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आख़िर मोदी जी इतनी बेतुकी बातें क्यों कर रहे हैं ?

आख़िर मोदी जी इतनी बेतुकी बातें क्यों कर रहे हैं ?

Why is Modi ji talking so absurdly?

मोदी ने साइकिल को ही आतंकवादी क्यों बता दिया?

सब लोग अब यह गौर करने लगे हैं कि यूपी के चुनाव में मोदी के भाषण कुछ अजीबोग़रीब हो रहे हैं। सिवाय कुछ सचेत सांप्रदायिक विभाजनकारी बातों के किसी को उनके भाषणों में कोई तुक नज़र नहीं आ रहा है। वे लोग भी, जो कभी मोदी की वाग्मिता पर मुग्ध रहा करते थे, अभी बेहद निराश दिखाई हैं। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आख़िर किस तर्क पर मोदी ने साइकिल को ही आतंकवादी बता दिया।

जबसे उन्होंने यह कहा कि लाल टोपी यूपी के लिए ख़तरे की घंटी है, उसके बाद से ही, अर्थात् कहा जा सकता है कि यूपी में चुनाव की चौसर के पूरी तरह से जमने के बाद से ही लगता है जैसे मोदी के भाषण पटरी से उतरने शुरू हो गए। अब तो वे छाती ठोक कर यूपी के लोगों को गोबर के व्यापार से मालामाल होने का नुस्ख़ा बताने तक की क़समें खाने लगे हैं !

मोदी के भाषणों में इस प्रकार की लगातार गिरावट के साथ ही साथ इस चुनाव प्रचार में एक और दृश्य भी सबको दिखाई देने लगा है। चारों ओर से भाजपा के सभी नेताओं की सभाओं के फ़्लाप होने के वीडियो सामने आने लगे हैं। अब तक उनकी कई सभाएँ और रोड शो रद्द भी हो चुके हैं। मोदी तक की सभा में भारी संख्या में कुर्सियाँ ख़ाली पड़ी रहती हैं। उनकी किसी सभा में कोई जोश, उत्साह नहीं दिखाई देता। उल्टे मोदी का भाषण शुरू होने के पहले ही लोग लौटने लगते हैं।

सवाल है कि यूपी चुनाव का यह नजारा क्या ज़ाहिर करता है ?

सभाओं में ख़ाली कुर्सियाँ और लोगों में भाषणों के प्रति एक उदासीनता और अस्थिरता तथा मोदी के भाषणों का बढ़ता हुआ बेतुकापन — क्या इन दोनों का आपस में कोई संबंध है ?

बंगाल के चुनाव के बाद ही हमने अपने एक लेख में काफ़ी विस्तार के साथ यह बताया था कि इसी बिंदु से प्रकट रूप में भारत की राजनीति में मोदी-शाह युग का अंत हो चुका है। यूपी का चुनाव जैसे ही जमने लगा, अचानक यह दिखाई देने लगा कि जहां लोग मान रहे थे कि इनमें भाजपा का कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं होगा, वहाँ अचानक जैसे बिल में से निकल कर अखिलेश और मंडलवादी राजनीति तथा किसान जनता की एक पूरी फ़ौज सपा का झंडा उठा कर तेज़ी से पूरे परिदृश्य पर छाती चली गई। इस विकराल हो रहे हुजूम को देख कर ही मोदी के मुँह से अनायास निकल गया था – ‘लाल टोपी यूपी के लिए ख़तरे की घंटी है।‘ अपने अंदर बज उठी घंटी की चिंता को उन्होंने यूपी के ज़रिए ज़ाहिर किया !

इसके बाद, जैसे-जैसे अखिलेश के गठबंधन का सैलाब बढ़ने लगा, भाजपा के ख़ेमे में दिल्ली से लेकर लखनऊ तक भारी भागमभाग शुरू हो गई। आम कार्यकर्ताओं की बेचैनी को शांत करने के लिए शुरू में तो आरएसएस वालों ने कई कथित ‘आरएसएस विशेषज्ञों’ के ज़रिए यह प्रचार शुरू करवाया कि कोई चिंता की बात नहीं है। आरएसएस के लाखों कार्यकर्ता यूपी के एक-एक घर में पहुंच जा रहे हैं; पूरे प्रचारतंत्र पर संघ का एकाधिपत्य है; वे दिन को भी रात साबित कर सकते हैं ! इनके कार्यकर्ता अकल्पनीय रूप में निष्ठावान, बेहद अनुशासित और प्राणों पर खेल कर भी संघ-बीजेपी के हितों की रक्षा करेंगे। ये ऐसे कार्यकर्ता है जो सिवाय किसी ‘नियमित फ़ौज’ के अन्यत्र नहीं पाए जाते हैं। ‘सेना का लौह अनुशासन इनकी शक्ति है।’

और सर्वोपरि, बीजेपी के पास हज़ारों-लाखों करोड़ रुपये की अतुलनीय आर्थिक शक्ति है। एक/एक सीट पर सौ-दो सौ करोड़ फूंक दिए जाएँगे।

इस पर पिछले दिनों हमने अलग से एक टिप्पणी भी लिखी थी। उनके ज़रिए कुल मिला कर यही दर्शाया जा रहा था कि आरएसएस-बीजेपी की चमत्कारी शक्ति के सामने इनके ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने वाला हर दल बहुत तुच्छ और बौना होता है और अंत में पराजित होने के लिए अभिशप्त भी है !

यह प्रचार कैसे राजनीति के ज़रिए असंभव की साधना के मूलभूत सत्य के विरुद्ध है, इसे हमने अपनी उस टिप्पणी में बताया था। हमने लिखा था कि “राजनीतिक परिवर्तन की चपेट में बड़ी-बड़ी राजसत्ताओं के परखच्चे उड़ ज़ाया करते हैं, आरएसएस या कम्युनिस्ट पार्टी या किसी भी पार्टी का अपना तंत्र तो बहुत मामूली चीज हुआ करता है।”

जानिए बधियाकरण चिंता/ कैस्ट्रेसन एनजाइटी किसे कहते हैं?

बहरहाल, संघ की यह कृष्ण के विराट रूप वाली चकमेबाजी ज़रा भी कारगर साबित नहीं हुई और मतदान के तीन चरणों के बाद ‘संघी चमत्कार’ की आस लगाए हुए ये सभी टिप्पणीकार भी अब अपने सुर को बदल चुके हैं। और कहना न होगा, यूपी में निश्चित पराजय की गूंज अभी से भाजपाई गलियारों में सब जगह सुनाई देने लगी है।

पराजय का अंदेशा ही वह पहली परिस्थिति होती है, जब आदमी को अपनी शक्ति के क्षय का दंश सताना शुरू कर देता है, उसकी बेचैनी बढ़ने लगती है, वह होश गँवाने लगता है। मनोविश्लेषण में इसे कैस्ट्रेसन एनजाइटी (castration anxiety) कहते हैं। ख़ास तौर पर जब किसी शक्तिवान को, जो अपने प्रबल प्रताप को मन-प्राण से जिया करता है, उसे अपनी शक्ति को गँवाने का अहसास होने लगता है, तब उसका होश ठिकाने पर नहीं रह सकता है।

मोदी के भाषणों में असंतुलित बातों का बढ़ना सबसे पहले तो इसी castration anxiety के परिणाम के रूप में सामने आई। लाल टोपी सपने में भी उन्हें सताने लगी।

पर इस विषय का दूसरा पहलू कहीं ज़्यादा गहरा और जटिल है। यह वह पहलू है, जिसे हमने ‘मोदी-शाह युग के अंत’ के रूप में देखा और रखा था। इसका अर्थ यह है कि अब मोदी की राजनीति से किसी की कोई अपेक्षा शेष नहीं रह गई है। लोगों ने इनकी सांप्रदायिक राजनीति के मर्म और उसकी ओट में इनके नेताओं की तमाम कुरीतियों को जान लिया है, और देश के लिए इसके अनिष्टकारी प्रभाव को भी अच्छी तरह से पहचानना शुरू कर दिया है।

जाने-माने मनोविश्लेषक जॉक लकान का प्रसिद्ध सूत्र है – Man’s desire is the desire of the Other। आदमी की कामना अन्य की कामना होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक हेगेल कहते हैं कि आदमी को अपनी स्वीकृति के लिए ही हमेशा किसी ‘अन्य’ (Other) की ज़रूरत होती है। यदि ‘अन्य’ में आपसे कोई अपेक्षा न हो, वह उदासीन हो, तो आप किसी से किसी संवाद की प्रक्रिया में शामिल ही नहीं हो सकते हैं। आप एकतरफ़ा और बेपरवाह होकर अपनी बात कहते जाने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं, आपकी बात को कोई ग्रहण कर भी रहा है या नहीं , आपको इसका होश नहीं रहता। यही वह स्थिति है जो ‘अन्य’ के न होने की स्थिति में आदमी को दफ़्ती की तलवार भांज कर अपने शौर्य का प्रदर्शन करने वाले काग़ज़ी शेर का रूप दे देता है। व्यक्ति हास्यास्पद होने लगता है।

जनतांत्रिक राजनीति में जिससे अब कोई नई अपेक्षा नहीं रह जाती है, उसके युग का अंत मान लिया जाना चाहिए। अनुभव बताता है कि ख़ास तौर पर यह तब ज़्यादा तेज़ी से घटित होता है जब कोई भी दल अपनी शक्ति का अधिकतम प्रदर्शन कर चुका होता है।

इस बात में हमें कोई आश्चर्य नहीं होता है कि 2006 में जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा को इतिहास में सबसे अधिक सीट मिली थी, उसके बाद ही 2011 के चुनाव में वाम मोर्चा बुरी तरह से पराजित हो गया। उसकी सारी बातें यकायक बेअसर दिखाई पड़ने लगीं, इसके पहले 1984 में जब अधिकतम सीटों के साथ केंद्र में कांग्रेस विजयी हुई थी, उसके बाद ही 1989 में वह अल्पमत में आ गई। अधिकतम सीटों पर विजयी होने का यह एक स्वाभाविक परिणाम हो सकता है कि आगे के चुनाव में आपसे लोगों की अपेक्षाएँ ही न रह जाए। यूपी में भी अभी बीजेपी के साथ यही हो रहा है। और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यही होगा। जब आपको स्वीकृति देने वाला ‘अन्य’ आपके सामने ही नहीं होगा तो आपके भाषण किसी की भी अपेक्षाओं को संबोधित होने के बजाय एक आत्म-प्रलाप का रूप लेने लगेंगे। तब विपक्ष पर मूर्खतापूर्ण आक्रमणों के अलावा आपके पास और क्या शेष रह जाएगा !

मोदी सचमुच अभी इसी दशा में पहुँच गए हैं। यूपी का चुनाव परिणाम चार चरणों के मतदान के बाद पूरी तरह से साफ़ दिखाई देने लगा है, जो अब उनके सिर पर चढ़ कर बोलने लगा है।

अरुण माहेश्वरी

arun maheshwari
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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