जस्टिस काटजू ने पत्रकारों को जनरल वी के सिंह द्वारा प्रेस्टिट्यूट्स कहने को अब सही क्यों ठहराया ?

जस्टिस काटजू ने पत्रकारों को जनरल वी के सिंह द्वारा प्रेस्टिट्यूट्स कहने को अब सही क्यों ठहराया ?

कहाँ वोल्टेयर और रूसो और कहाँ भारतीय पत्रकार ? कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली ?

आजकल कई समाचारपत्रों, वेबसाइट और टीवी चैनल पर पत्रकारों द्वारा यही चर्चा चल रही है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से योगी आदित्यनाथ हटाए जाएंगे कि नहीं, अरविन्द कुमार शर्मा, जो मोदीजी के बहुत क़रीबी माने जाते हैं, को योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में किसी बड़े पद पर आने देंगे कि नहीं, २०२२ के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बीजेपी जीतेगी कि हारेगी, आदि ?

यह सब भारतीय पत्रकारों की अल्पबुद्धि और सतही ज्ञान को प्रदर्शित करती हैI

हर राजनैतिक व्यवस्था और हर राजनैतिक कार्य की एक ही परख और कसौटी होती है, और वह है कि क्या उससे आम आदमी का जीवन स्तर बढ़ रहा कि नहीं, क्या उससे आम आदमी को बेहतर ज़िन्दगी मिल रही है कि नहीं, क्या ग़ुरबत बेरोज़गारी महंगाई, कुपोषण, स्वास्थ्य लाभ और अच्छी शिक्षा की कमी, दूर हो रही है कि नहीं ?

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो क्या फर्क पड़ेगा यदि योगी आदित्यनाथ मुख्य मंत्री पद पर बने रहें या हटाएँ जाएँ, अरविन्द कुमार शर्मा उत्तर प्रदेश के किसी बड़े पद पर आएं या न आएं, बीजेपी चुनाव में हारे या जीते ?ऐसा परिवर्तन हो भी जाए तो भी आम आदमी की ज़िन्दगी पर इसका क्या असर होगा ? कुछ भी नहीं I

ग़रीबी, बेरोज़गारी, महंगाई, कुपोषण, किसानों पर संकट, आदि वैसे के वैसे ही बने रहेंगेI तो फिर जिन बातों पर हमारे ‘बुद्दिजीवी’ पत्रकार हो हल्ला मचा रहे हैं उनका क्या महत्त्व ? जनता के असल मुद्दों और असल समस्याओं पर चर्चा करने के बजाये इन हलकी और तुच्छ विषयों पर क्यों कर रहे हैं जिनके आम आदमी के जीवन से कोई सरोकार नहीं ?

वास्तव में हमारे पत्रकार सतही और अल्प बुद्धि के हैं परन्तु वह दिखावा करते हैं कि वह ब्रह्मा जैसे परमज्ञानी हैंI दुर्भाग्यवश हमारी जनता का मानसिक स्तर इतना पिछड़ा है कि वह इन ढोंगियों के चक्कर में आ जाते हैं और उनके वेबसाइट या यूट्यूब चैनल के फॉलोवर्स बन जाते हैं ( एक पत्रकार ने हाल में कहा कि उसके १० लाख यूट्यूब चैनल के फॉलोवर्स हैं ) I इन पत्रकारों को वास्तव में इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि का सतही और छिछोरा ज्ञान है, पर वह पाखण्ड करते हैं कि वह सर्वज्ञ हैं और दुनिया भर के हर विषय पर अपने ज्ञान का बखान करते हैंI

गोदी मीडिया की तो बात करना ही फ़िज़ूल है, पर तथाकथित ‘स्वतंत्र’ मीडिया का क्या हाल है ? इनमें कई  पत्रकार तो कई वर्ष गोदी मीडिया में ही उच्च पद पर थे, पर जब किन्हीं कारणवश वहाँ से निकाले गए एकाएक ‘स्वतंत्र’ और ‘ईमानदार’ हो गएI

एक साहेब मीडिया के जगत से राजनीति में कूद पड़े, शायद यह सोच कर कि शीघ्र ही संसद सदस्य या मंत्री बनेंगे, पर जब दाल नहीं गली और उनको राज्य सभा का टिकट नहीं मिला तो पुनः कूद के मीडिया के जगत में आ गएI

एक महिला पत्रकार हैं, जो कांग्रेस पार्टी की बड़ी क़रीब मानी जाती थींI वह नीरा राडिया काण्ड में लिप्त थीं और केंद्र सरकार के मंत्रालय बांटती थीं, और कई वारदातों में उनकी भूमिका संदेहात्मक थीI जब कांग्रेस का पलटा पलट गया वह विलाप करने लगीं, पर अब बड़ी ज़ोर शोर से अपनी वेबसाइट शुरू करके फिर पत्रकारिता जगत में कूद पड़ींI

हकीकत यह है कि भारत के पत्रकारों का काम है जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाकर नगण्य तुच्छ मुद्दों ( जैसे फ़िल्मी कलाकारों का जीवन और उनके घोटाले, क्रिकेट, हमारी घटिया राजनीति,आदि ) की और मोड़ देना, ताकि जनता बेवक़ूफ़ बनी रहे और अपनी वास्तविक आज़ादी ( जो आर्थिक सामाजिक आज़ादी होती है ) के लिए ऐतिहासिक जनसंघर्ष और जनक्रांति न कर सकेI

इन पत्रकारों को जनरल वी के सिंह ने सही ही प्रेस्टिट्यूट्स  ( presstitutes ) कहा I

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।

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