कांग्रेस दलितों के साथ भावनात्मक रिश्ता क्यों नहीं बना पा रही ?

कांग्रेस दलितों के साथ भावनात्मक रिश्ता क्यों नहीं बना पा रही ?

Why is Congress unable to build an emotional bond with Dalits?

दलित सत्यके विमोचन के अवसर पर राहुल गांधी का भाषण वायरल (Rahul Gandhi’s speech on the occasion of the release of book ‘Dalit Truth’ edited by Dr K.Raju,) हो गया है और दरबारी मीडिया ने उनके खिलाफ फिर से आक्रामक शुरुआत की है और भाजपा के ट्रोल्स (BJP trolls) ने राहुल गांधी के भाषणों के चुनिदा अंशों को लेकर उसमें छेद करना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस की दलितों से संबंधित भविष्य की योजना क्या है?

जवाहर भवन सम्मेलन हॉल, जहां पुस्तक का विमोचन किया गया था, पूरी तरह से खचाखच भरा हुआ था। कांग्रेस पार्टी की ओर से जो निमंत्रण आया था उसमें बताया गया था कि पुस्तक विमोचन के पहले एक पैनल चर्चा होगी। कुछ दोस्त थे जिन्हें मैं जानता था और महसूस करता था कि मुझे सिर्फ उनसे मिलने के वास्ते वहा जाना चाहिए और इस बहाने कुछ अन्य दोस्तों से भी मुलाकात हो जाएगी।। मुझे लगा कि यह समझने का अवसर है कि कांग्रेस डॉ अंबेडकर के बारे में क्या सोचती है (What does Congress think of Dr. Ambedkar) और दलितों से संबंधित कांग्रेस की भविष्य की योजना क्या है (What is the future plan of Congress regarding Dalits?)

सभागार के अंदर दर्शकों में विभिन्न राज्यों के कांग्रेस कार्यकर्ताओं का बहुमत था, लेकिन मुख्य रूप से ये दिल्ली और हरियाणा और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों से थे। समृद्ध भारत फाउंडेशन के बोर्ड सदस्य थे जो आगे की पंक्ति में बैठे थे। भीड़ को मैनेज करते हुए सेवा दल की गतिविधियां भी दिखाई दे रही थीं।

साढ़े दस बजे तक हॉल खचाखच भरा हुआ था और इसके बाद आयोजकों ने पैनल चर्चा शुरू कर दी। लेकिन जैसा होता है राजनैतिक कार्यक्रमों में ‘बुद्धिजीवियों’ की फजीहत होने के अलावा कुछ नहीं होता। एक तो लोग आपको सुनना नहीं चाहते क्योंकि ये लोग नहीं थे, पार्टी के कार्यकर्ता थे जिन्हें अपने ‘नेता’ को सुनने के लिए लाया गया था इसलिए इन्हें बौद्धिकता से कोई विशेष मतलब नहीं होता। और दूसरे यह कि जोर जोर से नारे लगाना उनकी मजबूरी हो जाती है।

समस्या यही खत्म नहीं होती, पैनल में आपको दो तीन मिनट में बात खत्म करनी होती है। फिर जब नेता पहुँच जाते हैं तो पैनल पर जल्दी खत्म करने का दबाब पड़ता है और उन्हें ‘नए’ वी आई पी के लिए जगह छोड़ पीछे की सीटों पर बैठने के लिए कह दिया जाता है। राजनीति मे वीआईपी कल्चर (VIP culture in politics) अभी भी बहुत हावी है और काँग्रेस तो इसकी अम्मा है।

Creating a New Dalit Politics to Counter Hindutva

हिंदुत्व का मुकाबला करने के लिए एक नई दलित राजनीति का निर्माण विषय महत्वपूर्ण था, लेकिन मॉडरेटर ने इसे काँग्रेस और दलित मुद्दे (Congress and Dalit Issues) में बदल दिया और फिर ये बताया गया कि कांग्रेस ने उनके लिए ‘इतना’ करने के बावजूद दलितों को कांग्रेस में कैसे वापस लाया जा सकता है। इसे कांग्रेस नेता राजेश लिलोठिया द्वारा संचालित किया जा रहा था और इसमें श्री भंवर मेघवंशी, श्री अनुराग भास्कर, जिग्नेश मेवानी, पूनम पासवान, प्रणति शिंदे आदि शामिल थे।

चर्चा सुनकर मुझे लगा कि कांग्रेस ने अम्बेडकरवादी बुद्धिजीवियों को सामने लाने का एक बड़ा अवसर खो दिया है। कोशिश थी कि ‘दलितों’ को जगह दी जाए लेकिन बहस को बीजेपी वर्सेज कांग्रेस में ऐसे तब्दील करते रहे मानो असली विषय यही है।

Why did Dalits move away from Congress?

मॉडरेटर द्वारा पूछे गए सवाल थे ‘ दलित कांग्रेस से दूर क्यों चले गए’? तो एक पwनलिस्ट ने इसका उत्तर यह दिया कि हम अपने काम की ‘मार्केटिंग’ नहीं करते हैं और इसे और अधिक आक्रामक तरीके से करने की जरूरत है।

एक और योग्यव्यक्ति का कहना है कि दलितों के बीच इतने सारे समुदाय हैं और हमें एक या दो समुदायों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए बल्कि दूसरों पर जाना चाहिए।

दलित मध्यम वर्गों की बढ़ती आकांक्षाओं की भी चर्चा हुई, जिन्हें राजनैतिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ भूमि सुधार की आवश्यकता की बात भी सामने आई।

समस्या यह थी कि मॉडरेटर की कोशिश थी कि पूरे मुद्दे को इस रूप में बदल दिया जाए कि दलित ‘हिंदुत्व’ के खिलाफ क्यों नहीं लड़ रहे हैं और उन्हें कांग्रेस में लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। फिलहाल एक अच्छे विषय को ईमानदारी से बहस करने की बजाए उसे पार्टी का मुखौटा बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिश की गई जो सही नहीं था। दूसरी बात यह बहुत बड़ा विषय है और इस पर अधिक समय और वक्ताओं को लेकर बात करने की जरूरत थी।

पैनल डिस्कशन के तुरंत बाद राहुल गांधी आए और किताब के विमोचन के बाद श्री के राजू लगभग पांच मिनट तक बोले और फिर राहुल गांधी बोलने के लिए उठे।

यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि राहुल गांधी का जो भाषण वायरल हो गया, वह हकीकत में असली विषय से बिल्कुल अलग थलग था। उनके इरादे अच्छे हो सकते हैं और वह निश्चित रूप से एक सभ्य और सोचने समझने वाले व्यक्ति हैं, फिर भी उन्होंने कल जो बयान दिया वह एक परिपक्व नेता का संकेत नहीं था, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के बारे में अधिक था जो यह साबित करना चाहता है कि वह लोगों की कितनी परवाह करता है लेकिन उसका संदेश नकारात्मक था। उन्होंने उना की घटना और वे वहां कैसे गए, का वर्णन किया लेकिन ऊना के बारे में कहानी अधूरी रह गई और वह जो संदेश देना चाहते थे वह अचानक अधूरा रह गया। उनका कहना है कि जब वह ऊना पीड़िता के परिवार को देखने गए तो उन्होंने देखा कि कई युवकों ने आत्महत्या करने का प्रयास किया था और फिर वह उनसे मिलने अस्पताल गए. उसने उनमें से कुछ बोलने की कोशिश की और जब उसने एक से कहा कि तुमने आत्महत्या क्यों की, तुमने अपराधी को क्यों नहीं मारा, तो एक लड़के ने उससे कहा कि उसे डर है कि अगर उसने उसे मार डाला, तो वह दलित एक के रूप में पैदा होगा।

राहुल गांधी ने एक और बात के बारे में भी बताया कि वह एक सांसद से मिले और उनसे पूछा कि क्या वह पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। भाजपा के सांसद ने उनसे कहा कि वह नहीं करते हैं। राहुल ने फिर उनसे पूछा कि क्या वह पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते हैं तो वह भगवान राम में कैसे विश्वास करते हैं। उनका कहना है कि सांसद ने उनसे इस बारे में सार्वजनिक रूप से नहीं बोलने को कहा। राहुल गांधी इससे क्या संवाद करना चाहते थे, यह कोई नहीं जानता। सच तो यह है कि संघ परिवार के ट्रोलर्स को उनके और उनके संवाद के खिलाफ ढेर सारे गोला-बारूद मिले हैं।

पुनर्जन्म और भगवान राम में आस्था के बीच क्या संबंध है ? और अगर कोई रिश्ता भी हो तो वह दलितों के मुद्दों से कैसे जुड़ा है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे कांग्रेस पार्टी को क्या सियासी लाभ होने वाला है?

क्या यह संचार की समस्या है या इतिहास का बोझ? (Is it a communication problem or a burden of history?)

राहुल गांधी ने ‘दलित सत्य’ पर एक लंबा भाषण दिया, लेकिन उसमें सार का अभाव था। उनकी दो कहानियां कोई जवाब नहीं देतीं बल्कि भ्रम और अस्पष्टता को दर्शाती हैं। ऊना कथा का वास्तव में कोई मतलब नहीं था। उन्होंने दिल से बात की और इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनका इरादा नेक है लेकिन दलितों का मुद्दा केवल उनके ‘संरक्षक’ होने का नहीं है बल्कि उन्हें अपनी बात और अपने निर्णय स्वयं रखने की अनुमति है।

सच कहूं तो, यह अकेले राहुल गांधी नहीं थे, बल्कि कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे को संभालने में बहुत ही संरक्षणवादी रुख दिखाया। वह जिग्नेश मेवानी से पूछ सकते थे कि कांग्रेस कार्यकर्ता कितनी बार ऊना गए हैं। उना में दलितों ने विरोध किया और यह बड़ा विरोध था। उन्होंने अपना ‘पारंपरिक’ पेशा छोड़ दिया और नए काम को चुना। मई 2018 में उन सात और उनके परिवारों सहित कई लोगों ने विरोध स्वरूप बौद्ध धर्म को अपनाया, जिन्हें ऊना में दरबार समुदाय के गुंडों ने पीटा था।

गुजरात में दलित राजनैतिक तौर पर शक्तिशाली नहीं हैं क्योंकि वे राज्य की आबादी का केवल 7% हैं और इसलिए उनके खिलाफ हिंसा राज्य में कभी भी एक राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया, इस तथ्य के बावजूद कि यह मुद्दा एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय समाचार बन गया, लेकिन राजनीतिक रूप सत्ता परिवर्तन के लिए यह मुद्दा कारगर नहीं हो सकता। हां न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए सच के साठ खड़ा होना आवश्यक है और ये मुद्दा तब राजनतिक तौर पर प्रभावकारी होगा जब इसमें दूसरे समुदायों की भागीदारी होगी।

हां, गुजरात में दलितों को जबरदस्त मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा क्योंकि उनकी संख्या कम है और उन्हें कोई समर्थन नहीं मिलता है। हिंदुत्व मॉडल उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर बना रहा है और इसलिए प्रतिरोध कठिन हो गया है। दलितों के साथ-साथ आदिवासियों के खिलाफ सवर्ण हिंदुओं के लिए आर्थिक बहिष्कार एक शक्तिशाली उपकरण रहा है।

गुजरात में मुख्यधारा के सामाजिक आख्यान ने कभी भी अंबेडकरवाद को गांवों तक नहीं पहुंचने दिया। राजनीतिक दलों ने शायद ही कभी अपने मुद्दे उठाए लेकिन ऊना की घटना ने दलितों को अम्बेडकर और बौद्ध धर्म को समझने के लिए मजबूर किया। उन्होंने उन लोगों में से कई को भी देखा जो ऊना के माध्यम से ‘राष्ट्रीय’ और ‘अंतर्राष्ट्रीय’ बन गए लेकिन फिर कभी ऊना जाकर उत्पीड़ितों से मिलने की जहमत नहीं उठाई। इस तरह का विश्वासघात दलितों को मायूस कर देता है और वे सवाल करते हैं।

मुझे यकीन नहीं है कि क्या राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी यह समझते हैं कि दलितों का मुद्दा न केवल ब्राह्मणवाद के प्रति गुस्सा दिखा रहा है बल्कि सत्ता में भागीदारी भी है। यह अम्बेडकरवाद के बारे में भी है और इस तथ्य को महसूस करना कि भारत के मुद्दों को अम्बेडकरवादी विचारों की अनदेखी करके हल नहीं किया जा सकता है। क्योंकि पूरे कार्यक्रम मे काँग्रेस की तरफ से बाबा साहब का नाम केवल एक फॉर्मैलिटी के तौर पर लिया गया, दिल से जो बात आनी चाहिए थी वो नेताओं की जुबान पर नहीं थी।

पूरे कार्यक्रम की प्रकृति और इसकी रूपरेखा को देखते हुए, यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से अम्बेडकरवाद या अम्बेडकरवादी विचारधारा को अपनाने में सक्षम नहीं है। दो महिला पैनलिस्टों की ओर से ‘प्रतिरोध’ था, जो कांग्रेस पार्टी से प्रतीत होती हैं, तब भी जब पैनलिस्टों में से एक ने स्पष्ट रूप से डॉ अंबेडकर की तस्वीरें कांग्रेस मुख्यालय में लगाने के साथ-साथ उनके योगदान का सम्मान करने की बात कही थी।

जिग्नेश मेवानी ने कहा कि मध्यम वर्ग के दलितों की आकांक्षाओं का सम्मान करने की जरूरत है, लेकिन ज्यादातर कांग्रेस नेताओं को लगता है कि इसे ‘दलितों के लिए लड़ने’ और उन्हें यह दिखाने की जरूरत है कि इसने उनकी कितनी ‘देखभाल’ की है। खैर, इस तथ्य को नजरअंदाज करने की जरूरत नहीं है कि दो यूपीए सरकारों ने न केवल आरक्षण पर हमला किया, बल्कि निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया।

जहां तक निजीकरण का सवाल है, नरेंद्र मोदी उन मुद्दों को और आगे ले जा रहे हैं, जिन्हें यूपीए-द्वितीय ने छोड़ दिया था।

जिस तरह से कांग्रेस नेताओं ने दलित मुद्दों और उनके प्रतिनिधित्व के बारे में बात की, वह जमीनी हकीकत में समझ की कमी या इनकार को दर्शाता है। पहली बात, अगर कांग्रेस या राहुल गांधी दलित और उसकी विरासत के मुद्दे को समझने के बारे में कुछ सीख सकते हैं, तो प्रतिनिधित्व के मुद्दों का सम्मान करना और सत्ता संरचना में हिस्सा लेना है। आज ये सभी ओबीसी, आदिवासी और अल्पसंख्यक समेत इस प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस के पास एक समय में इन समुदायों के कई नेता थे, लेकिन कांग्रेस को इस तथ्य को कम नहीं समझना चाहिए कि मंडल के बाद का भारत अलग है। अब, भारत में दलितों के मुद्दे को डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ अपने संबंधों को समझे बिना नहीं निपटा जा सकता है। वे दिन गए जब कांग्रेस को बाबू जगजीवन राम के नाम पर वोट मिलते थे। आज, उस विचार के बहुत से लोग नहीं हैं और बाबूजी के नाम से दलितों का वोट तो कतई नहीं मिल सकता। नरेंद्र मोदी ने बाबा साहेब अंबेडकर का कितना ‘सम्मान’ किया है, यह दर्शाने के लिए हर मौके का इस्तेमाल किया है, कांग्रेस पार्टी में उस परिष्कार का अभाव है। आज भी पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान मंच के किनारे डॉ. अम्बेडकर की तस्वीर रखी गई थी और राहुल गांधी द्वारा दी गई श्रद्धांजलि महज एक औपचारिकता थी।

डॉ अम्बेडकर को समझने के लिए कांग्रेस ने खोया अवसर

राहुल गांधी अपने पूरे भाषण में वर्ण समाज के संकट को दर्शाने के लिए अंबेडकर को उद्धृत नहीं कर सके। दलितों को ‘जैसे के लिए तैसा’ करने के लिए कहने का उनका प्रयास थोड़ा सनकी था, जो डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने किसी अनुयायी से कभी नहीं कहा। अम्बेडकरवाद केवल ब्राह्मणवादी ‘शोषण’ या उत्पीड़न का जवाब देने का दर्शन नहीं है बल्कि उससे भी बड़ा है। प्रबुद्ध भारत का विचार एक समावेशी दर्शन है जो भारत को वर्ण व्यवस्था के कारण हुए विखंडन से और भी दूर ले जा सकता है। अगर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी वास्तव में दलितों और उनके मुद्दों के बारे में बोलना चाहते हैं तो कांग्रेस पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है कि वह संरक्षणवादी दृष्टिकोण से दूर हो और यह स्पष्ट रूप से समझें कि अम्बेडकर और उनके विचारों के बिना आप दलितों तक नहीं पहुंच सकते।

अंबेडकर फुले पेरियार एक वैकल्पिक सामाजिक सांस्कृतिक दर्शन दिए और कहीं पर भी उन्होंने हिंसा की वकालत नहीं की।

राहुल गांधी इस अवसर का उपयोग अम्बेडकरवाद के विचारों को नेहरू की विचारधारा के साथ लाने के लिए कर सकते थे जो भारत को एक आधुनिक राष्ट्र बना देगा जैसा कि वे दोनों चाहते थे। अम्बेडकर और नेहरू दोनों ही आधुनिक भारत के निर्माता और प्रतीक बने हुए हैं। उनमें समानताएं अधिक हैं और यद्यपि मतभेद हैं लेकिन निश्चित रूप से उनकी समानताओं की बात अधिक थी। दुर्भाग्य से, राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने इस संबंध में बहुत कम काम किया है और ऐसा लगता है कि कांग्रेस अभी तक बाबा साहेब अम्बेडकर को स्वाभाविक रूप से गले नहीं लगा पाई है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस को राजनैतिक तौर पर मजबूत रहने की जरूरत है क्योंकि ये भारत के लोकतंत्र के लिए बेहद आवश्यक है। यह पार्टी सभी हाशिए के लोगों की आवाज बन सकता है जिन्हें अवसर नहीं मिला है। कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि कई जगहों पर दलितों की अपनी पार्टियां हैं और इन वर्गों से स्वायत्त नेतृत्व उभरने में कुछ भी गलत नहीं है। जब तक कांग्रेस अपने मंचों को अपने मंचों के भीतर स्वतंत्र नेता बनाने की अनुमति नहीं देती, तब तक उसे समस्या होगी। मैंने लंबे समय से सुझाव दिया था कि कांग्रेस को बसपा के साथ चैनल खोलने की जरूरत है और उसे उत्तर प्रदेश में बड़ा हिस्सा लेने की स्वीकार्यता देनी चाहिए। कांग्रेस और बसपा के एक साथ आने से पार्टी को अन्य हिस्सों में मदद मिलती, जहां बसपा की मौजूदगी नहीं है, लेकिन अम्बेडकरवाद मौजूद है और उस सद्भावना के लिए अन्य राज्यों में कांग्रेस को बहुत जगह मिलेगी। दुर्भाग्य से, कांग्रेस की दलित पहुंच प्रकृति में ब्राह्मणवादी दिखती है और तेलंगाना जैसी जगहों पर, बसपा के डॉ आरके प्रवीण कुमार दलितों को बसपा में लाने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बाहर, तेलंगाना वह राज्य है जहां बसपा निश्चित रूप से ठीक होने के संकेत दे रही है क्योंकि डॉ प्रवीण कुमार ने हाल ही में बड़े पैमाने पर अभियान और राज्य के कोने-कोने में यात्रा शुरू की है।

बसपा और मायावती पर राहुल गांधी का घटिया बयान

बसपा प्रमुख मायावती पर राहुल गांधी का बयान स्थिति की खराब समझ को दर्शाता है। मैंने कई बार इसका उल्लेख किया है, जैसे मैं चाहता हूं कि कांग्रेस मजबूत हो, मैं चाहता हूं कि बसपा भी बढ़े क्योंकि यह हमारे लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। यह दावा करना कि सुश्री मायावती ने ईडी और सीबीआई के डर से चुनाव नहीं लड़ा, बेहद खराब फैसला है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बसपा उत्तर प्रदेश में अपनी लड़ाई बहुत पहले हार गई क्योंकि दलितों के बीच धारणा की लड़ाई में भी वह चुनाव नहीं लड़ रही थी। हम नहीं जानते क्यों लेकिन उनकी धारणा खतरनाक थी और अंततः पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन राहुल गांधी के लिए इस तरह की टिप्पणी करना अच्छा नहीं है क्योंकि बसपा ने तकनीकी रूप से अभी भी कांग्रेस पार्टी की तुलना में बहुत बेहतर प्रदर्शन किया है और कांग्रेस के मुकाबले लगभग 12% वोट शेयर दयनीय 2% है।

यह कहना कि आप मायावती को ‘मुख्यमंत्री’ बनाते हास्यास्पद है क्योंकि राजनीति में सब कुछ लुट कर ऐसी बात कहने के कोई मायने नहीं है। अगर अखिलेश यादव ने इस तरह का बयान दिया होता, तो कोई भरोसा करता, राहुल गांधी और काँग्रेस पार्टी ईमानदारी से ये बात बताएं कि क्या बसपा ने उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान में समय समय पर काँग्रेस पार्टी की सरकार बनाने में सहयोग नहीं किया ? इससे ज्यादा ये महत्वपूर्ण है के आखिर काँग्रेस ने इसका जवाब कैसे दिया ? हकीकत ये है कि काँग्रेस के स्थानीय नेताओं ने बसपा को इन तीनों राज्यों में खत्म करने के प्रयास किए और विधायकों से दल बदल करवा लिया। आप अपने को समर्थन देने वाली पार्टी के साथ ऐसा व्यवहार करके क्या संदेश दे रहे हैं ? कम से कम काँग्रेस इस संदर्भ में भाजपा से बहुत कुछ सीख सकती है।

बार-बार दलितों से ये सवाल करना के वे भाजपा में क्यों गए या हिन्दुत्व के साथ क्यों गए, दलितों की राजनीतिक सोच को कम आँकने जैसा है।

कांग्रेस जो अभी भी ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग के लिए अपने प्यार से दूर नहीं हुई है और जिसने खुद को ब्राह्मणों के अनुकूल दिखने के लिए सब कुछ पेश किया है, वह दलितों से जवाब कैसे मांग सकती है।

यह चौंकाने वाला है कि कोई यह नहीं पूछ रहा है कि सवर्ण, ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ, बनिया भाजपा को वोट क्यों दे रहे है ? कांग्रेस क्यों नहीं समझ पा रही है कि ब्राह्मण और सवर्ण वापस अपने पाले में नहीं आने वाले हैं और जब तक वह खुले दिल से अम्बेडकरवाद की अपनी समझ के साथ दलितों के पास नहीं जाती, तब तक वह आगे नहीं बढ़ सकती।

जब मैं अम्बेडकरवाद का सुझाव दे रहा हूं, तो मैं केवल यह सुझाव दे रहा हूं कि अम्बेडकर के विश्व दृष्टिकोण को समझे बिना कांग्रेस वास्तव में दलित वोटों का दावा नहीं कर सकती।

कांग्रेस को अपने घटते वोट बैंक के बारे में गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी को वैचारिकता के आधार पर खड़ा करने की जो कवायद की उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन इसके लिए अभी भी कई चीजों की जरूरत है।

कांग्रेस का पतन 1980 से शुरू हुआ जब जनता पार्टी प्रयोग के विफल होने के बाद इंदिरा गांधी सत्ता में वापस लौटीं। तभी से हिंदुत्व से छेड़खानी शुरू हो गई। अधिकांश कांग्रेस नेताओं में राजनीतिक विचारधारा का अभाव था और पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। 1984 में स्वर्ण मंदिर पर हमले और फिर श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को भारी जनादेश दिया लेकिन भारत में धर्मनिरपेक्ष राजनीति को हरा दिया। अल्पसंख्यकों को खलनायक बनाने के कांग्रेस के प्रयोग का इस्तेमाल भाजपा ने वर्ष 2002 में गुजरात में किया था। पार्टी का ध्यान शासन करने पर अधिक था और पार्टी के कैडर निर्माण पर कम था।

राहुल गांधी यूपीए-द्वितीय विशेष रूप से पी चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी, मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा के काम काज की समीक्षा होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने जो किया उसके परिणाम काँग्रेस आज तक भुगत रही है।

कांग्रेस ने 1980 के दशक में भिंडरवाले के रूप में एक राक्षस बनाया और 2012 में उसने अन्ना को बड़ा किया क्योंकि उसे लगा कि केजरीवाल और अन्ना को प्रोत्साहित करने से भाजपा का वोट कट जाएगा लेकिन काँग्रेस ने अति चालाकी में सब कुछ खो दिया।

1989 में जब वीपी सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया, तो राजीव गांधी ने वास्तव में संसद में इसका विरोध किया। राहुल गांधी को यह नहीं भूलना चाहिए कि राम जन्मभूमि का मंदिर 1985 में अरुण नेहरू द्वारा खोला गया था।

आज, कांग्रेस को वास्तव में आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि दलितकांग्रेस से क्यों चले गए हैं। पार्टी भी दलितों को लुभाने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन असफल रही और इसका कारण बहुत आसान है। जैसा कि 1989 के बाद भारत के राजनीतिक मानचित्र में चीजें बदल गई हैं। कांग्रेस इसे पसंद करती है या नहीं लेकिन हाशिए के लोग सत्ता संरचना में हिस्सा लेना चाहते हैं और वे केवल हाशिए के मुद्दे को नहीं बोलना चाहते हैं बल्कि उन्हें महत्व दिया जाना चाहिए।

भाजपा ने जाति की गतिशीलता को कांग्रेस से काफी बेहतर समझा और समाज के सभी वर्गों को इसमें लाया। कांग्रेस दुर्भाग्य से अस्पष्ट थी और वैचारिक संकट से पीड़ित थी क्योंकि 1980 के दशक के बाद से अधिकांश ‘चमचा’ को पार्टी संरचना में वरीयता मिली। एक ‘चमचा’ और पार्टी की विचारधारा के प्रति समर्पित व्यक्ति में अंतर होता है। काँग्रेस में कनेक्शन मायने रखता है और इसके परिणामस्वरूप ऐसे लोग मंत्री बने जिन्हें पार्टी और कार्यकर्ताओं से कोई मतलब नहीं था।

मेरा कहना है कि राहुल गांधी की मंशा सही है। मुझे अभी भी लगता है कि कांग्रेस ही एकमात्र राष्ट्रीय विकल्प है, लेकिन साथ ही, मैं कम से कम उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बसपा जैसी पार्टियों का हमेशा समर्थन करूंगा, जहां उनके पास अभी भी अच्छी तरह से काम करने पर सत्ता में लौटने का एक उचित मौका है।

राहुल गांधी के लिए महत्वपूर्ण है कि वे विभिन्न वर्गों के नेताओं को बढ़ावा दें जो लोगों के मुद्दों को उठा सकें। कोई यह समझ सकता है कि कांग्रेस पार्टी के लिए सभी को एक साथ लाना कठिन है, लेकिन यह एक तथ्य है कि कांग्रेस को स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की पहली सरकार का आह्वान करने की जरूरत है, जिसमें विभिन्न विचारधाराओं और दलों के लोग थे। जनसंघ के साथ-साथ डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर सहित सभी दलों के महत्वपूर्ण नेता नेहरू कैबिनेट का हिस्सा थे।

कांग्रेस जवाहरलाल नेहरू और डॉ अंबेडकर की वैचारिक धारणाओं में मौजूद समानता को सामने लाये। यह महत्वपूर्ण होगा लेकिन इसके लिए राहुल गांधी को ऐसे सलाहकारों की जरूरत है जो यह कार्य कर सकें और वे लोग अंबेडकर फुले पेरियार, भागात सिंह, राहुल सांकृत्यायन, नेहरू आदि के धर्मनिरपेक्ष समाजवादी विचारों को एक मंच पर लाएं ताकि स्वाधीन भारत की विशाल सामाजिक सांस्कृतरिक धरोहर यहां की ब्राह्मणवादी राजनीति का शिकार न हो सके। इस ‘पुस्तक विमोचन’ समारोह जैसे अवसर का उपयोग डाक्टर अम्बेडकर के विचारों को कांग्रेस पार्टी में लाने के लिए किया जा सकता था न कि अवांछित विवादों को उठाने के लिए जो न तो राहुल गांधी की मदद करेंगे और न ही कांग्रेस पार्टी को।

विद्या भूषण रावत

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व प्रसिद्ध अंबेडकरवादी चिंतक हैं।

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