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समाजवाद और पंथनिरपेक्ष शब्द से संघ को दिक्कत क्यों है?

संविधान की आत्मा हैं समाजवाद और पंथनिरपेक्ष शब्द

Why does the RSS have problems with the words socialism and secularism?

उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक कांग्रेस ने प्रदेश में तीन जनवरी को संविधान में किए गए बयालीसवें संशोधन- 42nd amendment made in the constitution (जिसमें संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और पंथनिरपेक्ष शब्दों को जोड़ा गया था) को आम जनता के बीच ले जाने, इसका महत्व बताने और कई कार्यक्रम करने का फैसला किया है। इसके तहत पूरे प्रदेश में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

समीक्षक इस फैसले को जहां कांग्रेस द्वारा अपनी गौरवपूर्ण विरासत और जनपक्षधर नीतियों की तरफ वापसी की राह मान रहे हैं वहीं पार्टी नेताओं का कहना है कि इस किस्म के आयोजनों से आम जनता से संपर्क बनाने, संविधान के असल मकसद को समझाने, नागरिकता बोध जगाने में मदद मिलती है।

इस कार्यक्रम के आयोजन को लेकर राजनैतिक हलकों में माना जा रहा है कि इसके तहत कांग्रेस पार्टी अपने पुरखों के सपनों का देश बनाने की अपनी उस प्रतिबद्धता को दोहरा रही है जिसका आधार राजकीय समाजवाद (State socialism) था। ऐसे आयोजन के बहाने प्रदेश के अल्पसंख्यक समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि संविधान की मूल भावना, जो सभी धर्मों का आदर करते हुए देश में गरीब समुदाय को प्राथमिकता देने की नीति पर कांग्रेस लौट रही है और उसका एजेंडा दक्षिणपंथ को नकारते हुए देश के गरीबों को राज्य के संसाधनों में सम्मानजनक हिस्सेदारी देना पहिला प्रयास होगा।

42वां संविधान संशोधन कब हुआ? | 42 वें संविधान संशोधन में क्या जोड़ा गया?

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा तीन जनवरी 1976 को भारतीय संविधान की प्रस्तावना में बयालीसवें संविधान संशोधन (42nd Constitution Amendment) द्वारा समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द को जोड़ा गया था। हालांकि संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए इन दो शब्दों के खिलाफ देश की हिंदुत्ववादी राजनीति को सबसे ज्यादा दिक्कत होती रही है। नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद संघ के लोगों (Rashtriya Swayamsevak Sangh) द्वारा इन दो शब्दों पर सबसे ज्यादा बहस की गयी है। भाजपा सांसद राकेश सिन्हा तो इस शब्द को संविधान से बाहर करने का प्रस्ताव तक संसद में ला चुके हैं।

लेकिन यहां सवाल यह है कि आखिर इन दो शब्दों में ऐसा क्या है कि इस देश की दक्षिणपंथी राजनीति इन्हें संविधान से बाहर करना चाहती है। आखिर अपने एजेंडे को पूरा करने में यह दो शब्द उन्हें बाधक क्यों दिखते हैं?

Both these words, Socialism and secular, are a philosophy showing the governance system of the state.

दरअसल यह दोनों शब्द सिर्फ शब्द न होकर राज्य की शासन प्रणाली को आईना दिखाने वाला एक दर्शन हैं जो उसकी समूची नीतियों की दिशा को न केवल तय करते हैं बल्कि इन्हीं के आधार पर राज्य की नीतियों का मूल्यांकन भी होता है। दरअसल यह दोनों शब्द भारत के भविष्य का खाका और उसका अंतिम लक्ष्य हैं।

भारत जैसे देश में जहां गरीबी भयावह स्तर पर है, वहां ’समाजवाद’ शब्द राज्य को यह लगातार स्मरण कराने का एक मजबूत संकेत है कि देश के इन गरीबों को प्राकृतिक संसाधनों पर उचित और न्यायपूर्ण हिस्सेदारी मिलनी ही चाहिए। वहीं पंथनिरपेक्ष शब्द राज्य को लगातार यह स्मरण कराता रहता है कि उसकी निगाह में सभी धर्मों के अनुयायी समान हैं। किसी भी नागरिक का उत्पीड़न धर्म की पहिचान के आधार पर कतई नहीं होना चाहिए। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और वह किसी भी स्तर पर अपने नागरिकों से धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है।

एक तरह से हम कह सकते हैं कि यह दोनों शब्द सामूहिक तौर पर राष्ट्रराज्य की विकासमान चेतना और उसके अंतिम लक्ष्य को निर्धारित करने वाले स्तंभ हैं।

यह दो शब्द राज्य को लगातार यह बताते रहते हैं कि उसका अंतिम उद्देश्य इस देश के गरीबों को उनका हक देना-दिलाना और सभी धर्मों के लोगों को अवसर, कानून और विकास में समान भागीदारी सुनिश्चित करना है।

लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाए संघ इन दोनों शब्दों को संविधान से बाहर करने पर क्यों तुला है? इसके पीछे कैसी राजनीति काम कर रही है?

दरअसल संघ जिस राजनीति में यकीन करता है वहां इन दोनों शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है। आज नरेन्द्र मोदी की समस्त नीतियां इन दोनों शब्दों के खिलाफ काम कर रही हैं। देश के प्राकृतिक संसाधनों को मामूली कीमतों पर पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है। देश में लगातार गरीबी बढ़ रही है। भयानक बेरोजगारी है। गरीब और गरीब होता जा रहा है अमीरों की संपत्ति बेलगाम बढ़ रही है। लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार के पास गरीबों के लिए समय ही नहीं है। वह हिंदुत्व के एजेंडे को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं जो सिर्फ फासीवाद और गरीब विरोधी पूंजीवादी दर्शन है।

जहां तक पंथनिरपेक्ष शब्द की बात है नरेन्द्र मोदी के समय में हिंदू चरम पंथ ने अपनी वैधता का विस्तार संसद तक किया है। एक तरफ मालेगांव की ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा को हिंदुत्व के रथ पर सवार करके संसद भेजा गया वहीं मुसलमानों को नागरिकता संशोधन कानून की आड़ में भयानक तौर पर आतंकित किया गया। गाय के नाम पर भीड़ द्वारा हत्याएं की गयीं और सत्ता में बैठे लोगों ने इस भीड़ का बचाव किया। राज्य ने अपने पूरे चरित्र में हिंदुत्व के बहुसंख्यकवाद को स्वीकार कर लिया है। 

The open agenda of India’s right-wing politics has been the establishment of Hindu Nation

दरअसल भारत की दक्षिणपंथी राजनीति का खुला एजेंडा हिंदूराष्ट्र की स्थापना रहा है। उसके पूरे दर्शन में शुद्ध पूंजीवादी राजनीति का ही पक्ष लिया जाता है। नरेन्द्र मोदी सरकार चाहती है कि संविधान के मूल दर्शन को ही बदल दिया जाए ताकि इसे आगे करके उसके एजेंडे की आलोचना को खत्म किया जा सके। एक तरह से यह संविधान के अंतिम लक्ष्य को बदलने का एक प्रयास है जिसके मूल में समाजवाद और सभी धर्मों के अनुयायियों के लिए सम्मानजनक जीवन की गारंटी है। संघ के एजेंडे में यही दो शब्द बड़े ब्रेक की तरह हैं इसीलिए कई हल्के तर्कों-कुतर्कों के साथ इन दोनों शब्दों को संविधान से हटाने का प्रयास लगातार जारी है।

हरे राम मिश्र

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