमत को बहुमत में बदलने के इस खेल को, खुद भाजपा ने ‘‘आपरेशन कमल’’ के नाम से, जाहिर है कि मीडिया पर अपने लगभग मुकम्मल नियंत्रण के सहारे, एक प्रकार से वैध जनतांत्रिक कार्यनीति के रूप में, काफी हद तक लोक स्वीकृति भी दिला दी है।

इस खेल में भाजपा अगर ज्यादातर सफल हो रही है, तो यह न तो मुख्यत: मोदी की लोकप्रियता का नतीजा है और न अमित शाह की चाणक्य नीति का। यह सबसे बढक़र नतीजा है, उनके ऐसी तमाम संस्थाओं को अपनी टीम में शामिल कर के फाउल खेलने का, जिन पर जनतांत्रिक व्यवस्थाओं का पालन सुनिश्चित करने के जरिए, जनतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी है। और इन तमाम संस्थाओं का अपने साथ मिलकर खेलना सुनिश्चित करना ही, मोदी राज की असली एकाधिकारवादी उपलब्धि है।

जनतंत्र की रक्षा करने वाली इन सभी संस्थाओं की स्वतंत्रता का हरण, मौजूदा राज के एकाधिकारवाद का हासिल भी है और उसका बड़ा हथियार भी।

महाराष्ट्र के ताजातरीन प्रकरण में हमने इन सभी संस्थाओं को, एक वैध बहुमत पर आधारित सरकार के तख्तापलट के खेल में, खुलकर मदद करते देखा है।

याद रहे कि पिछले विधानसभाई चुनाव के बाद, भाजपा महाराष्ट्र में अकेले सबसे बड़ी पार्टी के रूप में चुनकर आने के बाद भी बहुमत के आंकड़े से हालांकि काफी पीछे रह गयी थी, शिव सेना के साथ मिलकर उसे बहुमत मिला था। लेकिन, शिव सेना नेतृत्व के अनुसार, गठजोड़ में ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री पद के बंटवारे के वादे से मुकरते हुए भाजपा ने, बड़ी पार्टी के धोंस के जरिए अपना मुख्यमंत्री मनवाने की कोशिश की और इससे गठजोड़ टूट गया।

इन हालात में शिव सेना के नेतृत्व में, एनसीपी तथा कांग्रेस के साथ, तीन पार्टी गठबंधन की बहुमत की सरकार का विकल्प सामने आया। लेकिन, एमवीए सरकार के बनने से पहले ही, भाजपा ने एनसीपी में विभाजन कराने के जरिए, बहुमत जुटाने का पत्ता चल दिया और केंद्र सरकार के इशारे पर, राज्यपाल कोशियारी ने, एक सुबह लगभग मुंह अंधेरे राजभवन में फडनवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। लेकिन, भाजपा के दुर्भाग्य से शरद पवार ने अपनी पार्टी एनसीपी में अजीत पवार की बगावत को विफल कर दिया। दूसरी ओर, राज्यपाल ने भाजपायी मुख्यमंत्री को खरीद-फरोख्त के जरिए बहुमत जुगाड़ने के लिए काफी समय देना चाहा था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, आखिरकार हाथ के हाथ बहुमत का परीक्षण कराने की नौबत आ गयी और फडनवीस को तीन दिन में ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

याद रहे कि इससे पहले कर्नाटक में भी भाजपा के ही येद्दियुरप्पा को भी करीब-करीब ऐसे ही हालात में मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा था। उस समय येद्दियुरप्पा को भी प्रकटत: अल्पमत में होते हुए भी, मोदी सरकार की कृपा से राजभवन में बैठाए गए राज्यपाल ने मुख्यमंत्री की गद्दी बख्श दी थी।

महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार के बनने के साथ ही भाजपा ने तोड़-फोड़ और राज्यपाल व केंद्र सरकार ने रोड़े अटकाने का खेल शुरू कर दिया। इसी का एक नतीजा, ढाई साल से ज्यादा में विधानसभा का स्पीकर नहीं चुन पाना था, जो अंतत: भाजपा के खेल में मददगार साबित हुआ। उद्धव ठाकरे की अस्वस्थ्यता के दौरान, पहले राज्यसभा तथा फिर विधान परिषद चुनावों में, विधायकों का दलबदल आजमाने के बाद, शिंदे के नेतृत्व में जब शिव सेना विधायकों की बगावत करायी गयी, पहले भाजपा शासित गुजरात तथा फिर भाजपा शासित असम और अंतत: भाजपा शासित गोवा में, इन बागी विधायकों को सुरक्षित व आरामदेह शरण मुहैया करायी गयी।

बागियों के चार्टर्ड विमानों से लाए-ले जाए जाने से लेकर पांच सितारा सुविधाओं तक और चर्चाओं के अनुसार, प्रति विधायक पचास-पचास करोड़ की नकदी तक, सारा इंतजाम राजनीतिक चंदे के मामले में जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली व्यवस्थाओं के ध्वंस के बल पर किया गया।

वास्तव में मोदी राज ने चुनावी बांड के जरिए राजनीतिक भ्रष्टाचार को वैध तथा संस्थागत बनाने के जरिए, भाजपा के हाथों में अकूत पैसा दे दिया है, जिससे चुनाव में वोट से लेकर चुनाव के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों तक, सब कुछ खरीदा जा सकता है।

दूसरी ओर, शिव सेना खेमे में बगावत के नेताओं को खड़ा करने में और उनकी ताकत बढ़ाने में, सीधे केंद्र सरकार से संचालित ईडी जैसी एजेंसियों की अति-सक्रिय भूमिका को भी कम करने नहीं आंकना चाहिए।

बाद में, जब इस बगावत से उद्धव सरकार के लिए साफ तौर पर खतरा नजर आने लगा और दलबदल रोकने से संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत, शिंदे समेत सोलह बागी शिव सेना विधायकों के खिलाफ दलबदल संबंधी धाराओं के अंतर्गत डिप्टी स्पीकर ने नोटिस जारी किया, सुप्रीम कोर्ट ने दो अलग-अलग फैसलों के जरिए ऐसा हस्तक्षेप किया, जो साफ तौर पर दलबदल के खेल को संरक्षण देकर, उद्घव सरकार के तख्तापलट का रास्ता बनाता था। अपने पहले निर्णय के जरिए अदालत ने, दलबदल संबंधी शिकायतों के मामले में उक्त विधायकों के खिलाफ कार्रवाई करने से डिप्टी स्पीकार को दो हफ्ते के लिए रोक दिया। लेकिन, उसी समय इस अदालत ने राज्य सरकार के इस तार्किक आग्रह को नामंजूर कर दिया कि उक्त विधायकों के दलबदल के मामले के फैसले पर जब तक अदालत की रोक है, तब तक सरकार के बहुमत का परीक्षण भी नहीं कराया जाए।

हैरानी की बात नहीं है कि शीर्ष न्यायालय के फैसले के फौरन बाद, भाजपा नेता फड़नवीस ने राज्यपाल से मुलाकात कर, एमवीए सरकार के बहुमत का समर्थन खो देने का दावा कर दिया और बहुमत का परीक्षण कराने की मांग पेश कर दी। राज्यपाल ने भी तुरंत अपने कोविड से उबरने का एलान करते हुए, विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर फौरन शक्ति परीक्षण कराने का एलान कर दिया।

मिलीभगत का यह आलम था कि फडनवीस के राजभवन से निकलते ही, छतीस घंटे बाद विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराए जाने का राज्यपाल का आदेश मीडिया तक पहुंचना भी शुरू हो गया। यह बात दूसरी है कि बाद में इस पर मिलीभगत का ज्यादा शोर मचने पर राजभवन की ओर से उक्त आदेश को फर्जी बताते हुए, उससे खुद को अलग करने की कोशिश भी की गयी, हालांकि अगली सुबह वही आदेश विधिवत दोबारा जारी कर दिया गया।

और शिव सेना के बागी विधायकों पर दलबदल के लिए कार्रवाई के मुद्दे पर फैसले से पहले ही, विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराने की राज्यपाल तथा विपक्ष की इस जल्दबाजी के खिलाफ जब शिव सेना ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, अदालत ने राज्यपाल के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इंकार कर, दलबदल के आरोपी विधायकों के वोट से, सरकार के बहुमत में होने न होने का फैसला होने पर अपनी मोहर लगा दी। यह दूसरी बात है कि उसने बागी विधायकों पर दलबदल के लिए कार्रवाई के मुद्दे को दो हफ्ते की रोक के बाद सुनवाई करने की अपनी बात भी दोहरायी। व्यवहार में यह शीर्ष अदालत द्वारा जो प्रधानत: एक संवैधानिक अदालत है, दलबदलविरोधी कानून को रद्दी की टोकरी में ही डाल देना था।

अचरज नहीं कि इसके बाद, तख्तापलट के इंतजामात मुकम्मल हो गए और दलबदल के जरिए भाजपा के बहुमत जुगाड़ चुके होने को देखते हुए, उद्धव ठाकरे ने विधानसभा में बहुमत की परीक्षा से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

इसके चंद घंटों में ही बागियों के नेता शिंदे तथा फडनवीस, जैसे राज्यपाल से मिलने पहुंचे और राज्यपाल ने हाथ के हाथ सरकार बनाने के लिए बुला लिया और शाम तक शपथग्रहण भी करा दिया, उसकी जैट स्पीड भी चर्चा की हकदार है और जिस तरह मुख्यमंत्री बनते-बनते, फड़नवीस डिप्टी हो गए और शिंदे मुख्यमंत्री बन गए, फिर फटाफट स्पीकर का चुनाव तथा शिंदे सरकार के बहुमत का सत्यापन हो गया, वह भी चर्चा के काबिल है।

लेकिन, असली मुद्दा यह है कि तमाम संवैधानिक संस्थाओं की सत्ताधारियों द्वारा नाकेबंदी किए जाने से, डैमोक्र्रेसी की हालत पुरानी फिल्मों के खलनायक के अड्डे पर घिर गयी हीरोइन जैसी हो गयी है। खलनायक की भूमिका में सर्वाधिकारवादी शासक चुनौती दे रहे हैं–अब तुझे कौन बचाएगा री, डैमोक्रेसी!

याद रहे कि सर्वाधिकारवादी या एकछत्र राज की यह चुनौती, जनतंत्र की तमाम संस्थाओं का अपहरण कर के ज्यादा से ज्यादा एकछत्र राज कायम किए जाने की ही चुनौती नहीं है। जैसा कि महाराष्ट्र के मामले में शिंदे को खड़ाऊं मुख्यमंत्री बनाने और असली सत्ता उसका डिप्टी बनाकर बैठाए गए, फडनवीस के हाथ में थमाने के ‘‘मास्टरस्ट्रोक’’ का स्पष्ट संकेत है, यह सर्वाधिकारवाद, हरेक संभव राजनीतिक विरोध को तबाह करने की मुहिम तक जाता है।

जाहिर है कि शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने का मकसद, शिव सेना को नीचे तक दोफाड़ करना और अगर हो सके तो, ठाकरे परिवार के नेतृत्व को खत्म करने के जरिए, एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में शिव सेना को खत्म ही कर देना है।

शिव सेना के साथ संघ-भाजपा का यह खेल कामयाब होता है या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि ठाकरे परिवार का नेतृत्व इस खेल के रास्ते की बड़ी बाधा साबित होने जा रहा है।

वास्तव में कथित परिवारवादी या डॉयनेस्टिक राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ, मोदी की भाजपा के शोर-शराबे भरे हमले का असली मकसद, अपने एकछत्र राज के प्रतिरोध के इन गढ़ों को ढहाना है।

संघ परिवार के मुंह में यह मांग, राजनीति के जनतांत्रीकरण की मांग हर्गिज नहीं है। यह तो राजनीति के जनतांत्रीकरण के एक नारे को, सर्वाधिकारवाद का हथियार बनाए जाने का ही खेल है। 

राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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