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इतना क्यों चौंकते हैं हम? ये आज़ादी दरअसल गुलामी है, जो आज़ादी की शक्ल में हमें भरमाती है

Why are we so surprised? This freedom is actually slavery,

एक दिन, वन फाइन डे, प्रशांत भूषण दोषी ठहरा दिए गए अवमानना के। हम सब चौंक उठे। एक दिन, ऐसे ही, वॉल स्ट्रीट जर्नल ने फेसबुक पर स्टोरी लिख दी (The Wall Street Journal wrote the story on Facebook), सब चौंक गए। ऐसे ही किसी दिन किसी पत्रकार ने भाजपा के आईटी सेल पर किताब (Book on BJP’s IT cell) लिख कर सबको चौंका दिया। उससे पहले गार्डियन ने अमेरिकी चुनाव में फेसबुक की भूमिका पर स्टोरी (The Guardian’s story on the role of Facebook in the US election) की थी। तब भी हम चौंक गए थे। परंजोय गुहा पूरी किताब लिख चुके हैं इस पर। कोई अचानक एक दिन चौंका हुआ उठता है तो ब्लूटिक की मांग के लिए ट्विटर पर आंदोलन छेड़ देता है। कुछ लोग इन सोशल मीडिया कंपनियों में सामाजिक न्याय (Social justice in social media companies) का नारा उछाल देते हैं।

इन चौंकने के चक्करों में बिना मतलब दोस्तों पर मुकदमा हो जाता है। बैठे-बैठाए।

इतना क्यों चौंकते हैं हम? इतना चोक लेने की क्या ज़रूरत? क्या वाकई हम नहीं जानते कि जहां हम रोज़ दस बार स्खलित होते हैं, वो एक निजी ग्लोबल कंपनी है? बंटाई पर मिले खेत को आप जोत सकते हैं, उससे कुछ पा भी सकते हैं, लेकिन उससे आपका हक नहीं बन जाता ज़मीन पर। वास्तव में, जो अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of expression) की सहूलियत हमें यहां दिखती है उसकी हम जाने कितनी अदृश्य कीमतें चुका रहे होते हैं। ये आज़ादी दरअसल गुलामी है, जो आज़ादी की शक्ल में हमें भरमाती है। फिर वन फाइन डे, हम सब आंदोलित होकर नारा लगाने लग जाते हैं।

थोड़ा ठहर के सोचिए, क्या किसी निजी बहुराष्ट्रीय कंपनी से उसमें सुधार की किसी भी डिमांड का कोई मतलब बनता है, जो हमें मुफ्त में अपनी जगह दिए हुए है और उससे राष्ट्र-राज्यों को हमारी निगरानी करने में मदद कर रही है?

अभिषेक श्रीवास्तव
अभिषेक श्रीवास्तव

इतने नादान तो फिल्म वाले भी नहीं हैं। बीते दशक में आई फिल्मों में “तमाशा” मेरी सबसे पसंदीदा मूवी है। उसमें हीरो जब हिरोइन को पहली बार औपचारिक रूप से रेस्त्रां में ले जाता है, तो हल्की-फुल्की चर्चा के दौरान एक वाक्य बोलता है। याद है? Companies are the new countries and countries are the new companies. आज देश नई कंपनी बन चुके हैं और कंपनियां नए देश। हम और आप एक देश के नहीं, कंपनी के नागरिक हैं। हमारी अभिव्यक्ति को सुगम बनाने वाला यह मंच महज एक निजी ग्लोबल कंपनी नहीं है, एक देश है। पूरा का पूरा देश, जिसकी सेवाएं कंपनी बन चुके देशों की सत्ताएं लेती हैं।

यहां होना, न होना, दोनों के बीच कोई खास फर्क नहीं है। हां, इस माध्यम का चरित्र समझते हुए और बिना समझे हुए यहां होने के बीच थोड़ा फर्क ज़रूर है। ठीक वैसे ही, जैसे हम अपने परिवार, अपने समाज का चरित्र समझते हुए भी उनमें बने रहते हैं। ज़ाहिर है, हम समझते हैं इसीलिए ये भी जानते हैं कि परिवार और समाज में बने रहने के लिए कितना कदम आगे जाना है और कितना पीछे क्योंकि वहां होने और न होने से बड़ा फर्क पड़ता है। वो चेक और बैलेंस यहां गायब हो जाता है। नतीजा, हम आज़ाद होने के भ्रम में इसके गुलाम बनते जाते हैं और इसका पता भी नहीं चलता।

आज़ादी सी दिखने वाली ये गुलामी ही हमें हर बार चौंकने पर मजबूर करती है। चौंका हुआ आदमी कुछ भी करता है। अभी अपने आसपास देखिए, चौंकवाद के उदाहरणों को पकड़िए।

अभिषेक श्रीवास्तव

(अभिषेक श्रीवास्तव की फेसबुकिया टिप्पणी का संपादित रूप)

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