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क्या हम कभी एलियन को ढूंढ पाएंगे… क्यों नहीं मिलते एलियन?

Why don’t you meet the aliens?

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प्रारम्भ में मानव के पास ज्ञान सीमित था तो उसने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिय़ा और बिना किसी प्रमाण के पृथ्वी बाहर के आकाशीय पिण्डों पर विविध प्रकार के जीव होने की कहानियां रच डालीं। इस विषय पर बहुत साहित्य लिखा गया है। कई लोकप्रिय फिल्में भी बनती रही हैं। 

विज्ञान का विकास होने पर मानव ने पृथ्वी पर जीवन कैसे और कब से है (How and when is life on earth)? जैसे प्रश्नों के उत्तर जानने का प्रयास किया। डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त के साथ ही यह स्पष्ट हो गया गया कि गर्म गोले के रूप में जन्मी पृथ्वी धीरे-धीरे ठण्डी हुई तब इसका वातावरण बना। वातावरण में उपस्थित तत्वों के संयोग से सरल यौगिक व उनसे जटिल यौगिक बने। इन यौगिकों में जीवन के आधार अणु जैसे जल, अमीनों अम्ल, नाभकीय अम्ल आदि भी थे। इन अणुओं के घनीभूत होने पर आकस्मिक रूप से प्रथम जीव की उत्पति हुई। उस प्रथम जीव ने ही जैव विकास की प्रक्रिया द्वारा सहित सभी जीवों को जन्म दिया। पृथ्वी पर जीवन पनपने का कारण उसकी सूर्य से विशिष्ट दूरी है। पृथ्वी सूर्य से इतनी दूरी पर है कि वहां जल तरल रूप में रह सकता है।

अंतरिक्ष की जानकारी (Space information) बढ़ने के साथ ही यह स्पष्ट हुआ कि हमारी अपनी आकाशगंगा में सूर्य जैसे अरबों तारे हैं तथा उनके सौर परिवार भी हैं। अनेक तारों के सौर परिवार में पृथ्वी जैसे ग्रह भी हैं। रेडियो खगोलिकी (Rediyo khagoliki -RADIO ASTRONOMY) के विकास के साथ ही यह ज्ञात होने लगा कि जिन रासायनिक अणुओं ने पृथ्वी पर जीवन को जन्म दिया वे अणु अन्तरिक्ष में बहुतायत से उपस्थित हैं। इससे यह अवधारणा विकसित हुई कि पृथ्वी के बाहर अनेक ग्रहों पर जीवन उपस्थित है।

यह भी माना गया कि अनेक ग्रहों पर पृथ्वी से भी विकसित जीवन है। इसी से उड़न तश्तरियों में बैठ कर एलियनों के पृथ्वी पर आने की बात लोगों के मन में पनपने लगी।

1972 में पायोनियर 10 के छोड़े जाने के समय तो पृथ्वी बाहर मानव से बहुत अधिक विकसित जीवन होने की बात स्पष्ट रूप से स्वीकारी जाने लगी थी। उस समय वैज्ञानिकों को यह भय भी सताने लगा था कि पृथ्वी बाह्य की सभ्यता, हमारी किसी भूल के कारण, हमसे नाराज होकर हम पृथ्वीवासियों पर हमला कर सकती है। 

Pioneer 10 Space probe in Hindi

पायोनियर 10 योजना में अन्तरिक्ष यान को बृहस्पति ग्रह के पास से होते हुए हमारे सौर मण्डल से बाहर चला जाना था। भय इस बात को था कि अपनी अनन्त यात्रा के दौरान पायोनियर 10 किसी विकसित सभ्यता के सम्पर्क में आ सकता था। विकसित सभ्यता पायोनियर 10 को उन पर मानव सभ्यता द्वारा किया हमला मान हम पर पलटवार भी कर सकती थी। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए पायोनियर 10 पर एक प्लेट पर मानव स्त्री-पुरुष को मित्रता की मुद्रा में चित्रित किया गया तथा सांकेतिक भाषा में यान के पृथ्वी से भेजे जाने की बात प्रदर्शित की गई थी।

योजना अनुसार पायोनियर 10 बृहस्पति के पास से होते हुए हमारे सौर मण्डल से बाहर चला गया मगर किसी बाह्य सभ्यता का कोई संकेत नहीं मिला है।

बाहरी जीवन की खोज | Outdoor life search

वैज्ञानिक संसाधनों के विकसित होने के साथ पृथ्वीवासियों ने बाहरी जीवन की खोज करने करने प्रयासों को तेज कर दिया। बड़े बड़े रेडियो दूरसंवेदी (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस 1999 – Search for extra-terrestrial intelligence 1999) लगा कर दूर अन्तरिक्ष में होने वाली फुसफुसाहट को सुनने के प्रयास  किए जाते रहे हैं। इन सभी प्रयासों का परिणाम अभी तक शून्य ही रहा है। मानव से भी अधिक विकसित सभ्यता की बात तो बहुत दूर की है, पृथ्वी से बाहर किसी किसी सूक्ष्म जीव के होने के संकेत भी, वैज्ञानिक जगत, अभी तक नहीं जुटा सका है। इस खोज को किसी परिणाम तक पहुँचाने के लिए नासा ने एक महत्वाकांक्षी योजना प्रारम्भ की है। 

लगभग 100 अरब आकाशगंगाएं हैं ब्रह्माण्ड में

नए वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि हमारी गेलेक्सी आकाशगंगा में एक अरब पृथ्वी के जैसे संसार हैं, इनमें से अनेक पृथ्वी की तरह ही चट्टानी हैं। अब तक देखे गए ब्रह्माण्ड में लगभग 100 अरब आकाशगंगाएं हैंनासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एलेन स्टोफेन का कहना है कि आज हम पृथ्वीवासियों के पास बहुत पक्के सबूत है कि आगामी एक दशक में पृथ्वी बाह्य जीवन को खोज लेगें। 20 या 30 वर्ष में तो एलियन के विषय में पक्के प्रमाण जुटा लिए जाएंगे।

एलेन स्टोफेन की बात पर शंका करने का भी कारण नहीं क्योंकि आभासी सौरमण्डलीय प्रयोगशालाओं व अन्तरिक्ष में उपस्थित दूर संवेदी साधनों ने मानव समझ को पूर्व के किसी समय की तुलना में बहुत बढ़ा दिया है।

पृथ्वी जैसे गृहों के साथ बर्फ से ढंके उपग्रहों जैसे यूरोपा पर भी जीवन खोजा जा रहा है। किसी पृथ्वी बाह्य पिण्ड पर जीवन होने के संकेत अनुभव के साथ बदलते रहे हैं। पहले किसी आकाशीय पिण्ड के वायुमण्डल में आक्सीजन, ओजोन या मीथेन की उपस्थिति जीवन की उपस्थिति का पर्याय माना जाता थी।

प्रयोगों में पाया गया कि भौतिक क्रियाओं में भी ये गैंसें उत्पन्न हो सकती हैं, तब से किसी गैस को जीवन का प्रतीक मानने का पैमाना बदल दिया गया है। वर्तमान यह माना जा रहा है कि यदि मीथेन व ऑक्सीजन दोनों साथ-साथ पाई जाती हैं तो यह जीवन की उपस्थिति का सूचक होगा। यह सोच वैसी ही है जैसे महाविद्यालयी विद्यार्थी उपस्थित हैं तो पिज्जा वहां होगा ही।

यह हुआ सिक्के का एक पहलू।

वैज्ञानिकों के दूसरे समूह की सोच है कि पृथ्वी बाहर जीवन तो मिल सकता है मगर उसके पृथ्वी जैसा विकसित होने की संभावना नगण्य ही है। इनका मानना है कि जीवन के विकास के लिए जल युक्त पृथ्वी जैसा चट्टानी ग्रह होना ही पर्याप्त नहीं है। पृथ्वी जैसे पिण्ड पर जीवन की उत्पति होने में कोई परेशानी नहीं है, परेशानी जीवन की उत्पति के बाद उस पिण्ड के वातावरण को जीवन योग्य बनाए रखने में होती है। इन वैज्ञानिकों का मानना है पृथ्वी जैसे ग्रह के बनने के बाद आधा अरब वर्ष तक तो वह पिण्ड अत्यधिक गर्म व विस्फोटक होता है। ऐसे में जीवन पनपने की कोई संभावना नहीं होती।

लगभग आधे से एक अरब के बीच पिण्ड इतना ठण्डा हो जाता है कि रासायनिक यौगिकों के संयोग से जीवन की उत्पति हो सके।

जीवन की उत्पत्ति के लिए क्या जरूरी है | What is necessary for the origin of life

जीवन की उत्पति के लिए ग्रह के वातावरण का जीवन योग्य होना आवश्यक नहीं है। असली परीक्षा ग्रह के बनने के एक से डेड अरब वर्ष की आयु के बाद में होती है जब वातावरण स्थायी रूप से जीवन योग्य बनाए रखना होता है। यह जंगली साण्ड की सवारी करना जैसा कठिन होता है।

वाइटल डस्टके लेखक डी डुवे (Christian de Duve’s, author of “Vital Dust: Life as a Cosmic Imperative”) का कहना है कि अधिकांश पृथ्वी जैसे ग्रह अपनी आयु के प्रथम एक अरब वर्ष तक ऐसा करने में असफल रहते हैं और वहां उत्पन्न जीवन सूक्ष्म अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। किसी पिण्ड पर जीवन उत्पन्न के बाद, जीवन ग्रह के भौतिक वातावरण के साथ पुर्नभरण संवाद करने लगता है। यह संवाद सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार का हो सकता है। सामान्यत: यह नकारात्मक होता है और जीवन प्रारम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। जहाँ जीवन का अपने वातावरण से सकारात्मक पुर्नभरण संवाद स्थापित हो पाता है वहां ही जीवन का आगे विकास होता है। जैसा कि पृथ्वी पर हुआ। इस सकारात्मक पुर्नभरण संवाद को वैज्ञानिक जेम्स लवलोक व लिन मार्गुलिस (1974) ने गैअन (धरती माता) नियमन नाम दिया है।

 गैअन नियमन के अनुसार पृथ्वी एक सजीव इकाई की तरह कार्य करते हुए उस पर उपस्थित जीवों से सकारात्मक पुर्नभरण करती है। गैअन नियमन को पहले एक परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया गया था मगर आधुनिक अनुसंधानों के आधार पर इसे सिद्धान्त का दर्जा दे दिया गया। आध्यात्मिक विचार के लोग तो पहले से ही धरती को माता कह कर जीवन को पालने में धरती की भूमिका स्वीकारते रहे हैं।

विज्ञान जगत के लिए धरती को सजीव मानना गले नहीं उतर रहा है। इससे धरती के सोद्देश्य विकसित होने की बात सामने आती है जो विज्ञान में स्वीकार नहीं है।

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी एक ईकाई के रूप में कार्य करते हुए ही यहाँ के वातावरण को जीवन के पक्ष में बनाए रखा है। इस बात के प्रमाण मिले है कि जीव व उसका भौतिक वातावरण सकारात्मक पुर्नभरण संवाद करते हुए साथ साथ विकसित हुए हैं। इस बात को स्वीकारते हुए भू-कार्यकी जैसे विषय पढ़ाए जाने लगे हैं। जैव मण्डल (बायोस्फेयर) के रूप में धरती, उसके जीव व वायुमण्डल को एक ईकाई मान कर भू-जैव-रसायन चक्र का अध्ययन किया जाने लगा। यह भी माना जाने लगा है कि भू-जैव-रसायन चक्र में हस्तक्षेप कर मानव ने प्रदूषण को जन्म दे ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) का संकट उत्पन्न किया है।

गैअन बोतल ग्रीवा स्पष्टीकरण के अनुसार पृथ्वी जैसे ग्रह पर, जीवन का उत्पन्न होना व विलुप्त होजाना ही प्रकृति की नियती है। किसी ग्रह को जीवन योग्य बने रहने के लिए उस पर जीवन को होना आवश्यक है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जीवन ही किसी ग्रह के वातावरण को जीवन योग्य बनाता है। ग्रह के वातावरण व जीवों का विकास साथ-साथ चलते हैं मगर जैसे मुँह की जाते हुए बोतल संकरी होती है वैसे स्थाइत्व की ओर बढ़ने का मार्ग भी कठिन होता जाता है। सामान्यत: सफलता नहीं मिलती और जीवन प्रारम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। किसी पृथ्वी बाह्य जीवन से हमारी मुलाकात नहीं हो पाने का रहस्य भी इसी में छिपा है। 

चौपड़ा व लाइन्वीवर की कल्पना के पक्ष में फिलहाल कोई परिणाम उपलब्ध नहीं है। जब अन्तरिक्ष में जीवन मिलने लगेगा और वह सूक्ष्म जीवों के स्तर का ही होगा तो चौपड़ा व लाइन्वीवर की कल्पना की पुष्टि होगी।

कुछ खगोल जीववैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर जीवन के विकास के अध्ययन से कुछ अवरोधक खोज निकाले हैं। सामान्य अणुओं से जनन-क्षम अणुओं की उत्पति पहला अवरोधक रहा होगा। इन अणुओं के संयोग से सरल पूर्वकेन्द्रिकी कोशिका की उत्पति दूसरा अवरोधक रहा होगा। पूर्वकेन्द्रिकी से सुकेन्द्रकी कोशिका की उत्पति तीसरा अवरोधक रहा होगा। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि पृथ्वी पर, 3.5 अरब वर्ष पूर्व, सरल पूर्वकेन्द्रिकी कोशिका बनने के बाद लगभग 1.8 अरब वर्ष तक जीवन में कोई परिर्वतन नहीं हुआ था।  

कुछ लोग परिकल्पना को धर्म प्रभावित मान कर इसको खारिज भी करते हैं। स्पष्ट है कि जब तक कोई एलियन सचमुच में नहीं मिल जाता तब तक कल्पनाओं का दौर चलता रहेगा।

विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी

सेवानिव़ृत प्रधानचार्य

श्री बांगड़ राजकीय उ.मा.वि.पाली ( राजस्थान) 306401

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप)

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