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क्या हिंदुत्व की वजह से घटा है भाजपा में चुम्बकत्व? अब भाजपा को संभलने का वक्त नहीं

क्या है यूपी की राजनीति में ‘खदेड़ा’ का मतलब?

भाजपा पोषित मीडिया कह रही है कि चुनावी भगदड़ शुरू हो चुकी है। ऐसा कहकर योगी सरकार से अब तक तीन कैबिनेट मंत्रियों और 12 विधायकों के इस्तीफे को चुनावी दल-बदल की सामान्य प्रक्रिया (General procedure for electoral defection) बताने की कोशिश गोदी मीडिया कर रहा है। वास्तव में यह भाजपा में भगदड़ नहीं, वह घटना है जो ‘खदेड़ा’ का आधार बनने वाली है। यूपी की सियासत में ‘खदेड़ा’ का मतलब भाजपा को सत्ता से खदेड़ देने का संकल्प है।

पिछड़े वर्ग के नेताओं ने क्यों छोड़ी भाजपा?

जिन नेताओं ने भाजपा छोड़ी है उनका कहना है कि अपनी पार्टी के भीतर दलितों, पिछड़ों, वंचितों के लिए कुछ करने की उम्मीद में वे आए थे। आवाज़ भी उठाई। लेकिन, उनकी बात नहीं सुनी गई। मतलब यह कि पिछड़ों के हित में वे पार्टी छोड़ रहे हैं।

क्या अपना टिकट कटने के डर से छोड़ रहे हैं भाजपा? क्या वजह है लोग छोड़ रहे हैं भाजपा?

ये सभी तीन तरह के तर्कों को देखें तो जो एकदम स्पष्ट बात है वह यह है कि भाजपा छोड़ने वाले नेता (leaders leaving BJP) कम से कम अपनी टिकट कटने के डर से तो पार्टी नहीं छोड़ रहे हैं। यह नहीं माना जा सकता कि स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya), दारा सिंह और धर्म सिंह जैसे कैबिनेट मंत्रियों या फिर अन्य नौ विधायकों की टिकट काटी जा रही थी। संभव है इनमें एक-दो ऐसे लोग हों भी जिनके टिकट कट सकते थे। मगर, दावे से नहीं कह सकते कि ऐसा ही होने वाला था। फिर क्या वजह है? क्यों भाजपा छोड़ने की स्पर्धा दिखने लगी है?

ओबीसी नेताओं को शाह-योगी ने भ्रम में डाल दिया

29 अक्टूबर 2021 को लखनऊ की रैली में अमित शाह ने कहा कि मोदी को फिर से एक बार 2024 में पीएम बनाना है तो 2022 में योगी को एक बार फिर यूपी का सीएम बनाना है। तभी देश का विकास आगे बढ़ेगा। 2017 में ओबीसी वर्ग ने भाजपा का पूरा साथ दिया। तब कहा गया था कि डबल इंजन की सरकार होगी तो सबका विकास होगा। अब ओबीसी जो प्रदेश में 42 प्रतिशत हैं वे कन्फ्यूज हो गये कि डबल इंजन सरकार का नारा मोदी-योगी की युगलबंदी के तौर पर शर्त में क्यों बदल गया? थोपा गया योगी नेतृत्व (Yogi leadership imposed) दोबारा थोप दिया गया जानकर पिछड़े, दलित, वंचित सब में बेचैनी बढ़ गई।

8 जनवरी को 2022 को योगी आदित्यनाथ ने 80 फीसदी साथ होने और 20 फीसदी खिलाफ होने का नारा दे दिया तो इसके भी मायने लगाए जाने लगे। इसमें हिन्दू-मुस्लिम का संदेश तो पढ़ा गया लेकिन पिछड़े, दलित और वंचित तबके के लिए इसके मायने अधिक स्पष्टता से नहीं पढ़े जा सके।

हिंदुत्व की राह से क्यों मायूस हुए पिछड़े-दलित-वंचित? (Why backward-Dalit-Deprived were disappointed with the path of Hindutva?)

योगी आदित्यनाथ के लिए मथुरा और अयोध्या के रूप में जब सुरक्षित सीट खोजी जाने लगी तो यह स्पष्ट हो गया कि भाजपा ने ओबीसी, दलित और पिछड़ों का जितना इस्तेमाल करना था कर लिया और भाजपा अब आगे का रास्ता हिंदुत्व की राह में देख रही है। अब यह तय हो चुका है कि योगी आदित्यनाथ अयोध्या से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। और, यह तय होते-होते यह भी तय हो चुका है कि हिंदुत्व की राह चुनने का खामियाजा (Consequences of choosing the path of Hindutva) भुगतने के लिए भी भाजपा को तैयार रहना होगा। एक के बाद एक हो रहे इस्तीफे इसी हिंदुत्व की राह का विरोध है।

हालांकि भाजपा छोड़ रहे किसी नेता ने यह नहीं कहा है कि वह भाजपा के हिंदुत्व की राह को लेकर नाराज़ हैं लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा है कि पिछड़े, दलितों और वंचितों के लिए जिस उम्मीद के साथ वे भाजपा में जुड़े थे वह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी। आम तौर पर नाराज़गी अपने को केंद्र में रखकर व्यक्त की जाती है दूसरों की चुनी हुई राह पर चुप ही रहा जाता है।

क्यों रूठे नेताओं को मनाने दिल नहीं उतरे भाजपा नेता?

भाजपा छोड़ रहे नेताओं को देखें तो ये लोग वही हैं जिन्हें बहुत मशक्कत के साथ 2017 के चुनाव की तैयारी करते हुए अमित शाह और केशव प्रसाद मौर्य की जोड़ी (Amit Shah and Keshav Prasad Maurya) ने अपनी पार्टी से जोड़ा था। 2022 में भी यही दोनों इस घटना पर प्रतिक्रिया देते दिखे हैं। इनकी भाषा में भाजपा छोड़ने वाले अपने साथियों  के लिए आगाह करने का भाव है। मगर, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्यों अमित शाह-केशव प्रसाद मौर्य इन नेताओं को रोक नहीं पा रहे हैं? क्या केशव प्रसाद मौर्य और अमित शाह की क्षमता क्या घट गई है?

क्या यह यह भाजपा का अंदरूनी संघर्ष है?

यह भाजपा का अंदरूनी संघर्ष (internal struggle within BJP) है जो अमित शाह और केशव प्रसाद मौर्य को अपने से अलग हो रहे नेताओं को बनाए रखने के लिए श्रेष्ठ प्रयास करने से रोक रहा है।

केशव प्रसाद मौर्य 2022 में भी योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को क्यों स्वीकार करें?

केशव प्रसाद मौर्य ने 2017 में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को मन-मसोस कर मान लिया था। मगर, 2022 में भी केशव प्रसाद मौर्य क्यों ऐसा करें? जिस ओबीसी के दम पर भाजपा ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाई उस ओबीसी की ओर से सत्ता में हिस्सेदारी का यह सवाल है जिसे भाजपा नेतृत्व नजरअंदाज कर रहा है। इस पर प्रतिक्रिया होगी और हो रही है। इस प्रतिक्रिया को भाजपा के नेतृत्व का वह धड़ा होने दे रहा है जो योगी आदित्यनाथ से खुश नहीं है।

भाजपा की नाव छोड़ने को अब ब्राह्मण भी हैं तैयार!

भाजपा में एक और प्रतिक्रिया का इंतज़ार है और वह दिखेगी ही। यह प्रतिक्रिया है ब्राह्मणों की भाजपा में उपेक्षा (brahmins neglected in bjp) की। भाजपा में सबसे ज्यादा ब्राह्मण विधायक हैं। मंत्री और उपमंत्री भी हैं। इसके बावजूद ब्राह्मणों की उपेक्षा का सवाल ब्राह्मण समुदाय में है। इससे निबटने के लिए भाजपा ने 18 ब्राह्मण नेताओं की समिति भी बना दी। मगर, एक बार फिर अजय मिश्रा टेनी (Ajay Mishra Teni) को महत्व देने की वजह से ब्राह्मण खुश नहीं हुए। भाजपा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और कद्दावर नेता रीता बहुगुणा जोशी जैसी नेता को वह महत्व नहीं मिला।

योगी राज में क्षत्रियवाद का सबसे बड़ा शिकार ब्राह्मण समुदाय हुआ

योगी राज में क्षत्रियवाद खुलकर हुआ और इसका सबसे ज्यादा शिकार ब्राह्मण समुदाय हुआ।

हिंदुत्व की राह ब्राह्मणों को उपयुक्त लगती है। मगर, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह राह उन्हें अब रास नहीं आ रही है जो ब्राह्मणों से दूरी रखते रहे हैं। इस वजह से भाजपा में ब्राह्मण नेता (Brahmin leader in BJP) भी उसी तरह के तेवर दिखलाने को तैयार बैठे हैं जैसे तेवर ओबीसी नेताओं ने दिखलाए हैं। क्या तब भी यही कहा जाएगा कि पांच साल तक सत्ता की मलाई खाने के बाद चुनाव के वक्त ऐसे नेताओं को ब्राह्मणों का हित याद आ रहा है?

राजनीति में दल छोड़ने-पकड़ने या राजनीति की नई दिशा लेने के इस वक्त को टाइमिंग कहते हैं। चुनाव के वक्त कहीं से निकल कर कहीं जुड़ने की घटनाओं के जरिए राजनीति अपनी राह चुनती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा से सत्ता निकलती हुई दिख रही है। ओबीसी के साथ-साथ ब्राह्मण नेताओं के दल छोड़ने का शुरू होने वाला सिलसिला इसकी पुष्टि कर रहा है। क्या भाजपा में जो चुम्बकत्व घटा है उसकी वजह हिंदुत्व है? भाजपा के लिए अब संभलने का वक्त नहीं रहा।

प्रेम कुमार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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