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हमारे नेता-नौकरशाह सरकारी बसों से क्यों नहीं चलते?

दिल्ली दुनिया की सबसे घनी आबादी वाला तीसरा शहर है। डीटीसी की सेवाएं (Services of DTC) आज भी दिल्ली मैट्रो जैसी व्यवस्थित क्यों नहीं हो पाई हैं? अरविंद केजरीवाल की घोषणाएं (Arvind Kejriwal’s announcements) हवा हवाई साबित हुई हैं। क्या जनसुविधाएं सही चल रही हैं, सरकार के स्तर पर किसी ने कभी चेक भी किया है? सड़क परिवहन सुविधाओं की स्थिति अराजक क्यों है? पूरी दिल्ली में बेतरतीब विकास के सैकड़ों उदाहरण मिलेंगे। मायावी सरकारी विज्ञापनों के पीछे छिपी कड़वी हकीकत का पर्दा उठा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार पुष्परंजन

Why don’t politicians and bureaucrats travel in government buses?

टीवी पर एक विज्ञापन बड़ा आकर्षित करता है। एक पिता अपनी बेटी से कहता है, ‘आज मैं ऑफिस कार से नहीं, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट से जाऊंगा।’ स्वच्छ हवा के लिए दिल्ली सरकार द्वारा जनहित में जारी यह विज्ञापन स्टेटस सिंबल में आकंठ डूबी पीढ़ी के लिए संदेश देता है। उससे पहले 14 नवंबर को 2021 को टीवी पर और ट्वीट के ज़रिये तमाम लोगों ने देखा, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया अपने चिर- परिचित मुस्कान के साथ साइकिल चलाते कार्यालय की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। इसका नाम ‘राहगिरी कार्यक्रम’ रखा गया है। पहली नज़र में लगा कि सिसोदिया के रोजमर्रे में साइकिल से कार्यालय जाना शामिल हो चुका है। बकलोल टाइप भावुक भक्तों ने मान भी लिया इसे। मगर नहीं, यह कुछेक मिनट के वास्ते वेस्ट विनोद नगर की फ्लैग ऑफ रैली थी, जिसका आगाज़ मनीष सिसोदिया कर रहे थे।

कितने राजनेता-नौकरशाह सार्वजनिक परिवहन द्वारा अपने कार्यालय जाते हैं? (How many politicians-bureaucrats go to their offices by public transport?)

आप पूछ लीजिए, दिल्ली के कितने मंत्री और अफसर साइकिल से दफ्तर जाते हैं? साइकिल छोड़ें, उसमें वीवीआईपी का समय बर्बाद होता है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट से कितने नेता-नौकरशाह अपने कार्यालय प्रस्थान करते हैं? उत्तर, ज़ीरो बटा सन्नाटा है।

मैं यह मानता हूं, दिल्ली में स्कूल (schools in delhi), डिस्पेंसरी सरकार ने शानदार बनवा दिये। मगर, विज्ञापन देने वाले बता दें, कितने नेता-नौकरशाह, उनके परिवार वाले वहां इलाज के लिए जाते हैं, कितने महानुभावों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं? सर्वे करा लीजिए। नेताओं के बाइट लेने वाले पत्रकार ऐसे मुश्किल सवाल प्रेस सम्मेलनों में नहीं पूछते।

क्या ऐसे विज्ञापन केवल उपदेश देने के लिए है? लोग सड़क परिवहन पर कैसे भरोसा करें?

दिल्ली के ट्रांस्पोर्ट मंत्री हैं कैलाश गहलोत। पूछिये उनसे, साल में कब आम शहरी की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से यात्रा की हैं? स्वच्छ हवा के लिए संज़ीदा पर्यावरण मंत्री गोपाल राय से भी पूछ लीजिए। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल पर ख़ूब बयान दिया है। गोपाल राय एआईएसएफ के छात्र नेता रह चुके हैं। विधायक व मंत्री बनने से पहले दिल्ली की बसों में ख़ूब सफर किया होगा। अब न सेहत इज़ाज़त देती, न स्टेटस। फिर ऐसे विज्ञापन क्या केवल उपदेश देने के लिए है? आप इलेक्ट्रिक और बैट्री बसों की फ्लीट ला रहे हैं, अच्छी बात है। सुधारिये वायु की गुणवत्ता (air quality)। मगर टूटी सड़कें, बस चालन के दौरान अराजकता ठीक करने की ज़िम्मेदारी क्यों नहीं लेते? कैसे हो लोगों का रोड ट्रांसपोर्ट पर भरोसा?

डीटीसी की सेवाएं अब भी दिल्ली मैट्रो जैसी व्यवस्थित नहीं हो पाई हैं

एक सच तो स्वीकार कीजिए कि दिल्ली मैट्रो जैसी व्यवस्थित डीटीसी की सेवाएं अब भी नहीं हो पाई है। और शायद कभी हो भी ना। बसों में फोकट में चढ़ने वालों की भीड़, और अंदर ड्राइवर से लेकर कंडक्टर तक की अकड़, उनकी बदतमीज़ी आये दिन लोग कैसे झेलते-बर्दाश्त करते हैं, मंत्री जी को नहीं पता। दिल्ली की बसों में मार्शल नामक पक्षी की नियुक्ति सरकार ने कर रखी है, उसकी भूमिका भी कभी चेक कर लिया करो केजरीवाल जी। चलती बस में उसके सामने ऊटपटांग हरकतें होती रहती हैं, मार्शल मुंह फेर कहीं और व्यस्त दिखता है। बसों में मालूम नहीं कितने सीसीटीवी काम कर रहे? हवा-हवाई घोषणाएं। इन दिनों एक नया फैशन दिल्ली की सरकारी बसों में चल पड़ा है, एक दरवाजा खुलता है, पैसेंजर उसी से चढ़े, और उतरे। कह नहीं सकते, यह जेबकतरों की सुविधा के वास्ते है, या फिर ट्रांसपोर्ट मंत्री ने ऐसा आदेश दे रखा है? ड्राइवर से पूछिए, वह लड़ने को तैयार मिलेगा।

प्रश्न यह है कि जनसुविधाएं सही चल रही है, इसे समय-समय पर चेक क्यों नहीं करते? मीडिया वालों को फुर्सत नहीं कि सप्ताह में एक दिन खामोशी से दिल्ली की बस सुविधाओं का स्टिंग करें।

Status of road transport facilities

सड़क परिवहन सुविधाओं की अराजक स्थिति की सबसे बड़ी वजह मॉनिटरिंग का नहीं होना है। आज भी किसी-किसी रूट पर लोग घंटों बसों के इंतजार में खड़े मिलते हैं। दिल्ली मेट्रो में मालूम तो होता है, अगली गाड़ी कितनी देर में आ रही है। बस स्टॉप पर वाहनों के आगमन की सूचना स्क्रीन नहीं डालेंगे, केवल यूरोप की आधी-अधूरी नकल करेंगे।

इन दिनों दिल्ली के रेड लाइट पर युवा तख्ती लेते प्रदूषण बचाओ अभियान का हिस्सा बनाये गये हैं। जागरूकता के लिहाज़ से अच्छा क़दम है, मगर क्या ये पूरी ड्यूटी चौकसी से कर रहे होते हैं? दुम टेढ़ी की टेढ़ी है। कोई नहीं चेक करने वाला कि चौराहे पर तख्ती कंधे से टिकाये, वो मोबाइल फोन पर कहां लगे हुए हैं। बस दिहाड़ी बननी चाहिए। या यह उम्मीद कि कुछ समय बाद दिल्ली सरकार में नौकरी पक्की हो जाएगी।

उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जिस पांडव नगर इलाक़े में रहा करते थे, वहां एक संजय झील है। इस झील से गुज़रती केवल तीन सौ फीट लंबी एक सड़क विगत तीन साल में तैयार नहीं हो सकी। चुनांचे, वन वे रोड से टू वे ट्रैफिक‘ विश्व के सबसे स्मार्ट सिटी में बदस्तूर जारी है। इससे भी बदतर रोड कंडीशन लक्ष्मी नगर के विकास मार्ग पर है। चकाचक दुकानों तक पहुंचने के वास्ते पथरीले, ऊबड़-खाबड़ रोड से गुज़रिये। ‘नज़र हटी, और दांत टूटी’ वाले जोखिम से भरा विकास मार्ग। पता नहीं किसने, और क्या सोच कर नाम रखा, ‘विकास मार्ग’? पूर्वी दिल्ली में किसी भी सड़क से गुज़र जाएं, बिजली व केबल तारों के जाल को देखकर दिमाग़ घूम जाता है।

नेतागण चाहते, तो सिसोदिया जी के इलाके में अवस्थित संजय झील को अत्याधुनिक एम्यूज़मेंट वाटर पार्क में परिवर्तित कर सकते थे। प्राकृतिक झील का इतना बड़ा इलाक़ा पूरी दिल्ली में ढूंढे से नहीं मिलेगा। यहां कई सारे बिजनेस काम्प्लेक्स, बारात घर, पूल साइड पार्टी वाले लोकेशंस बन सकते थे। इस जगह के कायाकल्प के साथ-साथ करोड़ों रुपये की बारिश हो सकती थी। लाखों रोज़गार का सृजन हो सकता था। इतनी मोटी सी बात पूर्वी दिल्ली के मंत्री, ‘ईस्ट देल्ही प्रीमियर लीग’ कराने वाले सांसद गौतम गंभीर, दिल्ली के टाउन प्लानरों की समझ में नहीं आती, तो इसे दुर्भाग्य के अलावा क्या कहेंगे?

यह सिर्फ़ एक इलाके़ का नज़ीर है, आप पूरी दिल्ली की परिक्रमा करें, बेतरतीब विकास के सैकड़ों उदाहरण मिलेंगे। आप इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रास्ते महिपालपुर के अंदर वाली लेन से गुज़र लें, या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय का इलाक़ा, पंजाबी बाग़, द्वारका दर्शन कर लें, उधर भी हालत अच्छी नहीं है। वास्तविक विकास कहीं हुआ है, तो वह है, लुटियन ज़ोन। बिन मांगी सुविधाएं भी सबसे पहले लुटियन वालों को ही मिलती है, चाहे प्रदूषण कम करने के वास्ते कृत्रिम बारिश हो, या मच्छर भगाओ फागिंग मशीन।

लुटियन से चाणक्यपुरी, जोरबाग़, सफदरजंग इंक्लेव, सुप्रीम कोर्ट या राजघाट से गुज़रेंगे, यूरोप वाली फीलिंग आयेगी। ये वीवीआई मूवमेंट वाले इलाके़ हैं, चुनांचे यहां के बस स्टॉप भी साफ-सुथरे दिखेंगे। बाक़ी दिल्ली वाली बसावट, वही ‘गांधी क्लास’। पुरानी दिल्ली के दरीबा, बल्ली मारान, सदर बाज़ार चले जाएं, उसे न तो सत्तर साल वाला शासन सुधार पाया, न सात साल वाला। 1484 वर्ग किलोमीटर में बसी दिल्ली का लगभग आधा हिस्सा, यानी 783 वर्ग किलोमीटर देहात है, वहां ख़ूब आधुनिक मकान बने। दिल्ली देहात में किराये से धन बरसता है, मगर एक धेला हाउस टैक्स के मद में नहीं मिलता।

ढाई करोड़ की आबादी वाली दिल्ली, टोकियो और जकार्ता के बाद तीसरे नंबर पर दुनिया की सबसे घनी आबादी वाला नगर है। 2194 वर्ग किलोमीटर में बसे टोक्यो की आबादी दिल्ली से पौने दो गुना अधिक है, मगर वहां की टाउन प्लानिंग व नगरीय व्यवस्था, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को कोई अराजक व बेतरतीब नहीं कह सकता। दिल्ली के मंत्रियों और नौकरशाहों के लिए यूरोप या किसी भी विकसित देश में जाना सामान्य सी बात हो चुकी है। ये करते क्या है? मानव विकास के आधे-अधूरे नकल कर आते हैं। उसके पालन की दोहरी नीति साथ होती है। पर्यावरण साफ-सुथरा रखने के वास्ते विज्ञापन की विश्वसनीयता तब बढ़ती जब स्वयं सरकार में विराजे नेता और नौकरशाह एक दिन के वास्ते उसी अव्यवस्थित डीटीसी की बसों में सफर करते, घंटे-आधे घंटे बस के इंतज़ार में बस स्टॉप पर खड़े होते, फिर जन्नत की ज़़मीनी हक़ीक़त से रूबरू होते।

सरकारों का दोगलापन

दरअसल, इस देश में विज्ञापन आम जनता के वास्ते है। सरकारी स्कूल हमने अपने बच्चों के वास्ते नहीं बनाया, सरकारी बसों में सफर मंत्रीजी के लिए नहीं, जनता-जनार्दन के लिए है। इसे कहते हैं दोगलापन (Government hypocrisy)। यह स्वीडेन में नहीं दिखता। एक प्रधानमंत्री को छोड़कर संसद के किसी सदस्य या मंत्री को सरकारी कार से चलने की इज़ाजत नहीं है। स्वीडेन में रिक्सडैग (संसद) के स्पीकर तक को भीड़ वाली पब्लिक बस, अथवा ट्रेन में सफर करना होता है। स्वीडेन में सुप्रीम कोर्ट के जज तक को सरकारी कार की सुविधा नहीं है। आप अपनी कार से जाएं, अथवा सरकार की तरफ जारी पब्लिक ट्रांसपोर्ट कार्ड का इस्तेमाल करें।

यह जानकर भारतीय सांसद हैरान हो सकते हैं कि राजधानी स्टॉकहोम में 349 सदस्यीय स्वीडिश संसद के सदस्यों को 80 के दशक में आवास तक की सुविधा नहीं थी। बाज़दफा वे दफ्तर के सोफे को बतौर बेड इस्तेमाल करते थे। सन् 2000 में रिक्सडैग (संसद) प्रशासन ने ओवरनाइट स्टे की व्यवस्था (overnight stay arrangement) उन सांसदों के लिए की, जो सत्र के दौरान स्टॉकहोम से 50 किलोमीटर बाहर से आते हैं। वह किराये की छोटी सी जगह होती है, जिसे वन बीएचके अपार्टमेंट मानकर चलिए।

2003 का एक वाकया मै भूलता नहीं। स्वीडेन की तत्कालीन विदेशमंत्री अना लिंध का इंटरव्यू मुझे लेना था। स्टॉकहोम में मिलने का समय तय किया। अना ने वहां के सिटी सेंटर ‘क्लारा स्ट्रांड’ पर आने को कहा। वहां हम एक कैफे में मिले, उनसे बातचीत रिकॉर्ड की। उनके साथ कोई सिक्योरिटी नहीं, पीए नाम का पक्षी तक नहीं। हम बात करते बाहर निकले, और विदेश मंत्री अना लिंध सामने बस स्टॉप में पब्लिक के साथ लाइन में लग गईं। भीड़ वाली बस से अना लिंध संसद जा चुकी थीं। मैं महीनों सोचता रहा, क्या भारत जैसे देश में ऐसा होना संभव है?

– पुष्परंजन

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