लोकतंत्र में कुछ भी संभव है :  अपने लोकतंत्र को हम क्यों नस्लवादी बनाने पर आमादा हैं?

लोकतंत्र में कुछ भी संभव है : अपने लोकतंत्र को हम क्यों नस्लवादी बनाने पर आमादा हैं?

दूसरे दौर के मतदान में भी आगे भारतीय मूल के “ऋषि सुनक” शायद ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। अंग्रेज, जिन्होंने लगभग 200 वर्ष भारत पर राज किया, अब उन पर भारतीय मूल के एक व्यक्ति की सत्ता होगी।

ऋषि सुनक के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने की खबर वायरल है।

श्रीलंका, इंग्लैंड और फिलीपींस की हाल की घटनाएं बताती हैं कि लोकतंत्र में कुछ भी संभव है।

निरंकुश सत्ता और तानाशाही अक्सर लोकतंत्र की हत्या में सफल हो जाती है, लेकिन जनता की ताकत पलटवार जरूर करती है। जर्मनी और इटली उदाहरण हैं।

फ्रांसीसी क्रांति, इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति, अमेरिका की क्रांति, रूस और चीन की क्रांति के अलावा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास (History of Indian Freedom Struggle) लोकतंत्र और जनता की निरंकुश सत्ता पर जीत की मिसालें हैं।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नस्लवादी घृणा और हिंसा, शुद्धतावाद और रूढ़िवाद का इंग्लैंड में एक हजार साल से पुराना इतिहास है।

अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में नस्लवाद इंग्लैंड से संक्रमित हुई, जहां 11 वीं सदी में कैंटरबरी चर्च के आर्कबिशप की हत्या (Archbishop of Canterbury Church murdered) शुद्धतावादियों ने कर दी थी।

हम इन्हीं नस्ली अंग्रेजों के दो सौ साल तक गुलाम रहे।

सेक्स स्कैंडल की वजह से इस्तीफा देने वाले रूढ़िवादी ब्रिटिश कार्यवाहक प्रधानमंत्री ने अपील की है कि किसी को भी वोट दो, ऋषि सुनक को छोड़कर।

इससे पता चलता है कि ऋषि सुनक कितने प्रबल दावेदार हैं और उन्हें रोकने के लिए रूढ़िवादी नस्ली अंग्रेज कैसे आमादा हैं।

फिर भी अगर ऋषि जीत जाएं तो इंग्लैंड का इतिहास बदल जाएगा और विविधता व बहुलता की जिस विरासत की चर्चा हम करते हैं, हमारे कोहिनूर हीरा की तरह इस विरासत पर भी अंग्रेजों का कब्जा हो जायेगा।

और हम?

आजादी के सत्तर साल बाद अंग्रेजों की हिंसा और घृणा की नस्लवादी विरासत के वारिस हो जाएंगे। लेकिन फिर वही उम्मीद बाकी है कि हर अंधेरी रात की सुबह होती है और निरंकुश सत्ता की हार तय है। जनता जब भी सड़क पर उतर आएगी, अग्निपाखी की तरह जी उठेगा हमारा लोकतंत्र भी।

क्या ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन पाएंगे?

पूरी प्रक्रिया लम्बी है। ऋषि के प्रबल दावेदार बनना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ब्रिटिश जरूर हैं सुनक, लेकिन अंग्रेज नहीं हैं। उनके अलावा भी ब्रिटिश मंत्रिमंडल में कई काले लोग है।

अमेरिका में किसी काले के राष्ट्रपति होने की कल्पना नहीं की जा सकती थी, जहां नस्लवाद इतना प्रबल है। अश्वेत राष्ट्रपति की थीम पर हॉलीवुड ने जरूर फिल्म बनाई थी।

जिस कारण मैं इसे महत्वपूर्ण मानता हूं, वह बल्कि यह है कि शुद्धतावादी नस्ली अंग्रेज भी अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कालों के लिए जगह बना रहे हैं। आज का ब्रिटेन सौ साल पहले का ब्रिटेन नहीं है और न अमेरिका जहां कमला हैरिस उपराष्ट्रपति हैं।

ब्रिटेन का कोई लिखित संविधान नहीं है और न वह गणराज्य है।वहां अब भी वैधानिक राजतंत्र है। कॉमनवेल्थ देशों की अध्यक्ष भी ब्रिटेन की महारानी हैं।

इसके बावजूद लोकतंत्र में विविधता और बहुलता का स्पेस नस्लवादी, साम्राज्यवादी देशों में बन रहा है।

भारत में लिखित संविधान है और भारत लोक गणराज्य भी है। विविधता और बहुलता की हमारी सभ्यता, संस्कृति और जीवनशैली है तो हम क्यों अपने लोकतंत्र को नस्लवादी बनाने पर आमादा हैं?

पलाश विश्वास

पलाश विश्वास के एफबी कमेंट्स का संपादित समुच्चय

Why are we so intent on making our democracy racist?

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