हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, आज कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ?

हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, आज कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ?

यह पोस्ट अपने अग्रज, समाजवादी चिंतक, ITM  विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलाधिपति भाई Rama Shankar Singh के लिए है। कल उन्होंने पूछा था –

“बाक़ी सब ठीकई है जो है सो हइयै पर चंचल जी यह बताया जाये कि ४७ के बाद से लगातार २०१४ तक   कांग्रेस ने अपने उन विपक्षी सत्याग्रहियों के साथ भयानक दुर्व्यवहार क्यों किया जिनकी शानदार भूमिका आज़ादी की लड़ाई में थी।”

यह सवाल अलग-अलग तरीक़ों, अलग-अलग ज़ुबानो में अलग-अलग मौक़ों पर हमसे पूछा जाता रहा है। 

 रमा भाई हमारे शुभेक्षु हैं, उनका प्यार दुलार हम लोंगो को मिलता रहा है, सो उन्होंने बहुत बचाते हुए यह सवाल उठाया। रमा भाई ने यह सवाल प्रियंका गांधी की गिरफ़्तारी पर लिखे गए हमारे पोस्ट पर की है।

रमा भाई की इसी टिप्पणी के नीचे एक साहब और हैं, मनीष जी, उन्होंने सीधे-सीधे हमसे हमारी क़ीमत ही पूछ लिया – कांग्रेस ने कितने में ख़रीदा है ? यह सवाल दो मायने में दुरुस्त है एक – एक तरफ़ जब एक पूरा तंत्र कांग्रेस का इतिहास मिटाने पर तुला है, कांग्रेस के पास कोई जवाब देने वाला नहीं है ? ये कांग्रेसी अपना इतिहास तक नहीं जानता, कमबख़्त सालों साल बैठ कर मलाई खा रहा है और जब ऊँघता है तो पूछता है – कांग्रेस ने हमें दिया क्या ?

2012 से कांग्रेस का बचाव कर  रहे हो, ग़लीज़ गालियों के बीच से गुजरना पड़ रहा है तुम्हें मिला क्या है ?

हमने पहले हिस्से का जवाब नहीं दिया और सच बात है की हमारे पास उसका जवाब  है भी  नहीं, क़ि कांग्रेसी चुप क्यों रहता है ? दूसरे खंड का जवाब दिया है – हाँ हमें मिला है कांग्रेस से। “खुद मुखतारी “। मतलब आज़ादी। आज़ादी का वो मतलब नहीं, जो तुम आसानी से समझ बैठे हो – विदेशी  हुकूमत को हटा कर देसी सरकार बनाना। आज़ादी का मतलब मुकम्मिल आज़ादी। शोषण और दबाव मुक्त माहौल। हम ही उत्पादक हो, हम ही उपभोक्ता हों, बीच में कोई बिचौलिया न हो।

गांधी विचार की लम्बी यात्रा में केवल  निर्गुन आंदोलन नहीं रहा है, क्रांतिकारी रचनात्मक आंदोलन को कांग्रेस ने ढोया है। ( इस कांग्रेस में राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल या राज गोपालाचारी नहीं  रहे, इसी कांग्रेस में  बाचा खान, पंडित नेहरु, सुभाष चंद बोस   डॉक्टर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, सुचेता कृपलानी भी हैं ) अंग्रेजों भारत छोड़ो, के साथ चरखा भी चला है, मैकाले की  कलम घिस्सू शिक्षा नीति का बहिष्कार ही नहीं हुआ है, काशी विद्यापीठ,   जामिया मिल्लिया इसलामिया  जैसे संस्थानों के निर्माण के लिए कांग्रेस ने भीख माँग कर नयी पीढ़ी का निर्माण किया है।

हज़ारों हज़ार साल से अछूत बना कर समाज के एक  बड़े हिस्से को बाहर फेंक दिया गया था, उसे कांग्रेस ने  उसे ऊपर उठाया है। बग़ैर तस्वीर चिपकाए मासूम बच्चों को कलम के साथ तकली भी पकड़ाया है। मित्र ! यह सब हमें मुफ़्त में मिला है, ख़रीदना नहीं पड़ा है, न लड़ना पड़ा है। कांग्रेस ने कोई एहसान भी नहीं  जताया  क़ि “यह मुफ़्त“ में दे रहा हूँ।

यह रही हमारी तस्वीर। उस कांग्रेस को नहीं मालूम था क़ि  “फ़र्ज़ “ और  “कर्तव्य“ को फ़्री फंड बोल कर ग़ुलाम भी बनाया जा सकता है।

जी हाँ कांग्रेस ने ख़रीदा है और हम और क़ीमत की लालच में एक लबार के पीछे भागे जा रहे हैं। और कांग्रेस के साथ वाले से सवाल पूछा जा रहा है, कांग्रेस ने दिया क्या है ? 

हम रमा भाई के गम्भीर सवाल पर आते हैं।

रमा भाई का इशारा है कांग्रेस और समाजवादियों के बीच का रिश्ता वह भी 1947 से 2014 के बीच। कांग्रेस का सत्याग्रहियों के साथ भयानक दुर्व्यवहार क्यों किया, जिनकी आज़ादी की लड़ाई में शानदार भूमिका थी ? “

रमा भाई के बहाने से हम अपने उन तमाम शुभेक्षुओं से मुख़ातिब हैं जो अक्सर हमसे पूछते हैं ताउम्र ( वही आप वाली सीमा रेखा, रमा भाई !) 2014 तक तुम कांग्रेस के विरोध में रहे, मार खाते रहे, जेल जाते रहे अचानक कांग्रेस के समर्थन में कैसे आ गये ? यानी कांग्रेस और समाजवादियों के बीच का रिश्ता ? इस सवाल को हल करने के लिए हम इसी भारतीय ज़मीन से निकली, सबसे पुरानी और सबसे ज़्यादा प्रचलित कहानी का तीनों मशहूर हिस्सा दे  रहे हैं। 

मूल कहानी है- कछुआ और ख़रगोश के बीच दौड़ की प्रतियोगिता में ख़रगोश अपनी जीत पर आश्वस्त है, रास्ते में सो जाता है, जीतता कछुआ है।    

पाकिस्तान के मशहूर  व्यंग्यकार इब्ने इंशा लिखते हैं – कछुआ जब गंतव्य तक पहुँचा तो उसने देखा – पत्थर के एक टीले पर एक ख़रगोश का बच्चा बैठा, टुकुर-टुकुर ताक रहा है। कछुए ने ख़रगोश से पूछा – बच्चे ! तुमने किसी ख़रगोश को इधर आते देखा है ? हमसे दौड़ने की बाज़ी लगा रखा है। ख़रगोश का बच्चा मुस्कुराया –  वो मेरे दादा थे, पिता जी को जो समझा के गये, मरते  समय पिता जी ने वही बताया  कि  –  एक दिन एक ख़रगोश यहाँ आएगा, उसका कान काट लेना और बता देना कि तुम हार गये हो। इतना सुनते ही ख़रगोश ने अपनी गरदन  खोल में डाल ली और आज तक अपने खोल में छिपा बैठा है।

तीसरा  वर्जन डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन का है – लिखते हैं – नदी के किनारे एक वृद्ध कछुआ मुद्दतों से वही एक जगह पड़ा कराहता रहता है। गरदन  निकालता है, नदी के किनारे की झाड़ी को देखता है। दो बूँद आंसू गिरा कर फिर अपनी खोल में चला जाता है। रोने और चुप पड़े रहने का सबब पूछने पर उसने बताया – कछुआ और ख़रगोश में बाज़ी लग गई और दौड़ शुरू हुई।  ख़रगोश ने कुलाँच भरा ही था कि एक झबरा  कुत्ता झपट्टा मारा और ख़रगोश की गरदन मरोड़ कर, लहूलुहान कर दिया और  जबड़े  में फँसाए उसे लेकर अपने मालिक के पास  चला गया। आज भी वह कछुआ वहीं है। ख़रगोश का नाती-कभी कभी उस झाड़ी में दिख जाता है।

रमा भाई ! कांग्रेस और समाजवादी के बीच यही रिश्ता रहा। अलग-अलग भाष्य, अलग-अलग तेवर। आज देखें तो तीनों वर्जन सही लगते हैं। दोनों के बीच मात्र “गति“ की प्रतिस्पर्धा रही।

पहला समाजवादी सुभाष चंद बोस और बापू के बीच। केवल गति को लेकर जिच है। उद्देश्य दोनों का एक है। सुभाष चंद बोस ने हिंसक क्रांति को ज़्यादा गतिशील समझा, गांधी जी ने अहिंसक क्रांति के ज़रिए आने वाली सत्ता में  मज़बूती और स्थायित्व देखा। कालांतर में नेता जी ने स्वीकारा भी। 

समाजवादी निकले, अपना बड़ा हिस्सा वही, छोड़ कर। कांग्रस और समाजवादी  सिद्धांत या नीतियों में कोई फ़र्क़ नहीं है अगर कोई जिच रही तो गति को लेकर। 

बहरहाल हम या हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, कांग्रेस के कार्यकाल में, आज वे कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ? केवल एक बड़ी  वजह है –  सवाल उठना बंद हो जाएगा। राजनीति तिजोरी के हवाले हो जाएगी। मुल्क बंदूक़ के साये में हाँफेगा।

कांग्रेस केवल सत्ता नहीं थी, पीढ़ियों को राजनीति के दायरे में खड़ा किया।

रमा भाई ! 77 के बाद एक माम नहीं उठा, जिसे  राजनीति ने उठाया हो। कांग्रेस के साथ तो हम अपने स्वार्थ के लिए हैं और हमारा स्वार्थ है – कल कांग्रेस सत्ता में आ जाय, हम फिर सड़क पर तखती लिए खड़े मिलेंगे – “जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।“ एवज़ में लाठी चार्ज होगा, पानी के फव्वारे फेंके जाएंगे, आंसू गैस के गोले फेंके जाएंगे, जेल की तनहाई मिलेगी। सरकार बताएगी नहीं क़ि ये देशद्रोही हैं, ये टुकड़े-टुकड़े गैंग हैं, आंदोलनजीवी हैं, अर्बन नक्सल हैं। इसकी जगह सरकार पूछेगी – कौन हैं ये लोग ? इनकी माँग क्या है ? इन्हें रिहा किया जाय, बात चीत का न्योता दो।

बुलडोज़र नहीं रमा भाई !

हम ख़ौफ़ में हैं, हमारी एक पीढ़ी बधिया हो चुकी है। “न“ बोलना बंद हो गया है। बाक़ी कल 

Chanchal BHu

वरिष्ठ पत्रकार, समाजवादी चिंतक और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष चंचल जी की फेसबुक टिप्पणी साभार

भाजपा के लिए नई मुसीबत नीतीश-तेजस्वी! | hastakshep | हस्तक्षेप | उनकी ख़बरें जो ख़बर नहीं बनते

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner