धर्म की उपयोगिता क्या है, यह कौन बतायेगा? यह प्रकृति के हाथों मानव अहंकार का पराभव है

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Who will tell us, what is the usefulness of religion?

If these so-called religious leaders, pundits, mullah-maulvi, preachers, learned writers do not understand their own religious texts and teachings of great men, then stop cheating people in their name.

ईश्वर को कण-कण में व्याप्त बताने वाले सभी लोग आज अपने-अपने भगवान, यहोवा, अहुरमज्द, परमेश्वर, अल्ल्लाह, वाहेगुरु आदि का भरोसा छोड़कर अपने और अपने परिजनों को बचाने की चिंता में पड़े हुए हैं और सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर में बंद हो गये हैं। उनकी सारी तथाकथित आस्था और धार्मिकता आज दांव पर लगी हुई है। सभी पवित्र-पुरुषों यथा―पादरी, मौलवी, ज्ञानी, गुरु, ग्रंथी, पंडे-पुजारी तथा धर्म के धंधेबाज सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है।

चीन के वुहान प्रांत में एक मछली बाजार के निकट स्थित सेना की एक प्रयोगशाला से फैला यह Covid-19 वायरस पूरी दुनिया को इतना भारी पड़ रहा है कि लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो गया है।

इस विश्वव्यापी कोरोना वायरस का कहर ऐसा बरपा है कि हिंदुओं के पुरी, द्वारका, श्रृंगेरी जैसे तमाम बड़े-बड़े तीर्थस्थलों से लेकर यहूदियों, पारसियों, ईसाइयों तथा मुसलमानों के संयुक्त पवित्र नगर यरूशलेम, ईसाइयों का पवित्र नगर वेटिकन सिटी, जैनियों के पालिताण व श्रवणबेलगोला, बौद्धों के बोधगया, मुसलमानों के मक्का-मदीना, सिखों के स्वर्ण मंदिर, शिरड़ी, सिद्धि-विनायक तक सर्वत्र सन्नाटा पसरा हुआ है।

आज शंकराचार्यों का अद्वैतवाद मौन है, पोप का ईश्वर से संवाद फिलहाल बंद है, मुसलमानों का एकेश्वरवाद आदि सब कुछ ठप्प है। पुजारियों की मूर्तिपूजा व अन्य कर्मकांड, पादरियों की प्रेयर, मौलवियों की तकरीर, ग्रंथियों की अरदास सब स्थगित हैं। सारे मठ-मंदिर, पगौडा, विहार व चैत्य, गिरजाघर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि में सुनसानी व्याप्त है। वहां लगने वाली पाखंडियों की भीड़ गायब है क्योंकि उन्हें मालूम हो गया है कि उनका भगवान उनकी मदद को आने वाला नहीं है।

इससे आज हिंदू, यहूदी, पारसी, जैन, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम आदि सभी सम्प्रदाय मृतप्राय और निरर्थक हो गए हैं। क्योंकि इस वैश्विक महामारी ने आज यह साबित कर दिया है कि या तो इनका तथाकथित भगवान, यहोवा, अहुरमज्द, परमेश्वर, अल्ल्लाह, वाहेगुरु आदि का कोई अस्तित्व नहीं है या फिर इन तथाकथित धार्मिकों की पहुंच उस तक नहीं है। दोनों बातों में एक जरूर सत्य है।

इसी से आज सभी संप्रदायों के ठेकेदारों तथा एजेंटों ने अपने ही भयभीत समाज को कोरोना वायरस से असहाय अवस्था में निराधार छोड़ दिया है। इनके धर्माधिकारियों के पास विपत्तिग्रस्त इन्सानों के उद्धार का कोई ऐसा उपाय नहीं है जिसके भरोसे पीड़ित लोग इनकी शरण में जायें।

धर्म और आस्था के नाम पर पाखंड फैलाने वाले कोरोना से भयभीत हुए सभी लोग आज अपने-अपने कथित ईश्वर के साथ ही अनुपयोगी सिद्ध हो गए हैं।

आज कोरोना वायरस के संक्रमण से सारा संसार तड़प रहा है। दुनिया को दोनों विश्वयुद्धों में भी इतना तड़पते हुए नहीं देखा गया था। यह प्रकृति के हाथों मानव अहंकार और तथाकथित भगवान और देवी देवताओं का पराभव है। कोरोना का सामना करने में चढ़ावे-मन्नत वाले सभी देवी-देवता और भगवान सब गायब हो चुके हैं। कोरोना के कारण सब उल्टा ही हो गया है। इससे इनके सभी ठेकेदारों तथा ऐजेंटों को आज यह विश्वास हो चुका है कि किसी मूर्ति की पूजा-अर्चना, अदृश्य शक्ति के आगे सिर झुकाने, मनौती, चादर, चढ़ावे, रोजा-व्रत से महामारी नहीं जाती। इस संकट से केवल वैज्ञानिक ही बचा सकते हैं, जो वायरस को खत्म करने वाले टीके की शोध में जुटे हुए हैं।

धर्म तथा आस्था के नाम पर चलने वाले इस वैश्विक व्यवसाय को करारा झटका लगा है। इससे तथाकथित भगवान के नाम पर दानपेटी में आने वाली रकम में कमी जरूर आई है परन्तु इससे पहले इन अड्डों में इकट्ठा हुई अरबों डॉलर की राशि में से एक फूटी कौड़ी तक पीड़ित लोगों की मदद के लिए बाहर नहीं आई।

पोप फ्रांसिस के ही कोरोना संक्रमित होने की खबर आई थी। उन्हें लेंट रीट्रीट सहित अपने सभी सार्वजनिक कार्यक्रम भी रद्द करने पड़े।

मदीना में पैगम्बर मुहम्मद जहां दफन हुए थे, वहां की तीर्थयात्रा कोरोना के कारण स्थगित की गई है। इस बार हजयात्रा के भी टलने की आशंका है। अनेक मस्जिदों में जुम्मा की नमाज स्थगित की गई है। कुवैत में लोगों से घर में ही इबादत करने का आग्रह किया गया है। मौलवी भी अभी ‘इस्लाम खतरे में है’ की बांग देते हुए नहीं दिखाई पड़ रहे हैं और कोरोना से बचाव के लिए ‘मस्जिद में जाकर दुआ करो’ ऐसा नहीं कह रहे हैं। दुनिया भर के गैर-मुस्लिमों को काफिर बताने वाले इस्लामी रहनुमाओं को अब शायद यह विश्वास हो गया है कि अल्लाह कोरोना वायरस से बचाने नहीं आयेगा। हाथों में कलाश्निकोव तथा इन्सास राइफलें लहराते इस्लाम के रक्षक आइएसआइएस के लड़ाके अब सीरिया व ईराक की सड़कों पर दिखाई नहीं देते।

कोरोना वायरस ने ऐसा कहर बरपाया है कि सभी शक्तिशाली देश मानो निर्जीव हो गए। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी धन व साधनों से सम्पन्न अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, इटली व अन्य यूरोपीय देश लाचार असहाय हो गये हैं। सबकी धौंस, हनक और शक्ति एक ही झटके में जैसे लुप्त हो गई। ये सभी अपने ही देश व घरों में कैद होकर रह गये हैं। बाहर निकलने पर हरदम मौत के आ चिपटने का खतरा सिर पर नंगी तलवार की तरह लटका रहता है।

परमाणु बम तथा इंटरकॉटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइलों, सुपरसोनिक युद्धक बमवर्षकों तथा एक से बढ़कर एक अन्य घातक हथियारों की स्पर्धा में खुद को ही धन्य मानने वाले तथा स्वयं को सुपर पॉवर समझने वाले देश इस कोरोना के सामने लाचार दिखाई पड़ रहे हैं। चंद्रमा पर पांव रखने के बाद मंगल ग्रह की यात्रा की तैयारियों में जुटे अमेरिका को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना पड़ा है। किसी समय पूरी दुनिया पर राज करने वाले ग्रेट ब्रिटेन ने खुद को पूरी तरह बंद कर लिया है।

महारानी एलिजाबेथ और उनके सबसे बड़े बेटे प्रिंस चार्ल्स को उनके राजमहल से अलग रखा गया है क्योंकि प्रिंस चार्ल्स संक्रमित हो गये हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की है। सर्वत्र हड़कंप मचा हुआ है।

What is religion?

क्या कोई तथाकथित धर्मगुरु, पंडित, मुल्ला-मौलवी, उपदेशक, ज्ञानी-ग्रंथी तथा आस्था का धंधा करने वाला व्यक्ति इससे विकराल वैश्विक संकट से कुछ सीख लेगा? क्या वह यह समझने की जरा भी कोशिश करेगा कि वह जिन महापुरुषों या धार्मिक ग्रंथों के नाम पर व्यवसाय कर लोगों के बीच पाखंड फैलाता आया है उसकी सच्चाई क्या है? क्या धर्म विश्व-मानव को जोड़ने का साधन है या फिर यह एक सामाजिक कमजोरी है? जिन्हें भगवान या उनके अवतारी प्रतिनिधि के रूप में राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, यहोवा, अहुरमज्द, ईसा, मुहम्मद या नानक को पूजनीय मानते हैं, उन्होंने धर्म के सम्बंध में क्या कहा है? उन्होंने जिस तात्विक आधार पर ईश्वर या उसकी शक्ति की व्याख्या करने के साथ ही उसे अपने जीवन में धारण करने की आवश्यकता पर जोर दिया क्या हम उसे यथानुरूप समझ सके हैं? क्या हम उनकी मूल शिक्षाओं पर चलने की कोशिश कर रहे हैं? क्या है धर्म?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर हां में हैं तो फिर धर्म के बहाने पांखड की गुंजाइश कैसे निकलती है? इनके बहाने खून-खराबा कैसे हो रहा है? इसे रोकने की कोशिश धर्म के जानकारों द्वारा क्यों नहीं की जाती? क्यों नहीं धर्म के समावेशी स्वरूप को सबके सामने लाकर मतैक्य किया जाता? जो सभी में तात्विक रूप से उभयनिष्ठ है उसे सबकी भलाई के लिए सामने क्यों नहीं लाया जाता?

और, यदि ये तथाकथित धर्मगुरु, पंडित, मुल्ला-मौलवी, उपदेशक, ज्ञानी-ग्रंथी अपने ही धार्मिक ग्रंथों और महापुरुषों की शिक्षाओं को यथानुरूप नहीं समझते तो फिर उनके नाम पर लोगों को ठगना बंद करें।

श्याम सिंह रावत (Shyam Singh Rawat )

26.3.2020

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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