क्या है मोदी जी की परेशानी का सबब! मन की बात छोड़कर अपनी औकात पर क्यों आए नरेन्द्र मोदी?

क्या है मोदी जी की परेशानी का सबब! मन की बात छोड़कर अपनी औकात पर क्यों आए नरेन्द्र मोदी?

परेशान क्यों हैं नरेन्द्र मोदी?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी परेशान हैं ऐसा लगता नहीं था, लेकिन माननीय ने अचानक अपनी औकात का ढोल पीटकर साबित कर दिया कि वे परेशान हैं। देश का प्रधानमंत्री यदि परेशान हो तो आम जनता का परेशान होना स्वाभाविक है।

ये देश की खुशनसीबी है कि हमें नरेन्द्र मोदी जी जैसा ईमानदार प्रधानमंत्री मिला, जो मन की बात खुले मन से करते हैं। यहां तक कि वे अपनी औकात तक जनता से नहीं छिपाते। आपके साथ मैं भी हैरान, परेशान हूं कि ये अचानक औकात बीच में कहां से आ गई! बीच में तो गुजरात विधानसभा के चुनाव हैं।

मोदी जी को गुजरात में घर-घर वोट क्यों मांगने पड़ रहे हैं?

पिछले कुछ सालों से देश में जितने भी चुनाव हुए हैं या हो रहे हैं वे सब आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नाम पर हो रहे हैं। केंद्र के चुनाव हों या राज्यों के, सब में प्रधानमंत्री जी को अपनी साख दांव पर लगाना पड़ती है। इस बार तो उन्हें अपने गृहराज्य में घर-घर वोट मांगने पड़ रहे हैं। ऐसे में औकात का याद आना लाजमी है।

क्या राहुल गांधी मोदी जी के मुकाबले में हैं?

ये पहला मौका है जब देश के किसी प्रधानमंत्री को अपनी जनता के सामने अपनी औकात का हवाला देना पड़ रहा है। मोदी जी ने अपनी औकात के मुकाबले में राहुल गांधी को सामने रखकर बहुत बड़ी ग़लती कर दी। राहुल गांधी तो मोदी जी के मुकाबले में इन दिनों कहीं हैं ही नहीं। वे तो लगातार सड़कें नाप रहे हैं।

क्या पीएम मोदी ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की सफलता को स्वीकार कर लिया है?

राजनीति में औकात का सहारा लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक तरह से राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की कामयाबी को कबूल कर लिया है। बीते आठ-नौ साल में देश ने माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की औकात को लगातार बढ़ते देखा है। वे एक चाय वाले से विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर हैं किन्तु अचानक ही परिदृश्य बदल गया है। लगता है कि प्रधानमंत्री जी अचानक राजनीति में आई तब्दीली से घबड़ा गये हैं। और यही घबड़ाहट आप उनकी तकरीरों में नुमाया होते देख रहे हैं।

वे दो काम कौन से हैं जो पीएम मोदी नहीं कर पाए?

असंख्य कामयाबियों के बावजूद प्रधानमंत्री जी दो काम नहीं कर पाए। उनकी ऐढ़ी -चोटी की कोशिश के बाद भी देश कांग्रेस मुक्त नहीं हो रहा और दूसरे वे विश्वगुरु नहीं बन पा रहे हैं। ये मुमकिन हो सकता था यदि प्रधानमंत्री जी बजाय काशी आने के गुजरात में ही रहते और खुद को गंगा का बेटा न कहते। अब गुजरात भी समझ गया है कि जो व्यक्ति सियासी मुनाफे के लिए अपनी मां बदल सकता है उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

आप बुरा न मानें तो कहना चाहूंगा कि हमारी मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि रही भरोसे का संकट है। सरकार ने लगातार जनता के बीच अपना भरोसा तोड़ा है। परेशान जनता ने अब तो शिकायत करना ही बंद कर दिया है। जनता के बीच सरकार का भरोसा टूटना सबसे बड़ा नुक्सान माना जाता है।

बहरहाल मेरी तमाम सहानुभूति माननीय प्रधानमंत्री जी के साथ है, राहुल के साथ नहीं। राहुल के पास समय भी है और साहस भी। राहुल गांधी की वजह से मोदी जी को हीन भावना का शिकार नहीं होना चाहिए। वे मुश्किल से प्रधानमंत्री बने थे और उन्हें हमेशा मुश्किलें घेरे रहें ये अच्छी बात नहीं है।

गुजरात में और हिमाचल में क्या होगा इससे मैं बेपरवाह हूं। जानता हूं कि इन दोनों सूबों की सियासत प्रधानमंत्री जी का भविष्य बना और बिगाड़ नहीं सकती। ताजा हालात में मुझे मिर्जा गालिब का कहा याद आता है।वे कहते हैं कि –

बारहा देखी है उनकी रंजिशें,

पर कुछ अब की सरगरानी और है।

राकेश अचल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आजकल अमेरिका प्रवास पर हैं।

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